सरित प्रवाह, फरवरी (प्रथम) 2014
संपादकीय टिप्पणी ‘राजनीतिक दल और विकास’ सटीक लगी. 66 सालों में गरीबी और जनसंख्या का विकास हुआ है. भारत की आबादी 1 अरब 23 करोड़ है. चाहे कोई भी पार्टी सत्ता में आए, विकास करना कठिन है. विकास के लिए ईमानदार नेता और अफसर चाहिए जो पैसे का सदुपयोग करें. कोई पार्टी कहती है इन्कमटैक्स नहीं लगना चाहिए. मुलायम सिंह ने कहा है कि गरीबों को गैस सिलेंडर मुफ्त में दे दो. परंतु इस के लिए पैसा कहां से आएगा जबकि 45 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हैं.
परिवार नियोजन के कानून सख्त बनें, भ्रष्टाचार कम हो तभी विकास हो सकता है. चुनाव जीतने के लिए झूठे वादे करना खतरनाक है. इस से अराजकता फैल सकती है.
आई प्रकाश, अंबाला छावनी (हरियाणा)
 
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‘राजनीतिक दल और विकास’ शीर्षक से प्रकाशित आप की टिप्पणी उत्कृष्ट है. कांगे्रस, भाजपा और ‘आप’ व अन्य विकास से संबंधित दावे कर रही हैं, अनेक घोषणाएं कर रही हैं लेकिन जनता की सेवा के बारे में वे कुछ नहीं बता रहीं, सेवा करेंगी भी या नहीं, करेंगी तो किस रूप में करेंगी.
जनता की सेवा का अर्थ यह नहीं कि एक राजनीतिक दल से अपेक्षा की जाए कि वह सड़कें साफ कराएगा या पुलिस वाले की ड्यूटी लगाएगा. यह काम प्रशासन का है, उस पर नजर रखना जीतने वाले राजनीतिक दल का है, यह जनता की सेवा नहीं है. यह तो प्रशासन जनता से मिले पैसे के बदले करता है, यह उस का कर्तव्य है. सब से बड़ा काम है लोगों को कुरीतियों, गलत परंपराओं, धर्मजाति के नाम पर अलगाव, आर्थिक भेदभाव, मुनाफाखोरी, तनाव, शोषण आदि से बचाना.
आम आदमी पार्टी को छोड़ कर अन्य पार्टियों ने यह ध्येय रखने की कभी आवश्यकता नहीं समझी. उन्हें जनता या समाज से सरोकार नहीं है, वे केवल भाषा, जाति, धर्म, क्षेत्र के जंजालों में जनता को फंसा कर गन्ने से निकाले रस की तरह निचोड़ कर पावर रस निकालने में लगी हैं. विकास तब होगा जब हर नागरिक की उत्पादकता बढ़े, पर जब तक नागरिकों के पैर सामाजिक कीचड़ में धंसे रहेंगे, कुछ ज्यादा नहीं हो सकता. अब देखना है कि देश का भविष्य क्या होता है. पार्टियां तो तीनों अपनेआप में प्रयत्नशील हैं. किस पार्टी की विजय होती है यह तो वक्त बताएगा.
कैलाश राम गुप्ता, इलाहाबाद (उ.प्र.)
 
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संपादकीय टिप्पणी ‘कानून और न्यायाधीश’ काबिले तारीफ है. हमारे देश की जनता को आज भी यह विश्वास है कि देरसवेर मुकदमों का फैसला न्यायाधीश जो भी करते हैं वे कसौटी पर खरे उतरते हैं. पर यह कहना भी तर्कसंगत नहीं है कि फैसला सुनाने वाले जज पूरे पाकदामन होते हैं क्योंकि अभी हाल ही में 2 जजों पर जो आरोप लगे हैं उस से न्याय करने वालों की गरिमा को ठेस पहुंची है.
प्रदीप गुप्ता, बिलासपुर (हि.प्र.)
 
