शरीअत का कहर

अधेड़ावस्था में पिता बनने की चाहत फिल्म अभिनेता शाहरुख खान को महंगी पड़ रही है. वे यह ख्वाहिश किराए की कोख के जरिए पूरी करने जा रहे हैं. बात जब उजागर हुई तो मुल्लामौलवी तिलमिला उठे और शरीअत का हवाला देते हुए शाहरुख को हड़काने लगे. बकौल मुफ्ती मुजफ्फर हुसैन, सैरोगेसी से बच्चा पैदा करना बेहयाई है. इस मौलवी का कहना यह है कि बच्चे वैसे ही पैदा करने चाहिए जैसे कुदरती तौर पर होते हैं.

यानी शाहरुख को बेहयाई से बचने के लिए अपनी पत्नी गौरी से बेवफाई करनी चाहिए, यह जायज है. दोनों ही बातें औरतों पर जुल्म ढाती हुई हैं और मजहब के ठेकेदार यही चाहते हैं. वजह, किराए की कोख उन के धंधे को खोटा करती है. किसी के व्यक्तिगत मामले में दखल देना भले ही शरीअत में गुनाह हो लेकिन मौलवी समुदाय तो इसे करता ही रहा है.

इश्तहारी त्रुटि

जमाना इश्तहारों का है, कई तो इतने अच्छे होते हैं कि लोग उन्हें ही देखने के लिए टीवी देखते व पत्रिकाएं खरीदते हैं. जाहिर है कि ये विज्ञापन नामी और अच्छी एजेंसियों द्वारा तैयार किए जाते हैं. लेकिन सरकारी विज्ञापन आमतौर पर उबाऊ और पुराने जमाने की श्वेतश्याम डौक्यूमैंट्री फिल्मों सरीखे होते हैं जिन्हें देखने के बजाय लोग एक ?ापकी ले लेना पसंद करते हैं.

यूपीए सरकार की उपलब्धियां गिनाने के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने तकरीबन 2 अरब रुपए विज्ञापनों पर खर्च किए पर इन में से एक में क्रिकेटर महेंद्र सिंह धौनी को चेन्नई टीम का कैप्टन बिहारी... कहा गया था. छीछालेदर हुई तो कुछ दिनों बाद उसे सुधार लिया गया पर तब तक काफी कुछ बिगड़ चुका था. शुक्र तो इस बात का मनाना चाहिए कि मीडिया को हांकने वाले इस मंत्रालय ने धौनी को हौकी या फुटबाल का खिलाड़ी नहीं बताया था.

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