Gender Inequality: त्योहारों का सीजन शुरू हो चुका है. ज्यादातर त्योहारों पर धर्म की मुहर चिपकी हुई है. हर त्योहार पर एक धार्मिक कहानी जोड़ दी गई है, इसलिए लगभग सभी त्योहारों में धर्म की भेदभाव और गैरबराबरी वाली सोच हावी रहती है.
करवाचौथ पर करवा की पूजा करने के बाद पंडों को खिलापिला कर पर पति को पूजो, दीवाली पर लक्ष्मीगणेश को पूजो, ईद पर मुसलमान मसजिद में जा कर एकदूसरे से गले मिलें जबकि औरतें घर में कैद रहें, मर्दों के लिए पकवान व सिवईं बनाएं. औरतें पूजा, रोजा और व्रत में लगी रहें, दिनभर भूखी रहें, घर को सजाएं, पकवान बनाएं और मर्द सोफे पर बैठे मोबाइल में लगे रहें, पूरी रात जुआ खेलें, दारू पिए और दोस्तों संग घूमें. यह भेदभाव नहीं तो और क्या है? सारे त्योहारों में ऐसा ही होता है. संविधान सब लोगों को एक सा और सब आदमीऔरतों को बराबरी का हक देता है लेकिन त्योहारों पर धर्म और जैंडर इक्वैलिटी की बात घुसा दी गई है. ऐसे में त्योहार औरतों पर बोझ बन जाते हैं, एक सीमा तक रह जाते हैं वे.
हर त्योहार पर धर्म की मुहर चिपकी हुई है. हर त्योहार पर किसी न किसी भगवान की कहानी जोड़ दी गई है. हर त्योहार का मतलब दूसरे धर्म वालों को अलग करना भी है, अपने धर्म की औरतों को त्योहार के बोझ तले कुचल देना रह गया है. औरत व्रत रखे, औरत भूखी रहे, औरत सजाए, औरत पकवान बनाए और मर्द भगवान बन कर अपनी पूजा का आनंद लेता रहे. यह बेमतलब का भेदभाव नहीं, तो और क्या है?
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