Social Awareness Stories: आजकल ‘सशक्त नारी’ बड़ी तेजी से एक ब्रैंड बन गई है. टैलीविजन के विज्ञापन देखिए- एक महिला सुबह 5 बजे उठती है, अभ्यास करती है, बच्चों का टिफिन बनाती है, औफिस जाती है, मीटिंग लेती है, शाम को बाजार से सब्जी लाती है, रात को पति के लिए ‘उन की पसंद का खाना’ बनाती है और यह सब करतेकरते वह मुसकराती भी रहती है. कैमरा जूम इन होता है, बैकग्राउंड में कोई जोशीला गाना बजता है, और स्क्रीन पर लिखा आता है- ‘शी इज अनस्टौपेबल.’

यह देख कर मन में श्रद्धा उमड़ती है पर किस के लिए? उस महिला के लिए या उस साबुन, तेल या मल्टीविटामिन के लिए जो उसे यह सब ‘कर पाने की शक्ति’ दे रहा है? पहले नारी को घर तक सीमित रखना ‘परंपरा’ थी. अब उसे घर और दफ्तर दोनों में एकसाथ श्रेष्ठ होना ‘सशक्तीकरण’ है. अंतर बस इतना है कि पहले की थकान दिखती नहीं थी, अब भी नहीं दिखती, बस, उस के ऊपर एक चमकदार लेबल चिपका दिया गया है- महिला सशक्तीकरण का.

आज की नारी की थकान सिर्फ शारीरिक नहीं है. वह मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक भी है. लेकिन वह इसे छिपा कर रखती है, क्योंकि उसे सिखाया गया है– ‘अच्छी औरत वही है जो सब संभाल ले.’ और वह सच में सब संभाल लेती है, बस, एक चीज छोड़ कर- खुद की थकान. आज की नारी की सब से बड़ी समस्या यह नहीं है कि वह कमजोर है.

समस्या यह है कि उसे हर समय मजबूत दिखना पड़ता है. वह सुपरवुमन नहीं बनना चाहती, लेकिन समाज ने उसे बना दिया है. इसलिए अगली बार जब आप किसी महिला को मुसकराते हुए देखें तो यह मत समझिए कि वह बिलकुल ठीक है. हो सकता है, वह सिर्फ यह कह रही हो- ‘थकी हूं लेकिन अभी रुकना
नहीं है.’  लेखक – मिनी सिंह

लोगों को सचेत करते रहें

जुलाई (द्वितीय) अंक में प्रकाशित कहानी ‘कल्याण योजना से हुआ कल्याण’ मुझे बहुत पसंद आई. कृपा कर के ऐसी और कहानियां लोगों को सचेत करने के लिए छापते रहें.       लेखक – एक पाठक

मन खुश हो गया

सितंबर (प्रथम) अंक पढ़ कर मन बहुत खुश हो गया. कई महीनों बाद सरिता में सब कहानियों में कोई न कोई सार था. साथ में, समाज की छोटीछोटी अच्छाई के साथ बुराइयों का वर्णन भी बहुत ही मन को छूने लगा.

इस अंक में प्रकाशित सारे लेख भी बहुत पसंद आए. बहुतबहुत धन्यवाद अच्छे लेखों और सच्ची जानकारियां प्रकाशित करने के लिए.       एक पाठक

बच्चों के मुख से

मैं दफ्तर के बाद अपनी मां के घर से दोनों बेटियों को रिकशे में ले कर अपने घर लौटती थी. जीवन बहुत व्यस्त था. वापस आ कर घर के काम, बच्चों के होमवर्क आदि में समय निकल जाता था. मम्मी के घर से लौटते हुए अंधेरा सा हो जाता था.

दीवाली के त्योहार आने के 5 दिन रह गए थे. कुछ घरों पर बिजली के बल्बों की लड़ियां लगनी शुरू हो गई थीं. मेरी छोटी बेटी तान्या ने प्रश्न किया, “मम्मी, लोगों ने ल​ड़ियां क्यों लगाई हैं?” मैं ने उसे बताया ​कि दीवाली आने वाली है.

वह बोली कि लोग अभी से क्यों रोशनी कर रहे हैं. मैं ने उत्तर दिया कि यह तो अपनाअपना शौक है.

2-3 दिन तक यही सिलसिला चलता रहा. अगले दिन तान्या ने देखा कि और भी कई घरों से रोशनी की सजावट हो गई थी. वह भोलेपन से बोली, “मम्मी, हमें कब ‘शौक’ लगेगा?”

मैं ने घर पहुंचते ही सभी काम छोड़ कर सब से पहले बल्ब की ल​ड़ियां ढूंढ़ीं और पति के साथ मिल कर अपने घर को भी रोशनी से सजाया. चारू शर्मा

रमा ने बेटे से पूछा, “आज हिंदी का पेपर कैसा हुआ?”

“बहुत अच्छा, मम्मी,” 7 साल का रिंकू तुरंत बोला.

“लाओ दिखाओ,” मां ने पेपर देखते हुए पूछा, “अच्छा बताओ, नेत्र का पर्यायवाची क्या लिखा?”

“आई, मम्मी.”

“अरे ‘आई’ तो इंग्लिश का शब्द है,” रमा बोली.

“हां, मम्मी. इसीलिए तो हम ने ‘आई’ इंग्लिश में नहीं, हिंदी में लिखा.” फिर रिंकू खाने में लग गया. रमा रिंकू की नासमझी पर चुप हो गई. के के सरोज

बाथरूम में मेरा पैर फिसल गया और मैं गिर गई. मैं ने अपने बेटे को सहायता के लिए आवाज लगाई.

बेटा पहुंचता, उस से पहले मेरी 3 वर्षीय पोती रिमझिम आई और कहने लगी, “दादी, रोना नहीं, गिरगिर कर ही तो बहादुर बनते हैं.” उस की बात सुन कर दर्द में भी मुझे हंसी आ गई. लेखक – निर्मल कांता गुप्ता

मैं अपने थाइराइड की जांच के लिए एक पैथोलौजी सैंटर गई. मेरे साथ मेरा 6 वर्षीय बेटा भी था. वहां पर बहुत सारे लोग जांच के लिए ब्लड दे रहे थे.

मेरा बेटा बहुत गौर से सबकुछ देख रहा था. उस ने मुझ से पूछा, “मम्मी, ब्लड निकलते ही सब लोग एक्सरसाइज क्यों करने लगते हैं?”

मुझे उस की बात पर बहुत हंसी आई. वास्तव में ब्लड निकालने के बाद रूई रख कर हाथ को मोड़ने के लिए कहते हैं. उस की समझ से ब्लड निकलते ही सब लोग कसरत करने लगते हैं. Social Awareness Stories

लेखक – पुष्पा श्रीवास्तव 

 

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