पतियों के हाथों पिटती पत्नियों के लिए तो पूरा समाज आंसू बहाता है पर पत्नी यदि पीटने पर उतारू हो जाए तो पति बहुत ही किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है. आज की जिम जाने वाली, शरीर से स्वस्थ पत्नी पति से ज्यादा ताकतवर हो सकती है और पति की खासी पिटाई कर सकती है, विशेषकर तब जब पति को किसी गलती का एहसास कराना हो. वैसे पत्नियां जो पिटती हैं और मुंह बंद रखती हैं उन में से ज्यादातर जानती हैं कि उन की खुद की गलती कम नहीं होती पर उन्हें दूसरों की सहानुभूति मिल जाती है.

अमेरिका में पत्नी की पिटाई से एक पति इतना तंग आ गया कि उस ने न केवल पत्नी की हत्या कर दी, मरी पत्नी के फोटो फेसबुक पर डाल कर खुद को पुलिस के हवाले कर दिया कि कानून उसे मौत की सजा दे या उम्रभर की कैद.

दरअसल पिटाई, खासतौर पर पतिपत्नी के बीच किसी समस्या को हल नहीं कर सकती. यह सामाजिक देन है कि पीटने से आप दूसरे को डरा सकते हैं. बाहर के लोग चाहे पिटाई की वजह से चुप हो जाएं पर जिसे घर में रहना है उसे पीट कर पीटनेवाला कुछ नहीं पा सकता. यह पिटाई भाईबहनों में हो, बापबेटेबेटी में हो या पतिपत्नी में, निरर्थक है. यह हिंसा प्रकृति की देन नहीं है. पशु आक्रामक प्रतिद्वंद्वी से लड़ते कम हैं, मान जाते हैं. केवल माया को पाने के लिए या अपने अधिकार क्षेत्र को बचाने के लिए वे लड़ते हैं. जो दूसरों को मार कर खा जाते हैं उन का मामला दूसरा है.

पतिपत्नी के बीच में जब हिंसा का सा माहौल हो जाए तो घर छोड़ देना सब से सरल और सही उपाय है. जिसे लगे कि उस के साथ अन्याय हो रहा है, उसे घर छोड़ कर चले जाना चाहिए, चाहे कम सुविधाओं में जीना पड़े. सुविधाओं, बच्चों के भविष्य, पैसे के लिए हिंसा सहना गलत है. यह आत्मसम्मान के भी खिलाफ है और अव्यावहारिक भी. सब से बड़ी बात यह है कि जिस घर या जिन बच्चों को बचाने के लिए हिंसा सही जाती है, वे कभी एहसान नहीं मानते. हिंसा के शिकार के प्रति आदर कभी नहीं पनपता, हिंसा करने वाले के प्रति चाहे गुस्सा, क्षोभ, घृणा हो.

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