Hindi movie: विदेशों में वृद्धावस्था में तलाक आम होता जा रहा है. हालांकि पिछले 4 दशकों में युवा जोड़ों में यह दर कम हुई है मगर वृद्ध वयस्कों में यह दर बढ़ गई है. भारत में अभी ऐसे हालात नहीं पैदा हुए हैं. 65 वर्ष और उस से अधिक आयु के वयस्कों में अमेरिका में तलाक दर बढ़ रही है.

अध्ययनों से पता चलता है कि वृद्धावस्था में तलाक की यह प्रवृत्ति कई कारणों से हो रही है. लोगों की उम्र पहले से ज्यादा हो गई है और ज्यादा उम्र के जोड़े पहले की तुलना में असंतोषजक विवाह को बरदाश्त करने के लिए इच्छुक नहीं है. वहीं युवा देर से शादी कर रहे हैं और जीवनसाथी का चुनाव करते समय ज्यादा सतर्क हो गए हैं.

वृद्धावस्था में तलाक जीवनशैली में बदलाव और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालता है. अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की देखादेखी भारत में भी अब वृद्धावस्था में तलाक होने लगे लगे हैं, मगर वे अपेक्षाकृत कम हैं. वृद्धावस्था में तलाक लेने पर वित्तीय चुनौतियां ही सामने आती हैं, अकेलापन, अवसाद और चिंता हर वक्त घेरे रहती है. सामाजिक जीवन में बदलाव आता है, स्वास्थ्य की चिंता परेशान करने लगती है.

भारत में, खासकर बौलीवुड में, वृद्धावस्था में संबंधविच्छेद कर लेना आम बात है. मशहूर फिल्म अभिनेता धर्मेंद्र ने तो हेमा मालिनी से विवाह करने के लिए अपना धर्म परिवर्तन करा लिया था. पंकज कपूर ने सुप्रिया पाठक के साथ दूसरी शादी की थी. इस शादी से उन के 2 बच्चे हैं, बेटी ऋचा कपूर और बेटा रोहन कपूर. शाहिद कपूर नीलिमा अजीम से पैदा हुआ उन का बेटा है. ऐसे बहुत से उदाहरण आप को बौलीवुड में मिल जाएंगे.

‘खुली किताब’ भी एक उम्रदराज कपल द्वारा शादी बचाने नहीं, बल्कि तलाक लेने के लिए आपस में लड़ने की कहानी पर बनी फिल्म है. यह फिल्म सौरभ शुक्ला के उसी नाम वाले थिएटर प्ले का अडौप्शन है जिसे उस ने खुद लिखा और खुद ही निर्देशित किया.

कहानी के केंद्र में गोपाल (पंकज कपूर) और अनुसूया (डिंपल कपाड़िया) है. अनुसूया 2 साल कोमा में रहने के बाद होश में आती है. एक दिन वह गोपाल को 50 साल पुराने एक सच के बारे में बताती है. यह बात उन के लंबे रिश्ते की नींव हिला देती है. गोपाल भीतर से टूट जाता है. उसे लगता है कि उस ने उम्रभर एक झूठ पर यह रिश्ता निभाया है. गुस्से में आ कर वह बूढ़ी उम्र में तलाक लेने का फैसला करता है.

गोपाल के जीवन में उथलपुथल शुरू हो जाती है. बच्चे उलझ जाते हैं. गोपाल वकील आर के नेगी (अपारशक्ति खुराना) से मिलता है. बातचीत में गोपाल के कई साल पुराने जख्म हरे होते हैं और अनुसूया का सच भी सामने आता है. तलाक से शुरू हुआ यह सफर आखिर में उन्हें एक नई समझ की ओर ले जाता है. वहां रिश्ता टूटने के बजाय एक अलग रूप में बदलने लगता है.
यह एक ईमानदार पारिवारिक कौमेडी है. रिश्तों की सच्चाई बताने वाली यह फिल्म धीमी गति की है. फिल्म की लंबाई कम है, 94 मिनट, यह अच्छी बात है. फिल्म की कहानी आम फिल्मों से हट कर है. फिल्म का निर्देशन अच्छा है. कहानी संवादों द्वारा आगे बढ़ती है. लेकिन मध्यांतर के बाद फिल्म की रफ्तार धीमी पड़ जाती है. यह रफ्तार पूरे समय एक सी नहीं रहती. कुछ सीन जरूरत से ज्यादा लंबे हैं.
‘जब खुली किताब’ उम्रदराज रिश्तों की सच्चाइयों को बिना किसी दिखावे के दिखाती है. इस में कोई ड्रामा नहीं है. हर किसी को शायद पसंद भी न आए. सौरभ शुक्ला और डिंपल कपाड़िया के साथसाथ अपारशक्ति खुराना का काम भी बढ़िया है. फिल्म 75 वर्ष की उम्र में भी रिश्तों को नया मौका देने के विचार को खूबसूरती से पेश करती है. फिल्म दर्शकों को उन के परिवार के और नजदीक लाने में शायद सफल हो पाए. सिनेमेटोग्राफर की फोटोग्राफी बढ़िया है. Hindi movie

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