Serbia Gen Z Protest: सर्बिया का चुनावी नतीजा दुनिया भर के दक्षिणपंथी शासकों के लिए एक अलार्म है जिसने साबित यह किया है कि राष्ट्रवाद, धार्मिक ध्रुवीकरण और धर्म स्थलों की सरपरस्ती में चल रही राजनीति और सत्ता का किला कागजी होता है जिसे जेन जी ही ढहा सकती है. जिसका अहम मकसद सिस्टम में सुधार का है जो न हो तो वह सत्ता भी हथियाने से भी चूकती नहीं.
दक्षिणी यूरोप के छोटे देशों में में शुमार सर्बिया के चुनावी नतीजे दुनिया भर के लिए अहम हो चले थे जिनसे इकलौती अहम बात यह साबित होना थी कि अति राष्ट्रवाद पर युवाओं की लोकतांत्रिक चेतना भारी पड़ेगी या फिर कट्टरवाद का कागजी किला जिसकी बुनियाद ही हुक्मरानों की मनमानी, अहंकार, रूढ़ियां और धर्म की राजनीति हैं ज्यों का त्यों खड़ा रहेगा. एक तरह से यह चुनाव यह भी साबित करने बाला था कि डराने और बांटने की राजनीति की कोई `एक्सपाइरी डेट` होती भी है या नहीं और होती भी है तो उसकी मियाद लगभग कितनी होती है.
बीती 26 अक्तूबर को सर्बिया के इलेक्शन कमीशन ने जब नतीजे घोषित किए तो वहां यह मियाद 14 साल निकली. जेन जी की महज डेढ़ महीने पहले विधिवत गठित हुई नई नवेली पार्टी स्टूडेंट लिस्ट ने सत्तारूढ़ सर्बियन प्रोग्रेसिव पार्टी यानी एसएनएस को चलता कर दिया. लेकिन यह बदलाब बहुत आसान नहीं था. इसके लिए सर्बिया के छात्रों को कोई दो साल सड़कों पर आंदोलन और धरने प्रदर्शन करना पड़े थे. इस आंदोलन को खत्म करने और छात्रों की हिम्मत तोड़ने के लिए राष्ट्रपति एलेक्जेंडर वुसिक ने वे तमाम हथकंडे आजमाए जो आमतौर पर कोई भी तानाशाह अपनाता है.
जब छात्रों का यह आंदोलन शुरू हुआ था तो बेहद शांतिपूर्ण और अहिंसक था. लेकिन वुसिक इससे इतना घबरा गए थे कि उन्होंने इसे कुचलने के लिए न केवल छात्रों पर हमले करवाए बल्कि उन पर कड़ा क़ानूनी शिकंजा कसने की गरज से मुकदमे भी दायर करवाए. मीडिया को उन्होंने एक टूल की तरह इस्तेमाल करते आंदोलन को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. आंदोलनकारी युवाओं पर देश का दुश्मन और विदेशियों के हाथों नाचने और फंडिंग का भी आरोप लगाया गया.
हैरत तो तब ज्यादा हुई जब कोई चाल कामयाब न होते देख बौखलाए वुसिक ने एक `काउन्टर प्रोटेस्ट` खड़ा कर डाला. बड़ी तादाद में उन्होंने अपने समर्थकों की भीड़ को राजधानी बेलग्रेड में इकट्ठा किया. मंशा यह दिखाने की थी कि जनता उनके साथ है और युवाओं का प्रोटेस्ट कुछ उन्मादियों का बेमतलब का तमाशा है. कुछ दक्षिणपंथी युवाओं से मीडिया के सामने यह कहलवाया गया कि आम छात्र और युवा सरकार के साथ हैं.
