Festival Travel: त्योहार खुशियां ले कर आते हैं, लेकिन देश के करोड़ों गरीब और दूसरे शहरों में रह रहे मजदूरों के लिए ये दिन अपने गांव, पुश्तैनी घर पहुंचने की जद्दोजेहद बन जाते हैं. ट्रेनों में जगह नहीं, बसों का किराया महंगा और साजिश यह कि सरकार रिश्वतखोरी से पैसा कमाने के लिए ऐसे मौकों पर पहले से जानबूझ कर सस्ती और सुविधाजनक यात्रा की तैयारी नहीं करती जबकि मौका कुंभ, तीर्थ, मंदिर का होता है तो सरकार की तरफ से कहीं कोई कमी नहीं होती.
त्योहार आते हैं तो देश में एक अजीब सी तसवीर दिखाई देती है. बाजारों में रौनक बढ़ जाती है, दुकानों पर भीड़ बढ़ जाती है, हलवाई दिनरात मिठाइयां बनाते हैं, कपड़े की दुकानें सज जाती हैं, औनलाइन कंपनियां अरबों रुपए की बिक्री के सपने देखने लगती हैं. सामान थोड़ा महंगा होता है पर ज्यादा नहीं. किसी चीज की कमी नहीं होती. लेकिन इसी समय देश का एक बड़ा हिस्सा एक घोर चिंता में डूबा होता है- अपने घर, अपने पेरैंट्स, भाईबहन के पास कैसे पहुंचें?
दिल्ली में रहने वाला मजदूर बिहार जाना चाहता है. मुंबई में काम करने वाला युवक उत्तर प्रदेश जाना चाहता है. सूरत में काम करने वाला अपने परिवार के पास राजस्थान या मध्य प्रदेश जाना चाहता है.
पंजाब में मजदूरी करने वाला व्यक्ति अपने गांव लौटना चाहता है. लेकिन ट्रेनों में जगह ही नहीं है. इंटरस्टेट बसों का किराया बढ़ गया है. टिकट मिलना ही मुश्किल है. और अगर किसी तरह लड़भिड़ कर टिकट ले भी लें तो किराया जेब पर बहुत भारी पड़ता है. बहुतों को सोचना पड़ता है त्योहार पर घर जा रहे हैं तो बच्चों के लिए मिठाई-कपड़ा खरीदें या न खरीदें?
जिस त्योहार को परिवार के साथ खुशी से मनाने के लिए वह सालभर इंतजार करता रहा, उसी त्योहार के पहले उसे यह हिसाब लगाना पड़ता है कि रेल का टिकट कटा कर घर जाए या बच्चों के लिए सामान खरीदे? या बगैर टिकट ही गाड़ी में चढ़ जाए. जब टीटीई पकड़ेगा, तब देखा जाएगा.
यह रेलवे की समस्या नहीं है. यह सरकार की चालाकियों का सवाल है. त्योहार अचानक नहीं आ जाते हैं. त्योहारों की तारीख सरकार को भी मालूम होती है. सरकार को महीनों पहले मालूम होता है कि दीवाली कब है, छठ कब है, होली कब है, ईद कब है, क्रिसमस कब है, दशहरा कब है, दुर्गापूजा कब है.
सरकार के पास पिछले वर्षों के आंकड़े भी होते हैं कि कितने लाख यात्रियों ने त्योहार में रेल यात्रा की और कितने टिकट न मिलने की वजह से मायूस लौट गए. उसे मालूम होता है कि त्योहार के समय दिल्ली से पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की तरफ जाने वाली ट्रेनों में कितनी भीड़ होती है. उसे मालूम है कि मुंबई से उत्तर प्रदेश और बिहार जाने वाली ट्रेनों पर कितना दबाव पड़ता है. उसे मालूम है कि दूसरे महानगरों से भी लाखों लोग त्योहारों पर अपने घर लौटते हैं.
