Youth Protest in India: तिरंगा लेकर प्रदर्शन करने निकले तो पुलिस रोकेगी, सरकार के खिलाफ नारे लगाए तो हिरासत में ले लिया जाएगा और विरोध की आवाज उठाई तो मुकदमों और बांड के चक्रव्यूह में फंसा दिया जाएगा. कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका, सौरव दास और आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाइयों ने लोकतंत्र अस्तित्व पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या मोदी सरकार में शांतिपूर्ण विरोध करने वालों और सरकार से जवाबदेही चाहने वालों को कानूनी कार्रवाई का डर दिखा कर चुप कराने की कोशिश हो रही है?

मई 2018 में कर्नाटक (बेंगलुरु) में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राहुल गांधी ने बीजेपी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष और वर्तमान गृह मंत्री अमित शाह के लिए कहा था कि वे हत्या के मामले में संलिप्त हैं. राहुल की इस बात से बीजेपी के एक नेता विजय मिश्रा इतने आहत हो गए कि उन्होंने सुल्तानपुर की जिला अदालत में 4 अगस्त 2018 को राहुल के खिलाफ IPC की धारा 499 और 500 के तहत मानहानि का मुकदमा कर दिया. ये मुकदमा 8 साल चला.

2018 से 2026 तक चले इस मुकदमे में 30 से ज्यादा पेशियां पड़ीं. इन पेशियों पर राहुल की तरफ से वकील पेश होते रहे. खुद राहुल गांधी व्यक्तिगत रूप से 4 बार अदालत के सामने पेश हुए. आखिरकार 26 अक्टूबर 2026 को चौथी बार फैसले वाले दिन राहुल गांधी जब कोर्ट पहुंचे तो न्यायाधीश शुभम वर्मा ने उन्हें मामले से बरी कर दिया. हालांकि मामला लोअर कोर्ट का है. वादी के पास बड़ी कोर्ट में फैसले को चुनौती देने का अधिकार है. अगर वह ऐसा करता है तो केस अभी आगे दस-पंद्रह साल और चल सकता है.

राहुल गांधी देश के बड़े नेता हैं. उनके पास कानूनी सलाहकारों की टीम है और अदालत में उनका पक्ष रखने के लिए वकीलों की लंबी फौज है. उनके पास संसाधन हैं, आर्थिक रूप से सक्षम हैं. इसके बावजूद उन्हें मानहानि के एक मुकदमे में आठ साल तक कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ा. अब जरा सोचिए, यदि यही मुकदमा किसी मध्यमवर्गीय नागरिक के खिलाफ दर्ज हुआ होता, तो उसकी क्या हालत होती?

एक आम आदमी की जिंदगी में आठ साल बहुत मायने रखते हैं. इन आठ वर्षों में किसी के बच्चे स्कूल से निकलकर कॉलेज पहुंच जाते हैं, किसी की बेटी की शादी की उम्र हो जाती है, किसी के माता-पिता बूढ़े हो जाते हैं और किसी की पूरी जिंदगी की कमाई घर, बच्चों की पढ़ाई और परिवार की जरूरतों में खर्च हो जाती है. लेकिन अदालत में चल रहा मुकदमा उसके जीवन पर एक अनिश्चितता की तरह लटका रहता है.

सबसे पहली मार उसकी जेब पर पड़ती है. वकील की फीस, अदालत आने-जाने का खर्च, दस्तावेज तैयार कराने का खर्च और काम से छुट्टी लेने के कारण होने वाला आर्थिक नुकसान, ये सब मिलकर एक सामान्य परिवार का बजट बिगाड़ देते हैं. मुकदमा लंबा खिंचने पर कई बार व्यक्ति को अपनी बचत खर्च करनी पड़ती है, कर्ज लेना पड़ता है या जमीन-जायदाद तक बेचनी पड़ती है.

दूसरी मार उसके रोजगार पर पड़ती है. रोज कमाकर खाने वाला व्यक्ति हर पेशी पर अदालत नहीं पहुंच सकता, लेकिन गैरहाजिरी या कानूनी प्रक्रिया की अनदेखी उसके लिए मुश्किलें खड़ी कर देती है. निजी नौकरी करने वाले व्यक्ति को छुट्टी लेने में परेशानी हो सकती है. छोटा दुकानदार दुकान बंद करके अदालत जाता है तो उस दिन की कमाई का नुकसान होता है. दिहाड़ी मजदूर के लिए एक दिन की पेशी का मतलब एक दिन की मजदूरी गंवाना भी हो सकता है.

तीसरी मार उसके मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन पर पड़ती है. मुकदमा कब खत्म होगा, अगली पेशी पर क्या होगा और कहीं कोई प्रतिकूल आदेश तो नहीं आ जाएगा, ये सवाल उसे लगातार परेशान कर सकते हैं. परिवार तनाव में रहता है. बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और भविष्। योजनाएं प्रभावित होती हैं. वर्षों तक चलने वाला मुकदमा व्यक्ति को मानसिक रूप से थका देता है.

चौथी मार उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा पर पड़ती है. अदालत में किसी के खिलाफ मामला दर्ज होने का अर्थ यह नहीं कि वह दोषी है, लेकिन समाज में कई लोग मुकदमे को ही अपराध का प्रमाण मान लेते हैं. पड़ोस, रिश्तेदारी और कार्यस्थल पर सवाल उठ सकते हैं. व्यक्ति को बार-बार अपनी सफाई देनी पड़ती है.

