Movie Flop Reasons: कहते हैं सिनेमा समाज का आईना होता है. बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह, दहेज और जमींदारों के उत्पीड़न जैसे सामाजिक मुद्दों पर भारतीय सिनेमा ने बेहतरीन फिल्में दी हैं. इन सामाजिक मुद्दों को उठाने वाली फिल्मों के जरिए फिल्म निर्माताओं ने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी तय की है, साथ ही, इन फिल्मों ने समाज को जागृत करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है. लेकिन जातिआधारित भेदभाव, छुआछूत, सामाजिक उत्पीड़न, दलित संघर्ष और शोषित वर्ग के सशक्तीकरण को केंद्र में रख कर फिल्म बनाने की हिम्मत बेहद कम फिल्मकारों ने ही दिखाई है.
सिनेमा समाज को बदलने का जरिया नहीं है, यह एक बिजनैस है. बौलीवुड में हर निर्माता पैसा कमाने के मकसद से फिल्में बनाता है. एक फिल्म को बनाने में खासा बजट लगता है. ऐसे में अगर फिल्म न चले तो निर्माताओं के बरतन तक बिक जाते हैं. सो, फिल्म निर्माता ऐसे मुद्दों को छूते भी नहीं जो घाटे का सौदा साबित हों. लेकिन, कुछ फिल्मकार ऐसे भी हैं जो लीक से हट कर काम करते हैं और सिनेमा के जरिए समाज के प्रति अपनी जवाबदेही तय करते हैं.
इस में दो राय नहीं है कि भारत का एससी वर्ग ऐतिहासिक दमन का शिकार रहा है. इस समाज के साथ सदियों तक जातिगत भेदभाव होता रहा है और हर कदम पर जम कर शोषण हुआ है. आज भी एससी समाज हाशिए पर ही है. ऐसे में अगर कुछ फिल्मकार इस समाज की विडंबनाओं को केंद्र में रखकर सिनेमा बनाने का जोखिम उठाते हैं तो यह एससी वर्ग की जिम्मेदारी बनती है कि वह ऐसी फिल्मों, जो उस की अस्मिता से जुड़ी हैं और उन के अधिकारों की वकालत करती हैं, को पूरा समर्थन प्रदान करें. लेकिन एससी वर्ग की उदासीनता और उन की लापरवाही के कारण ऐसी फिल्में दर्शकों के लिए तरस जाती हैं, नतीजतन, फ्लौप साबित होती हैं.
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