इन टोटकों का भी कोई असर नहीं हुआ तो वुसिक ने छात्रों के विरोध प्रदर्शन को रोकने और संसद के सामने की जगह को घेरने के लिए सरकार और एसएनएस कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने लगातार 18 महीनों तक एक बड़ा टेंट गाड़े रखा. आंदोलनकारी आगे न बढ़ पाएं इसके लिए लोहे की मजबूत बेरिकेडिंग करवा दी गई.
क्या और क्यों था सर्बियाई छात्रों का प्रोटेस्ट और कैसे इसने दमनकारी एलेक्जेंडर वुसिक को घुटनों पर लाते लोकतांत्रिक भाषा बोलने पर मजबूर कर दिया, इससे पहले इस प्रोटेस्ट के मद्देनजर बहुत छोटे में अपने दिमाग में चस्पा तस्वीर केप्चर कर लें जो यह एहसास कराती है यह तो भारत में भी पिछली जुलाई से हो रहा है. और सरकार तमाम कोशिशों के बाद भी सीजेपी, इंडिया ब्लाक और बुद्धिजीवियों के प्रोटेस्ट को रोक नहीं पा रही है. भारत और सर्बिया के प्रोटेस्ट में फर्क महज आबादी, मुद्दों और डेमोग्राफी बगैरह का है, नहीं तो मांग दोनों की एक ही है कि लोकतंत्र मरना नहीं चाहिए.
नोवी साद हादसा
राजधानी बेलग्रेड के बाद नोवी साद सर्बिया का दूसरा बड़ा शहर है. इसके रेलवे स्टेशन पर 1 नवम्बर 2024 को एक दर्दनाक भीषण हादसे में कोई 16 लोग मारे गए थे. जिनमे कालेज छात्रों के साथ साथ 6 साल की बच्ची से लेकर 77 साल के बूढ़े भी शामिल थे. इस दिन दोपहर के 12 बजे से कुछ पहले स्टेशन के मुख्य द्वार के बाहर बनी कांक्रीट की छत नीचे बेंचों पर बैठे और राह चलते लोगों पर भरभराकर गिर गई थी. हादसा इतना भयानक था कि मलबे में दबे लोगों को अपने मरने का एहसास ही नहीं हुआ होगा.
अब यह कोई सत्य निकेतन बाला भारत तो था नहीं जहाँ पुल ढहने, सरकारी इमारतें गिरने और धार्मिक आयोजनों की भगदड़ में दर्जनों लोग मारे जाते हैं और किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेगती. एकाध दो दिन के होहल्ले के बाद लोग सब कुछ भूलभाल कर अपने अपने कामों में लग जाते हैं. नोवी साद हादसे पर लोग खासतौर से सर्बियाई नौजवान चुप नहीं बैठे. उन्होंने इसे सुरक्षा मानकों की अनदेखी के अलावा खालिस तौर पर सरकारी नाकामी ठहराया जो भ्रष्टाचार की देन थी.
हादसे की जबाबदेही की मांग करते छात्र सड़कों पर उतरे तो देखते ही देखते `बोरबा` नाम का एक ग्रुप वजूद में आ गया. बोरबा का मतलब लड़ाई या युद्ध होता है. इन युवाओं ने सरकारी इमारतों, पुलिस की गाड़ियों और सड़कों पर लाल रंग के पेंट फेकना शुरू कर दिया. इन लोगों का आरोप था कि सरकार के हाथ खून से रँगे हुए हैं. बोरबा ग्रुप ने सोशल मीडिया पर हल्ला मचाने के बाद सड़कों पर आकर जाम लगाना, विरोध प्रदर्शन करना और सरकार के खिलाफ नारे लगाना शुरू कर दिया. यह ठीक वैसा ही था जैसा भारत में काकरोचों ने किया था.
इसके बाद जो हुआ वह भी भारत सरीखा ही था कि सरकार ने इस विरोध को विपक्ष द्वारा प्रायोजित करार देते इसे कुचलने की हर मुमकिन कोशिश की. शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे युवाओं को गिरफ्तार किया गया जिससे आग और भडक उठी. जिद्दी और अडियल वुसिक और उनकी सरकार ने इस प्रोटेस्ट को कुचलने के लिए क्या कुछ नहीं किया यह ऊपर बताया गया है.