वर्षों बाद जब अदालत उसे बरी कर देती है, तो क्या उसके जीवन के वे आठ साल वापस मिल सकते हैं? क्या वकीलों पर खर्च हुई रकम लौट आती है? क्या नौकरी में छूटा हुआ अवसर वापस मिल पाता है? क्या मानसिक तनाव और सामाजिक प्रतिष्ठा को पहुंची चोट अपने आप ठीक हो जाती है?

लंबी न्यायिक प्रक्रिया का बोझ उठाने की क्षमता सब में नहीं होती. एक प्रभावशाली व्यक्ति महंगे वकील रख सकता है, कानूनी सलाह ले सकता है और लंबी लड़ाई लड़ने के लिए संसाधन जुटा सकता है, लेकिन एक गरीब या मध्यमवर्गीय नागरिक के लिए मुकदमा लड़ना ही सजा जैसा अनुभव होता है, भले ही अंत में फैसला उसके पक्ष में आए.

आज न्यायालय दोषी को सजा देने वाला स्थान नहीं, बल्कि निर्दोष को अनावश्यक उत्पीड़न देने वाला स्थान बन गया है. जहां मामलों का समयबद्ध निपटारा और जरूरतमंद नागरिकों को प्रभावी कानूनी सहायता मिलना सिरे से गायब है.

सरकार और पुलिस देश की न्याय व्यवस्था की खामियों को बहुत अच्छी तरह जानते हैं, लिहाजा जैसे ही सत्ता में बैठे किसी नेता या सरकार के खिलाफ किसी ने कुछ बोला, उस पर दस तरह के मुक़दमे अलग अलग शहरों में दर्ज करवा कर उसका जीवन बर्बाद करने के उपक्रम शुरू हो जाता है.

सत्ता अपने खिलाफ उठने वाली आवाजों को कानूनी चक्रव्यूह में फंसा कर ख़त्म करना जानती है. पुलिस सत्ता की गुलाम है. उसको जो इशारा मिलता है, वह वैसा ही करती है. वह आवाज उठाने वाले के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कर उसे अदालतों के चक्कर में फंसा देती है और खुद हाथ झाड़ कर किनारे हो जाती है. अब आप जानिये और अदालत जाने.

16 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी फाउंडर अभिजीत दीपके को तिरंगा मार्च में हिस्सा लेने के लिए दिल्ली पुलिस ने घर से बाहर नहीं निकलने दिया. दीपके दिल्ली के झंडेवालान में एक मित्र के घर पर रुके हुए थे, जब पुलिस जबरन उन्हें वहीं घेर कर बैठ गई. पहले उन्हें प्रदर्शन न करने का नोटिस दिया और जब उन्होंने उस पर साइन करने से मना किया और बाहर निकल कर तिरंगा निकाल कर दोनों हाथों से अपने सिर के ऊपर किया तो पुलिस ने दीपके को गिरफ्तार कर लिया. उन्हें जाफरपुर कलां थाने लेजाया गया. रात भर पुलिस ने दीपके को हिरासत में रखा और 17 अक्टूबर को छोड़ दिया.

किस जुर्म में वह रात भर पुलिस हिरासत में रहे?
तिरंगा फहराने के जुर्म में?
‘घर घर तिरंगा’ का नारा देने वाली मोदी सरकार के लिए अब तिरंगा फहराना जुर्म हो गया है?

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन पर पाबंदी, तिरंगा फहराने पर जेल

दशकों से जंतर मंतर पीड़ितों, आंदोलनकारियों के लिए प्रदर्शन स्थल है. मोदी सरकार ने अचानक वहां घुसने पर बैन लगा दिया. बिना कोई कारण बताये लोगों से उनका प्रदर्शन स्थल छीन लिया गया. कॉकरोच जनता पार्टी के सह संयोजक आशुतोष रांका और सौरव दास ने मोदी सरकार और उनकी पुलिस के इस मनमानेपन को चुनौती दी और जब जबरन वहां घुस कर तिरंगा फहराया तो पुलिस ने दोनों को हिरासत में लेकर जेल भेज दिया.

सात दिन तक आशुतोष रांका और सौरव दास को हार्ड कोर तिहाड़ जेल में रखने के बाद उनकी जमानत हुई, मगर बरी वे अभी भी नहीं हुए हैं. उन्हें क्राइम ब्रांच में आये दिन बुलावा आता है. न जाओ तो समन भेजा जाता है.

उन्हें सात दिन की कैद किस जुर्म में हुई?
सरकार की मनमानी को चुनौती देने के जुर्म में?
तिरंगा फहराने के जुर्म में?

नेहा बोरा पर किस जुर्म में 10 हजार रुपये का बांड भरने का दबाव

ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की नैशनल हेड नेहा बोरा को किसी अपराध में दोषी ठहराए जाने के बाद नहीं, बल्कि भविष्य में शांति भंग होने की आशंका के आधार पर बांड भरने का नोटिस दिल्ली पुलिस द्वारा दिया गया. नेहा ने बांड भरने से इंकार कर दिया. उन्होंने पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन 23 अक्टूबर 2026 को अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी.

