Shakti Samanta Birth Centenary: शक्ति सामंत के जन्म शताब्दी वर्ष पर खास मनोरंजन के साथ भारतीय समाज की रीढ़ और धर्म के ठेकेदारों पर प्रहार करने वाली फिल्मों का सर्जक फिल्मकार शक्ति सामंत
फिल्मकार शक्ति सामंत केवल ‘चौकलेट हीरो’ राजेश खन्ना के सहारे रोमांटिक फिल्में नहीं बना रहे थे बल्कि वे मनोरंजन के माध्यम से भारतीय समाज की रीढ़ पर प्रहार कर रहे थे. शक्ति सामंत ने धर्म को ईश्वर की पूजा के रूप में नहीं, बल्कि मानवता के तराजू पर तोला. उन्होंने अपनी फिल्मों में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि अकसर जो समाज खुद को सब से धार्मिक या संस्कारी कहता है, वही सब से ज्यादा अमानवीय और क्रूर होता है.
भारतीय सिनेमा के इतिहास में शक्ति सामंत (जन्मः 13 जनवरी, 1926, मृत्यु: 9 अप्रैल, 2009) का नाम केवल व्यावसायिक सफलता की गारंटी देने वाले निर्देशक के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे ‘विजनरी’ निर्देशक’ के रूप में दर्ज है, जिन्होंने मनोरंजन के चकाचौंधभरे फ्रेम में गहरे सामाजिक सरोकारों को छिपाने की कला विकसित की थी. उन के जन्म शताब्दी वर्ष यानी कि 2026 में लोग अपनेअपने तरीके से उन्हें याद कर रहे हैं, श्रृद्धांजलि दे रहे हैं. जबकि हमें लगता है कि ऐसे वक्त में शक्ति सामंत के सिनेमा का पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए.
जरूरत इस बात को परखने की है कि 60 व 70 के दशक में शक्ति सामंत का बनाया हुआ सिनेमा आज ज्यादा प्रासंगिक क्यों हैं? क्योंकि शक्ति सामंत ने अपने समय से आगे का सिनेमा बनाते हुए अपनी फिल्मों के माध्यम से सामाजिक सरोकारों, नारी चेतना, बहिष्कृत महिलाओं- विधवा या वेश्या- को मुख्य धारा में लाने के साथ ही धार्मिक पाखंडों पर जम कर कुठाराघाट किया. वहीं, लालच और भ्रष्टाचार को भी रेखांकित करने में उन्होंने कोई कसर बाकी नहीं रखी.
शक्ति सामंत का नाम आते ही लोग उन्हें 1969 की ‘आराधना’, 1970 की ‘कटी पतंग, और 1972 की ‘अमर प्रेम’ जैसी संगीतमय और भावनात्मक फिल्मों के सर्जक की संज्ञा देने लगते हैं. पर ये लोग इन फिल्मों के भीतर तत्कालीन भारतीय समाज की सड़न, पाखंड और संकीर्णता पर तीखे प्रहार को नहीं देख पाते हैं. क्योंकि इन्हें सिनेमा की समझ ही नहीं है. याद दिला दें कि शक्ति सामंत ने जब फिल्में बनाना शुरू किया, तब देश नेहरूवादी समाजवाद और विभाजन के जख्मों से उबर रहा था. ऐसे वक्त में उन्होंने सिनेमा को पलायनवाद का साधन बनाने की बनिस्बत सिनेमा को समाज का एक ऐसा आईना बनाया जो कड़वे सच को बेहद सलीके और संवेदनशीलता के साथ दिखाता था.
शक्ति सामंत ने न सिर्फ सफलतम फिल्मों का निर्माण व निर्देशन किया,बल्कि कई कलाकारों को बतौर अभिनेता पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई. कई संगीतमय सफलतम फिल्मों के सर्जक शक्ति सामंत की वजह से बौलीवुड को शर्मिला टैगोर जैसी अभिनेत्री मिली, तो वहीं राजेश खन्ना जिस फिल्म से सुपरस्टार बने उस फिल्म का निर्माण भी शक्ति सामंत ने ही किया था.
शक्ति सामंत ने अपनी फिल्मों के माध्यम से साबित किया कि व्यावसायिक सिनेमा मनोरंजक होने के साथसाथ सामाजिक रूप से प्रासंगिक और भावनात्मक रूप से गहरा भी हो सकता है.