दो साल का अरसा कम नहीं होता. सरकार दमन करते थक गई लेकिन छात्र नहीं जो अब भ्रष्टाचार मुक्त सर्बिया, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और पारदर्शी शासन की भी मांग करने लगे थे. बहुत जल्द सर्बियाई बुद्धिजीवी, कलाकार, वकील, डाक्टर और जज भी इस प्रोटेस्ट को समर्थन देने लगे तो घबराए वुसिक ने मध्यावधि चुनाव की घोषणा कर दी.
यह दरअसल में उनकी मजबूरी भी हो गई थी क्योंकि कुछ अंधभक्तों को छोड़ पूरा सर्बिया उनके अडियलपन और तानाशाही के खिलाफ उठ खड़ा होने लगा था. लोग उन्हें झूला झूलाकर श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे या बांग्लादेश की प्रधानमन्त्री शेख हसीना की तरह गद्दी सहित उखाड़ फेंकते या विदेश भागने को मजबूर कर देते उससे बेहतर रास्ता उन्हें चुनाव का लगा. जिसमे दिल को बहलाने ग़ालिब ख्याल अच्छा है कि तर्ज पर उम्मीद की एक किरण तो बाकी थी.
ढहा कट्टरवाद का कागजी किला
पर यह किरण 26 अक्तूबर को वुसिक के लिए डूबता हुआ सूरज साबित हुई. नतीजों ने उनकी उम्मीदों और मंशा दोनों पर पानी फेर दिया. सर्बिया की संसद की कुल 250 सीटों में से एसएनएस को महज 105 सीटें मिली जबकि स्टूडेंट लिस्ट 138 पर विजयी रही. यह उसके दो साल के लगातार प्रोटेस्ट का सुखद नतीजा था जिसने वुसिक सरीखे कट्टरवादी और चर्चवादी नेता को यह कहने मजबूर कर दिया कि `यह स्पष्ट है कि हम चुनाव हार गए हैं`.और सर्बियन प्रोग्रेसिव पार्टी मजबूत विपक्ष का रोल अदा करेगी. हालाँकि खिसियाहट के चलते वे अपनी हार का ठीकरा विदेशी ताकतों और मीडिया के सर फोड़ने से नहीं चूके
दूसरी तरफ स्टूडेंट लिस्ट को जीत के लिए कोई खास कवायद नहीं करना पड़ी. क्योंकि लोग उनके साथ थे, इसीलिए उनकी पार्टी को रिकार्ड 54 फीसदी वोट मिले जबकि एसएनएस को महज 39 फीसदी वोट ही हासिल हुए. जब चुनाव की घोषणा हुई थी तब जो टक्कर कांटे की आंकी जा रही थी वह आख़िरकार एकतरफा साबित हुई. नतीजे के दिन सर्बिया की राजधानी बेलग्रेड सहित तमान शहरों में जश्न मनाया गया. लोगों ने सड़कों पर आकर नाचते गाते अपनी ख़ुशी का इजहार किया.
इस चुनाव में स्टूडेंट लिस्ट का कोई घोषित नेता नहीं था न ही किसी छात्र ने खुद चुनाव लड़ा था. बल्कि अधिकतर टिकिट उन लोगों को दिए गए थे जिन्होंने प्रोटेस्ट के दौरान उसका समर्थन किया था. इनमे लगभग सभी गैर राजनितिक हस्तियाँ शामिल थीं. मसलन डाक्टर, इंजीनियर, वकील, कलाकार, किसान, शिक्षाविद और पत्रकार बगैरह जिन्हें सरकार चलाने का कतई तजुर्बा नहीं. यह हालाँकि आगे चलकर दिक्कत बाली बात भी स्टूडेंट लिस्ट के लिए साबित हो सकती है.