गौरतलब है कि 16 अक्टूबर 2026 को नेहा बोरा दिल्ली के मंडी हाउस इलाके में ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च में शामिल होने पहुंची थीं. इस मार्च का उद्देश्य मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध दर्ज कराना और कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में राष्ट्रीय ध्वज फहराना था. पुलिस ने मंडी हाउस से ही नेहा बोरा को अरेस्ट कर लिया. वह रात भर कस्टडी में रही. 17 अक्टूबर को नेहा को रिहा किया गया.

इसके बाद विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) ने उन्हें नोटिस जारी किया. नोटिस में कहा गया कि वह जांच की अवधि के दौरान शांति बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का निजी मुचलका भरें और एक जमानतदार दें.

नोटिस में मुख्य रूप से तीन आधार बताए गए –

मंडी हाउस में नारेबाजी – आरोप लगाया कि नेहा बोरा ने 16 अक्टूबर को वहां नारे लगाए.
निषेधाज्ञा के बावजूद प्रदर्शन – पुलिस ने जंतर-मंतर के आसपास धारा 163 के तहत प्रतिबंध लगा रखा था, उसके बावजूद नेहा वहां पहुंची. (गौरतलब है कि नेहा अकेले ही थी, न कि भीड़ के साथ. जबकि धारा 163 के तहत पांच या उससे अधिक लोगों के एक जगह एकत्रित होने पर पुलिस कार्रवाई होती है.)
प्रदर्शन के लिए लोगों को प्रेरित करना – पुलिस का आरोप था कि उन्होंने लोगों को कनॉट प्लेस में प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसाया.

क्या महज आशंका के नाम पर नागरिकों के अधिकार छीने जा सकते हैं?

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि ये पुलिस और प्रशासन की ओर से बताई गई बातें महज आशंकाएं थीं, अदालत द्वारा साबित किया गया अपराध नहीं था. मंडी हाउस में न तो तिरंगा फहराने पर प्रतिबन्ध था और न नारेबाजी करने पर. न अकेले उस रास्ते पर चलने पर. बावजूद इसके नेहा को पुलिस ने कस्टडी में लिया, रात भर थाने पर बिठा कर रखा और दूसरे दिन छोड़ा. फिर जब कोई व्यक्ति किसी आंदोलन का नेतृत्व कर रहा है तो निश्चित ही वह जनता से प्रदर्शन में शामिल होने का अनुरोध करेगा.

इसमें अपराध क्या है?
क्या तिरंगा साथ लेकर चलना अपराध हो गया है?
क्या जनता का आह्वान करना अपराध हो गया है?
सरकार की गलत नीतियों, गलत लोगों के खिलाफ नारेबाजी करना अपराध हो गया है?
आखिर नेहा बोरा को अरेस्ट क्यों किया गया?
उन पर बांड भरने और जमानतदार लाने का दबाव क्यों है?

बांड का कानूनी आधार क्या था?

पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 126 और 130 के तहत नेहा बोरा पर कार्रवाई की. धारा 126 के अंतर्गत, यदि मजिस्ट्रेट को ऐसी विश्वसनीय जानकारी मिलती है कि किसी व्यक्ति से शांति भंग होने की आशंका है, तो वह उस व्यक्ति से शांति बनाए रखने के लिए बांड भरने के संबंध में जवाब मांग सकता है.

धारा 130 संबंधित आदेश में आवश्यक विवरण दर्ज करने की प्रक्रिया से जुड़ी है. नोटिस में धारा 135(3) का भी उल्लेख था, जो जांच लंबित रहने के दौरान कुछ परिस्थितियों में अंतरिम बांड का निर्देश देने से संबंधित है.

इस तरह पुलिस की दलील थी कि कार्रवाई किसी अपराध की सजा देने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में संभावित अशांति को रोकने के लिए की गई. लेकिन सवाल यह है कि क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने के आधार पर वास्तव में शांति भंग होने की आशंका मानने के पर्याप्त कारण थे? आखिर सिर्फ एक आशंका के चलते नेहा बोरा को रात थाने में गुजारनी पड़ी? हाई कोर्ट तक जाना पड़ा? वकील हायर करना पड़ा? समय और पैसा बर्बाद करना पड़ा?

क्या यह उनके साथ अन्याय नहीं ?
क्या उनके अधिकारों का हनन नहीं?

नेहा ने तो शांतिपूर्ण प्रदर्शन का आह्वान किया था और हिंसा करने के लिए किसी को नहीं कहा था. फिर पुलिस ने अरेस्ट क्यों किया?
क्या लोकतंत्र में सरकार बदलने की मांग करना गलत है?
किसी गलत व्यक्ति का इस्तीफा मांगना गलत है?
सरकार की आलोचना करना, सरकार से ठीक से काम करने के लिए कहना या मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन करना गलत है?

शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर सवाल, लेकिन अदालत ने याचिका खारिज कर दी

आखिर नेहा के किस आचरण से भविष्य में शांति भंग होने की आशंका पैदा हुई? पर्याप्त तथ्य दिए बिना उन्हें संभावित उपद्रव के लिए जिम्मेदार कैसे मान लिया गया? नेहा बोरा शांतिपूर्ण विरोध कर रही थीं, ऐसे में उन्हें बांड भरने के लिए कहना क्या उनके संवैधानिक अधिकारों पर अनुचित दबाव नहीं है?

