वर्ष 2011 में अमेरिका के सैनिकों द्वारा देर रात में हैलिकौप्टरों से पाकिस्तान की सीमा में 100 किलोमीटर अंदर घुस कर ओसामा बिन लादेन के ऐबटाबाद के गुप्त ठिकाने पर हमला कर उसे  मार डालने से जहां अमेरिका ने अपना संकल्प पूरा किया वहीं उस ने पाकिस्तान सरकार को लुंजपुंज साबित कर दिया. इस की जांच के लिए पाकिस्तान सरकार द्वारा बैठाए गए आयोग की तैयार रिपोर्ट को एक विदेशी चैनल ने प्रसारित कर दिया जबकि पाकिस्तान सरकार की इस पर चुप रहने की मंशा थी.

आयोग ने यह तो जाहिर किया है कि ओसामा बिन लादेन 2002 से पाकिस्तान के विभिन्न शहरों में रह रहा था पर इस बात को मानने में आयोग हिचका है कि सेना प्रमुख, राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को इस बाबत जानकारी थी. यह बात अजीब लगती है कि जिस व्यक्ति को पकड़ने के लिए अमेरिका बुरी तरह पीछे पड़ा हो और कई मिसाइल अटैक कर चुका हो, उस के बारे में पाकिस्तान की सरकार को मालूम न हो.

आयोग ने रास्ता निकाला है कि पाकिस्तान की सरकार बेहद निकम्मी साबित हुई है और साथ ही अमेरिका के सीमा में घुसने पर उसे दुश्मन होना करार दिया. आयोग को कोई सुबूत नहीं मिला जिस से वह सेना प्रमुख आदि की जानकारी में होने की बात को स्वीकारता पर वह आईएसआई, पाकिस्तान की विशेष गुप्तचर संस्था का हाथ अवश्य मानता है.

इस आयोग की रिपोर्ट वैसी ही है जैसे हमारे यहां के आयोग देते हैं-न इधर की बात करते हैं न उधर की. मोटे से गं्रथ में घुमाफिरा कर तीनचौथाई ऐसे तथ्य दे देते हैं जो सब को मालूम होते हैं. पाकिस्तान के लिए ओसामा बिन लादेन को पनाह देना लगभग अनिवार्य था क्योंकि उसी के बल पर वह अमेरिका को लगातार ब्लैकमेल करता था और उस से सहायता लेता था. जब तक ओसामा को मारा नहीं गया, पाकिस्तान की हर बात अमेरिका मानता गया. पाकिस्तान में वास्तविक लोकतंत्र के लौटने के आसार अगर दिख रहे हैं तो इसीलिए कि अब सेना और मुल्लाओं को एहसास होने लगा है कि अमेरिका को अब ब्लैकमेल करना संभव नहीं है.

यह आयोग यह स्पष्ट करता है कि कई बार सरकारें कितनी असहाय होती हैं कि अपने यहां छिपे व्यक्ति के बारे में भी उन्हें कुछ नहीं मालूम होता. सरकारें सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापक नहीं, यह ओसामा बिन लादेन ने मर कर साबित कर दिया.

 

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