Charak Movie: चरक को आयुर्वेद का आचार्य माना जाता है. उन्होंने आयुर्वेद के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया. मगर इसी शीर्षक से बनी सुदीप्तो सेन की पावरफुल कहानी ‘चरक: फेयर औफ फेथ’ को आयुर्वेद से कुछ लेनादेना नहीं है. यह फिल्म बंगाल की तांत्रिक प्रथाओं और नरबलि पर आधारित है.
हमारे देश में आज भी अंधविश्वास की जड़ें फैली हैं. इन अंधविश्वासों को फैलाने में पंडेपुंजारियों, तांत्रिकों और मौलवियों का बड़ा हाथ है. अकसर वे अंधविश्वासों के चक्रव्यूह में लोगों को फंसा कर अपनी जेबें भरते हैं. जादूटोने के नाम पर लोगों को गुमराह करते हैं, भूतप्रेत भगाने के नाम पर लोगों को उल्लू बनाते हैं और संतान सुख प्राप्त करने के लिए किसी दूसरे बच्चे की बलि दिलवाने तक में भी नहीं हिचकिचाते. यह सब वे मां काली और तथाकथित भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए करते हैं.
‘चरक’ में अंधविश्वासों की अति दिखाई गई है. यह फिल्म ग्रामीण भारत में अंधविश्वास, तांत्रिक प्रथाओं और बच्चों की बलि जैसे भयावह विषयों को उजागर करती है. आस्था और कट्टरता की महीन रेखा पर सवाल उठाती यह एक तनावपूर्ण थ्रिलर है. फिल्म में पारंपरिक चरक मेले में रची गई एक खतरनाक कहानी दिखाई गई है.
चरक मेला मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल और दक्षिणी बंगलादेश में बंगाली कैलेंडर के चैत्र महीने के अंतिम दिन यानी चैत्र संक्रांति (अप्रैल के मध्य में) आयोजित किया जाता है. यह तथाकथित भगवान शिव के सम्मान में मनाया जाने वाला एक पारंपरिक त्योहार है जिस में अंधविश्वासी श्रद्धालु उपवास रखते हैं और चरक के चारों ओर घूमते हैं.
फिल्म की कहानी नरबलि और बच्चों के लापता होने की घटनाओं को केंद्र में रखती है. ‘द केरल स्टोरी’ के निर्देशक सुदीप्तो सेन ने ‘चरक’ के जरिए फिल्म निर्माण क्षेत्र में कदम रखा है. फिल्म मेले की आड़ में होने वाले अंधविश्वास को ले कर झकझोरती है. अकसर लोग हिंदी फिल्मों में दिखाए गए अंधविश्वासों से सबक नहीं लेते, उलटे, उसी तरह के अंधविश्वासों में खुद को लपेट लेते हैं.
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