India’s Ideological Influence Abroad: यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने मंदिर मस्जिद चर्च की वजह से तरक्की नहीं की बल्कि वे तकनीक, मेहनत, इनोवेशन, डेमोक्रेसी, सिविक सेन्स और निष्पक्ष मीडिया की वजह से विकसित हुए. पिछले तीन चार दशकों में भारत पाकिस्तान के जो लोग विदेशों में पहुंचे वे रोजगार और बेहतर जिंदगी की तलाश में वहां भागे. अपने देश के मंदिर मस्जिद उन्हें न तो सुरक्षा दे पाये और न ही खुशहाली, इसलिए ये लोग उन देशों में अपना मुंह उठाकर पहुंचे जहां मंदिर मस्जिद थे ही नहीं. अब एक दो पीढ़ी में जब विदेशी धरती ने उन्हें पैसा, सुरक्षा और खुशहाली प्रदान कर दी है तब उन्हें वहाँ भी मंदिर मस्जिद की जरुरत पड़ रही है. यह धर्म नहीं दोगलापन है.

भारत पूरी दुनिया से तकनीक आयात करता है. तेल से लेकर हथियार तक सब विदेशों से आता है और भारत दुनिया को बदले में कच्चा माल, सस्ते मजदूर और धर्म देता है. भारत से बाहर जाने वाले लोग अपने साथ अपना वैचारिक कचरा भी लेकर जाते हैं, लालच, डर और लूट की संस्कृति में जन्मे लोग विदेशी धरती पर भी इस मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाते इसलिए वे दुनिया में कहीं भी चले जाएँ उन्हें मंदिर मस्जिद की जरूरत पड़ती है.

जो लोग लेबर बन कर जाते हैं वे कुछ दशकों के बाद वहाँ के नागरिक बन जाते हैं इसमें मंदिर मस्जिद की कोई भूमिका नहीं होती बल्कि यह वहाँ का प्रगतिशील कल्चर है जिसमें धर्म नहीं मेहनत, स्किल और इनोवेशन ही मायने रखता है. यहां अपने देश की नदियाँ बर्बाद करने वाले लोग, औरत को जूती की नोक पर रखने वाले लोग और एक बड़ी आबादी को नीच समझने वाले लोग विदेशों में अपनी यही गन्दी मानसिकता लेकर पहुँचते हैं. भारत का यही वैचारिक कचरा विदेशी धरती तक पहुंच रहा है और यह पश्चिम की मज़बूरी है कि वे ऐसे लोगों को झेल रहे हैं.

औरतों को गायब रखने की मानसिकता

6 सितंबर 2026 को पेरिस में BAPS संस्था के नए हिंदू मंदिर का उद्घाटन हुआ, जिसमें भारत से 93 साल के गुरु महंत स्वामी महाराज आए थे और इस मौके पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्चुअल भाषण भी दिया. इसी कार्यक्रम के एक दिन पहले यानि 5 सितंबर को बाप्स के करीब 100 लोगों का जत्था एफिल टॉवर घूमने गया. टॉवर की कंपनी SETE के सामने इस जत्थे ने पहले से शर्त रखी थी कि उनकी विजिट के दौरान महिलाओं से इंटरेक्शन लिमिट किया जाए और हैरानी की बात यह कि कंपनी ने इस संगठन की बात मान भी ली. औरतों से अपनी जगह छोड़ने को कहा गया और उनकी जगह पुरुषों को लगा दिया गया. महिला कर्मचारियों को अदृश्य होने का आदेश दिया गया, कुछ को पोस्ट छोड़कर दूसरी जगह हटने को कहा गया और कुछ जगह तो औरतों को पुरुषों से रिप्लेस कर दिया गया.

इस अपमान से गुस्साए कर्मचारियों ने सोमवार 7 सितंबर को हड़ताल कर दी और इस हड़ताल की वजह से एफिल टॉवर को बंद करना पड़ा. पेरिस के मेयर ने जांच के आदेश दिए और कहा कि ऐसी शर्तें बर्दाश्त नहीं की जा सकतीं. फ्रांस की जेंडर इक्वालिटी मंत्री ने कहा कि फ्रांस में हम महिलाओं को मिटाने की ऐसी घटिया मानसिकता के लिए कोई जगह नहीं हालांकि मामला तूल पकड़ते ही BAPS ने माफ़ी मांग ली लेकिन यह घटना साबित करती है कि असल में फ्रांस में मंदिर के नाम पर उस संस्कृति की घुसपैठ जारी है जिसमें औरतों को इंसान समझा ही नहीं जाता.