इन सभी बातों को नजरअंदाज कर 23 अक्टूबर 2026 को न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने नेहा बोरा की बांड को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी. अदालत ने पुलिस और प्रशासन द्वारा बताई गई वजहें स्वीकार कर लीं. गौरतलब है कि न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद वही न्यायाधीश हैं जिन्होंने दिसंबर 2025 में उन्नाव बलात्कार मामले में दोषी ठहराए गए पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को जमानत दे दी थी.

गौरतलब है कि कुलदीप सेंगर को राहत देने वाला फैसला न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद और न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने दिया था. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश पर रोक लगा दी थी.

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना अपराध नहीं

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना कोई अपराध नहीं है. सरकार के फैसलों से असहमति जताना, सड़कों पर उतरना, सवाल पूछना और अपनी मांगों के लिए आंदोलन करना जनता का अधिकार है. लोकतंत्र में सरकार जनता की मालिक नहीं, जनता के प्रति जवाबदेह प्रतिनिधि होती है. चुनाव जीतना सरकार को पांच साल तक शासन करने का अधिकार देता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसे जनता की आलोचना या जवाबदेही से मुक्त कर दिया गया है.

नेपाल से बांग्लादेश तक : जनता की आवाज दबाने का अंजाम

नेपाल, बांग्लादेश, फ्रांस और यूरोप के अनेक देशों में जो आंदोलन हुए और जो हो रहे हैं. उन तमाम जनांदोलनों ने यह दिखाया है कि जनता केवल वोट डालकर अपनी राजनीतिक जिम्मेदारी पूरी नहीं कर देती. जब लोगों को लगता है कि सरकार उनकी समस्याओं को अनदेखा कर रही है, उनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ रही है, उनके अधिकार सीमित किए जा रहे हैं या सत्ता जवाबदेही से बच रही है, तो वे सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज बुलंद करते हैं.

जहां जहां सरकारों ने जनता की असहमति को सुनने के बजाय उसे दबाने का रास्ता अपनाया, प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया, गोलियां चलाईं, उन्हें जेल में ठूंसा तो समस्या खत्म होने के बजाय और गंभीर हो गई. कई जगह तख्तापलट भी हो गया. नेपाल और बांग्लादेश हालिया उदाहरण हैं.

बड़े सामाजिक और राजनीतिक बदलाव अदालतों में याचिकाएं दाखिल करने से नहीं आते. बदलाव आते हैं, जब आम आदमी अपने अधिकारों के लिए घर से बाहर निकल कर, सड़कों पर उतर कर सत्ता को अपनी ताकत का अहसास कराता है. अदालतें न्याय देने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं, लेकिन जनता की सामूहिक आवाज और शांतिपूर्ण जनांदोलन वह ताकत हैं, जो अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं को बदलने के लिए सरकारों को मजबूर कर देती हैं.

गांधी से जेपी तक : सड़क पर उतरी जनता ने बदला इतिहास

महात्मा गांधी बैरिस्टर थे, अदालतों की कार्यप्रणाली को अच्छी तरह समझते थे, लेकिन भारत की आजादी की लड़ाई उन्होंने सड़क पर लड़ी, न कि किसी अदालत में कानूनी अर्जियां दाखिल करके. गांधी ने ने जनता को संगठित किया, अंग्रेजी शासन के अन्याय के खिलाफ सड़क पर उतरने का आह्वान किया और सत्याग्रह को आजादी की लड़ाई का हथियार बनाया. चंपारण सत्याग्रह से लेकर असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन तक गांधी ने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने के लिए जनता की सामूहिक शक्ति पर भरोसा किया. उन्होंने लाठियां खाईं, जेल गए और जेल से लौट कर फिर सड़कों पर आंदोलन किये.

1974 में बिहार से जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में भ्रष्टाचार, महंगाई और सरकार के कामकाज के खिलाफ छात्रों ने आवाज उठाई . यह आंदोलन व्यापक जनांदोलन में बदला. जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया. 1975 में आपातकाल लागू होने के बाद विपक्षी नेताओं और आंदोलनकारियों को जेल में डाला गया, प्रेस पर प्रतिबंध लगाए गए और नागरिक स्वतंत्रताएं सीमित कर दी गईं, लेकिन विरोध समाप्त नहीं हुआ. आंदोलन का ही असर था कि 1977 के चुनाव में जनता ने सत्तारूढ़ कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया.

क्या मोदी सरकार जनता की आवाज से डर रही है?

मोदी सरकार को ये बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि वे किसी अमर सरकार के तानाशाह नहीं हैं. यह लोकतंत्र है जहां सरकारें आती-जाती रहती हैं. लोकतंत्र की असली ताकत इस बात में है कि नागरिक अपनी सरकार से सवाल पूछ सकें. लेकिन जब सरकार सवालों का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वालों को ही कानूनी कार्रवाई का डर दिखाने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट हो रही है. और इस स्थिति को जनता ज्यादा दिन तक सहन नहीं करेगी.

देश में सीजेपी यानी कॉकरोच जनता पार्टी और उससे जुड़े लोगों के आंदोलन के संदर्भ में उठ रहे सवाल इसी चिंता को सामने लाते हैं. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन हो, जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराने की कोशिश हो या सरकार की नीतियों के विरोध में आंदोलन हो, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की बर्बर कार्रवाई ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या अब सरकार के खिलाफ आवाज उठाने की कीमत मुकदमे, गिरफ्तारी, जमानत की जद्दोजहद और अदालतों के चक्कर लगाकर चुकानी पड़ेगी?