इन पंक्तियों के लिखे जाने तक स्टूडेंट लिस्ट ने अपने नए नेता यानी अगले प्रधानमंत्री का चयन नहीं किया था लेकिन प्रोटेस्ट के दौरान सबसे चर्चित नाम 56 वर्षीय इलिजा सर्डानोविच का था जो पेशे से कार्डियोलाजिस्ट हैं. निश्चित रूप से यह भी कम दिलचस्पी बाली बात नहीं होगी कि सर्बियाई संसद में अधिकतर सांसद पहली बार चुनकर आए हैं. वे देश कैसे चलाएंगे यह देखना भी कम दिलचस्पी बाली बात नहीं होगी. अगर यह प्रयोग सफल रहा तो यह माडल दुनिया भर में लोकप्रिय भी हो सकता है. वजह अधिकतर देशों में लोग परम्परागत राजनेताओं और घिसीपिटी राजनीति से आजिज आ रहे हैं. वे नया कुछ चाहते हैं.
सुधारवादी हो यह नया कुछ
स्टूडेंट लिस्ट की शुरूआती मांग रिजीम चेंज की नहीं बल्कि जबावदेही और पारदर्शिता की थी वह लोकतांत्रिक तरीके से देश चलाने की बात कह रही थी. यही मांगे दुनिया भर के युवा कर रहे हैं और ऐसा अधिकतर दक्षिणपंथी शासित देशों में हो रहा है. जहाँ शासक धर्म और धर्मस्थलों की आड़ लेकर मनमानी कर रहे हैं. भारत भी इससे अछूता नहीं है.
युवा शिक्षा, स्वास्थ और रोजगार सहित धर्मनिरपेक्ष शासन की बात कर रहे हैं जो कतई अधार्मिक नहीं है. वैश्विक तौर पर जेन जी कहीं भी धर्म की खिलाफत नहीं कर रही. धर्म उनके लिए व्यक्तिगत विषय और आस्था की बात है. लेकिन इसका दखल वे शासन और सरकार में नहीं चाहते जो लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है. जिन देशों में इस शर्त की अनदेखी या उल्लंघन हो रहा है वहां के युवा सड़कों पर आने से चूक नहीं रहे जाहिर है उन्हें अपनी ताकत के साथ साथ जिम्मेदारियों का एहसास भी उसे है.
दरअसल में ये युवा उदारवादी हैं और विविधता में भरोसा करते हैं.
ये न तो देश, लोकतंत्र और संविधान विरोधी हैं और न ही तथाकथित विदेशी ताकतों के इशारे पर नाचने बाले हैं. सर्बिया और भारत सहित किसी भी देश में अभी तक ऐसे सबूत नहीं मिले हैं जो इन्हें किसी कटघरे में खड़ा करते हों. अब तो युवतियां भी इन प्रोटेस्टो में बढ़ चढ़ कर शिरकत कर रहीं हैं क्योंकि वे हर जगह, हर देश में उसके धर्म की सताई हुई हैं. उनका बड़े पैमाने पर शोषण सिर्फ धर्म ने किया है और दुनिया भर के धर्म जिनमे इसाई, इस्लाम और हिन्दू प्रमुखता से हैं पितृसत्तात्मक व्यवस्था के हिमायती और पैरोकार हैं.
सभी धर्मो की नजर में औरत दोयम दर्जे की बताई गई है. सरिता में समय समय पर इस संवेदनशील विषय पर विश्लेषणात्मक और तथ्यात्मक लेख प्रकाशित होते रहे हैं जो कट्टरपंथियों के सीने में शूल से चुभते हैं. वे नहीं चाहते कि कोई स्त्री स्वन्त्रता की बात भी करे और जो उनकी परवाह नहीं करता वह नास्तिक, देश द्रोही, दुश्मनों का एजेंट, नक्सली, वामपंथी और कम्युनिस्ट करार देते बदनाम किया जाने लगता है.
