टीवी खौलते ही एंकरों की दनदनाती आवाज. मानों बहुत समय बाद उन्हें कुछ उन के मतलब का टोनिक मिल गया हो. इतने दिन मजदूरमजदूर की पीपरी बजा कर यह एंकर अपने असली मुददों से भटक गए थे. पिछले 4-5 दिनों से मजदूरों की पलायन की ख़बरों को चलाचला कर इन का हाल ठीक वैसे ही हो गया था जैसे इंडियन क्रिकेटरों का विदेशी पिचों पर होता है. 6-8 साल से चेनलों पर चमकते या चमकाए गए इन नए एंकरों की जमात मजदूरों के मुददों से ऐसे अज्ञान थी जैसे देश की जनता कालेधन से.

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