आंदोलन को कमजोर करने का नया तरीका : मुकदमे, गिरफ्तारी और कानूनी दबाव

आंदोलन को कमजोर करने का यह तरीका किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक है. प्रदर्शनकारियों पर कानूनी कार्रवाई का दबाव कई बार दिखाई नहीं देता. मुकदमों और कानूनी शर्तों का बोझ इंसान की जिंदगी, उसकी रोजी-रोटी, परिवार और भविष्य पर बहुत गहरा पड़ता है. अगर किसी आंदोलनकारी को महीनों तक अदालतों के चक्कर लगाने पड़ें, वकीलों की फीस जुटानी पड़े, आयदिन थाने में हाजिरी देनी पड़े और हर समय गिरफ्तारी का डर सताता रहे, तो सवाल उठता है कि वह अगली बार आंदोलन में शामिल होने की हिम्मत कैसे जुटाएगा? सरकार और पुलिस अब प्रदर्शनकारियों को कानूनी फंदे में फांस कर असहमति को हतोत्साहित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है.

पहले धारा 163, फिर गिरफ्तारी और मुकदमों का जाल

आंदोलन रोकने के लिए प्रशासनिक प्रतिबंध लगाना, निषेधाज्ञा जारी करना और उसके उल्लंघन पर कार्रवाई करना आंदोलनकारियों को डराने और तितर-बितर करने का हथियार बन गया है.

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस की धारा 163 के तहत किसी स्थान पर तत्काल रोकथाम संबंधी आदेश जारी किए जा सकते हैं, यदि कानून में निर्धारित परिस्थितियां मौजूद हों. यह प्रावधान अपने आप में लोकतंत्र विरोधी नहीं है. हिंसा रोकना, लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और वास्तविक खतरे से निपटना प्रशासन की जिम्मेदारी है. लेकिन यदि इसी प्रावधान का इस्तेमाल शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को रोकने के लिए व्यापक और लगातार किया जाने लगे, तो उसकी वैधता, आवश्यकता और औचित्य पर सवाल उठता है.

हर प्रदर्शन दंगा नहीं होता. हर नारा कानून-व्यवस्था के लिए खतरा नहीं होता. सरकार के खिलाफ उठने वाली हर आवाज से सार्वजनिक शांति भंग होने का खतरा भी नहीं पैदा होता. मान लीजिए, कुछ युवा सरकार की किसी नीति का विरोध करने के लिए एक जगह इकट्ठा होना चाहते हैं. प्रशासन निषेधाज्ञा लागू कर देता है. प्रदर्शनकारी वहां पहुंचते हैं तो पुलिस उन्हें हिरासत में ले लेती है. फिर उनके खिलाफ अलग-अलग धाराओं में मुकदमे दर्ज होते हैं. कुछ लोगों को जेल भेज दिया जाता है, कुछ को जमानत के लिए अदालत जाना पड़ता है और कुछ को भविष्य में शांति बनाए रखने के नाम पर बांड भरने के लिए कहा जाता है.

सवाल यह है कि क्या प्रदर्शनकारियों ने वास्तव में हिंसा की थी, या वे केवल अपनी असहमति दर्ज कराने आए थे?
कानून का उद्देश्य अपराध रोकना है, न कि नागरिकों को इतना परेशान कर देना कि वे अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने से ही डरने लगें.

बांड भरवाकर आंदोलन से दूर रखने की कोशिश?

सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके और आंदोलन से जुड़े दूसरे लोगों के मामलों ने इस बहस को तेज किया है. अभिजीत दीपके से बांड भरवाया गया और कानून-व्यवस्था बिगाड़ने वाली गतिविधियों से दूर रहने जैसी शर्त लगा दी.

शांति बनाए रखने की शर्त का अर्थ यह होना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति हिंसा न करे, सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान न पहुंचाए और कानून का उल्लंघन न करे. लेकिन अगर ऐसी शर्त को इस तरह लागू किया जाए कि संबंधित व्यक्ति सरकार के खिलाफ प्रदर्शन ही न कर सके, तो यह शांतिपूर्ण असहमति के अधिकार पर अप्रत्यक्ष रोक है.

आखिर कानून-व्यवस्था बिगाड़ने और सरकार की आलोचना करने में फर्क है. दोनों को एक ही तराजू में कैसे तौला जा सकता है?

सरकार के खिलाफ नारे लगाना, किसी संवैधानिक पदाधिकारी से इस्तीफे की मांग करना या चुनाव व्यवस्था पर सवाल उठाना अपने आप में हिंसा नहीं है. ऐसी गतिविधियों को केवल इसलिए अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता कि उनसे सरकार या किसी प्रभावशाली पदाधिकारी को असुविधा होती है.

आखिर प्रदर्शनकारी से बांड क्यों मांगा गया? उसका कानूनी आधार क्या था? क्या उसकी शर्तें हिंसा रोकने तक सीमित थीं या उन्होंने शांतिपूर्ण प्रदर्शन की स्वतंत्रता को भी प्रभावित किया? इन सवालों का जवाब सार्वजनिक होना चाहिए. लोकतंत्र में पुलिस की कार्रवाई केवल इसलिए सही नहीं हो जाती कि उसके पास वर्दी और कानूनी अधिकार हैं.