कटी पतंग: महिलाओं की पहचान, प्रेम, त्याग और समाज का दोहरा चेहरा
शक्ति सामंत के सिनेमा का सब से प्रगतिशील पक्ष था उन का स्त्री पात्रों को देखने का नजरिया. साठ और सत्तर के दशक के भारतीय समाज में विधवा होना किसी अभिशाप से कम नहीं था. सफेद साड़ी, सूना माथा और समाज से कटी हुई जिंदगी. यही एक विधवा की नियति मान ली गई थी. शक्ति सामंत ने इस रूढ़ि पर अपनी 1971 में रिलीज फिल्म ‘कटी पतंग’ के माध्यम से सीधा और गहरा आघात किया.
1971 में रिलीज फिल्म ‘कटी पतंग’ में शक्ति सामंत ने सामाजिक सरोकार के रूप में बहिष्कृत महिलाओं की पहचान, प्रेम, त्याग और समाज के दोहरे मापदंडों जैसे मुद्दों को उठाया, जहां नायिका माधवी (आशा पारेख) अपने प्रेमी द्वारा धोखा दिए जाने के बाद अपनी मृत सहेली पूनम की पहचान अपनाकर एक विधवा का जीवन जीती है, जो उस समय के रूढ़िवादी समाज में स्त्री की स्थिति, उस की अग्निपरीक्षा और आत्मसम्मान की कहानी बयां करती है, जिस में सच्चा प्रेम और पहचान की तलाश प्रमुख सामाजिक संदेश है.
फिल्म ‘कटी पतंग’ के एक बेहद गंभीर दृश्य में जब माधवी सफेद साड़ी पहन कर पहली बार समाज के सामने आती है, तो कैमरे का एंगल और बैकग्राउंड म्यूजिक एक अजीब सी उदासी पैदा करता है. शक्ति सामंत ने यहां दिखाया कि कैसे समाज एक जीवित, सुंदर और युवा स्त्री को केवल ‘विधवा’ के ठप्पे के साथ एक जीतीजागती लाश में बदल देता है.
अमर प्रेम: धार्मिक और सामाजिक पाखंड बनाम मानवीय संवेदना
शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की कहानी ‘हिंगीर बाजार’ को आधार बना कर 1972 में शक्ति सामंत फिल्म ‘अमर प्रेम’ ले कर आए थे. सामंत ने इसे जिस तरह का सिनेमाई विस्तार दिया, वह अद्वितीय था. इस फिल्म में उन्होंने धर्म के ठेकेदारों और समाज के तथाकथित ‘सभ्य’ लोगों के दोहरे चरित्र की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. फिल्म की नायिका पुष्पा (शर्मिला टैगोर) को उस का पति बांझ कह कर घर से निकाल देता है, बाद में उस का सगा चाचा उसे कलकत्ता के कोठे पर बेच देता है. समाज उसे ‘वेश्या’ और ‘पतित’ घोषित कर देता है. लेकिन फिल्मकार शक्ति सामंत ने अपनी फिल्म में रेखांकित किया है कि पुष्पा (शर्मिला टैगोर) का दिल उस गंगा नदी की तरह पवित्र है जिस के किनारे वह रहती है.
इतना ही नहीं, फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जिन में संस्कारी समाज के पाखंड पर कुठाराघाट किया गया है. मसलन, एक दृश्य नंदू की बीमारी का है. पुष्पा के पड़ोस में रहने वाला छोटा बच्चा नंदू (मास्टर बौबी) बीमार है. उसे तेज बुखार है और वह प्यास से तड़प रहा है. समाज की तथाकथित संस्कारी और धार्मिक औरतें, जो सुबहशाम मंदिरों में पूजाअर्चना करती हैं, भजन गाती हैं, वे उस बच्चे को पानी देने या छूने से कतराती हैं क्योंकि नंदू की सौतेली मां उसे बोझ समझती है. जब पुष्पा को यह पता चलता है तो वह समाज के सारे बंधनों को तोड़ कर नंदू के घर में घुस जाती है. वह उसे अपनी गोदी में लेती है, दवा खिलाती है और पानी पिलाती है. तभी समाज की औरतें वहां आ कर हंगामा खड़ा कर देती हैं कि ‘एक वेश्या ने हमारे पवित्र महल्ले और बच्चे को अपवित्र कर दिया.
