Gender Inequality: त्योहारों का सीजन शुरू हो चुका है. ज्यादातर त्योहारों पर धर्म की मुहर चिपकी हुई है. हर त्योहार पर एक धार्मिक कहानी जोड़ दी गई है, इसलिए लगभग सभी त्योहारों में धर्म की भेदभाव और गैरबराबरी वाली सोच हावी रहती है.
करवाचौथ पर करवा की पूजा करने के बाद पंडों को खिलापिला कर पर पति को पूजो, दीवाली पर लक्ष्मीगणेश को पूजो, ईद पर मुसलमान मसजिद में जा कर एकदूसरे से गले मिलें जबकि औरतें घर में कैद रहें, मर्दों के लिए पकवान व सिवईं बनाएं. औरतें पूजा, रोजा और व्रत में लगी रहें, दिनभर भूखी रहें, घर को सजाएं, पकवान बनाएं और मर्द सोफे पर बैठे मोबाइल में लगे रहें, पूरी रात जुआ खेलें, दारू पिए और दोस्तों संग घूमें. यह भेदभाव नहीं तो और क्या है? सारे त्योहारों में ऐसा ही होता है. संविधान सब लोगों को एक सा और सब आदमीऔरतों को बराबरी का हक देता है लेकिन त्योहारों पर धर्म और जैंडर इक्वैलिटी की बात घुसा दी गई है. ऐसे में त्योहार औरतों पर बोझ बन जाते हैं, एक सीमा तक रह जाते हैं वे.
हर त्योहार पर धर्म की मुहर चिपकी हुई है. हर त्योहार पर किसी न किसी भगवान की कहानी जोड़ दी गई है. हर त्योहार का मतलब दूसरे धर्म वालों को अलग करना भी है, अपने धर्म की औरतों को त्योहार के बोझ तले कुचल देना रह गया है. औरत व्रत रखे, औरत भूखी रहे, औरत सजाए, औरत पकवान बनाए और मर्द भगवान बन कर अपनी पूजा का आनंद लेता रहे. यह बेमतलब का भेदभाव नहीं, तो और क्या है?
त्योहारों पर भेदभाव क्यों बढ़ जाता है?
हर त्योहार खुशियां लाता है. नए कपड़े बनते हैं. घर सजता है. बाजार सजते हैं. वहीं, त्योहार के मौके पर आज कई तरह के भेदभाव भी नजर आते हैं. आंकड़ों से देखिए कि त्योहारों पर भेदभाव कैसे बढ़ जाता है. करवाचौथ पर व्रत सिर्फ औरत रखती है पति के लिए, पति औरत के लिए व्रत नहीं रखता. कथा वही है कि सावित्री ने यमराज से पति को वापस ले लिया, वीरवती ने व्रत तोड़ा तो पति मर गया. कहानी का मोरल यही है कि पति भगवान है, उसे पूजो.
नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे कहता है कि भारत में 35 प्रतिशत औरतें खुद के लिए अकेले बाजार तक नहीं जा सकतीं लेकिन 80 प्रतिशत औरतें करवाचौथ का व्रत रखती हैं.यानी, औरतों को बाजार जाने तक की आजादी नहीं है लेकिन उस पर व्रत का संस्कार जरूर थोपा गया है.
औक्सफैम इंडिया की टाइम यूज सर्वे रिपोर्ट कहती है कि भारतीय औरतें रोजाना औसतन 5 से 6 घंटे अनपेड केयर वर्क करती हैं. खाना, सफाई, पूजा की तैयारी आदि काम औरतें ही करती हैं. त्योहारों पर इन कामों में 8 से 10 घंटे लग जाते हैं. वहीं, यही घरेलू काम मर्द सिर्फ 36 मिनट करते हैं. एनएसएसओ के मुताबिक, दीवाली के हफ्ते में औरतों के ये अनपेड वर्क 30 फीसदी बढ़ जाते हैं.
दीवाली पर लक्ष्मी को धन की देवी मानकर पूजा जाता है जबकि इसी लक्ष्मी के देश में औरतें संपत्ति से आज भी बेदखल हैं. एग्रीकल्चर सेंसस के मुताबिक, सिर्फ 13.9 फीसदी जमीन महिलाओं के नाम पर है.लक्ष्मी की मूर्ति हर घर में है लेकिन ‘लक्ष्मी’ रखने का हक औरत के पास नहीं है.
