Women Protest: जुलाई से अक्टूबर के बीच जारी आंदोलनों में कई ऐसी महिलाएं सामने आई हैं, जिन्होंने डर की दीवार को अपने साहस से तोड़ दिया है. इनकी लड़ाई सिर्फ किसी सरकार या सत्ता से नहीं, बल्कि उस मानसिकता से भी है जो नागरिक को चुप और औरत को कमजोर देखना चाहती है. इन शेरनियों की दहाड़ आज सड़कों पर सुनाई दे रही है, लेकिन इसकी गूंज आने वाली पीढ़ियों के लोकतांत्रिक विवेक में सुनाई देगी.
धरती पर जिस जगह अत्यधिक दबाव बढ़ता है, धरती वहीं से ज्वालामुखी के रूप में फूट पड़ती है. उसके मुँह से निकला लावा कुछ सालों बाद ठंडा होकर आसपास कई किलोमीटर तक जमीन को खनिज से समृद्ध कर इतना उपजाऊ बना देता है कि फिर उस जमीन पर उगने वाली फसलें बहुत अच्छी और स्वस्थ होती है. उस जमीन पर जीवन ज्यादा ताकत के साथ पनपता है.
दक्षिणपंथी सत्ता, पितृसत्ता और धर्म ने मिलकर जिस औरत को सदियों तक दबाये रखा, उसकी आवाज को नियंत्रित किया, उसकी स्वतन्त्रता को बाधित किया, वह आज उसी ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ी है. दबाव की बेड़ियाँ पिघला कर निकला लावा जो आज चारों तरफ बह रहा है, उसकी ताकत से आने वाले दशकों की इंसानी पैदावार मानसिक रूप से बहुत ज्यादा जागरूक और स्वस्थ होगी, यह तो अब निश्चित है.
आज भारत की सड़कों पर दिखाई दे रही अनेक युवा महिलाओं की आवाज को इसी ऐतिहासिक संदर्भ में देखने की जरूरत है. मोदी सत्ता के विरोध में जुलाई 2026 में शुरू हुए कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़े युवा आंदोलनों से लेकर अक्टूबर में चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तक पहुंची राजनीतिक हलचल में अनेक ऐसी शेरनियां सामने आयी हैं, जिनकी दहाड़ से मोदी सत्ता को ही नहीं, बल्कि संघ, पितृसत्ता और धर्म सत्ता को लकवा मार गया है.
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