फ्रांस ने 1905 में ही चर्च को स्टेट से अलग कर दिया था ताकि कोई धर्म ऑफिस में घुसकर यह न कहे कि औरतें अपवित्र होती हैं इसलिए इन्हें हटाओ. यह कैसा मज़ाक है कि 93 साल के गुरु का ब्रह्मचर्य फ़्रांस की औरतों की वजह से संकट में पड़ जाता इसलिए एफिल टॉवर से औरतों की छुट्टी कर दी गई. एफिल टॉवर मैनेजमेंट ने सोमवार को यह आदेश निकाल भी दिया क्योंकि फ़्रांस का सबसे बड़ा ग्राहक भारत है इसलिए यहां डेमोक्रेसी पर बिजनेस भारी पड़ गया लेकिन वह फ़्रांस है भारत नहीं.

औरतों ने मैनेजमेंट के इस फैसले के खिलाफ प्रोटेस्ट शुरू कर दिया और फिर पूरे फ़्रांस के सिलिब्रिटीज से लेकर आम आदमी तक औरतों के पक्ष में खड़े हो गये. मनुस्मृति को पेरिस की औरतों ने लात मार दी क्योंकि उन्हें पता था कि अगर एफिल टॉवर पर मनुस्मृति का यह विधान लागू हो जाता तब फ़्रांस के साइंस लैब, मेडिकल कॉलेज, यूनिवर्सिटीज और मंत्रालयों तक में भी मनुस्मृति की घुसपैठ शुरू हो जाएगी इसीलिए फ्रांस के आम लोगों से लेकर मंत्री तक ने मिलकर मनुस्मृति को पैरों तले कुछ दिया. उन्होंने टॉवर बंद होने का नुकसान सहा लेकिन यह मानने से इनकार कर दिया कि कोई विदेशी गुरु आकर उनकी महिला कर्मचारियों को छुट्टी पर भेज दे. यही फर्क है एक सेक्युलर देश और एक धार्मिक भीड़ में.

एक 93 साल के गुरु को अपनी साधना के लिए अगर पूरी दुनिया की महिलाओं को अदृश्य करना पड़े तो यह असल में मनुस्मृति का ग्लोबल वर्जन है. एफिल टॉवर पर काम करने वाली महिलाऐं लिफ्ट ऑपरेटर, सिक्योरिटी गार्ड, इंजीनियर यह सब वहां बराबर की कर्मचारी है. उन्हें यह कहना कि तुम हट जाओ क्योंकि बाबा को औरत दिख जाएगी, मनुस्मृति की सोच ही है जो अब पूरी दुनिया में पहुंच रही है. भारत से आप तकनीक लेकर फ्रांस नहीं गए, आप वहाँ मंदिर और मनुस्मृति लेकर गए. मंदिर के साथ आप वही नियम भी ले गए जो पौराणिक काल में बनाए गए थे कि औरत सामने आएगी तो तपस्या भंग हो जाएगी.

पश्चिम ने तरक्की क्यों की?

फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, अमेरिका ने तरक्की मंदिर मस्जिद की वजह से नहीं की. उन्होंने तरक्की सेक्युलर शिक्षा, लेबर राइट्स, इनोवेशन, लोकतंत्र, शहरों की प्लानिंग और कानून के राज से की. वहाँ 100 साल पहले ही चर्च का राज खत्म किया गया तब जाकर विज्ञान और इंडस्ट्री आगे बढ़ी. आज वही देश हैं जहाँ एक मजदूर भी अपने हक के लिए पुलिस में शिकायत कर सकता है और कोर्ट उसकी सुनता भी है.