सवाल उठता है कि जब हलवाई को पहले से पता नहीं होता कि कितनी मिठाई बिकेगी, फिर भी वह त्योहार से पहले अपनी दुकान भर लेता है, मिठाई की कमी नहीं पड़ती, तो सरकार को महीनों पहले यह पता होने के बावजूद कि लाखों की भीड़ ट्रैवल करेगी, ट्रेनों की संख्या क्यों नहीं बढ़ाती है? किराया कम क्यों नहीं करती है?
जब हलवाई मांग का अनुमान लगाता है, दुकानदार मांग का अनुमान लगाता है, औनलाइन कंपनियां मांग का अनुमान लगाती हैं, बैंक मांग का अनुमान लगाते हैं, बिजली कंपनियां मांग का अनुमान लगाती हैं, तो सरकार क्यों नहीं? सरकार की तैयारी आखिरी वक्त पर क्यों शुरू होती है? क्यों सरकार जानबूझ कर न ट्रेनें चलाती है, न बसों को परमिट देती है, न टैक्सियों को एक राज्य से दूसरे राज्य जाने की छूट देती है.
छठ और होली-दीवाली पर कुछ विशेष ट्रेनें चलाने की घोषणा होती है. पर यह ऊंट के मुंह में जीरे की तरह होती है. ये ट्रेनें 5-7 दिन पहले चलाने की घोषणा होती है और रास्तेभर रुकती हुई चलती है. सवाल यह है कि विशेष ट्रेनें पहले से क्यों नहीं तय होतीं? अगर सरकार को पता है कि एक खास रूट पर हर साल त्योहार के समय यात्रियों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है, तो उस रूट के लिए स्थाई त्योहारयोजना क्यों नहीं बनाई जा सकती? क्यों हर बार ऐसा लगता है कि सरकार समस्या को पहले से देख नहीं रही, बल्कि समस्या पैदा होने के बाद उस पर प्रतिक्रिया दे रही है? क्या शासन का मतलब यही है कि पहले जनता परेशान हो और फिर थोड़ी सी राहत दे कर बाकी रिश्वतखोरी, ऊपरी कमाई के लिए छोड़ दे?
जब धार्मिक आयोजनों, जिन में सरकार को अपने समर्थकों को पैसा कमाने देने का मौका मिलता है, के लिए पहले से पूरी व्यवस्था हो सकती है तो घर जाने वाले गरीबों के लिए क्यों नहीं? जब देश में कोई बड़ा धार्मिक आयोजन होता है तो सरकार बड़े पैमाने पर व्यवस्थाएं करती है.
सुरक्षा बल लगाए जाते हैं. अतिरिक्त परिवहन की व्यवस्था होती है. रास्ते बनाए जाते हैं. सड़कों को फूलों और बिजली के बल्बों से सजाया जाता है, चिकित्सा सुविधाएं बढ़ाई जाती हैं. प्रचार सामग्री प्रकाशित होती है. सरकार समर्थक दैनिक अखबारों में पूरेपूरे पेज के विज्ञापन छपवाए जाते हैं. जगहजगह बैनरपोस्टर लगवाए जाते हैं, प्रशासनिक मशीनरी को सक्रिय किया जाता है. धार्मिक आस्था रखने वाले नागरिकों की सुविधा और सुरक्षा पर सरकार की पूरी नजर रहती है. ऐसे आयोजनों के समय सरकार पूरी जिम्मेदारी से काम करती है.
छठ, होली पर कितने ही स्टेशनों पर भगदड़ मचती है. कुंभ पहुंचने पर कोई भगदड़ किसी स्टेशन पर नहीं होती. वहां सिर्फ तब भगदड़ होती है जब श्रद्धालु पैसा चढ़ा चुका होता है और एक्स्ट्रा पुण्य कमाने के लिए किसी के पैरों की रख लेने के लिए दौड़ता है.
