सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने मदर टेरेसा को संत की उपाधि देने पर उन्हें अर्धशिक्षित, धोखेबाज और कट्टरपंथी तक कह डाला पर इस पर कोई कांवकांव नहीं हुई. आलोचना की यह काटजू  शैली कोई भेदभाव नहीं करती, इस का यह मतलब नहीं कि वे हमेशा सटीक होती है, बल्कि इस का एक मतलब यह है कि देश में एक बड़ा वर्ग है जो इस तरह के धार्मिक ढकोसलों से इत्तफाक नहीं रखता क्योंकि ये मूलतया धर्म की दुकानदारी बढ़ाने के लिए किए जाते हैं.

वैसे भी हमारे देश में संतमहात्माओं का टोटा नहीं है. ऐसे में क्रिश्चियन ही सही, एक और संत पैदा हो गया तो कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ना है. मौजूदा ब्रैंडेड संतों के लक्षण तो उन से भी गए बीते हैं जो काटजू ने टेरेसा में गिनाए. धर्मांधों और दानदाताओं को तो खुश होना चाहिए कि एक और नई गुल्लक मार्केट में आ गई.

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