भूख का भी जैंडर है. करवा चौथ, तीज, वट सावित्री, जितिया सब में औरत भूखी रहती है, विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है, भारत में 15 से 49 साल की 57 फीसदी औरतें एनीमिक हैं. औरतों के भूखी रहने को संस्कार बताया जाता है लेकिन असल में यह कुपोषण का धार्मिक रूप है. रोजा के दिनों में औरतों के सामने खाना रहता है पर वे खा नहीं सकतीं. आदमी कम से कम खाने की सुगंध से दूर तो रहता है. प्रकृति ने आदमी को ऐसा बनाया है कि खाने की सुगंध से उसे भूख लग सकती है. खाने बनाने में लगी औरत भूखी रहे, यह धर्मों ने क्यों जोड़ा, इसलिए कि उस की निगाह में औरतें गुलाम हैं और भोग की चीज हैं. त्योहार केवल पुरुषों के लिए हैं, औरतों व गुलामों के लिए नहीं.
धर्म ने बनाया औरतों को गुलाम
मनुस्मृति में साफ लिखा है- “पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति. अर्थात, बचपन में पिता रक्षा करे, जवानी में पति, बुढ़ापे में पुत्र क्योंकि स्त्री स्वतंत्रता के योग्य नहीं है. इसी मनुस्मृति के दूसरे अध्याय में लिखा है कि औरत पुरुष को मोहित करने वाली होती है, इसलिए उसे काबू में रखना जरूरी है.
रामचरितमानस में लिखा-‘ढोल गंवार शूद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी.’तुलसीदास के इस दोहे का इस्तेमाल औरत को पीटने के जस्टिफिकेशन के तौर पर सदियों तक हुआ है.
कुरान में सूरा निसा की 34वीं आयत में लिखा है कि मर्द औरतों के ऊपर कव्वाम हैं. अगर औरतें अपनी मरजी चलाएं तो उन्हें पीटो. इसी सूरा की 15वीं आयत में औरत को घर में बंद कर मारने तक की बात लिखी है. मौडर्न इसलामिक फैमिनिस्ट स्कौलर्स जैसे आमिना वदूद ने इस की कड़ी आलोचना की है, कहा है कि यह 7वीं सदी के अरब कबीलाई समाज का प्रोडक्ट है, खुदा का नहीं. त्योहार पर क्या इस तरह की औरतों का स्तर बढ़ जाता है जबकि त्योहार की सब से मुख्य चीज खाना है जिस को तैयार करने की जिम्मेदारी सिर्फ गुलाम सी औरतों की होती है.
हदीसों में भी औरत के टेढ़ी पसली से बनी होने की बातें मिलती हैं. बाइबिल के पहले तीमूथियुस, अध्याय दो, वचन 12, में लिखा है कि मैं औरत को उपदेश देने या मर्द पर अधिकार चलाने की इजाजत नहीं देता, लेविटिकस में पीरियड्स के दौरान औरत को अपवित्र माना गया है.
बात किसी एक धर्म की नहीं है. लगभग सभी धर्मों में औरत की जगह घर, परदा, व्रत और सहनशीलता में तय की गई है क्योंकि धर्म की किताबें उस समय लिखी गईं जब औरत की कोई प्रौपर्टी नहीं थी, वोट नहीं था, नौकरी नहीं थी. तमाम धार्मिक किताबों में औरतों को सिर्फ वस्तु की तरह देखा गया है. वह घर में रहे, शादी से पहले बाप की मरजी से जिए और शादी के बाद पति व ससुराल की गुलाम बन कर जिए. यही औरतों का धर्म था.
धर्म बनाम संविधान
त्योहारों पर 20 हजार रुपए की साड़ी, सोने की अंगूठी और मेहंदी के शगुन व उसके श्रृंगार से औरत की गरिमा तय नहीं होती. यह तो गुलामी को मजबूत करने की तरकीबें हैं जिन्हें संस्कार की आड़ में औरतों पर लादा गया है. इसमें बराबरी की बात नहीं है. रथ में जुतने वाले पालतू घोड़े को खूब सजाया जाता है, महंगी लगाम पहनाई जाती है, पैरों में नाल ठोकी जाती है और पीठ पर महंगा लबादा डाल दिया जाता है. यह आजादी नहीं बल्कि गुलामी को खूबसूरत बनाने की मशक्कत है. औरतों के साथ यह हजारों साल से होता आया है.