कांवड़ ढोने वालों के लिए सड़कों की साफसफाई, बांसबल्ली लगा कर उन के लिए सुरक्षित रास्ते तैयार करवाना, जगहजगह प्याऊ लगवाना, विश्राम स्थल बनवाना, वहां सुरक्षा के पूरे इंतजाम करना, भारी पुलिस बल तैनात करना, कांवड़ियों पर हैलिकौप्टरों से फूल बरसाने के लिए करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा देने वाली सरकारें होली, दीवाली, ईद, छठ और क्रिसमस पर अतिरिक्त ट्रेनें और बसें क्यों नहीं चला सकतीं, कि गरीब आदमी भी सुविधाजनक तरीके से कम पैसे खर्च कर के सुरक्षित अपने घरवालों तक पहुंच जाए और त्योहार की असली खुशी हासिल कर ले?
भगवा सरकार के लिए श्रद्धालुओं और आम आदमियों के लिए सुविधा का पैमाना अलग क्यों है? जब श्रद्धालुओं की यात्रा महत्त्वपूर्ण है तो परिवार से मिलने वाले नागरिक की यात्रा भी महत्त्वपूर्ण होनी चाहिए. सरकार को यह तय नहीं करना चाहिए कि नागरिक किस उद्देश्य से यात्रा कर रहा है. उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नागरिक सुरक्षित, सम्मानजनक और उचित कीमत पर यात्रा कर सके. वह भी खुशीखुशी त्योहार मना सके.
गरीब को मुफ्त त्योहार नहीं चाहिए, बस एक न्यायपूर्ण व्यवस्था चाहिए. वह मुफ्त ट्रेन नहीं मांग रहा. वह मुफ्त मिठाई नहीं मांग रहा. वह सरकार से अपने घर का खर्च उठाने की मांग नहीं कर रहा. वह सिर्फ ऐसी व्यवस्था चाहता है जिस में उस की मेहनत की कमाई पूरी तरह महंगाई और अव्यवस्था में न चली जाए.
क्या यह बहुत बड़ी मांग है? किसी धार्मिक आयोजन पर होने वाले खर्च से तो यह बहुत कम है. आखिर धार्मिक आयोजन पर भी तो सरकार गरीब के दिए टैक्स के पैसे को पानी की तरह बहा रही है. फिर गरीब की सुखद यात्रा और त्योहार की खुशी पाने के लिए क्या वह इतना भी नहीं कर सकती?
दरअसल, भगवा सरकार ने कुछ धार्मिक आयोजनों को अपना पर्सनल इवैंट बना रखा है, जैसे कांवड़ यात्रा, चारधाम यात्रा या गंगा आरती आदि. इन इवैंट्स में गरीब आदमी के टैक्स का पैसा लगा कर सरकार अपना धार्मिक चेहरा चमकाती है. यह पैसा वे भक्त देते हैं जो कांवड़ तैयार करते हैं, मंदिरों में चढ़ावे चढ़ाते हैं. सरकार वोट के लिए समाज का ध्रुवीकरण करती है. मगर आम आदमी का त्योहार कोई सरकारी ‘इवैंट’ नहीं है. उस में चढ़ावा नहीं होता है. उस में पंडितों को ज्यादा नहीं मिलता है. उस में कैमरे नहीं आते हैं. नेताओं और मुख्यमंत्रियों के फोटो नहीं खींचे जाते हैं, उस में राजनीतिक भाषण नहीं होते हैं. इसलिए उस पर सरकार का ध्यान नहीं है.
जबकि त्योहार मनाने के लिए घर जाना मजदूर की सिर्फ यात्रा की कहानी नहीं है, बल्कि उस में एक मां का इंतजार होता है. उस में बच्चों की खुशी होती है. उस में परिवार का मिलना होता है. मगर सरकार की नजर में इस का कोई महत्त्व नहीं है क्योंकि इस से सरकार को कोई फायदा नहीं है.