शक्ति सामंत ने इस दृश्य में अति तीखे संवादों द्वारा धार्मिक पाखंड पर चोट करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी.
फिल्म‘ अमर प्रेम’ में एक गाना है- ‘चिनगारी कोई भड़के…’ यह कोई साधारण गाना या दृश्य नहीं है. इस प्रसिद्ध गाने के दृश्य को हुगली नदी पर एक नाव में फिल्माया गया है, जिस की पृष्ठभूमि में हावड़ा ब्रिज दिखता है. समाज के पाखंड, भावनात्मक उपेक्षा और महिलाओं के हाशिए पर पड़े जीवन पर रोशनी डालने वाली फिल्म ‘अमर प्रेम’ में एक वेश्या पुष्पा (शर्मिला टैगोर) और एक अकेले व्यवसायी आनंद बाबू (राजेश खन्ना) के बीच अपरंपरागत बंधन की संवेदनशील कहानी है.
फिल्म ‘अमर प्रेम’ में शक्ति सामंत ने मानवीय मूल्यों में गिरावट, सामाजिक पाखंड और हाशिए पर पड़ी महिलाओं की उपेक्षा जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों को उजागर करने का प्रयास किया. फिल्म का मूल संदेश यही है कि सच्चा प्यार और करुणा सामाजिक बंधनों और पूर्वाग्रहों से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण हैं. फिल्म में पुष्पा (शर्मिला टैगोर) का किरदार पतियों द्वारा छोड़ दिए जाने के बाद महिला की होने वाली दुर्दशा तथा समाज उन्हें किस तरह वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर करता है, इस बात का चित्रण करता है. समाज उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार भी नहीं देता. यह फिल्म न केवल पुष्पा की उस के पति और मां द्वारा उपेक्षा को रेखांकित करती है, बल्कि छोटे लड़के, नंदू (मास्टर बौबी/विनोद मेहरा) के साथ उस की सौतेली मां के दुर्व्यवहार को भी रेखांकित करती है.
फिल्म ‘अमर प्रेम’ यह बताती है कि रिश्ते खून के नहीं, बल्कि दिल के होते हैं. पुष्पा और नंदू के बीच का रिश्ता (एक मांबेटे का रिश्ता) इसका एक मार्मिक उदाहरण है. नंदू बड़ा हो कर इंजीनियर बनता है और अपनी ‘मां’ पुष्पा को सम्मानपूर्वक अपने साथ ले जाता है, जो यह साबित करता है कि सच्चे संबंध सामाजिक मान्यताओं से ऊपर होते हैं. यह फिल्म हाशिए पर पड़े व्यक्तियों के संघर्षों को संवेदनशील रूप से चित्रित करती है और सहानुभूति व मानवीय गरिमा के महत्त्व पर जोर देती है.
द्विभाषी फिल्म अमानुषः धर्म के ऊपर मनुष्यता की जीत
शक्ति सामंत ने अपनी कई फिल्मों में धर्म पर करारा चांटा मारा है. ‘अमर प्रेम’ ही नहीं बल्कि बंगला व हिंदी में एकसाथ बनी और 1975 में रिलीज हुई फिल्म ‘अमानुष’ में तो उन्होंने धर्म पर करारा चांटा जड़ते हुए इस बात को रेखांकित किया कि ‘धर्म’ तिलक लगाने या मंत्र पढ़ने में नहीं है, बल्कि संकट के समय किसी की जान बचाने में है. शक्ति सामंत ने इसी बात को रेखांकित करने के लिए सुंदरवन में पहली बार फिल्माई गई अपनी इस फिल्म में बाढ़ का एक दृश्य रखा है. यह दृश्य इस प्रकार हैः
सुंदरवन के इलाके में भारी बारिश के कारण बांध टूटने वाला है. पूरा गांव डूबने की कगार पर है. गांव का सब से धनी और तथाकथित धार्मिक व्यक्ति महिम घोश (उत्पल दत्त) अपनी तिजोरी और कीमती सामान समेट कर नाव से भागने की तैयारी कर रहा है. महिम घोश गांव वालों से कहता है कि ‘यह भगवान का प्रकोप है, इसे कोई नहीं रोक सकता, सब मंदिर में जा कर प्रार्थना करो.’ दूसरी तरफ मधु (उत्तम कुमार) है, जिसे समाज ने ‘अमानुश’ (जानवर/शराबी) कह कर बहिष्कृत कर रखा है. मधु भगवान के भरोसे बैठने के बजाय फावड़ा उठाता है और उफनती नदी के बीच अकेले बांध को बचाने के लिए कूद पड़ता है.