यदि किसी प्रदर्शन में निषेधाज्ञा लागू थी तो प्रशासन को उसका आधार, दायरा और अवधि स्पष्ट करनी चाहिए थी. यदि गिरफ्तारी की गई, तो उसका कानूनी आधार बताया जाना चाहिए था. यदि कई धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया, तो आरोपों के समर्थन में उपलब्ध सामग्री की जांच होनी चाहिए थी. यदि किसी व्यक्ति को बांड भरने के लिए कहा गया, तो संबंधित कानूनी प्रावधान और शर्तें स्पष्ट होनी चाहिए थी.

क्या तिरंगा फहराना भी अपराध की तरह देखा जाएगा?

आशुतोष रांका और सौरभ दास को जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराने के मामले में सात दिन के लिए जेल भेजे जाने की खबर ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं. तिरंगा केवल कपड़े का एक टुकड़ा नहीं है. वह देश की आजादी, संविधान और नागरिकों की साझा पहचान का प्रतीक है. उसे फहराना अपने आप में कोई अपराध नहीं है. अगर नागरिकों को यह महसूस होने लगे कि देश के झंडे के साथ विरोध दर्ज कराने पर भी उन्हें जेल जाना पड़ सकता है, तो सत्ता और प्रशासन को अपनी कार्रवाई के औचित्य के बारे में स्पष्ट जवाब देना चाहिए.

देश के प्रति प्रेम और सरकार के प्रति असहमति एक साथ मौजूद हो सकते हैं. संविधान ने नागरिकों को केवल सरकार का समर्थन करने का अधिकार नहीं दिया, बल्कि उसके फैसलों पर सवाल उठाने की स्वतंत्रता भी दी है.

अब लाठीचार्ज की जगह मुकदमो का डर?

लोकतंत्र में पुलिस की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. उसका काम नागरिकों की सुरक्षा करना, हिंसा रोकना और कानून लागू करना है. पुलिस के पास जितनी शक्ति है उसकी जवाबदेही भी उतनी बड़ी है. अगर पुलिस कानून की धाराओं का नाजायज इस्तेमाल कर प्रदर्शनकारियों पर धड़ाधड़ मुकदमे ठोंकने लगे तो देश में लोकतंत्र को बचाने वाली आवाजें धीरे धीरे शांत हो जाएंगी. यह बात अब मोदी सरकार और उनकी पुलिस बखूबी समझ रही है. लिहाजा अब लाठी से नहीं कानूनी फंदे में फंसाने की कार्रवाइयां तेज हो रही हैं.

जब प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज होता है, तो भीड़ तुरंत तितरबितर हो जाती है. बात आईगई हो जाती है, लेकिन कानूनी कार्रवाई का सिलसिला लम्बे समय तक चलता है. किसी व्यक्ति के खिलाफ कई धाराओं में मुकदमा दर्ज हो जाए, तो उसे वकील से संपर्क करना पड़ता है. जमानत के लिए आवेदन देना पड़ता है. अदालत में पेशियां होती हैं. जांच में शामिल होने के लिए पुलिस के सामने बार बार उपस्थित होना पड़ता है. जैसे कि आशुतोष आंका और सौरव दास क्राइम ब्रांच दिल्ली के सामने बार बार बुलाये जा रहे हैं. नौकरी या कारोबार प्रभावित होता है. परिवार के लोगों को आर्थिक और मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

अगर मुकदमे की सुनवाई लंबे समय तक पूरी न हो, तो यह बोझ और बढ़ जाता है. कठोर और बार-बार की कानूनी कार्रवाई लोगों को विरोध प्रदर्शन से दूर करती है. दिल्ली पुलिस अब इसी तरीके से लोगों को डराना चाहती है. इसलिए अब प्रत्येक मामले में दर्ज धाराओं, गिरफ्तारी के आधार, जमानत की स्थिति और सुनवाई की प्रगति की सार्वजनिक समीक्षा जरूरी है.

सरकार और पुलिस को बताना चाहिए कि उसका उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना है या असहमति जताने वालों की आवाज बंद करना? अगर कार्रवाई का व्यावहारिक असर यह हो कि लोग अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करने से डरने लगें, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर चेतावनी है.

आज सीजेपी, कल कोई और : शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार सबका है

सीजेपी का आंदोलन हो या किसी अन्य संगठन का प्रदर्शन सवाल केवल एक पार्टी या कुछ व्यक्तियों का नहीं है. सवाल उस अधिकार का है जिसका इस्तेमाल कल कोई भी नागरिक कर सकता है.

आज किसी एक संगठन को प्रदर्शन करने से रोका जा रहा है, तो कल किसी दूसरे संगठन की बारी आ सकती है. आज सरकार के विरोध में नारे लगाने वाले लोगों को कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है, तो कल किसी दूसरे मुद्दे पर आवाज उठाने वालों को भी ऐसी ही परिस्थितियों से गुजरना पड़ सकता है. इसीलिए शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार की रक्षा हर नागरिक के अधिकार की रक्षा करना है.