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उम्मीद की किरण
फरवरी (प्रथम) अंक में प्रकाशित लेख ‘शातिरों से बचना ‘आप’ की चुनौती’ नवनिर्मित ‘आम आदमी’ दल के लिए सचेतक का काम करता है. वास्तव में ऊबी और वीआईपी कल्चर से दुखी व परेशान जनता को ‘आम आदमी पार्टी’ के रूप में अंधेरे में उम्मीद की एक किरण नजर आई है. ऊबी इसलिए कि उसे पक्षविपक्ष परदे के पीछे मिले हुए नजर आते हैं जिस में क्षेत्रीय दल का वजूद न्यूसैंस वैल्यू ही दिखाता है.
अब रह गई बात वीआईपी कल्चर की तो उस का यह हाल है कि मंत्रीजी आ रहे हैं तो घंटों पहले सड़क रोक दो. फिर चाहे जनता का कोई चिकित्स्यकार्य क्यों न हो, वह मरे अथवा जिए. जब तक साहब बाअदब गुजर नहीं जाते, मजाल क्या है जो परिंदा भी पर मार जाए.
अब किस को क्या दोष दें, आखिरकार जनता ही ने तो उन्हें वीआईपी बनाया है. वे खुद थोड़े न वीआईपी बन गए हैं.   ‘आप’ इस फर्क को मिटाने की कोशिश में है. उस के ऊपर ये इलजाम लग रहे हैं कि 49 दिन में क्या किया. जबकि यही प्रश्न अन्य दलों से पूछा जाना चाहिए.
कृष्णा मिश्रा, लखनऊ (उ.प्र.)
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लेख ‘शातिरों से बचना ‘आप’ की चुनौती’ को पढ़ कर यही पता चलता है कि ‘आप’ के लिए असली चुनौती पुराने स्थापित दल ही बन रहे हैं जोकि ‘आप’ के द्वारा उठाए हर कदम पर वार करने से नहीं चूकते. वे यह भूल रहे हैं कि नवजात शिशु भी गिरगिर कर ही संभलता है और कुछ उसे आसपास वाले सहारा देदे कर संभालते हैं जिस में कि पुराने दलों या विपक्षी दलों की भूमिका एकदम नकारात्मक रही है.
वहीं दूसरी ओर केजरीवाल, जोकि हर सुविधा के लिए मना कर रहे थे, उन को भी समझना होगा कि जैसे दहेज लेना या मांगना अपराध है मगर लड़की वाले यदि अपनी इच्छा से जरूरत की कुछ वस्तुएं लड़की को शादी में देते हैं तो वह दहेज या अपराध नहीं, आवश्यकता है.
मुकेश जैन ‘पारस’, बंगाली मार्केट (नई दिल्ली)
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लेख ‘शातिरों से बचना ‘आप’ की चुनौती’ पसंद आया. ‘आम आदमी पार्टी’ के लिए सुखद है कि 1 वर्ष पहले अरविंद केजरीवाल द्वारा बोया गया छोटा सा बीज बहुत ही कम समय में अंकुरित हो कर ऐसा वटवृक्ष बनने जा रहा है जिस की शाखाएं पूरे भारत में फैल जाएंगी. आज जहां आम आदमी इस पेड़ की ठंडीठंडी छांव का आनंद लेने के लिए उतावला हो रहा है वहीं दूसरी ओर कई भ्रष्टाचारी चीलकौवे की तरह इस की खूबसूरत शाखाओं पर अपना घोंसला बनाने की साजिश रच सकते हैं.
इस बारे में यही कहना ठीक है कि इस के माली और उस की पूरी टीम को एकजुट हो कर ऐसे लोगों से सावधान रहना चाहिए. तभी आम आदमी पार्टी आम आदमी के काम की रहेगी.
प्रवीण कुमार ‘धवन’, जगराओं (पंजाब)
 