भारत और पाकिस्तान से जो लोग पिछले 30-40 साल में बाहर गए वे बेरोजगारी, गरीबी, जातिवाद और असुरक्षा से भाग कर गए थे. खाड़ी में, अमेरिका में, यूरोप में किसी को इसलिए वीजा नहीं मिला कि वह बहुत धार्मिक है बल्कि इसलिए मिला कि वह सस्ता कोडर है, टैक्सी ड्राइवर है, नर्स है या फैक्ट्री में 12 घंटे काम कर सकता है. फ्रांस को भारत का मेहनतकश चाहिए था इसलिए उसने वीजा दिया, वहाँ कामगारों, कारीगरों और स्किल वालों की जरुरत थी मंदिर बनाने वाले की नहीं.

पहली पीढ़ी अपने धर्म और संस्कृति को लात मार कर विदेशों में पहुंची और वहाँ बिना मंदिर मस्जिद के मेहनत के दम पर, खून पसीना बहाकर उन्होंने पैसा, घर और नागरिकता हासिल की लेकिन दूसरी पीढ़ी को मंदिर मस्जिद और संस्कृति याद आने लगा. कुछ लोग जो गोरे समाज में पूरी तरह घुल नहीं पाए उन्होंने अपने गांव वाला धर्म भारत से इम्पोर्ट करना शुरू कर दिया. धर्म के साथ ही जातिवाद और पाखंडवाद भी इम्पोर्ट हुआ जो की धर्म का बाईप्रोडक्ट है. इसी मानसिकता के कारण ही आज पेरिस में, न्यू जर्सी में, सिडनी में बड़े मंदिर बन रहे हैं.

न्यू जर्सी के मंदिर में इंसान को कीड़ा बनाने की सोच

2021 में BAPS के रॉबिंसविले मंदिर पर अमेरिका में केस चला था कि भारत से दलित मजदूरों को धार्मिक वीजा पर ले जाकर 12-14 घंटे काम करवाया गया और मात्र 450 डॉलर महीना दिया गया. अमेरिकी एजेंसियों ने जांच की. तब यह जातिवादी खेल उजागर हुआ. यह वही शोषण है जो भारत में होता है, बस जगह बदल गई. रॉबिंसविले केस धर्म और जाति के बिजनेस मॉडल का केस है.

11 मई 2021 को 6 मजदूरों ने न्यू जर्सी के फेडरल कोर्ट में क्लास एक्शन केस फाइल किया था. आरोप था कि 200 से ज्यादा मजदूरों को भारत से धार्मिक वीजा पर लाया गया. यह आर-वन वीजा पादरियों और धार्मिक वालंटियर के लिए होता है. धार्मिक वीजा पर लाये गये मजदूरों से सिर्फ पत्थर काटने का मैनुअल काम कराया गया. इस मामले पर तत्काल कार्यवाही करते हुए उसी दिन एफबीआई, होमलैंड सिक्योरिटी और डिपार्टमेंट ऑफ लेबर ने न्यू जर्सी के रोबिन्सविल्ले में बने BAPS संस्था के श्री स्वामिनारायण मंदिर पर छापा मारा.

जांच में मजदूरों के आरोप सही पाए गये. मजदूरों से कहा गया था कि अमेरिका में स्टैंडर्ड घंटे के हिसाब से काम होगा लेकिन वहाँ सुबह 6:30 से शाम 7:30 तक 12-13 घंटे, हफ्ते में 87 घंटे से ज्यादा काम कराया गया और हफ्ते में कोई छुट्टी नहीं दी गई. सैलरी 450 डॉलर महीना, यानी करीब 1 से 1.2 डॉलर प्रति घंटा, जिसमें से सिर्फ 50 डॉलर कैश हाथ में दिया जाता था, बाकी भारत के खाते में डाल दिया जाता था, जबकि न्यू जर्सी में मिनिमम वेज उस वक्त 12 डॉलर था.