सत्ता स्थायी नहीं, लेकिन उसके बनाए उदाहरण लंबे समय तक याद रहते हैं

मोदी सरकार और दिल्ली पुलिस को यह स्पष्ट करना चाहिए कि सीजेपी तथा अन्य संगठनों के आंदोलनों से निपटने के लिए अपनाई जा रही कार्रवाई का वास्तविक उद्देश्य क्या है? मोदी सरकार को तय करना होगा कि वह जनता के सवालों का जवाब देना चाहती है या सवाल पूछने वालों को ही कानूनी प्रक्रिया में उलझाकर थका देना चाहती है? क्योंकि सरकारें स्थायी नहीं होतीं, लेकिन उनके बनाए उदाहरण लंबे समय तक याद रखे जाते हैं.

भारत ने आजादी इसलिए नहीं हासिल की थी कि एक दिन विदेशी सत्ता चली जाए और नागरिकों को अपनी ही सरकार से सवाल पूछने में डर लगने लगे. आजादी का अर्थ नागरिकों को अधिकार मिलना, सत्ता की जवाबदेही तय होना और कानून के सामने हर व्यक्ति का समान होना था.

यदि किसी आंदोलनकारी को अपने विचार रखने से पहले गिरफ्तारी का डर सताने लगे, यदि किसी छात्र को अपनी आवाज उठाने से पहले परिवार की आर्थिक स्थिति का हिसाब लगाना पड़े और यदि किसी सामान्य नागरिक को यह सोचना पड़े कि सरकार की आलोचना करने के बाद उसे कितने मुकदमे लड़ने पड़ सकते हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छी स्थिति नहीं है.

मोदी सरकार को याद रखना होगा कि लोकतंत्र में जनता की आवाज को लंबे समय तक दबाकर रखना आसान नहीं होता है. सत्ता के पास पुलिस, प्रशासन और जेलें हो सकती हैं, कानून का बेजा इस्तेमाल कर आंदोलनकारियों पर गंभीर से गंभीर धाराएं लगाईं जा सकती हैं. मगर जनता ने अगर बदलाव लाने की ठान ली है तो फिर बदलाव होकर रहेगा.

धारा 126

इस धारा का मूल प्रावधान CrPC की धारा 107 में पहले से मौजूद था. CrPC, 1973 को 25 जनवरी 1974 को अधिनियमित किया गया और यह 1 अप्रैल 1974 से लागू हुआ. 2024 में नई संहिता लागू होने के बाद इसका समकक्ष प्रावधान धारा 126 बन गया. इस धारा का उद्देश्य ऐसी स्थिति में शांति बनाए रखना है, जब कार्यपालक मजिस्ट्रेट को जानकारी मिले कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है या सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ सकता है. इसके तहत मजिस्ट्रेट संबंधित व्यक्ति को कारण बताने के लिए बुला सकता है कि उससे शांति बनाए रखने के लिए बांड क्यों न भरवाया जाए.

शांति बनाए रखने के लिए बांड की अवधि अधिकतम एक वर्ष हो सकती है. संबंधित व्यक्ति को अपनी बात रखने का अवसर दिया जाता है. यह कार्रवाई संभावित शांति भंग को रोकने के लिए है, न कि अपने आप में किसी अपराध में दोषसिद्धि. उदाहरण के लिए यदि प्रशासन को ठोस जानकारी मिलती है कि दो समूहों के बीच टकराव होने की आशंका है, तो वह शांति बनाए रखने के लिए संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध इस धारा के तहत कार्यवाही शुरू कर सकता है. लेकिन केवल सरकार की आलोचना करना या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि कोई व्यक्ति शांति भंग करेगा.

धारा 130

इस धारा का पुराना समकक्ष CrPC की धारा 111 था, जो 1 अप्रैल 1974 से लागू हुई दंड प्रक्रिया संहिता का हिस्सा था. 1 जुलाई 2024 से इसका समकक्ष प्रावधान BNSS की धारा 130 हो गया. धारा 130 का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शांति बनाए रखने के लिए बांड भरवाने की कार्यवाही मनमाने ढंग से न हो, बल्कि मजिस्ट्रेट लिखित आदेश जारी करे. जब मजिस्ट्रेट धारा 126 या संबंधित धाराओं के तहत किसी व्यक्ति से बांड भरवाने की कार्यवाही आवश्यक समझता है, तो उसे लिखित आदेश में प्रमुख बातें दर्ज करनी होती हैं –

संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध मिली सूचना का सार
बांड की राशि
बांड कितनी अवधि तक प्रभावी रहेगा
जमानतदारों की संख्या और उनकी पर्याप्तता से संबंधित विवरण

इस प्रकार, धारा 130 प्रशासनिक कार्रवाई को एक निर्धारित कानूनी प्रक्रिया से जोड़ती है.

धारा 135(3)

इसका समकक्ष प्रावधान CrPC की धारा 116(3) में था. CrPC, 1973 के लागू होने के साथ यह व्यवस्था 1 अप्रैल 1974 से अस्तित्व में आई. 1 जुलाई 2024 से इसे BNSS की धारा 135(3) के रूप में जारी रखा गया. यह तीनों प्रावधानों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें कुछ परिस्थितियों में जाँच पूरी होने से पहले भी शांति बनाए रखने के लिए बांड भरवाने और हिरासत में रखने की शक्ति का उल्लेख है.