आराधनाः पितृत्व, यौन उत्पीड़न, अविवाहित मातृत्व और सामाजिक बहिष्कार व सामाजिक रूढ़ियों पर चोट
1969 में रिलीज हुई फिल्म ‘आराधना’ में शक्ति सामंत ने एकसाथ पितृत्व, अविवाहित मातृत्व, सामाजिक बहिष्कार, यौन उत्पीड़न, वर्गभेद, आत्मबलिदान और सामाजिक रुढ़ियों के विषय को उठाया. फिल्म में एक अविवाहित मां वंदना (शर्मिला टैगोर) के संघर्ष और अपने बच्चे को समाज की खातिर अनाथालय में छोड़ने पर मजबूर होने व फिर उसे वापस पाने के प्रयास की मार्मिक कहानी है. यह समाज के दोहरे मानकों व पाखंड पर सवाल उठाती है.
फिल्म की नायिका वंदना (शर्मिला टैगोर) अपने प्रेमी और गुप्त पति (राजेश खन्ना) की असामयिक मृत्यु के बाद गर्भवती और अविवाहित रह जाती है. उसे उस रूढ़िवादी समाज का सामना करना पड़ता है जो अविवाहित माताओं को स्वीकार नहीं करता. सामाजिक बहिष्कार से बचने और अपने बेटे के बेहतर भविष्य के लिए वंदना अपने बच्चे को गोद देने पर मजबूर होती है. वह अपने बेटे के करीब रहने के लिए बाद में उसी घर में दाई के रूप में काम करती है. यह कहानी भारतीय ‘त्याग की मूर्ति मां’ की महिमा का चित्रण करती है, जहां एक मां का जीवन उस के बच्चे के लिए बलिदान और त्याग के इर्दगिर्द घूमता है.
शक्ति सामंत ने ‘आराधना’ में जिन मुद्दों को उठाया है उन्हें अलगअलग फिल्म के दृश्य या प्रसंग से समझा जा सकता है. मसलन फिल्म में एक दृश्य है जिस में अरुण वर्मा (राजेश खन्ना) की मृत्यु के बाद वंदना (शर्मिला टैगोर) को पता चलता है कि वह गर्भवती है. जब वह अपने प्रेम और विवाह की सच्चाई बताने का प्रयास करती है तब समाज और परिवार उस की बात स्वीकार नहीं करते.
शक्ति सामंत ने इस दृश्य के माध्यम से इस बात को उकेरने का प्रयास किया है कि विवाह का प्रमाण न होने के कारण एक स्त्री की बात पर विश्वास नहीं किया जाता. उस का मातृत्व सम्मान का विषय बनने के बजाय सामाजिक अपमान का कारण बन जाता है. फिल्म ‘आराधना’ इस विडंबना पर आधारित है कि वंदना को अपने ही पुत्र से दूर रह कर उस का पालनपोषण करना पड़ता है.
यौन उत्पीड़न और स्त्री की असुरक्षा को रेखांकित करने के लिए फिल्म में एक प्रसंग यह है कि जिस घर में वंदना काम करती है, वहां एक पुरुष उस की इच्छा के विरुद्ध उस के साथ दुर्व्यवहार करने का प्रयास करता है. घटना के बाद परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि अपराध का दंड वंदना को भुगतना पड़ता है. फिल्मकार ने इस दृश्य/प्रसंग द्वारा कार्यस्थल पर स्त्री की सुरक्षा, न्याय व्यवस्था और सामाजिक पूर्वाग्रह के साथ ही स्त्री द्वारा परिवार की रक्षा के लिए स्वयं दंड स्वीकार करने का मुद्दा पूरी गंभीरता के साथ उठाया है. यह प्रसंग साफ तौर पर इस बात कि ओर इंगित करता है कि पीड़िता को ही दोषी ठहराए जाने की प्रवृत्ति कितनी गहरी थी. फिल्म इस अन्याय को भावनात्मक रूप से सामने लाती है.