यही इस देश की राजनीति का दोगला चेहरा है. चुनाव आता है तो यही जनता अचानक बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाती है. तब हर वर्ग की चिंता की जाती है. हर समुदाय से संवाद होता है. हर इलाके की जरूरत याद आती है. हर वोट महत्त्वपूर्ण हो जाता है. लेकिन चुनाव के बाद वही आम आदमी अनाथ की तरह छोड़ दिया जाता है. ट्रेन में सीट चाहिए तो खुद जूझो. महंगा किराया है तो खुद भुगतो. बाजार में कीमत बढ़ी है तो खुद संभालो. मिलावट है तो खुद सावधान रहो. बस नहीं मिली तो खुद देखो. यह कैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था है जिस में नागरिक से वोट लेते समय उस की तकलीफ दिखाई देती है, लेकिन त्योहार पर उस के घर लौटने की तकलीफ दिखाई नहीं देती?
जबकि सरकार चाहे तो एक स्थाई ‘त्योहार परिवहन योजना’ बना सकती है. सरकार देश की तरक्की का मूल्यांकन बड़ी परियोजनाओं से करती है. कितने किलोमीटर सड़क बनी. कितने हवाई अड्डे बने. कितनी बड़ी इमारत बनी. कितना निवेश आया. लेकिन किसी देश की असली तरक्की का एक पैमाना यह होना चाहिए कि उस का गरीब नागरिक अपने परिवार से मिलने के लिए कितनी आसानी से घर जा सकता है.
क्या वह सुरक्षित यात्रा कर सकता है? क्या उसे उचित किराए में टिकट मिल सकता है? क्या उस के बच्चे त्योहार पर नए कपड़े पहन सकते हैं? क्या उस के घर में त्योहार की मिठास महंगाई से फीकी नहीं पड़ती? अगर इन सवालों का जवाब ‘नहीं’ है तो फिर हमें विकास के दावों पर ठहर कर सोचना चाहिए. अगर एक मजदूर अपने परिवार के पास पहुंचने के लिए रेलवे स्टेशन पर घंटों धक्के खाता रहे, टिकट के लिए परेशान हो, महंगा किराया चुकाए और फिर भी समय पर घर न पहुंच पाए, तो हमें यह पूछना ही चाहिए कि क्या सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ बड़े धार्मिक आयोजनों की भीड़ संभालना है, या उस आम आदमी की जिंदगी को आसान बनाना भी है जो अपनी मेहनत से इस देश को चला रहा है?
एयरलाइंस के बढ़ते दाम : सरकारी साजिश
जिन लडक़ेलड़कियों की अच्छी कमाई हो गई उन्हें ट्रेनों में टिकट न मिल पाने पर हवाई जहाज का सहारा लेना पड़ता है. 2026 की होली के दिनों में 4,500-5,000 रुपए में मिलने वाला टिकट 11,000 से 13,000 रुपए में बिका. बेंगलुरु से पटना जाने वाला टिकट 6000-7000 से बढ़ कर 11,000 से 13000 रुपए हो गया. दिल्ली से रांची का किराया 15 से 20 फीसदी बढ़ गया.
सब से बड़ी कमी एक्स्ट्रा एयरक्राफ्टों की है या पटना, रांची जैसे एयरपोर्टों की. जब सरकारों को मालूम है कि लाखों आ रहे हैं तो वह एयरपोर्टों को परमानैंटली विस्तृत कर सकती है. जो सरकार कुंभ पर 800 करोड़ रुपए खर्च कर सकती है, कुंभनगरी बना सकती है, जो सरकार अयोध्या में एयरपोर्ट बना सकती है वह रांची, पटना को ठीक क्यों नहीं कर सकती.
सरकार हवाला दे सकती है कि एयरक्राफ्ट एक्ट 1936 के अंतर्गत वह विदेशी एयरलाइनों को इजाजत नहीं दे सकती. जो सरकार 2-4 घंटे में संविधान संशोधन कर सकती है वह एयरक्राफ्ट एक्ट नहीं बदल सकती. वर्ल्ड कप और ओलिंपिक में कभी एयर टिकट महंगे नहीं होते क्योंकि सरकारें छूट देती हैं.
