Kavita Mahto: झारखंड के रामगढ़ जिले के सिद्धो-कान्हू मैदान में होमगार्ड के 284 पदों पर बहाली के लिए 2 और 4 अक्टूबर को ट्रायल दौड़ करवाई गई थी. ट्रायल में कविता महतो साड़ी पहनकर नंगे पांव 1600 मीटर दौड़ीं, निर्धारित समय 10 मिनट था लेकिन उन्होंने करीब 6 मिनट में ही यह दौड़ पूरा कर लिया. कविता रामगढ़ की ही रहने वाली एक विधवा महिला हैं. उनके पति की मौत 3 साल पहले हो गई थी. कविता पर 2 छोटे बच्चे और बुजुर्ग सास-ससुर की जिम्मेदारी है और वह ईंट भट्टा में काम करती हैं.

कविता महतो की वह दौड़ सिर्फ 1600 मीटर की ट्रायल नहीं थी बल्कि इस देश की हर गरीब बेटी के खाकी वर्दी के सपने की दौड़ थी. कविता ने यह दौड़ नंगे पांव, बिना ट्रैक सूट, बिना महंगे जूते और बिना किसी सुविधा के 6 मिनट में पूरी की. इस दौड़ के साथ ही कविता शोशल मिडिया पर वाइरल हो गईं और इस दौड़ को पूरा करने के साथ ही उन्होंने पूरे सिस्टम के मुंह पर तमाचा भी मारा है.

एक तरफ संपन्न घर की वह लड़कियां हैं जिनके लिए जिम, डाइटिशियन, नाइकी के जूते और महंगे कोचिंग सेंटर हैं और दूसरी तरफ कविता जैसी लड़कियाँ है जिसके पास संसाधनों के नाम पर जिम्मेदारियां, परेशानियां और सिर्फ हौसला है. इस दौड़ के साथ ही कविता ने साबित किया है कि इस देश में प्रतिभा की कमी नहीं है बल्कि संसाधनों पर कब्जा सवर्ण पुरुषवादी व्यवस्था का है इसलिए गरीब और पिछड़े तबके की औरतों को मौका ही नहीं मिल पाता.

देखा जाये तो आज भी गरीब और छोटी जातियों की लड़कियों को परंपराओं की बेड़ियों में जकड़ कर रखा गया है. अगर इन्हें भी बराबरी का मौका मिले तो यह लड़कियां भी किसी से कम नहीं है. कविता की यह दौड़ आरक्षण और बराबरी की मांग को और मजबूत करती है. कविता जैसी लाखों बेटियां गांव में सिर्फ इसलिए पीछे रह जाती हैं क्योंकि उनके पास ट्रैक नहीं, जूते नहीं और कहने वाला कोई नहीं कि तू भी दौड़ सकती है इसलिए कविता महतो की यह 6 मिनट की दौड़ इस देश की 6 सौ साल पुरानी जातिवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था के खिलाफ एक ऐतिहासिक दौड़ साबित हुई है.

यहां एक सवाल है जो हर सवर्ण मेरिट वाले से पूछा जाना चाहिए कि मेरिट कहां से आएगा जब शुरुआत ही बराबर नहीं है. एक तरफ वह लड़की है जिसके पिता ने बचपन से उसे इंग्लिश मीडियम, प्रोटीन शेक, स्पोर्ट्स एकेडमी और सरकारी नौकरी की तैयारी के लिए दिल्ली भेज दिया और दूसरी तरफ कविता महतो है जिसे नंगे पांव खेत की मेड़ पर दौड़ना पड़ रहा है तो क्या दोनों की दौड़ की तुलना बराबर है?

कविता महतो विधवा हैं. ईंट भट्टे पर काम करने वाली कविता पर सिर्फ अपने दो बच्चों की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि वह अपने मर चुके पति के मां बाप की जिम्मेदारी भी उठा रही हैं. एक विधवा औरत से धर्म नफरत करता है. धर्म कहता है कि विधवा औरत किसी काम की नहीं, उसे सफेद साड़ी में कोने में बैठा दो, चूड़ियां तोड़ दो, मांग का सिंदूर पोंछ दो, शुभ कामों से दूर रखो और उसे बता दो कि उसके पति की मौत का कारण वही औरत है. यही वह जहरीली सोच है जिसने सदियों तक भारत की लाखों कविताओं को जिंदा लाश बना दिया. कविता ने न सिर्फ इस सोच को बल्कि पूरे धर्म के पाखंड को अपने नंगे पांव से कुचल दिया है. कविता ने सिर्फ सिस्टम को तमाचा नहीं जड़ा बल्कि धर्म पर भी जोरदार तमाचा जड़ा है क्योंकि धर्म कभी भी कविता जैसी औरतों का साथ नहीं देता.

यहां आरक्षण का महत्व समझ आता है. असल में तो आरक्षण कोई भीख नहीं बल्कि आरक्षण तो उस गरीब बेटी को बस यह कहने का नाम है कि तू भी दौड़ सकती है. जब तक संसाधनों पर कुछ जातियों का कब्जा रहेगा और जब तक गांव की बेटी को स्कूल जाने से पहले घर का चूल्हा जलाना पड़ेगा तब तक आरक्षण ही उसकी दौड़ को पूरा करने का एकमात्र हथियार बना है. कविता महतो की यह दौड़ इस बात का जिंदा सबूत है कि मौका मिले तो गरीब गुरबे की बेटियां सिर्फ 1600 मीटर की दौड़ ही नहीं लांघ सकतीं बल्कि वह देश भी संभाल सकती हैं. Kavita Mahto

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