इतिहास में पहली बार मानव निर्मित संविधानों ने कहा कि औरत और मर्द बराबर हैं. धर्म ने 3 हजार साल में जो नहीं दिया, भारत के संविधान ने 1950 में एक लाइन में दे दिया. संविधान का अनुच्छेद 14 कहता है, राज्य का हर नागरिक कानून के सामने बराबर है. अनुच्छेद 15(1) कहता है कि राज्य लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा.अनुच्छेद 15(3) कहता है कि राज्य औरतों के लिए विशेष प्रावधान बना सकता है. अनुच्छेद 16 कहता है कि औरत को नौकरी में बराबर का मौका मिलेगा. संविधान की ये बातें असली त्योहारों को याद करने के लिए हैं.
संविधान का नजरिया एकदम साफ है. औरत बाप की प्रौपर्टी नहीं, पति की गुलाम नहीं बल्कि बराबर की नागरिक है. हिंदू उत्तराधिकार संशोधन कानून 2005 ने बेटी को बाप की प्रौपर्टी में बराबर का हक दिया, मुसलिम पर्सनल ला में भी शाहबानो केस के बाद से बहस शुरू हुई जिससे मुसलिम औरतों को तीन तलाक जैसी कुप्रथाओं से मुक्ति मिली. औरतों को यह अधिकार धर्म से नहीं, संविधान से हासिल हुआ. वहीं तमाम धार्मिक किताबों में औरतों को सिर्फ वस्तु की तरह देखा गया है. सदियों तक धर्म ने औरतों को मर्दों के पांवतले दबा कर रखा. लेकिन इतिहास में पहली बार संविधान में लिखा गया कि औरत और मर्द बराबर हैं.
त्योहारों के नाम पर पतियों को पूजने की परंपरा चलती है जिसमें औरत की गुलामी को संस्कार माना जाता है. असल में धर्म औरतों की गरिमा ही इस बात में देखता है कि वह अपने पिता, पति और परिवार के लिए कितनी आज्ञाकारी है.लेकिन संविधान के अनुच्छेद 21 में औरत की गरिमा का मतलब उसकी व्यक्तिगत पहचान से है और हर नागरिक की गरिमा इस बात में है की उसे सम्मान और अवसरों में बराबरी हासिल है या नहीं.
संविधान कहता है बराबर काम का बराबर पैसा. लेकिन धर्म ने त्योहार को रिचुअल बनाया जिसमें व्रत, कथा और पकवान के नाम पर सारा बोझ औरतों पर डाल दिया. त्योहारों पर दीया जलाना बुरा नहीं है लेकिन दीया सिर्फ औरत ही जलाए, तेल सिर्फ औरत ही लाए और अंधेरा सिर्फ औरत के हिस्से में ही आए, यह बुरा है. दीवाली मनानी है तो लक्ष्मी की मूर्ति के साथसाथ जमीन के कागज पर भी औरत का नाम लिखिए, करवा चौथ मनाना है तो पति भी भूखा रहे या दोनों मिल कर खाना खाएं. इसमें क्या गलत है? ऐसे त्योहार जो औरतों की बराबरी को खत्म करें, उन्हें त्याग की मूरत बना कर सारा बोझ उनके सिर पर डाल दें, असल में वेत्योहार नहीं, बल्कि भूख, थकान और मुफ्त की मजदूरी के जश्न हैं.
लक्ष्मी औरत है, देवी है पर जब पुरुष के हाथों में आती है तो उस तिजोरी में बंद हो जाती है जिस की चाबी सिर्फ पुरुषों के हाथों में थी. क्या किसी मुगल बादशाह की कोषाध्यक्ष महिला थी? क्या किसी ईद की नमाज की अगुआई किसी बुर्कानशीन औरत ने की? फिर ईद या दीवाली औरतों का त्योंहार कैसे हुआ?
त्योहार किस के हैं
धर्म ने औरत को कभी इंसान माना ही नहीं. वह जीतीजागती सामान थी. ऐसा सामान जिसपर कंट्रोल हमेशा पितृसत्ता का रहा. बेटी, बहन, पत्नी, मां और बहून जैसे रिश्ते में बंधकर भी औरत वस्तु ही रही और हर त्योहार इसी रिश्ते को पूजता है, औरत को नहीं. रक्षाबंधन पर बहन अपने भाई को राखी बांधती है और भाई उसकी रक्षा का वादा करता है. सवाल यह है कि बहन को रक्षा की जरूरत क्यों है? क्योंकि धर्म ने ही बाहर की दुनिया को खतरनाक बनाया है और फिर उसी खतरे से बचाने के नाम पर भाई को भगवान बना दिया.