मजदूरों के पासपोर्ट आते ही ले लिए गए, उन्हें ट्रेलरों में फेंस के अंदर रखा गया, बाहर अकेले निकलने पर रोक थी और बताया गया कि बिना पासपोर्ट पुलिस पकड़ लेगी. उनमें से ज्यादातर दलित थे, अंग्रेजी नहीं जानते थे. उनसे कागजों पर अंग्रेजी में साइन करा लिए गए. मंदिर का सुपरवाइजर स्वामी प्रशानंद इन मजदूरों को कीड़े कहता था ताकि उन्हें उनकी जातिगत जगह याद रहे. यह वही जाति व्यवस्था है जो भारत की संस्कृति में रची बसी है, बस सूटकेस में भरकर अमेरिका ले जाई गई. अमेरिका को लगा कि मंदिर बन रहा है, अंदर जाकर पता चला कि बंधुआ मजदूरी चल रही है. इसी वजह से बाद में कैलिफोर्निया, इलिनोइस, टेक्सास, जॉर्जिया में भी BAPS के दूसरे साइट्स पर छापे पड़े और वहाँ भी जांच एजेंसियों को पासपोर्ट छीनने और निगरानी करने जैसे मामले मिले.

हैरानी की बात तो यह है कि भगवान को इतना बड़ा मंदिर चाहिए था लेकिन वह खुद नहीं बना सकता था. इस मंदिर में लगने वाले पत्थरों को तराशने के लिए भारत से मजदूरों की जरूरत पड़ी क्योंकि यह सस्ते थे. पत्थर तो मशीन भी काटती है लेकिन मशीन जाति नहीं पूछती, दलित को कीड़ा नहीं कहती और 1 डॉलर में 13 घंटे काम नहीं करती इसलिए आदमी लाया गया, और जानबूझकर सबसे गरीब, सबसे कम पढ़ा लिखा आदमी लाया गया ताकि वह सवाल न पूछे. धर्म का सम्बन्ध अगर नैतिकता से होता तो इन मंदिरों मस्जिदों में खटने वाले मजदूरों को सबसे ज्यादा इज्जत मिलती. यहाँ भी वही हुआ जो भारत में होता है. मंदिर के अंदर ही मजदूरों का जमकर शोषण हुआ और उन्हें कीड़ा समझा गया. यह आस्था नहीं, ट्रैफिकिंग है और भारत में तो यह वर्षो पुराना धंधा है जो संस्कृति और धर्म के नाम पर चलता है लेकिन अमेरिका में अभी इतनी अंधेरनगरी नहीं है इसीलिए अमेरिकी कानून में इस पर TVPA यानी मानव तस्करी कानून के तहत केस चला.

दीवाली पर पटाखों का कचरा वहाँ भी

ब्रिटेन के लीसेस्टर और फ्रांस के सीन सेंट डेनिस में दिवाली पर सड़कें बंद करके पटाखे चलाने और लाउडस्पीकर पर अजान या भजन बजाने जैसी बातें अब आम हो चुकी हैं और इन मामलों को लेकर वहाँ के लोकल लोग परेशान हो चुके हैं. हर साल शिकायतें बढ़ रही हैं और साथ ही भारतीय लोगों से नफ़रत भी बढ़ रही है. भारत के लोगों को भी अंग्रेजों से शिकायतें हैं क्योंकि वे इन्हें भारत की तरह धार्मिक आजादी देने के पक्ष में नहीं हैं. रामनवमी में सड़कों पर डीजे, दीवाली पर पटाखों का प्रदूषण, गणेश, सरस्वती और विश्वकर्मा की पूजा के बाद सड़कों पर जुलूस और नदियों में विसर्जन और मुहरर्म पर खुलेआम तलवारबाजी यह सब वहाँ के लोगों को पसंद नहीं इसलिए भारत के लोग कहते हैं कि हमसे भेदभाव हो रहा है. आप यूरोप के सिविक सेंस वाले देश में जाकर नदी किनारे मूर्ति विसर्जन करेंगे, सड़क पर शोभायात्रा में कचरा फेंकेंगे तो वहाँ का सिस्टम आपको टोके भी नहीं, भारतीय लोगों को विदेशी धरती पर इतनी आजादी तो चाहिए.

धर्म व्यक्तिगत आस्था हो सकती है लेकिन जब यह संगठित होकर जमीन, पैसा और वोट मांगने लगे इंसानों को कीड़ा समझने लगे तो वह दोगलापन बन जाता है. धर्म के धंधे से जोड़कर और मां का नाम देकर भारत की ज्यादातर नदियों को मार दिया गया. अब अगर यही मानसिकता विदेशों में माइग्रेट होकर पहुंचेगी तो वहाँ के लोगों को दिक्क़त तो होगी न?