पटना और रांची एयरपोर्ट सघन इलाकों में हैं लेकिन उन के इर्दगिर्द सरकारी मकान ही हैं. उन्हें आसानी से हटाया जा सकता है. पर मजदूरों और कामगारों की कौन सुने.
सरकार चाहती है कि इन दिनों दाम बढ़ें ताकि उस की टैक्स की आमदनी बढे. नेताओं का दबाव नहीं रहता क्योंकि उन के आका पंडेपुजारी कुछ नहीं कहते.
छठ, होली, दीवाली पर सरकारी साजिश के कारण स्टेशनों पर भगदड़ में मौतें, घायल
त्योहारों पर अपनों के साथ खुशियां मनाने जा रहे गरीब मजदूरों की लाशें जब गांव पहुंचे तो कैसा लगता होगा, यह अंदाजा लगाया जा सकता है. एक राम मंदिर के लिए 500 साल जिन हिंदुओं का खून खौला था. इन मौतों पर माथे पर शिकन भी नहीं पड़ती क्योंकि ये कोई दान देने नहीं जा रहे थे.
कुछ मामले देखें
11 नवंबर, 2023 : सूरत रेलवे स्टेशन
छठ और दीवाली के कारण बिहार जाने वाली सूरत से चलने वाली ट्रेन में चढऩे के लिए 5,000 लोग जमा हो गए और सांस घुटने व कुचले जाने से कुछ की मौत हो गई.
27 अक्तूबर : बांद्रा टर्मिनस, मुंबई
मुंबई से गोरखपुर जाने वाली ट्रेन में चढऩे के दौरान सैकड़ों यात्री घायल ही नहीं हुए, मौके पर 10 की मौतें भी हो गईं.
पटना रूट
छठ और दीवाली पर मुंबई, गुजरात, पंजाब, दक्षिण भारत से 1.5 लाख यात्री प्रतिदिन से बढ़ कर 15 से 15-20 लाख हो जाते हैं और वे कैसे जाते होंगे, इस की कल्पना ही की जा सकती है.
गोरखपुर रूट
इस की क्षमता 8,000 यात्रियों की है पर 2 से 2.5 लाख यात्री जाने लगते हैं और रेलवे जानबूझ कर पर्याप्त ट्रेनें नहीं चलाता.
दान लेने वाले कुंभ के दौरान सब इंतजाम पक्के
हरिद्वार के स्टेशन की क्षमता अलग है. यानी, 10 दिनों में 3 लाख के करीब. लेकिन जब कुंभ होता है तो दान एकत्र करने वाली सरकार पूरे जोरशोर से काम पर लग जाती है. 10 दिनों में जहां 3 लाख यात्री आ कर जा सकते थे, हरिद्वार या आसपास के स्टेशनों ने 40 से 50 लाख दान देने वाले यात्रियों को ढोया. ये वे ही लोग हैं जो भाजपा को वोट देते हैं जबकि पटना-रांची वाले भाजपा को मन मार कर वोट देते रहे हैं.
कमी रेलों की नहीं है, नीयत की है. जहां धर्म का मामला हो, बड़ेबड़े शहर बस जाते हैं, लाखों टन कूड़ा हो जाता है. कांवड़ यात्रा के आखिरी दिन 4.5 करोड़ लोग छोटे से हरिद्वार में मौजूद थे. सब इंतजाम पुख्ता. पर पटना-रांची जाने वाले मजदूर हर साल दीवाली-होली पर रोतेपीटते घर पहुंचते हैं और फिर घर से काम पर पहुंचते हैं क्योंकि वे बस शूद्र मजदूर है, ब्राह्मणों की सेवा करने के लिए घरों में नहीं जाते. Festival Travel





