Rajasthan Corruption: राजस्थान में पति शिखर अग्रवाल IAS हैं पत्नी प्रशाखा माथुर IPS है. दोनों ने अनंता रिसॉर्ट्स नाम की कंपनी को फायदा पहुंचाकर उदयपुर और अलवर में 36 विला सिर्फ 5.52 करोड़ में अपने लोगों के नाम करवा लिए. इन विलाज की असली बाजार कीमत 50 करोड़ से ज्यादा है. दोष अभी सिद्ध नहीं हुआ है. जहां दक्षिणा को पुण्य और रिश्वत को सांस्कृतिक वर्ण व्यवस्था कहा जाता हो, वहां क्या आश्चर्य?
अब 36 विलाओं वाले पति पत्नी में एक के पास आईएएस की पावर है जो किसी कंपनी की किस्मत बदल सकता है तो दूसरे के पास आईपीएस की वर्दी है जो किसी को भी सलाखों के पीछे पहुंचा सकती है. ऐसे ही लोग देश पर राज कर रहे हैं क्योंकि जनता पूजापाठी होने की वजह से इस रिश्वत को पिछले जन्म के कर्मों का पुण्य मानती है.
1993 बैच के IAS शिखर अग्रवाल और 1995 बैच की IPS प्रशाखा माथुर की, जिन पर आरोप है कि उन्होंने पद का इस्तेमाल करके गोयल फैशन्स प्राइवेट लिमिटेड यानी अनंता ब्रांड के रिसॉर्ट्स को नियमों से बाहर जाकर फायदा पहुंचाया और बदले में उदयपुर के बुझड़ा और अलवर के अजाबगढ़ में अपने, अपनी पत्नी, अपने दो बेटों और सास-ससुर के नाम पर कुल 36 विला सिर्फ 5.52 करोड़ रुपये में अपने नाम करवा लिए, जबकि बाजार में एक-एक विला की कीमत 70 लाख से 2 करोड़ रुपये तक है.
27 अक्टूबर 2026 को दैनिक भास्कर में खबर छपी, ACB ने प्रारंभिक जांच की. 28 अक्टूबर को शिखर अग्रवाल को और 31 अक्टूबर को प्रशाखा माथुर को APO पर भेज दिया गया.
सबसे बड़ा सवाल खड़ा करते हैं कि 27 मार्च 2026 को जिस दिन वित्त विभाग से कंपनी को विशेष रियायती वित्तीय पैकेज मिला, उसी दिन 20 विला की रजिस्ट्री परिवार के नाम कैसे हो गई और फिर वो सारे विला उसी कंपनी को सालाना करीब 1.80 करोड़ रुपये किराये पर लीज पर कैसे दे दिए गए?
राजस्थान के सैंट्रल सर्विस के दो अफसरों का मामला अकेला नहीं है. सैंकड़ों मामले दबे रहते हैं क्योंकि सैंट्रल सर्विस लौबी अपने ग्रुप की जमकर रक्षा करती है.
यह भारतीय संस्कृति का वह सच है जिसे हम धर्म, संस्कार और परंपरा के नाम पर छिपाते आए हैं और जिसके लिए 150साल से हिंदू व्यवस्था के गुणगान गाए जा रहे हैं. भारत में भ्रष्टाचार कोई बाहर से आई बीमारी नहीं है, ये इसी संस्कृति की रीढ़ में बसा हुआ है, जहां बचपन से सिखाया जाता है कि काम करवाना है तो पंडितों को कुछ चढ़ावा चढ़ाना पड़ेगा. रामचरित मानस के हर पृष्ठ पर यह बात दोहराई गई है रिश्वतखोरी को दान की तरह पुण्य का काम घोषित कर दिया गया.
मंदिर में पुजारी को रिश्वत देना दक्षिणा कहलाता है लेकिन राजस्थान के सैंट्रल सर्विस अफसरों को पैसा देना भी पुण्य ही कहलाता है. मंदिर और दफ्तर की मानसिकता एक ही है. अफसरों ने ही नेताओं को बदनाम किया है. नेता बेचारा तो अफसरों का सेवक है.
इस देश में सरकारी कुर्सी को सेवा नहीं जागीर समझा जाता है. दरोगा, जज, डीएम, आईपीएस और आईएएस बनने का मतलब लोगों की सेवा नहीं लोगों पर राज करना है. ऐसे सिस्टम में अफसर खुद को भगवान से कम नहीं समझता. राजस्थान के आइएएस शिखर अग्रवाल और आईपीएस प्रशाखा माथुर के केस में जहां पूरा परिवार ही सिस्टम में हो तो यह परिवार नहीं एक छोटी सी सरकार बन जाती है. यहां यह डर ही खत्म हो जाता है कि जांच कौन करेगा?
अगर धर्म भ्रष्टाचार से रोकता तो भारत सबसे ईमानदार देश होता, यहां हर गली में मंदिर है, हर ऑफिस में भगवान की फोटो है और हर फाइल पर स्वास्तिक बना है. फिर हर सरकारी आफिस में भी चपरासी से लेकर आईएएस, आईपीएस तक भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं, पूरा सिस्टम सड़ा रहा है. यहां दुर्वासा और विश्वामित्र ही असली हैं. Rajasthan Corruption