यूरोप की जनसंख्या घट रही है इसलिए उसे मजदूर चाहिए, यह सच है. अब यही यूरोप मजदूर को नागरिक इसलिए बनाता है क्योंकि उसका संविधान स्किल और टैक्स देखता है, जाति या ओहदा नहीं. पश्चिमी देशों का सिस्टम लेबर कोर्ट, हेल्थ इंश्योरेंस और वैज्ञानिक यूनिवर्सिटीज से देश चलता है. चर्च पर तो ताले लग रहे हैं लेकिन भारत का सिस्टम धर्म से चलता है. राजनीति, समाज, मीडिया और लोकतंत्र सभी धर्म के संक्रमण से बीमार हैं इसलिए जब इसी सडे हुए सिस्टम से भागकर कोई पश्चिमी देशों तक पहुँचता है तो वह अपने बीमार दिमाग़ में धर्म का वाइरस भी लेकर जाता है. पश्चिमी देशों में बन रहे थोक के भाव में मंदिर मस्जिद इसी दिमागी संक्रमण का नतीजा है. बाहर मंदिर मस्जिद बनना धर्म की जीत नहीं है, यह इस बात का सबूत है कि हम पश्चिम से तकनीक तो इम्पोर्ट कर लेते हैं लेकिन आज तक वहाँ से वैज्ञानिक सोच इम्पोर्ट नहीं कर पाए. हम भारत में राफेल और मेट्रो तो ले आते हैं लेकिन भारत से जाते वक़्त साथ में जाति, पंचायत, पाखंडवाद, मंदिर मस्जिद और गुरु का ब्रह्मचर्य वाला ढकोसला भी सूटकेस में भर ले जाते हैं.

यूरोप में कुकुरमुत्ते की तरह उगे भगवान

यूरोप के हाउसिंग एस्टेट में जाकर देखिए. फ्रांस में 70 के दशक में जो तमिल और पंजाबी मजदूर के तौर पर आए थे उन्होंने पहले मजदूरी की, ईंट जोड़े, फैक्ट्री में पेंच कसे और इसी मजदूरी के पैसों से उनके बच्चों ने फ्रेंच स्कूल में पढ़ाई की और डॉक्टर या इंजीनियर बन कर निकले लेकिन जैसे ही कॉलोनी में थोड़ा पैसा आया, सबसे पहला काम यह हुआ की धर्म की दुकान खुलने लगी. बॉबिग्नी से लेकर ला शापेल तक गोदाम किराए पर लेकर गुरुद्वारा, मंदिर, मस्जिद बना दी गई. फ्रेंच म्युनिसिपैलिटी को होश आया तब तक तो यह पूरे इलाके में कुकुरमुत्ते की तरह उग चुके थे. धर्म की इन दुकानों से टैक्स नहीं मिलता, बल्कि पार्किंग, शोर और कचरे की शिकायत मिलती है अब यह म्युनिसिपैलिटी के लिए मुसीबत बन चुके हैं इसलिए इनपर रोक लगाने की बात हो रही है.

यही पैटर्न कनाडा के ब्रैम्पटन में भी दिखाई देता है. वहाँ 2023-24 में नगर निगम ने रिपोर्ट दी कि दिवाली पर आतिशबाजी से हर साल 300 टन कचरा फैलता है और साथ ही इस दौरान एयर क्वालिटी इंडेक्स 400 पार चला जाता है. लोकल कनाडाई परिवारों को इससे दिक्कतें होती हैं. ये वही भारतीय लोग हैं जो अपनी महान संस्कृति को लात मार कर कनाडा पहुंचे थे लेकिन वहाँ भी अपने सांस्कृतिक कचरे को ढो कर ले गये. जब एक कनाडाई कहता है कि पटाखे बंद करो, लाउडस्पीकर पर अजान बंद करो तो इनके व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज चलता है कि कनाडा में हिंदु खतरे में है, इस्लाम खतरे में है.