अजनबीः पारिवारिक मूल्य व संबंधों का चित्रण
शक्ति सामंत की 1974 में रिलीज हुई फिल्म ‘अजनबी’ मूलतया एक मनोरंजन प्रधान संगीतमय ड्रामा और सस्पैंस थ्रिलर है. इस में कुछ सामाजिक सरोकार भी निहित हैं विशेष रूप से वर्ग भेद और पारिवारिक मूल्यों के संबंध.
फिल्म ‘अजनबी’ की कहानी के केंद्र में मध्यम वर्ग के एक ईमानदार युवक रोहित कुमार सक्सेना (राजेश खन्ना) और एक धनी व महत्त्वाकांक्षी युवती रश्मी सक्सेना (जीनत अमान) हैं. फिल्म इन दोनों के बीच के आर्थिक और सामाजिक वर्ग के अंतर को रेखांकित करती है. कहानी दिखाती है कि कैसे अलगअलग सामाजिक पृष्ठभूमि और जीवन के प्रति अलगअलग दृष्टिकोण रखने वाले 2 लोग प्यार में पड़ते हैं, शादी करते हैं, लेकिन बाद में जीवन में गलतफहमियों व परिस्थितियों के चलते अलग हो जाते है
फिल्मकार ने अपनी फिल्म ‘अजनबी’ के माध्यम से इस बात को रखने का प्रयास किया कि सच्चा प्यार सामाजिक या आर्थिक स्थिति की परवा नहीं करता. मध्यवर्ग के लड़के और धनी लड़की का मिलन इसी बात को रेखांकित करता है. कहानी इस बात पर भी प्रकाश डालती है कि गलतफहमियां और बाहरी कारक (जैसे कि एक महत्त्वाकांक्षी साली और अन्य भ्रष्ट पात्र) किस प्रकार मजबूत रिश्तों को भी प्रभावित कर सकते हैं, उन्हें तोड़ सकते हैं. फिल्म में विवाह और रिश्तों में विश्वास व संवाद की महत्ता को दर्शाया गया है.
हावड़ा ब्रिजः सामाजिक बुराइयों का चित्रण
1958 में रिलीज हुई शक्ति सामंत की फिल्म ‘हावड़ा ब्रिज’ मूलतया ‘नायर’ शैली की एक क्राइम थ्रिलर फिल्म है. लेकिन उन्होंने इस में भी सामाजिक सरोकार के तौर पर मानवीय लालच और भ्रष्टाचार के विषय का सजीव चित्रण किया. व्यावसायिक सिनेमा के ढांचे में सामाजिक बुराइयों को उजागर करने वाली इस फिल्म की कहानी रंगून के एक व्यापारी प्रेम कुमार (अशोक कुमार) की है जो अपने भाई के हत्यारों को खोजने व परिवार की एक कीमती विरासत को वापस पाने के लिए कलकत्ता (अब कोलकाता) आता है. इस यात्रा के दौरान, फिल्म तत्कालीन कलकत्ता के आपराधिक अंडरवर्ल्ड की सैर कराती है, जिस में तस्करी और हत्या जैसे अपराध शामिल हैं.
फिल्म दर्शाती है कि भौतिकवादी लालच किस हद तक व्यक्तियों को अपराध की ओर धकेल सकता है. तो वहीं यह फिल्म संगठित आपराधिक गिरोह (तस्करों का एक समूह) के संचालन को दिखाती है. यह समाज के उस स्याह पक्ष को सामने लाती है जहां कानून से परे जा कर अवैध गतिविधियां संचालित कि जाती हैं. फिल्म में कैबरे डांसर एडना (मधुबाला) का किरदार, उस समय के समाज में एक हाशिए पर या रूढ़िवादी नजरिए से देखे जाने वाले पेशे का चित्रण करता है. हालांकि, फिल्म में वह एक मजबूत और सहायक महिला के रूप में उभरती है जो नायक की मदद करती है, जिस से उस की अच्छाई सामने आती है.