एनसीआरबी का डेटा कहता है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले 70फीसदी से ज्यादा अपराध घर के अंदर होते हैं, जहां वही भाई, वही पति, वही पिता मौजूद होता है. घर में ही लड़कियां सुरक्षित नहीं है और धर्म चाहता है कि बाहर वालों के लिए औरत पत्थर की देवी बनी रहे. देवी पत्थर की है तो सुरक्षित है लेकिन बेटी जिंदा है तो खतरा है.
ईद और दीवाली पर औरतों को कपड़े और गहने दिला कर पुरुष उन की कीमत का हिस्सा अदा करते है. यह पार्टनरशिप के मुनाफे के हिस्से का बंटवारा नहीं होता.
भाईदूज पर भी वही कहानी दोहराई जाती है. यम ने यमुना को वरदान दिया कि इस दिन अगर बहन भाई की लंबी उम्र मांगे तो वह पूरी हो जाती है. सवाल यह है कि क्या कभी भाई ने बहन की लंबी उम्र मांगी है? कभी किसी कथा में पति ने पत्नी के लिए व्रत रखा है कि पत्नी लंबी आयु जिए? नहीं. क्योंकि धर्म की पूरी इकोनौमी ही इस बात पर टिकी है कि औरत देगी और मर्द लेगा. औरत व्रत देगी, मर्द उम्र लेगा. औरत सेवा देगी, मर्द आशीर्वाद देगा. बहनें सजधज कर भाईयों का स्वागत करती हैं पर इसलिए कि भाईयों की कृपा बनी रहे, यह नहीं कि वह बराबर की हैसियत वाली बहन से मिलने आया है.
होली के गीतों में क्या है? रंगों के नाम पर औरतों के खिलाफ फूहड़ गाने चलते हैं. कीचड़ में औरत को खींच कर रंग लगाया जाता है, भाभी को रंग लगाने का अधिकार समझा जाता है. मथुरावृंदावन की होली को कल्चर कहते हैं लेकिन क्या उस होली में औरत की सहमति पूछी जाती है? जबरन रंग लगाना त्योहार है या उत्पीड़न? नैशनल कमीशन फौर वीमेन की रिपोर्ट के अनुसार, हर साल होली के आसपास छेड़छाड़ के मामले 20फीसदी तक बढ़ जाते हैं.जबकि, धर्म कहता है, बुरा न मानो होली है.
त्योहारों पर चलने वाला यह सिर्फ भावना का खेल नहीं है, यह बाजार का खेल भी है. धर्म ने संस्कार का ढोंग पैदा किया और बाजार ने उसी ढोंग को कमाई का साधन बना दिया. एसोचैम की रिपोर्ट कहती है कि हर साल सिर्फ करवाचौथ पर ही 15 से 20 हजार करोड़ रुपए का कारोबार होता है. यह पैसा साड़ी, ज्वैलरी, मेहंदी, गिफ्ट और ब्यूटीपार्लर के नाम पर खर्च होता है. असल में यह पैसा औरत की ही सेविंग का होता है और वह यह पैसा अपने पति की लंबी उम्र के नाम पर खर्च कर देती है. फायदा किसे होता है? बाजार को, जो मर्द चलाते हैं.
लक्ष्मी के नाम पर दीवाली में जो सोना खरीदा जाता है, वह सोना मर्द के पैसे से औरत के नाम पर खरीदा जाता है लेकिन लौकर की चाबी मर्द के पास ही रहती है. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, भारत में 22 हजार टन सोना घरों में गहने के रूप में है और यह गहना 85फीसदी औरतें ही पहनती हैं.लेकिन सवाल यह है कि इन गहनों पर मालिकाना हक कितनी औरतों के पास है?
संविधान ने दी ताकत
संविधान ने औरत को पहली बार बाजार से निकाला और नागरिक बनाया. हिंदू मैरिज एक्ट 1955 से पहले पति चाहे जितनी शादी कर सकता था, धर्म इसकी इजाजत देता था. संविधान ने इस घटिया प्रथा को अपराध घोषित किया और एक मर्द बराबर एक औरत का कौन्सैप्ट दिया. धर्म में तलाक पाप था लेकिन संविधान ने इस पाप से भी मुक्ति दिलाई जिसका सबसे बड़ा लाभ औरतों को मिला.