विदेशी धरती पर लूट की दुकाने

ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न और सिडनी में हर साल मंदिर कमेटी चंदा इकट्ठा करती है और गुजरात या यूपी के किसी बाबा को बिजनेस क्लास टिकट पर ऑस्ट्रेलिया बुलाती है. वही बाबा जो भारत में कहता है कि औरतें अपवित्र हैं, वही प्रवचन वहाँ भी देता है. जिस देश ने औरतों को 1902 में ही वोट दे दिया था, वहाँ आकर ऐसे पाखंडी बाबाओं की चरणवंदना करना वैज्ञानिक सोच की हत्या ही नहीं, ब्राह्मणवादी सोच का निर्यात भी है.

सबसे बड़ा सच यह है कि विदेशी धरती पर मंदिर मस्जिद जैसी धार्मिक दुकाने ख़डी करना धर्म से ज्यादा प्रॉपर्टी का खेल हैं. न्यू जर्सी से लेकर पेरिस तक मंदिर ट्रस्ट, गुरुद्वारा ट्रस्ट और मस्जिद ट्रस्ट के नाम पर लाखों यूरो का चंदा आता है, जमीन खरीदी जाती है, फिर उसी ट्रस्ट में परिवार के लोग ट्रस्टी बन जाते हैं. भारत में जो काम मंदिर, मठ, मदरसे, मजार और डेरे में होता है, वही मॉडल विदेश में भी कॉपी हो गया है.

एक सीधा सवाल है. अगर मंदिर मस्जिद ही खुशहाली लाते तो लोग उसे छोड़कर क्यों भागे? कोई भी आदमी लुधियाना से लंदन इसलिए नहीं गया कि लंदन में बड़ा गुरुद्वारा है. वह इसलिए गया कि लंदन में मजदूरी का रेट तय है, अस्पताल में लाइन में घूस नहीं लगती और बच्चा स्कूल में सुरक्षित है. ये तीनों चीजें धर्म ने नहीं, धर्म को सत्ता से अलग करने वाली व्यवस्था ने दी हैं. जब वही आदमी वहाँ सेटल होकर फिर से धर्म को सत्ता में घुसाता है तो वह उस सीढ़ी को ही काट रहा है जिस पर चढ़कर वह ऊपर आया है.

चर्च का खेल खत्म और मंदिर मस्जिद का खेल शुरू

यूरोप का असली धार्मिक आंकड़ा देखो तो कहानी साफ हो जाती है. Pew Research की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक यूरोप में ईसाई 2010 में 75 फीसदी थे, 2020 में 67 फीसदी रह गए. सिर्फ पंद्रह सालों में ही गिनती में 9 फीसदी की गिरावट आई. इसी दौरान धर्म को न मानने वाले 14 करोड़ से बढ़कर 19 करोड़ हो गए. फ्रांस में 1986 में 81 परसेंट लोग खुद को कैथोलिक बताते थे, 2020 में 47 परसेंट रह गए. स्विट्जरलैंड में 2000 में 80 फीसदी ईसाई थे, 2024 में 56 फीसदी रह गए.

इसी खाली जगह में भारत का धार्मिक कचरा बाजार में उतरा. यूरोप में हिंदू आबादी 2010 से 2020 में 30 फीसदी बढ़कर 20 लाख हो गई. मुस्लिम 1.9 करोड़ से बढ़कर 4.6 करोड़ हो गए. सिर्फ UK में नेशनल काउंसिल ऑफ हिंदू टेम्पल्स के मुताबिक 300 से ज्यादा मंदिर हैं और पूरे यूरोप में मिलाकर छोटे बड़े पूजा हॉल जोड़ो तो 600 से ऊपर हैं. जर्मनी के बर्लिन में भारतीय नागरिक 2014 में 4000 थे, 2024 में 41000 हो गए इसलिए वहाँ फ्रैंकफर्ट में ही आधा दर्जन मंदिर बन गए और बर्लिन में इस साल जर्मनी का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर भी खुल चुका है. पेरिस के पास जो नया BAPS मंदिर बना है, वही फ्रांस का पहला पारंपरिक शिल्प वाला मंदिर है जिसे 10 हजार पत्थर भारत से लाकर फ्रेंच इंजीनियरों से बनवाया गया.

