Women Rights in India: त्योहारों का सीजन आते ही हर घर में एक ही तस्वीर नजर आती है. पति ऑफिस जाएगा, बच्चे फोन पर रील देखेंगे और औरत सुबह चार बजे उठ कर व्रत की तैयारी करेगी, दिन भर भूखी रहेगी, सबके लिए पकवान बनाएगी, करवा चौथ की कथा सुनेगी और पति की लंबी उम्र के लिए चांद देखेगी. दीवाली पर भी यही तमाशा. औरत घर लीपेगी, रंगोली बनाएगी, लक्ष्मी गणेश की मूर्ति लाएगी, दिया जलाएगी और रात को सबके खाने के बाद बचा हुआ खाएगी. इसे त्योहार कहते हैं लेकिन सवाल यह है कि यह किसका त्योहार है? औरत का या गैरबराबरी के साथ औरत की भूख और थकान पर टिका मर्द का?

त्योहारों का सीजन शुरू हो चुका है. ज्यादातर त्योहारों पर धर्म की मुहर चिपकी हुई है. हर त्यौहार पर एक धार्मिक कहानी जोड़ दी गई है इसलिए लगभग सभी त्योहारों में धर्म की भेदभाव और गैरबराबरी वाली सोच हावी रहती है. कारवा चौथ पर पति को पूजो, दीवाली पर लक्ष्मी गणेश को पूजो. ईद पर घर के मर्दों के लिए पकवान बनाओ. औरतें पूजा, रोजा और व्रत में लगीं रहें, दिन भर भूखी रहें, घर को सजाये, पकवान भी बनायें और मर्द सोफे पर बैठे मोबाइल में लगे रहें, पूरी रात जुआ खेलें, दारू पिए और दोस्तों संग घूमें. यह भेदभाव नहीं तो और क्या है? सारे त्योहारों में ऐसा ही होता है. संविधान औरतों को बराबरी का हक देता है लेकिन त्योहारों पर जेंडर इक्वेलिटी की बात बेमानी लगती है और त्यौहार औरतों पर बोझ बन जाते हैं.

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