कुछ अपवादों मसलन चीन, उत्तरी कोरिया, वियतनाम, लाओस और क्यूबा को छोड़ दें तो दुनिया भर में कम्युनिस्ट अब कहने भर की बात रह गए हैं. वे सीधे सीधे तख्तापलट की बात करते थे. इसके लिए वे हथियारों से लेस संगठन भी बनाते थे और खून बहाने से भी नहीं हिचकते थे कम्युनिसटो पर पूरी तरह मार्क्स और लेनिन की विचारधारा हावी थी जो कहती थी कि निजी संपत्ति का खात्मा और संसाधनों पर राज्य का नियंत्रण होना चाहिए. पूंजीवादी और राजशाही को उखाड़ फेकना उनका बड़ा मकसद था. इसके लिए उन्होंने सशस्त्र क्रांतियाँ भी की, रूस की 1917 और 1949 की चीनी क्रांति इसकी बेहतर मिसाल हैं.
उलट इसके जेन जी हिंसा और हथियारों से परे किसी विचारधारा विशेष से बंधी नहीं है. सर्बिया के प्रोटेस्ट के मद्देनजर देखें तो किसी राजनितिक पार्टी का प्रभाव भी उस पर नहीं था और ऐसा हर उस जगह है जहाँ वे व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहे हैं.
सीधे सीधे कहें तो दुनिया भर के युवा सिस्टम को बदलने या हथियाने की नहीं बल्कि उसमे सुधार की बात कर रहे हैं. सुशासन और निष्पक्ष न्याय उनकी प्राथमिकता है जो अलेक्जेंडर वुसिक जैसे अति राष्ट्रवादी नहीं देना चाहते थे तो स्टूडेंट लिस्ट को खुद चुनावी मैदान में कूदना पड़ा. लेकिन हैरत की बात यह कि वह सत्ता में भागीदारी नहीं चाह रही, हाँ एक हद तक उसे कंट्रोल में रखना उसका मकसद है जो किसी भी लिहाज से गलत नहीं. क्योंकि बदलाव उसकी वजह से आया है नहीं तो वुसिक के पूर्णकालिक तानाशाह होने में बहुत ज्यादा देर भी नहीं थी.
वुसिक का कट्टरवाद
जब स्टूडेंट लिस्ट का प्रोटेस्ट संभाले नहीं संभल रहा था तब बौखलाए अलेक्जेंडर वुसिक चर्च की शरण में जाकर प्रार्थनाएं कर रहे थे कि हे यीशु जैसे भी हो इन लड़कों को सही यानी मेरी तेरी राह दिखा. जिससे धर्म और संस्कृति की गरिमा बनी रहे. नहीं तो पथभ्रष्ट हो गए ये युवा अभी तक का किया धरा मिटटी में मिला देंगे.
वुसिक ने सर्बिया के बहुसंख्यक रूढ़िवादी ईसाईयों को अपने पाले में बनाए रखने चर्चों के पादरियों से बेहद करीबी ताल्लुकात रखे. जिससे उनकी सत्ता की नैतिक और धार्मिक स्वीकार्यता बनी रहे.
खासतौर से उन्होंने सर्बिया से अलग हुए राज्य कोसोवो के मुद्दे पर अपनी राष्ट्रवादी नीतियों को सही ठहराने के लिए चर्च और पादरियों का जमकर इस्तेमाल किया. गौरतलब है कि कोसोवो को इसाई धर्म का उद्भव स्थल माना जाता है. यानी उसकी अहमियत वैसी ही है जैसी इस्लाम में मक्का की और हिदू धर्म और भारत में अयोध्या की है.