हड़पने की होड़ वहाँ भी

ऐसा नहीं है की पश्चिमी देशों में मंदिर के नाम पर सिर्फ दान पेटी, पूजा पाठ, भजन कीर्तन और सत्संग का ही आयात हो रहा है बल्कि भारत में चंदा चोरी, मंदिर की जमीनों और दान पेटियों के बंदरबाट की जो संस्कृति रही है वह भी विदेशी धरती पर आयातित होकर पहुंच रही है. साउथहॉल, लंदन में दो हिंदू मंदिरों के बीच प्रॉपर्टी की लड़ाई कोर्ट तक गई. एक ट्रस्ट ने दूसरे पर आरोप लगाया कि दान का पैसा भारत में जमीन खरीदने में लगा दिया. यह वही पैसा था जो यूरोप में टैक्स फ्री चैरिटी के नाम पर लिया गया था. ऐसे एक नहीं कई मामले उजागर हुए हैं जहाँ विदेशी मंदिरों में भी लूट की संस्कृति चल रही है और यह लुटेरे अंग्रेज नहीं है.

अराजकता फैलाने में इस्लामिस्ट भी पीछे नहीं हैं. फ्रांस में मस्जिदों के बाहर सेक्युलर स्कूल की बच्चियों को हिजाब पहनने के लिए टोका गया जिसपर काफ़ी हंगामा हुआ. फ्रांस के स्कूलो में धार्मिक प्रतीक पर बैन है ताकि सब बराबर रहें लेकिन बाहर खड़े कुछ मुस्लिम संगठन पर्चे बांटते हैं कि हिजाब नहीं पहनना लड़की के नंगी होने की निशानी है. यह लाहौर और लखनऊ की वही मुग़लकाल वाली सोच है जो अब पेरिस से लेकर पीसा तक शिफ्ट हो गई है.

कनाडा में खालिस्तान और हिंदू राष्ट्र दोनों के झंडे लेकर सड़कों पर लड़ाई चलती है. जिस कनाडा ने दोनों को शरण दी, उसी की सड़कों पर कृपाण और लाठियां चलती हैं. टोरंटो पुलिस को 2023 में दिवाली और वैसाखी दोनों पर अलग से फोर्स लगानी पड़ी. जर्मनी के फ्रैंकफर्ट मंदिर में इंजीनियर और अमेजन के मैनेजर वॉलंटियर बनते हैं लेकिन मंदिर के अंदर जाति देखकर रसोई अलग कर दी जाती है. जर्मनी में जो इंडियन लैब में सबके साथ कॉफी पीता है, वही मंदिर में पूछता है कि आप किस समाज से हो? यही वैचारिक कचरे का ट्रांसफर है. यूरोप ने चर्च इसलिए खाली नहीं किए कि उसे नया मंदिर चाहिए था उसने चर्च इसलिए खाली किए क्योंकि पादरी विज्ञान और डेमोक्रेसी से बड़ा नहीं था और हमने उस खाली जगह में अपनी उन्हीं कुंठाओं को घुसा दिया जिससे भाग कर विदेश गये थे.

भारत की नदियों का कचरा विदेशी नदियों तक पहुँच गया

UK में मूर्ति विसर्जन की परमिशन नहीं है. टेम्स वाटर और एनवायरनमेंट एजेंसी हर साल अगस्त सितंबर में नोटिस निकालती है कि नदी में पेंटेड मूर्ति, फूल, नारियल डालना वहां के वाटर रिसोर्सस एक्ट के तहत अपराध है क्योंकि इससे लेड पेंट और प्लास्टिक पानी में घुलता है. 2019 में साउथवॉल में गणेश विसर्जन के बाद टेम्स से 400 किलो मलबा निकाला गया था, जिसके बाद न्यूहैम काउंसिल ने 3 मंदिरों को चेतावनी पत्र दिया. इसी तरह लीसेस्टर में सोअर नदी में विसर्जन रोकने के लिए काउंसिल ने आर्टिफिशियल टैंक बनवाए.