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वास्तविकता का बोध
लेख ‘दबंगई की राह पर बचपन’ (फरवरी प्रथम) में लेखक ने बच्चों में पनपती हिंसा एवं उद्दंडता के लिए जिन कारकों को जिम्मेदार ठहराया है उन से सहमति व्यक्त की जा सकती है. आज के चकाचौंध भरे दौर में बच्चों को ललचाने के लिए रंगीन सपनों की अधिकांश दुकानें टीवी, फिल्म एवं इंटरनैट के जरिए चारों तरफ फैली हुई हैं जो उन्हें हसीन व काल्पनिक दुनिया की सैर करा कर मझधार में छोड़ देती हैं. परिणामस्वरूप उन में असंतोष व कुंठा के बीज पनपने लगते हैं जो बाद में अपराध और हिंसा का रूप धारण कर लेते हैं.
ऐसी अवस्था में मातापिता का दायित्व है कि वे अपने बच्चों का सही मार्गदर्शन करें. उन की गतिविधियों का अवलोकन करते रहें और उन के साथ जुड़ कर उन को वास्तविकता का बोध कराएं. उन्हें स्पष्ट हिदायत दें कि उन की मेहनत ही उन्हें अच्छे परिणाम देगी. उन की उद्दंडता को कभी भी बाल्यावस्था समझ कर अनदेखा न करें. हकीकत में देखा जाए तो मांबाप से बेहतर बच्चों की मनोदशा को कोई नहीं समझ सकता. बच्चों में जब भी कोई गलत प्रवृत्ति उत्पन्न होती है तो वे अकसर अपने को असुरक्षित महसूस करते हैं. तब मातापिता उन का सुरक्षा कवच बन कर उन को उस दलदल से बाहर निकाल सकते हैं.
यह सही है कि वर्तमान समय में मातापिता के समक्ष भी अनेक समस्याएं एवं चुनौतियां विद्यमान हैं जिन में वे उलझे रहते हैं, किंतु जब बच्चों की जिंदगी और सुनहरे भविष्य का सवाल हो तो ये कठिनाइयां काफी हलकी प्रतीत होती हैं.
सूर्य प्रकाश, वाराणसी (उ.प्र.)
 
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रोचक अंक
सरिता एक ऐसी पत्रिका है जो ढोंग और आडंबर के विरुद्ध कई वर्षों से लड़ रही है. इस के कई लेखों ने मेरे सोचने के तरीकों को बदल दिया है.फरवरी (प्रथम) अंक कई दृष्टि से उल्लेखनीय रहा है. ‘रजस्वला’ जैसी कहानी लिखने के लिए लेखिका की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है. वहीं दूसरी ओर लेख ‘दंगों के बाद की जिंदगी बेबस और बेहाल’ तथा ‘समलैंगिक गृहस्थी पर कानून की चोट’ ने पाठकों को सोचने का अलग नजरिया प्रदान किया.
वैसे तो सरिता के सभी लेख एक नया दृष्टिकोण, एक नई सोच प्रदान करते हैं परंतु 2 बिंदुओं पर आप का ध्यान आकर्षित करना चाहती हूं : पहला, इस अंक के एक लेख ‘संस्कार व नैतिकता माने क्या हैं’ में लेखक के ज्यादातर विचार मुझे सही एवं सटीक तो लगे परंतु उन का एक वाक्य चुभता तथा गलत महसूस हुआ.
लेखक का कहना है कि ‘कोढि़यों की सेवा हो या दुखियों की मदद, ईसाई मिशनरियां ही उन्हें हाथोंहाथ लेती हैं. दूसरी तरफ हम छूना तो दूर घृणा से मुख मोड़ लेते हैं.’
परंतु ऐसा नहीं है कि कोढि़यों की सेवा केवल ईसाई मिशनरियां ही करती हैं. कई सरकारी, गैर सरकारी एजेंसियां भी हैं. यहां तक कि कई आप और मुझ जैसे लोग भी हैं जो अपने शहर के कोढि़यों तथा दुखियों की सेवा करते हैं, बिना उन का धर्म जाने या उन के धर्म परिवर्तन कराए. न उन से घृणा करते हैं न द्वेष.
दूसरा, कहानी ‘बड़े ताऊजी’ एक बहुत अच्छी कहानी है परंतु उस कहानी के कुछ वाक्यों ने मन को उद्वेलित कर दिया. उस कहानी में एक वाक्य है : ‘अकसर औरतें ही हर फसाद व कलहक्लेश का बीज रोपती हैं. ज्यादा झगड़ा सदा औरतें ही करती हैं.’
मैं यही कहना चाहूंगी कि झगड़ा वहीं होता है जहां स्वार्थ और कुटिलता होती है. उस में किसी का स्त्रीपुरुष होना जिम्मेदार नहीं होता. हर फसाद की जिम्मेदार औरत को क्यों ठहरा दिया जाता है, जबकि करने वाले पुरुष होते हैं.
मेरा सिर्फ इतना कहना है कि औरत को हर गलत बात के लिए जिम्मेदार ठहराना बंद होना चाहिए. आशा करती हूं, आप इसे गलत नहीं समझेंगे.
पल्लवी, फाजिल्का (पंजाब)
 