वुसिक जैसे लोग `जन्मना` ही कट्टर होते हैं. उन्होंने 1990 के दशक में विवादित बयान यह दिया था कि एक `सर्ब` के मारे जाने पर सौ बोस्नियाई मुसलमानों को मार दिया जाना चाहिए इसी दशक में कानून की डिग्री लेने के बाद वे धुर राष्ट्रवादी नेता वोयिस्लाव शेशेल की सर्व रेडिकल पार्टी में शामिल हो गए थे. वे ग्रेटर सर्बिया की बात उसी तरह किया करते थे जैसे डोनाल्ड ट्रम्प मेक अमेरिका ग्रेट अगेन और नरेन्द्र मोदी विश्व गुरु होने की किया करते हैं.
साल 2012 में सत्ता में आने के बाद उन्होंने उदारवादी दिखने की कोशिश में खुद को ईयू यानी यूरोपीय संघ समर्थक के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया. लेकिन चर्च मोह और धर्म प्रेम नहीं छोड़ पाए और जनता का पैसा चर्चों पर खुले हाथ से लुटाने लगे. सर्बिया के सबसे बड़े और अहम सेंट गावा चर्च को उन्होंने कई करोड़ यूरो सरकारी खजाने से दिए. यह राशि दरअसल में कितनी थी शायद इसका खुलासा नई सरकार करे. क्योंकि इस दान का सर्बिया की इकोनामी पर बुरा असर पड़ा था. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स का दावा है कि यह राशि 680 करोड़ से ज्यादा ही थी.
देश तो देश विदेशी चर्चों पर भी वुसिक ने जनता का पैसा उड़ाया. वह खुद अक्सर बड़े फख्र से दो बातें कहा करते थे पहली यह कि पिछले 50 सालों में किसी भी सरकार ने चर्च को उतना पैसा नहीं दिया है जितना कि मैंने दिया है. दूसरी यह कि बिना चर्च के सर्बिया अधूरा है. इन बातों जिन्हें डील कहना बेहतर होगा के एवज में पादरियों ने भी अच्छा रिटर्न वुसिक को दिया. न केवल राजनितिक समर्थन की शक्ल में बल्कि उन्हें चर्च के सबसे बड़े नागरिक सम्मान `आर्डर आफ सेंट सावा` से भी नवाजा गया. कोसोवा मुद्दे पर चर्च और पादरी हमेशा उनके साथ रहे जो अक्सर यह कहा करते थे कि वुसिक ही सर्बियाई धार्मिक विरासत की रक्षा कर सकते हैं यह भी ठीक ऐसा ही है कि सनातन धर्म और संस्कृति की रक्षा सिर्फ मोदी ही कर सकते हैं.
अब सब हवा
हार के साथ ही चर्चों ने वुसिक से दूरी बनाने में गजब की फुर्ती दिखाई. जाहिर है उनका मकसद और मंशा सिर्फ पैसा एंठते रहने की थी. निचले स्तर के पादरियों और भिक्षुओं ने तो स्टूडेंट प्रोटेस्ट के दौरान ही हवा का रुख भांपते वुसिक से दूरी बना ली थी. स्टूडेंट लिस्ट ने धार्मिक दान पर रोक लगाने की घोषणा कर यह भी जता दिया है कि उनका गुस्सा और भड़ास केवल नोवा साद हादसे तक ही सीमित नहीं थे बल्कि वे जनता का पैसा धरम करम पर लुटाने के भी खिलाफ हैं.
अभी तक होता यह था कि जब भी वुसिक को दौरा पड़ता था वे बिना संविधान का लिहाज किये चर्चों को पैसा बांटने लगते थे. ठीक वैसे ही जैसे पौराणिक काल के राजा महाराजा, ऋषि, मुनियों और गुरुओं सहित ब्राह्मणों को सोना, चाँदी, हीरे, जवाहरात, जमीने, गाएं और दास दसियों सहित खूबसूरत औरतें तक दान में दे दिया करते थे . सर्बिया की स्टूडेंट लिस्ट सरकार ने बहुत साफ़ कर दिया है कि अब खजाने का पैसा चर्चों नहीं बल्कि स्वास्थ और शिक्षा पर खर्चा जाएगा. जीत के साथ ही नई सरकार ने धर्मनिरपेक्षता पर जोर देते उच्च शिक्षा का बजट सीधे 20 फीसदी बढ़ाने का भी एलान कर दिया है.