कुल मिला कर शक्ति सामंत की फिल्म ‘हावड़ा ब्रिज’ का मुख्य सामाजिक संदेश यह है कि अपराध का रास्ता विनाश की ओर ले जाता है और आखिरकार सच्चाई और न्याय की जीत होती है.
अनुरागः नेत्रदान और करुणा का संदेश
शक्ति सामंत की 1972 में रिलीज फिल्म ‘अनुराग’ का मुख्य सामाजिक सरोकार मानवीय करुणा, त्याग, नेत्रदान का महत्त्व और शारीरिक अक्षमता के प्रति समाज का संवेदनशील रवैया है. फिल्म इन गंभीर मुद्दों को एक मार्मिक पारिवारिक कहानी के माध्यम से उठाती है. फिल्म 2 प्रमुख स्वास्थ्य चुनौतियों को सामने लाती है, एक- छोटे बच्चे चंदन (सत्यजीत) का रक्त कैंसर (ब्लड कैंसर) से लड़ना और दूसरी- फिल्म की नायिका शिवानी (मौसमी चटर्जी) का नेत्रहीन होना. फिल्म कहती है कि भौतिक धनसंपत्ति से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण मानवीय मूल्य और रिश्ते हैं. कहानी में धनी और गरीब परिवारों के बीच के अंतर्संबंधों को दिखाया गया है, जहां धनवान दादाजी शिवशंकर राय उर्फ राय साहब (अशोक कुमार) की सोच में बदलाव आता है और वे समझते हैं कि जीवन में करुणा और त्याग का क्या स्थान है. फिल्म का क्लाइमैक्स नेत्रदान के विचार पर केंद्रित है. कैंसर से पीड़ित छोटा बच्चा चंदन (सत्यजीत) अपनी मृत्यु के बाद अपनी आंखें नेत्रहीन युवती शिवानी को दान करने की इच्छा व्यक्त करता है, जिस से वह दुनिया देख पाए. यह पहलू समाज में नेत्रदान के महत्त्व को रेखांकित करता है. फिल्म मजबूती के साथ कहती है कि शारीरिक अक्षमता के बावजूद व्यक्ति सम्मान और प्रेम का हकदार है.
जाग उठाः आधुनिकता बनाम रूढ़िवादिता के साथ सामाजिक असमानता का चित्रण
अपने शुरुआती दौर की इस फिल्म में शक्ति सामंत ने देश के विकास (नागार्जुन सागर बांध के निर्माण) की पृष्ठभूमि में इंसानी रिश्तों और धार्मिकजातिगत संकीर्णता को दिखाया था. इस फिल्म में उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि आधुनिक भारत का असली ‘धर्म’ विकास, श्रम और इंसानी एकता है, न कि पुरानी सड़ चुकी परंपराएं. जी हां, शक्ति सामंत की 1959 की फिल्म ‘इंसान जाग उठा’ में आधुनिक भारत के निर्माण, औद्योगीकरण और ग्रामीण समाज में परिवर्तन को प्रमुख विषय बनाया गया है. फिल्म की पृष्ठभूमि बड़े बांध के निर्माण और उस से जुड़े सामाजिक बदलाव हैं. इस में आधुनिक विकास और पारंपरिक सोच के बीच का टकराव कई दृश्यों में दिखाई देता है.
फिल्म में एक प्रसंग/दृश्य है जब बांध निर्माण की परियोजना आरंभ होती है. गांव के अनेक लोग इसे नए भारत की प्रगति का प्रतीक मानते हैं. वहीं गांव के कुछ लोग अपनी पारंपरिक जीवन पद्धति, खेती और पुराने सामाजिक ढांचे के बदलने से चिंतित हैं. फिल्म का नायक रंजीत (सुनील दत्त) और अन्य पात्र लोगों को समझाने का प्रयास करते हैं कि विकास केवल मशीनों का आगमन नहीं है, बल्कि रोजगार, सिंचाई, बिजली और बेहतर भविष्य का माध्यम भी है. दूसरी ओर, कुछ पात्र यह आशंका व्यक्त करते हैं कि आधुनिकता उन की परंपराओं और जीवनशैली को समाप्त कर देगी. यही वैचारिक संघर्ष फिल्म का केंद्रीय सामाजिक संदेश बनता है.
