Inflation in India: महंगाई की मार से आम आदमी की रसोई और जेब दोनों तप रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर सरकार देशवासियों से ‘आशीर्वाद का दीया’ जलाने की अपील कर रही है. जब देश की अस्सी करोड़ जनता जीवित रहने के लिए सरकारी खैरात पर निर्भर है, उस जनता से मोदी किस आशीर्वाद की आशा कर रहे हैं?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर भारतीय जनता पार्टी ने देशवासियों से 17 सितंबर की शाम 6 से 7 बजे के बीच घर-घर ‘आशीर्वाद का दीया’ जलाने की अपील की है. भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने लोगों से प्रधानमंत्री की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और निरंतर सफलता की कामना करते हुए दीया जलाने को कहा है. यह अपील उनकी ‘सेवा संकल्प अभियान’ का हिस्सा है.

लेकिन सवाल यह है कि जब 80 करोड़ भारतीय आर्थिक रूप से इस लायक नहीं हैं कि वे दो वक्त की रोटी खुद कमा के खा सकें, जो पेट भरने के लिए सरकारी खैरात पर निर्भर हैं, वे दिया और तेल कहाँ से लाएंगे? जिनके घर रसोई का चूल्हा महंगाई से तप रहा है, उस घर से सरकार किस तरह के आशीर्वाद की उम्मीद कर रही है?

क्या उस मां से मोदी के लिए ‘आशीर्वाद का दीया’ जलाने के लिए कहना उचित है, जिसका घरेलू बजट सब्जियों और राशन की कीमतों ने बुरी तरह बिगाड़ दिया है? क्या उस मध्यमवर्गीय परिवार से दीया जलाने की फरमाइश करना ठीक है, जिसकी कमाई का बड़ा हिस्सा पेट्रोल, डीजल, किराया, बच्चों की स्कूल फीस, बूढ़ों की दवाई और रोजमर्रा के खर्च में चला जाता है? क्या उस मजदूर का आशीर्वाद मोदी पा सकेंगे, जो दिहाड़ी पाने की उम्मीद में सूरज उगने से पहले ही चौक पर जा बैठता है और टकटकी लगाए अपनी तरफ आने वाले हर आदमी को इस आशा से ताकता है कि शायद आज उसे कोई कुछ काम करवाने के लिए ले जाए और तीन-चार सौ रूपए दिहाड़ी मिलने पर शाम को वह अपने बच्चों के भूखे पेट रोटी के टुकड़ों से भर सके.

अगस्त 2026 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत की खुदरा महंगाई 4.82 प्रतिशत तक पहुंच गई है. यानी आम आदमी की जरूरत की चीजें जैसे राशन, कपड़े, किराया, परिवहन, शिक्षा आदि की औसत कीमतें पिछले साल के मुकाबले लगभग 4.82% ज्यादा हो गई हैं. खाद्य महंगाई 5.95 प्रतिशत थी. यानी खाने-पीने की चीजों की कीमतों में औसतन लगभग 5.95% की बढ़ोतरी हुई. सब्जी, दाल, अनाज, दूध, फल आदि खरीदने में आम आदमी को पहले की तुलना में ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ रहा है. ग्रामीण भारत में खुदरा महंगाई 5.23 प्रतिशत थी. यानी महंगाई का बोझ केवल शहरों की रसोई तक सीमित नहीं है. ग्रामीण परिवारों पर महंगाई का दबाव औसतन ज्यादा था.

थोक कीमतों का आंकड़ा तो और ज्यादा बेचैन करने वाला है. अगस्त में थोक महंगाई 9.92 प्रतिशत पहुंच गई. ईंधन और बिजली के क्षेत्र में महंगाई 22.93 प्रतिशत रही, जबकि पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की कीमतों में सालाना आधार पर 34.41 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई. ऐसे आंकड़ों के बीच सरकार कह रही है “दीया जलाइए”. जबकि जनता गुहार लगा रही है ”जनाब महंगाई कम करने के उपाय कीजिए.”