धर्म की व्यवस्था में सिर्फ औरत के लिए शादी सात जन्मों का बंधन थी. मर्द तो कई शादियां कर कर सकता. संविधान की बदौलत ही औरतों के लिए जन्मजन्मांतर के इस फालतू रिश्ते से निकलना आसान हो गया. विधवा का सिर मुंडवा देना धर्म था लेकिन संविधान ने उसी विधवा की दोबारा शादी करने इजाजत और पैंशन देने की व्यवस्था की. दुनियाभर के संविधानों ने चर्चों, मौलवियों, पंडों, बिच्छुओं से औरतों को आजादी दिलाई है. लगभग हर संविधान में औरत को बराबर का स्थान मिला है.
एक और बड़ा फर्क है. धर्म कहता है पाप करो तो अगले जन्म में औरत बनोगे, मतलब यह कि औरत बनना सजा है. गरुड़ पुराण में लिखा है कि पापी आदमी अगले जन्म में स्त्री योनि में जन्म लेता है. इस तरह धर्म ने तो औरत होना ही सजा बना दिया. जबकि, संविधान कहता है, औरत होना सजा नहीं, पावर है. पंचायत में 50 फीसदी रिजर्वेशन और लोकसभा में 33 फीसदी रिजर्वेशन की बात इसी प्वर का रिजल्ट है. यह धर्म ने नहीं, संविधान ने सोचा.
ईद, रमजान और औरत
हिंदू त्योहारों की तरह इसलाम के त्योहारों में भी नेकियों का हिसाब औरत के जिस्म और उसकी मौजूदगी से तय होता है. रमजान का महीना इबादत का महीना कहा जाता है लेकिन घर में इसका बोझ सिर्फ औरतों पर होता है? 3 बजे सुबह उठकर सहरी औरत ही बनाती है. शाम को इफ्तारी में दस तरह के पकवान भी औरत ही बनाती है. दिनभर रोजा रख कर भी औरत किचन में खड़ी रहती है. रोजा मर्द का भी है लेकिन इफ्तारी की जिम्मेदारी औरत की है. कई घरों में औरत खुद रोजे से रहती है, फिर भी उसे चूल्हे के सामने खड़े हो कर सबके लिए खाना बनाना पड़ता है, रोजा की भूख अलग और किचन की गरमी अलग.
ईद पर नई टोपी, नया कुरता मर्द के लिए सिलाया जाता है जबकि औरत को नया बुर्का गिफ्ट में दिया जाता है. ईद की नमाज की लाइनें सिर्फ मर्दों से भरी होती हैं. मसजिदों में औरतों के लिए कोई जगह नहीं. भारत में सिर्फ 8 से 10फीसदीमसजिदों में औरतों के नमाज की जगह है. ईदगाह में हजारों मर्द नमाज पढ़ते हैं, औरत घर में रह कर सेवइयां बनाती है. ईदमिलन में मर्द गले मिलते हैं, औरतें अंदर कमरे में एकदूसरे से मिलती हैं. ईद का बाजार भी मर्द का है, बकरीद पर बकरा मर्द खरीदता है, कुरबानी मर्द देता है, गोश्त के 3 हिस्से का फैसला भी मर्द करता है.
यहां भी कहानी वही है जो करवाचौथ में थी. शबएबरात पर औरतें रातभर जाग कर हलवा बनाती हैं, मर्द कब्रिस्तान जा कर दुआ मांग आता है. मोहर्रम पर मर्द ताजिया उठाता है, मातम करता है, औरत घर में बैठ कर रोती है. जुमे की नमाज, ईद की नमाज, जनाजे की नमाज सब में औरत की गैरमौजूदगी ही मजहब है.
निकाह में मेहर औरत का हक है लेकिन कितनी औरतों को मेहर का पैसा सच में मिलता है? कई जगह मेहर 786 रुपए या एक कुरान की किताब रख दी जाती है, जो सिर्फ कागज पर ही लिखा रह जाता है. कड़वा सच यह है कि तलाक का हक एकतरफा मर्द के हाथ में रहता है. हलाला जैसी प्रथा में औरत को फिर से एक और निकाह से गुजरना पड़ता है ताकि पहले पति से फिर निकाह कर सके. ये सब त्योहारों की तरह ही हैं, इनमें औरत की मरजी की कोई गुंजाइश ही नहीं.इसलाम में तो मर्द की मरजी से औरत की जिंदगी तय होती है.