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कोहरे से झांकती किरण
अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के अभ्युदय ने हिंदुस्तान के करोड़ों निराशहताश एवं किंकर्तव्यविमूढ़ जन के मन में उम्मीद की नई किरण जगाई है. आज के दौर में सभी राजनीतिक पार्टियां सैद्धांतिक व नैतिक बातें तो बड़ीबड़ी करती हैं लेकिन सियासी फायदे के जोड़तोड़ की खातिर सत्ता के दलालों व भ्रष्टों-ए राजा, वीरभद्र सिंह, बी एस येदियुरप्पा जैसों के सामने घुटने भी टेकती रहती हैं. 
ऐसा नहीं है कि उन तमाम पार्टियों में ईमानदार देशभक्त लोग नहीं हैं, किंतु वे घुट कर जीने को अभिशप्त हैं. इन परिस्थितियों में अन्ना हजारे के शिष्य केजरीवाल राष्ट्र के इतिहास में एक बड़ी करवट की दहलीज पर हैं. वे भ्रष्टाचार, अहंकार, व्यक्तिवाद, आडंबर, चरणवंदन से मुक्त हैं. वे विनम्र, संवेदनशील क्रांति की उच्चस्तरीय राजनीति के जरिए देश का माहौल बदल सकते हैं. वे दूसरे दलों को व्यक्ति, वंश, धर्म, जाति एवं क्षेत्रवाद के दलदल से ऊपर उठ कर वतनपरस्त, साफसुथरी सियासत करने को मजबूर कर पाए तो उन की पार्टी की सफलताअसफलता से परे वे इतिहास में ‘नायक’ का दरजा पा जाएंगे.
अर्चना विकास खंडेलवाल, जबलपुर (म.प्र.)
 
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करनी व कथनी में अंतर
जीवन सरिता स्तंभ के अंतर्गत ‘संस्कार व नैतिकता के माने क्या हैं’ लेख में इस कथन से सहमत हुआ जा सकता है कि जो संस्कार हमारे भीतर इंसानियत की एक चिंगारी न पैदा कर सकें उन्हें दफन कर देना चाहिए. संस्कारों की आड़ में पिछले दिनों जो कुछ देश व समाज में घटा है वह आंखें खोलने के लिए पर्याप्त है.
आज मनुष्य के आचारविचार व व्यवहार में झूठ, पाखंड व बनावटीपन स्पष्ट नजर आता है. कथनी व करनी में फर्क नजर आने लगा. स्थिति यह हो गई है कि सुबह मछलियों को दाना चुगाने वाले ढोंगी शाम को फिशकरी खाते हैं.
कितनी विडंबना है कि गाय इस देश में पूजा करने के योग्य मानी जाती है और वहीं काटने के काम भी, स्त्रियों को देवी समझ कर पूजा की जाती है और सब से ज्यादा दुष्कर्म उन्हीं के साथ किए जाते हैं. संस्कारों ने ही देश को जाति व वर्गों में विभाजित कर इंसानों के बीच नफरत की दीवार खड़ी कर दी है जिस से देश का विकास अवरुद्ध हो गया है. बरसों से जमे इन सड़ेगले संस्कारों को मन से उतार फेंकना चाहिए ताकि समाज व देश का पुनर्निर्माण हो सके.  
श्याम चौरे, इंदौर (म.प्र.)

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