जाहिर है ये और ऐसी ढेरों वजहें थीं जिनके चलते सर्बिया के वोटर ने कट्टरवाद को विदा कहते उदारवाद को चुनने का अक्ल भरा फैसला लिया. जो सारी दुनिया के लिए नजीर है कि दरअसल में सरकार कैसी होनी चाहिए.उसे धर्म और कट्टरवाद की सड़ांध मारती राजनीति से दूर रहते नागरिक सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ और रोजगार को प्राथमिकता देनी चाहिए. यह काम सिर्फ युवा, छात्र, जेन जी और काकरोच टाइप के उन्मादी ही कर सकते हैं. नफरत और भेदभाव के संस्कारों बाले रूढ़िवादी और परम्परावादी तो मुफ्त की मलाई चाटने के आदी हमेशा से ही रहे हैं.
बेहद बेहद खूबसूरत देश है सर्बिया
वे देश जिनकी कोई सीमा नहीं होती `लेंड लॉक्ड` देश कहे जाते हैं. सर्बिया उनमे से एक है जो दक्षिण पूर्वी यूरोप का एक एतिहासिक महत्व का देश है.नदियों के जाल से घिरे इस छोटे लेकिन ख़ूबसूरत देश के बीच से डैन्यूब नदी होकर गुजरती है. सावा और मोरवा सैबिया की दो अन्य प्रमुख नदियाँ हैं लगभग 70 लाख की आबादी बाले इस देश में रूढ़िवादी ईसाईयों की भरमार है.
राजधानी बेलग्रेड को तो कुदरत ने बेइंतिहा खूबसूरती से नवाजा है. बेलग्रेड के तैरते हुए क्लब्स और नाईट लाइफ का लुत्फ़ उठाने दुनिया भर के शौक़ीन सर्बिया आते हैं. विक्की कौशल अभिनीत `उरी द सर्जिकल स्ट्राइक` की अधिकतर शूटिंग यहीं हुई थी.टाइगर श्राफ अभिनीत `बागी 3` की शूटिंग भी सर्बिया में निर्माता साजिद नाडियाबाला ने की थी.
बेलग्रेड के एतिहासिक महत्व के किले भी दर्शनीय हैं..इन किलों को बनबाने की शुरुआत रोमनो ने की थी जो मध्यकालीन शासकों जो सर्बियाई ही थे से लेकर हैब्सवर्ग साम्राज्य तक कायम रही. बेलग्रेड के किले से जुडी रहस्मय कहानियां पर्यटकों को रोमांचित करती है.
सर्बियाई लोग खाने पीने के साथ साथ मेहमानवाजी के लिए भी जाने जाते हैं सर्बियाई शराब के भी खासे शौक़ीन है राकिया शराब को तो राष्ट्रीय शराब का दर्जा मिला हुआ है. बर्मेट नाम की मीठी शराब भी खासी लोकप्रिय है. चेवापी सर्बिया का राष्ट्रीय व्यंजन है जो एक लोकप्रिय स्ट्रीट फ़ूड भी है. सर्बिया अब तेजी से हाईटेक हो रहा है लगभग सभी दिग्गज टेक कम्पनियां यहाँ कारोबार कर रही हैं. उम्मीद है स्टूडेंट लिस्ट सरकार आईटी सेक्टर को और प्रोत्साहन देगी क्योंकि वह है ही तकनीक मानसिकता बाली. Serbia Gen Z Protest




