India's Ideological Influence Abroad: यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने मंदिर मस्जिद चर्च की वजह से तरक्की नहीं की बल्कि वे तकनीक, मेहनत, इनोवेशन, डेमोक्रेसी, सिविक सेन्स और निष्पक्ष मीडिया की वजह से विकसित हुए. पिछले तीन चार दशकों में भारत पाकिस्तान के जो लोग विदेशों में पहुंचे वे रोजगार और बेहतर जिंदगी की तलाश में वहां भागे. अपने देश के मंदिर मस्जिद उन्हें न तो सुरक्षा दे पाये और न ही खुशहाली, इसलिए ये लोग उन देशों में अपना मुंह उठाकर पहुंचे जहां मंदिर मस्जिद थे ही नहीं. अब एक दो पीढ़ी में जब विदेशी धरती ने उन्हें पैसा, सुरक्षा और खुशहाली प्रदान कर दी है तब उन्हें वहाँ भी मंदिर मस्जिद की जरुरत पड़ रही है. यह धर्म नहीं दोगलापन है.
भारत पूरी दुनिया से तकनीक आयात करता है. तेल से लेकर हथियार तक सब विदेशों से आता है और भारत दुनिया को बदले में कच्चा माल, सस्ते मजदूर और धर्म देता है. भारत से बाहर जाने वाले लोग अपने साथ अपना वैचारिक कचरा भी लेकर जाते हैं, लालच, डर और लूट की संस्कृति में जन्मे लोग विदेशी धरती पर भी इस मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाते इसलिए वे दुनिया में कहीं भी चले जाएँ उन्हें मंदिर मस्जिद की जरूरत पड़ती है.
जो लोग लेबर बन कर जाते हैं वे कुछ दशकों के बाद वहाँ के नागरिक बन जाते हैं इसमें मंदिर मस्जिद की कोई भूमिका नहीं होती बल्कि यह वहाँ का प्रगतिशील कल्चर है जिसमें धर्म नहीं मेहनत, स्किल और इनोवेशन ही मायने रखता है. यहां अपने देश की नदियाँ बर्बाद करने वाले लोग, औरत को जूती की नोक पर रखने वाले लोग और एक बड़ी आबादी को नीच समझने वाले लोग विदेशों में अपनी यही गन्दी मानसिकता लेकर पहुँचते हैं. भारत का यही वैचारिक कचरा विदेशी धरती तक पहुंच रहा है और यह पश्चिम की मज़बूरी है कि वे ऐसे लोगों को झेल रहे हैं.
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