Reporting Live Movie Review: कहानी ‘आजाद भारती’ नाम के एक हिंदी न्यूज चैनल की प्राइमटाइम रिपोर्टर संध्या यादव (परिणीति चोपड़ा) की है. संध्या अपने सीनियर कैमरामैन विनोद शर्मा (देवेन भोजानी) के साथ टीआरपी लाने वाली खबरों के पीछे भागती है. इसी बीच विसरगांव में एक पुल गिर जाता है, जिस में स्कूली बच्चों से भरी बस नदी में डूब जाती है और ड्राइवर समेत 15 बच्चों की जान चली जाती है. जब संध्या और विनोद इस स्टोरी की पड़ताल करते हैं, तो उन्हें पता चलता है कि यह महज एक दुर्घटना नहीं, बल्कि नदियों से निकाले जा रहे इल्लीगल बालू खनन का नतीजा है. इस ‘ब्राउन गोल्ड’ के काले धंधे का ऊपरी सिरा राज्य के बड़े उद्योगपति आर वेलराज (नासर) तक जाता है, जिस की पहुंच नेताओं से ले कर न्यूज चैनलों के मालिकों तक है.

यहां से शुरू होती है सच को प्राइम टाइम पर चलाने का संघर्ष, जिस में आजाद भारती चैनल का मालिक श्याम सोलंकी (शेखर सुमन) और उस के कौर्पोरेट इंटरैस्ट बीच में आता है. वहीं, चीफ एडिटर विदुर दत्त (आदिल हुसैन) अपने सिद्धांतों और नौकरी के बीच पिसता हुआ दिखाई देता है. फिल्म की सब से बड़ी नाकामी यही है कि यह मीडिया में खबरें दबाने के खेल और इस के पीछे के कौर्पोरेट और राजनीतिक दबाव को गहराई से खंगालने की बात तो करती है मगर सहला कर निकल जाती है. टीवी न्यूजरूम का जो तनाव, राजनीति और खबरों को रोके जाने की जो जटिल प्रक्रिया होती है, उसे बेहद ढीले अंदाज में दिखाया गया है.

दूसरी बात, फिल्म में पत्रकारिता की बारीकियों का इतना भारी अभाव है कि सिर पटकने का दिल करता है. जैसे, संध्या और विनोद लंबी इन्वैस्टिगेशन के लिए जबतब निकल जाते हैं मगर इस बीच किसी तरह का कोआर्डिनेशन चैनल या एडिटर के साथ करते नहीं दिखाई देते, जो प्रैक्टिकल कम लगता है. अवैध बालू माफिया जैसे खौफनाक नैटवर्क का परदाफाश करना ऐसा लगता है जैसे किसी कालेज प्रोजैक्ट का काम हो. अब बताओ, चैनल के एडिटर को इतना भोला दिखाया गया है कि उसे अपने संस्थान के बारे में कुछ पता ही नहीं है. फिल्म में न तो कोई सौलिड डायलौग है, न स्क्रीन प्रेजैंस.

कलाकारों के प्रदर्शन की बात करें तो परिणीति चोपड़ा संध्या के किरदार में एक ही टोन में बात करती दिखती है. उस के हावभाव एक नौसिखिया छात्र जैसे महसूस होते हैं. सीनियर पत्रकार की कसमसाहट और चालाकपना नजर ही नहीं आता कि लगे वह किसी माफिया से टकरा रही है. एडिटर की तरह वह खुद भी अनजान है, जो हास्यास्पद है.

दूसरी तरफ, देवेन भोजानी ने कैमरामैन विनोद के रूप में अच्छा काम किया है. परिणीति के साथ उस की कैमिस्ट्री में कुछ अच्छे पल जरूर हैं, जो कैमरामैन का डर और मजबूरी साफ झलकती है. शेखर सुमन चैनल के मालिक के रूप में चिल्लाने और अपनी कौर्पोरेट सनक दिखाने के अलावा कुछ नया नहीं कर पाता. एडिटर के तौर पर आदिल हुसैन बेबस ही दिखता है.

तकनीकी मोरचे पर फिल्म की एडिटिंग और स्क्रीनप्ले का तालमेल बहुत बिखरा हुआ है. पहले हाफ में जब बालू खनन का खेल उजागर होता है, तो कहानी थोड़ीबहुत बांधती है. लेकिन इंटरवल के बाद न्यूजरूम ड्रामा, धमकी, और माफिया से जंग सबकुछ एक खिचड़ी बन जाती है. वीएफएक्स और विजुअल औसत से नीचे हैं. बैकग्राउंड स्कोर बिना बात के माहौल को टेंस बनाता है.

कुल मिला कर, ‘रिपोर्टिंग लाइव’ एक ऐसा विषय उठाती है जो आज के समय में बेहद प्रासंगिक है लेकिन सतही लेखन, गैरजिम्मेदाराना निर्देशन और थ्रिल की भारी कमी की वजह से फिल्म अपनी ही स्पष्टता खो देती है. Reporting Live Movie Review

 

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