लेखक-   डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

किन्नरों कि रंग बिरंगी दुनिया कि पहचान बन चुकी जयपुर की हवेली में खामोशी है. अभावों और तमाम संघर्षों के बाद भी शाम पड़े यह हवेली अल्हड़ और मस्त जीवन का पर्याय बन जाती थी,जहां प्यार,दुलार,स्नेह और दुआओं कि ध्वनियाँ अक्सर सुनाई देती थी,लेकिन कोरोना के संकट से बदली परिस्थितियों अब यह रंगीन माहौल हताशा और निराशा का बाज़ार बन गया है जहां सब कुछ खामोश है और भूख का खौफ निराश आंखों में देखा जा सकता है.

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