धारा 135 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध मिली सूचना की सत्यता की जांच करता है. इसकी उपधारा (3) के अनुसार, यदि जांच शुरू होने के बाद लेकिन पूरी होने से पहले मजिस्ट्रेट को लगता है कि तत्काल कदम उठाना जरूरी है, तो वह कुछ शर्तों के अधीन व्यक्ति को जांच पूरी होने तक शांति बनाए रखने के लिए बांड भरने का निर्देश दे सकता है. कुछ परिस्थितियों में बांड न भरने पर व्यक्ति को हिरासत में भी रखा जा सकता है. लेकिन यह शक्ति असीमित नहीं है.

कानून के अनुसार –
मजिस्ट्रेट को तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता महसूस होनी चाहिए .
उसे कार्रवाई के कारण लिखित रूप में दर्ज करने होते हैं.
बांड की शर्तें धारा 130 के आदेश में निर्धारित शर्तों से अधिक कठोर नहीं हो सकतीं.
धारा 135(3) के तहत संबंधित कार्रवाई को वैधानिक शर्तों के अनुरूप होना चाहिए.

उदाहरण के लिए यदि मजिस्ट्रेट के सामने किसी व्यक्ति के विरुद्ध शांति भंग करने की आशंका से संबंधित कार्यवाही चल रही है और उसे तत्काल सुरक्षा उपाय आवश्यक लगते हैं, तो वह कानून में निर्धारित शर्तों के अधीन बांड भरने का आदेश दे सकता है. लेकिन किसी व्यक्ति को केवल इसलिए हिरासत में रखना कि उसने सरकार के विरुद्ध आवाज उठाई है, इस प्रावधान का स्वतः वैध इस्तेमाल नहीं बन जाता.

फ्रांस में सड़कों पर उतरे हजारों लोग, मैक्रों सरकार पर दबाव

फ्रांस में महंगाई, जीवन-यापन की बढ़ती लागत, शिक्षा व्यवस्था की बदहाली और सरकारी सेवाओं में कटौती के खिलाफ जबरदस्त प्रदर्शन जारी है. 24 अक्टूबर को देशभर में 4 लाख से अधिक लोगों ने प्रदर्शन में शामिल होकर सरकार से जवाब माँगा. वहां छात्र, शिक्षक और कर्मचारी बेहतर सार्वजनिक सेवाओं और राहत की मांग कर रहे हैं. यूनियनों ने 31 अक्टूबर को फिर प्रदर्शन और 5 नवंबर को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है. यह आंदोलन दिखाता है कि जनता अपनी सरकार की आर्थिक नीतियों से असहमत हो तो सड़कों पर उतरकर जवाब मांग सकती है.

जब ट्रैक्टर लेकर पेरिस पहुंचे थे किसान

जनवरी 2026 में फ्रांस के किसान ट्रैक्टर लेकर पेरिस पहुंच गए थे और कई प्रमुख सड़कों को उन्होंने जाम कर दिया था. किसानों का विरोध यूरोपीय संघ के मर्कोसुर व्यापार समझौते, सस्ते विदेशी कृषि उत्पादों से प्रतिस्पर्धा और खेती की बढ़ती लागत को लेकर था. किसानों ने सरकार से अपनी आजीविका और कृषि क्षेत्र की सुरक्षा के लिए कदम उठाने की मांग की थी. यह आंदोलन बताता है कि लोकतंत्र में मजदूर-किसान भी सरकार और उसकी नीतियों के खिलाफ संगठित होकर अपनी आवाज बुलंद कर सकते हैं.

सर्बिया में छात्रों का आंदोलन, सरकार से जवाबदेही की मांग

सर्बिया में 2024 के अंत से छात्रों के नेतृत्व में बड़े सरकार-विरोधी प्रदर्शन हुए. भ्रष्टाचार और सरकारी जवाबदेही को लेकर शुरू हुआ आंदोलन व्यापक जन आंदोलन में बदल गया. जून 2025 में बेलग्रेड में एक विशाल प्रदर्शन हुआ, जिसमें अनुमानित 1.40 लाख लोग शामिल हुए. बाद में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव बढ़ा तथा कई लोगों को हिरासत में लिया गया. आंदोलन ने यह सवाल उठाया कि सरकार से जवाबदेही मांगने वाले नागरिकों के साथ प्रशासन का व्यवहार कैसा होना चाहिए.

चेक गणराज्य में सरकारी मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर प्रदर्शन

अक्टूबर 2026 में चेक गणराज्य की राजधानी प्राग में हजारों लोग सार्वजनिक प्रसारण संस्थानों की फंडिंग में प्रस्तावित बदलावों के खिलाफ प्रदर्शन करने जुटे. सरकार की योजना के तहत चेक टेलीविजन और चेक रेडियो को मिलने वाली नियमित फीस की जगह सरकारी बजट से वित्तपोषण का प्रस्ताव था. आलोचकों को आशंका थी कि इससे सार्वजनिक मीडिया की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है. प्रदर्शनकारियों ने प्रस्ताव वापस लेने और व्यापक सार्वजनिक चर्चा की मांग की. यह आंदोलन दिखाता है कि लोकतंत्र में जनता केवल महंगाई या रोजगार जैसे मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि मीडिया की स्वतंत्रता और संस्थाओं की स्वायत्तता के लिए भी सरकार से सवाल पूछ सकती है. Youth Protest in India

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