दिल्ली में 15 सितंबर को पेट्रोल 102.12 रुपए और डीजल 95.20 रुपए प्रति लीटर दर्ज किया गया. पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने पर सिर्फ आम आदमी के परिवहन में ही बाधा नहीं आती, बल्कि ट्रक का डीजल महंगा होने पर माल ढुलाई महंगी हो जाती है. माल ढुलाई महंगी होने पर सब्जी, फल, दूध, किराना और तमाम सामान की लागत बढ़ती है. बस और टैक्सी का खर्च बढ़ेगा तो हर आदमी की जेब पर असर पड़ना लाजिमी है. यानी तेल की बढ़ती कीमत सिर्फ पेट्रोल पंप तक की खबर नहीं होती है, वह बाजार की हर कीमत में इजाफा कर देती है.

आज आम आदमी मोदी सरकार से पूछना चाहता है कि क्या दीया जलाने से पेट्रोल सस्ता होगा? दीया जलाने से डीजल का बिल कम होगा? दीया जलाने से हमारी रसोई का बजट संतुलित होगा? दीया जलाने से बेरोजगार युवक को नौकरी मिलेगी? दीया जलाने से किसान की लागत कम होगी? और क्या दीया जलाने से थोक महंगाई का 9.92 प्रतिशत का आंकड़ा बदलेगा? अगर यह सब नहीं सकता तो दिया क्यों जलाया जाए?

प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर लोग उन्हें शुभकामनाएं दें, यह उनका निजी निर्णय है. मगर सरकार को यह भी याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र में आशीर्वाद के साथ हिसाब भी मांगा जाता है.

अगर सरकार ‘विकसित भारत’ का सपना दिखाती है तो जनता यह पूछने का हक़ रखती है कि उस विकसित भारत में उसके घर की रसोई कितनी सुरक्षित है? उसकी आय कितनी बढ़ी? उसके रोजगार की स्थिति क्या है? उसकी बचत कितनी है? और ऊर्जा की कीमतों का बोझ उसके परिवार पर कम कैसे होगा?

मोदी को जनता का आशीर्वाद चाहिए तो उन्हें ऐसी अर्थव्यवस्था बनानी पड़ेगी जिसमें आम आदमी को महंगाई से डरकर हर शाम अपने खर्च का हिसाब न लगाना पड़े. 17 सितंबर की शाम देश भर से यह सवाल उठने चाहिए कि मोदी सरकार महंगाई के अंधकार को कब मिटाएगी? लोकतंत्र में नागरिक का काम शासक के लिए दीया जलाना नहीं है. अगर आम जनता की रसोई का तेल महंगा हो, पेट्रोल की कीमत जेब जला रही हो और बाजार की कीमतें लगातार दबाव बना रही हों, तो सरकार को जनता से ‘आशीर्वाद का दीया’ जलाने की मांग करने से पहले महंगाई के अंधेरे को बुझाने का इंतजाम करना चाहिए.

फिर भी दीया जलाने के सरकारी आह्वान पर काफी अंधभक्त जो पहले भी ताली-थाली बजा चुके हैं, शाम को अपनी दहलीज पर, बालकनी में या छत पर दीया जलाकर रखते और फिर उसकी तस्वीरों और वीडियो को सोशल मीडिया पर शेयर करते मिलेंगे और गोदी मीडिया इन तस्वीरों का प्रसार-प्रचार करता दिखाई देगा, मगर हिसाब लगाइये कि 140 करोड़ की आबादी वाले देश में यदि ऐसा मात्र एक करोड़ लोग भी करते हैं तो 1,00,00,000 घरों में कोई 100 टन तेल फूंक दिया जाएगा. अभी कुछ दिन पहले तो साहब कम तेल खाने की सलाह देते फिर रहे थे, अब इतना सारा तेल एक शाम में फूंक देने का फरमान जारी कर रहे हैं? उनको इस बात से भी कोई मतलब नहीं है कि इससे कितना ज्यादा वायु प्रदूषण फैलेगा? Inflation in India

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