बुर्का और परदे को भी त्योहार के लिबास की तरह पेश किया जाता है. ईद पर नया बुर्का पहनो, शराफत दिखेगी. यह बुर्का किसके लिए है? मर्द की नजर से बचने के लिए. यानी, औरत का कपड़ा भी मर्द की नजर तय करेगी. गरमी में 50 डिग्री में भी औरत काले बुर्के में रहे ताकि मर्द की नीयत पाक रहे. यह भी वही सोच है जो करवा चौथ पर औरत को भूखा रखती है ताकि पति की उम्र बढ़े.दोनों में औरत का जिस्म मर्द की नीयत और मर्द की उम्र के लिए कुरबान होता है.
यानी, धर्म कोई भी हो, गैरबराबरी का पैटर्न एक ही है. हिंदू धर्म में औरत को व्रत में भूखा रखा गया, इसलाम में औरत को त्योहार में अदृश्य कर दिया गया. एक में औरत दिखती है पर सिर्फ सजी हुई, भूखी, थकी हुई. दूसरे में औरत दिखती ही नहीं, वह किचन में है, परदे में है, घर में है. दोनों में मर्द सैंटर में है.
धर्म को निकालना क्यों जरूरी
क्या त्योहार मनाना बंद कर दें? नहीं. त्योहार इंसान की जरूरत हैं, मेलमिलाप, मिलकर खाना, हंसना, छुट्टी लेना, एंजौय करना आदि खुशियां त्योहारों की बदौलत ही मिलती हैं. दिक्कत त्योहार से नहीं, त्योहार के अंदर बैठे धर्म से है.सो, अब धर्म को त्योहार से निकाल कर संविधान को डालने का वक्त है. धर्म को निकालने का मतलब है कि इसे सैकुलर और डैमोक्रेटिक बनाया जाए और धर्म की कहानियों को बदला जाए.
वीरवती ने व्रत तोड़ा तो पति मर गया, करवाचौथ की कहानी से यह डर निकाल दीजिए. इसकी जगह नई कहानी लिखिए कि वीरवती ने पढ़ाई की और डाक्टर बन गई. वट सावित्री में सावित्री ने यमराज से पति को वापस लिया, यह ठीक है लेकिन अब सावित्री यमराज से अपनी खुद की जिंदगी भी मांगे. रक्षाबंधन पर भाई रक्षा करेगा, यह वादा हटा दीजिए. अब नया वादा लिखिए कि भाईबहन दोनों एकदूसरे की बराबरी से रक्षा करेंगे, दोनों कमाएंगे, दोनों घर संभालेंगे. ईद पर सिर्फ मर्द कुर्बानी देगा, इसमें से कुरबानी वाली कहानी से धर्म को अलग कर दीजिए. कुरबानी का मतलब बकरा काटना नहीं, अपनी मर्दानगी की अकड़ काटना होना चाहिए. हिजाब के पीछे की कहानी को बदलिए और औरत को बुर्के में ढकने के बजाय मर्द को तमीज सिखाइए.
त्योहार और संस्कृति
जब अगली बार कोई कहे कि त्योहार तो संस्कृति हैं तो पूछिए किसकी संस्कृति? जो संस्कृति औरत को भूखा रख कर खुश होती है, जो संस्कृति औरत के हाथ में मेहंदी लगा कर उसके हाथ से कलम छीन लेती है, जो संस्कृति औरत को लक्ष्मी कह कर उसकी जेब खाली रखती है, असल में वह संस्कृति नहीं, शोषण है.
असली त्योहार वह होगा जिस दिन रक्षाबंधन पर भाई बोलेगा, बहन, तू नौकरी कर, मैं घर संभालता हूं, जिस दिन करवा चौथ पर पति बोलेगा, चलो, दोनों मिलकर खाना बनाते हैं और दोनों मिलकर चांद देखते हैं, जिस दिन दीवाली पर लक्ष्मी की मूर्ति के साथ बेटी के नाम की एफडी का कागज भी रखा जाएगा. ऐसा जब तक नहीं होगा तब तक हर त्योहार एक रिमाइंडर है कि धर्म अभी भी चल रहा है और संविधान अभी भी सिर्फ किताब में है.
