Bollywood Alcohol Controversy: आज का बौलीवुड केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि एक बड़ा व्यापार बन चुका है, जहां कलाकारों की प्राथमिकता समाज नहीं, बल्कि मुनाफा बन गई है. जब ये आइडल माने जाने वाले स्टार्स शराब को कूल दिखाते हैं, तो वह अप्रत्यक्ष रूप से उन लाखों महिलाओं की चीखों के जिम्मेदार बनते हैं जिन्हें रात में उन का शराबी पति पीटता है. एक युवा जब अपने आदर्श यानी कि अभिनेता को स्टाइल में वोडका का गिलास पकड़े देखता है, तो वह इसे महानता की निशानी समझने लगता है. क्या इन स्टार्स की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं है?
भारतीय सिनेमा कभी संस्कारों की पाठशाला हुआ करता था. वह दौर याद कीजिए जब पृथ्वीराज कपूर, सोहराब मोदी और बलराज साहनी जैसे दिग्गज अपनी कला को समाज सुधार का माध्यम मानते थे. 1953 की फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ में बलराज साहनी ने एक गरीब किसान की पीड़ा का चित्रण जिस अंदाज में किया था, उस ने देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया था.
इतना ही नहीं, 70 के दशक में जब परदे पर विजय (अमिताभ बच्चन) अन्याय के खिलाफ लड़ता था तो युवा अपनी कमीज की आस्तीन वैसी ही चढ़ा लेते थे. जब 50 के दशक में दिलीप कुमार या राज कपूर परदे पर सिसकते थे तो पूरा देश रोता था. सिनेमा भारत में सिर्फ मनोरंजन नहीं, एक संस्कार था.
लेकिन आज वही महानायक और बादशाह अपने करोड़ों प्रशंसकों के हाथों में दूध का गिलास नहीं, शराब की बोतल थमा रहे हैं. कड़वा सच यही है कि वर्तमान समय में उसी भारतीय सिनेमा के नायक, जिन्हें युवा अपना आदर्श मानते हैं, अपने प्रशंसकों की बदौलत ही कई सौ करोड़ रुपए की फीस जेब में डालते हुए समाज व अपने प्रशसंकों के हाथ में जाम पकड़ा रहे हैं. यह महज व्यापार नहीं, बल्कि उस भरोसे की हत्या है जो एक आम इंसान इन सितारों पर करता है.
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