Film Review: `राजकुमार राव ने अपनी शुरुआती फिल्मों में बतौर ऐक्टर कई ऐसी फिल्में दी थीं जिन्होंने क्रिटिक्स समेत दर्शकों को हैरान किया था. इन फिल्मों में ‘शाहिद’, ‘न्यूटन’, ‘सिटी लाइट्स’ ‘अलीगढ़’ जैसी फिल्में थीं, जिन में वे प्रवासी मजदूर, दलित चुनाव अधिकारी, संजीदा वकील इत्यादि बने थे. तब वे अलगअलग जौनर में हाथ आजमाते थे.
पिछले 5-7 सालों में सिलसिलेवार तरीके से उन की फिल्मोग्राफी देखें तो उन के क्राफ्ट में बदलाव आया है. उन की फिल्मों के किरदार आम आदमी तो होते हैं मगर संजीदगी की जगह वे कौमेडी पर ज्यादा निर्भर होने लगे हैं. कौमेडी भी एकजैसी मानो ‘स्त्री’ फिल्म का भूत उन के सिर से उतर ही न रहा हो. यही हाल ‘टोस्टर’ फिल्म का है. फिल्म ‘टोस्टर’ सिचुएशनल कौमेडी पर बेस्ड है. इसे ‘सिटकौम’ कहा जाता है. ऐसी फिल्में जहां कोई कैरेक्टर ऐसी सिचुएशन में फंस जाता है जहां से फिल्म उलझती चली जाती है, इसी उलझन में हास्य पैदा होता है. अकसर ऐसी फिल्में दर्शकों को गुदगुदाने में कामयाब रहती हैं. मगर टोस्टर के साथ ऐसा नहीं होता.
फिल्म ‘टोस्टर’ की कहानी शुरू होती है मुंबई के अमोल आमरे (जितेंद्र जोशी) नाम के एक नेता से, जो शहर में ‘स्पा सैंटर’ को विदेशी और अश्लील कल्चर कह कर बंद करवा रहा है. उसी नेता की अश्लील वीडियो एक चिप में उस का नौकर ग्लेन डिसूजा उर्फ फुकची (अभिषेक बनर्जी) रिकौर्ड कर लेता है. और उस से फिरौती की मांग करता है. फुकची नशेड़ी है.
दूसरी तरफ कहानी में रमाकांत (राजकुमार राव) का किरदार इंट्रोड्यूस होता है. यह किरदार निहायती कंजूस आदमी है. इतना कंजूस कि सुबह पार्क से टहलते हुए मंदिर से केले उठा लेता है, पैट्रोल बचाने के लिए ट्रक की चैन खींच कर रास्ता तय करता है, अपनी पत्नी शिल्पा (सान्या मल्हौत्रा) को डेट के नाम पर लंगर खिलाने ले जाता है. मगर इसी कंजूसी में वह गलत काम भी कर बैठता है. रमाकांत और उस की पत्नी शिल्पा को एक शादी में बुलाया जाता है और शिल्पा महंगा टोस्टर गिफ्ट देने की बात करती है. वह मन मार कर टोस्टर गिफ्ट कर आता है.
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