संविधान त्योहारों का सही रास्ता है
संविधान ने इसीलिए धर्म से अलग रास्ता दिया. संविधान कहता है कि हर मामले में औरत का हक बराबर है. संविधान कहता है, तीन तलाक असंवैधानिक है, सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में इसे खत्म किया.यह हक कुरान से नहीं, संविधान से मिला. संविधान कहता है, मेहर भीख नहीं बल्कि हक है, औरत की प्रौपर्टी है. मुसलिम औरतों को भी पैतृक संपत्ति में हक मिलना चाहिए, यह बात औल इंडिया मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड नहीं, संविधान की बराबरी की सोच कहती है.
त्योहार सच में खुशी का दिन होता है. वह हर जने, हर वर्ग, हर धर्म व हर औरत के लिए होना चाहिए. ईद की सेवइयां सिर्फ औरत क्यों बनाए, मर्द भी क्यों न बनाए? रमजान में सहरी का खाना मर्द भी क्यों न बनाए? ईदगाह में औरतों के लिए जगह क्यों नहीं है? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलेंगे तब तक ईद भी औरत के लिए सिर्फ किचन का त्योहार रहेगी, जैसे दीवाली हिंदू औरत के लिए झाड़ूपोंछे का त्योहार है. यही हमारा संविधान कहता है.
सब यानी सब मिल कर त्योहार मनाएं
संविधान के आधार पर त्योहार मनाने का मतलब है 3 चीजें लागू की जाएं. पहला, सहमति. बिना सहमति का रंग उत्पीड़न है, त्योहार नहीं. दूसरा, बराबर काम. दीवाली की सफाई सिर्फ औरत नहीं करेगी, मर्द भी करेगा. रमजान की सहरी और ईद की सेवइयां सिर्फ औरत नहीं बनाएगी, मर्द भी बनाएगा. तीसरा, बराबर पैसा. करवा चौथ पर 20 हजार रुपए की साड़ी के साथ 20 हजार रुपए की किताब भी आनी चाहिए, दीवाली पर सोने के साथ बेटी के नाम की जमीन का कागज भी आना चाहिए, बकरीद पर गोश्त के साथ मेहर का पैसा भी औरत के हाथ में आना चाहिए.
हर त्योहार चुनावों में वोट देने की तरह का होना चाहिए, जिस में आदमी, औरत, युवा, वृद्ध, परिवार वाले, विधवा, विदुर सब शामिल हों. यह कदम महज छोटे बदलाव नहीं बल्कि क्रांति साबित होंगे क्योंकि जब त्योहार की कहानी से धर्म बाहर होगा तब अगली पीढ़ी की सोच बदलेगी. बेटी देखेगी की त्योहारों पर मां भूखी नहीं है, मां भी खाना खा रही है तो बेटी सीखेगी कि भूखा रहना संस्कार नहीं है. जब बेटा देखेगा कि बाप भी झाड़ू लगा रहा है तो बेटा सीखेगा कि झाड़ू देना सिर्फ औरत का काम नहीं है.
संविधान ने हमें यही सिखाया है. अनुच्छेद 51ए भारत के सभी नागरिकों से कहता है कि वैज्ञानिक सोच रखो और परंपराओं में लगातार सुधार करो. यह सुधार त्योहारों में भी क्यों न हो? तो आइए इस साल से एक नया नियम बनाएं. हर त्योहार से पहले घर में एक बैठक हो जिसमें ये सवाल उठाए जाएं कि इस त्योहार में कौन भूखा रहेगा? कौन थकेगा? कौन कमरे में रहेगा? कौन बाहर जाएगा? कौन पैसा खर्च करेगा? कौन पैसा रखेगा? अगर जवाब में हर बार औरत ही आ रही है तो समझिए की यह धर्म वाला त्योहार है. इसे वहीं रोक दीजिए और संविधान वाला त्योहार बनाइए जहां मर्द और औरत मिल कर किचन संभालेंगे, साफसफाई भी दोनों मिल कर करेंगे, सब मिल कर एंजौय करेंगे, सब बाहर जाएंगे और पैसा भी सब का बराबर खर्च होगा.
त्योहारों से धर्म निकल जाएगा तो त्योहार खत्म नहीं होंगे बल्कि और ज्यादा बड़े व खूबसूरत हो जाएंगे क्योंकि तब त्योहार सिर्फ आधे लोग नहीं, बल्कि पूरे लोग मनाएंगे. Gender Inequality