फ्रांस में पब्लिक स्पेस में नमाज पढ़ना 2004 के सेक्युलर कानून के तहत बैन है. 2022 में पेरिस के पास क्लिशी में सड़क पर हर शुक्रवार नमाज पढ़ने पर म्युनिसिपैलिटी ने 2000 यूरो जुर्माना लगाया था क्योंकि सड़क जाम हो रही थी. ब्रिटेन में भी वेम्बली और बर्मिंघम में फुटपाथ पर ईद की नमाज के लिए बिना परमिशन लाउडस्पीकर लगाने पर काउंसिल को केस करना पड़ा.

भारत में नदी में सब कुछ फेंकना आस्था है, यूरोप में वही नदी पब्लिक प्रॉपर्टी है और वहाँ हर बूंद का टेस्ट होता है. टेम्स में हर हफ्ते पानी की गुणवत्ता चेक होती है, वहाँ अगर फूल और राख भी डालोगे तो कैमरे में रिकॉर्ड होगा और जुर्माना आएगा. यह आस्था का सवाल नहीं, आदत का सवाल है. जो आदमी पटना में गंगा में मूर्ति फेंककर आता है, वह पेरिस में भी टेम्स को गंगा समझ लेता है. जो आदमी लखनऊ में सड़क पर नमाज पढ़कर ट्रैफिक रोक देता है, वह लंदन में भी वही करता है. दोनों जगह सोच एक ही है कि मेरा धर्म सिविक रूल से बड़ा है. यूरोप ने इसी सोच से छुटकारा पाकर तरक्की की थी. उसने चर्च को बोला कि सड़क चर्च की नहीं, जनता की है.

यह धर्म नहीं, एक्सपोर्ट क्वालिटी पाखंड है.

जिस आदमी को 93 साल में भी औरत देखकर अपनी साधना टूटने का डर लगता है, उसे फ्रांस नहीं, मेंटल अस्पताल जाना चाहिए. टॉवर पर काम करने वाली महिला कोई अप्सरा नहीं, वह आठ घंटे ड्यूटी करने वाली मजदूर है. उससे नजर बचाना तपस्या नहीं, मानसिक बीमारी का ही धार्मिक नाम है और सबसे बड़ी बात, यह कचरा भारत से इम्पोर्ट किया गया है. फ्रांस ने इस आदमी को नहीं बुलाया. फ्रांस ने इंजीनियर, डॉक्टर और ट्रक ड्राइवर को वीजा दिया था. उस वीजा की आड़ में जब कोई बाबा 10 हजार पत्थर, 100 लोगों का जत्था और ब्रह्मचर्य के नाम पर महिला को अदृश्य करने की शर्त लेकर आता है तो वह टेक्नोलॉजी नहीं, मनुस्मृति लाता है और यही सबसे खतरनाक प्रदूषण है. यूरोप ने चर्च को लात मारकर लैब बनाई थी, अब उसी लैब के बगल में आप नया चर्च खड़ा कर रहे हो, बस नाम बदलकर मंदिर कर दिया है.

जो लोग कहते हैं कि यह संस्कृति है, उनसे पूछो कि कौन सी संस्कृति? वह संस्कृति जहाँ औरत को देखना पाप है लेकिन उसी औरत की मजदूरी से बनी सड़क पर जुलूस निकालना पुण्य है? यही संस्कृति जब फ़्रांस पहुंचेगी तो आप वहाँ एफिल टॉवर के नीचे पूजा करोगे, डांस करोगे, फोटो खिंचवाओगे, लेकिन टॉवर चलाने वाली औरत से आपकी साधना भंग हो जाएगी ? अगर इतना ही ब्रह्मचर्य प्यारा है तो हिमालय में जाओ. एफिल टॉवर घूमने क्यों आए? सच यह है कि आपको भी एफिल टॉवर चाहिए, पेरिस की चमक चाहिए, फ्रांस की नागरिकता चाहिए, बस वहाँ की बराबरी वाली सोच नहीं चाहिए इसीलिए यह मंदिर मस्जिद का विस्तार नहीं, वैचारिक कचरे का कंटेनर शिपमेंट है. फ्रांस ने इस बार टॉवर बंद करके बता दिया कि यह उसका कंटेनर है जिसके कचरे को वह वापस भेज सकता है. India’s Ideological Influence Abroad

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