उपरोक्त दृश्य के माध्यम से शक्ति सामंत ने इस बात को रेखांकित करने का प्रयास किया कि स्वतंत्रता के बाद भारत केवल राजनीतिक रूप से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था. इतना ही नहीं, फिल्म ‘इंसान जाग उठा’ में शक्ति सामंत ने भ्रष्टाचार और सामाजिक असमानताओं का मुद्दा उठाया. हालांकि यह शुरू में व्यावसायिक रूप से सफल नहीं हुई थी, लेकिन इस ने सामाजिक सरोकार के प्रति उन के झुकाव को दर्शाया.
आन मिलो सजनाः सामंती सोच पर प्रहार
1970 में रिलीज शक्ति सामंत की फिल्म ‘आन मिलो सजना’ में सामंती मानसिकता (जमींदारी, ऊंचनीच, धन और वंश के अहंकार) की आलोचना प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में दिखाई गई है. सामंती सोच को रेखांकित करने वाला वह दृश्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है जब जमींदार परिवार का मुखिया गरीब और साधारण परिवार से जुड़े पात्रों को अपने से निम्न समझता है तथा रिश्तों का मूल्य धन और सामाजिक प्रतिष्ठा के आधार पर तय करता है. वह यह मानता है कि ऊंचे खानदान के लोगों का मेल केवल समान हैसियत वाले परिवारों से होना चाहिए. इस कारण प्रेम, समानता और मानवीय संवेदनाओं की उपेक्षा की जाती है. इस दृश्य में व्यक्ति की पहचान उस के चरित्र से नहीं, बल्कि उस के धन और वंश से की जाती है. गरीब और निम्न वर्ग के लोगों को सम्मान के योग्य नहीं माना जाता.विवाह को सामाजिक प्रतिष्ठा और संपत्ति बनाए रखने का साधन समझा जाता है. परिवार का मुखिया अपने अधिकार और प्रभुत्व को सर्वोपरि मानता है.
द ग्रेट गैंबलरः नैतिक पतन
1959 में रिलीज हुई शक्ति सामंत की फिल्म ‘द ग्रेट गैंबलर’ मूलतया अपराध, जासूसी और अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र पर आधारित फिल्म होते हुए भी नैतिक पतन, अपराधजगत, धनलोलुपता, छलकपट और सत्ता के दुरुपयोग का चित्रण करती है. फिल्म के एक महत्त्वपूर्ण दृश्य में अपराध सरगना और उस के सहयोगी जुए, तस्करी तथा अवैध गतिविधियों के माध्यम से धन और शक्ति अर्जित करने की योजना बनाते हैं. उन के लिए मानवीय जीवन, ईमानदारी और कानून का कोई महत्त्व नहीं होता. वे स्वार्थ की पूर्ति के लिए विश्वासघात, हिंसा और छल का सहारा लेते हैं. तो वहीं इसी के समानांतर नायक अपराधियों की इस दुनिया का सामना करता है और स्पष्ट होता है कि लालच तथा अनैतिक साधनों से प्राप्त सफलता आखिरकार विनाश का कारण बनती है.
फिल्मकार ने इस फिल्म में इस बात को पुरजोर तरीके से रेखांकित किया है कि धन के अंधे मोह से नैतिक मूल्यों का पतन होता है. तो वहीं संगठित अपराध और भ्रष्टाचार को समाज के लिए गंभीर खतरा बताया है. शक्ति सामंत केवल विचारों में ही आधुनिक नहीं थे, बल्कि फिल्म निर्माण की तकनीक में भी अपने समकालीनों से बहुत आगे थे. फिल्म ‘कटी पतंग’ में उन्होंने रंगों के विरोधाभास का अद्भुत प्रयोग किया. एक तरफ आशा पारेख की सफेद और बेरंग जिंदगी थी, तो दूसरी तरफ सत्तर के दशक का बदलता हुआ रंगीन फैशन. यह केवल सिनेमेटोग्राफी नहीं थी, बल्कि कहानी कहने का एक दृश्य माध्यम था.
शक्ति सामंत ने हमेशा इस बात का ख़याल रखा कि उन की फिल्मों के गाने फिल्म के कथा कथन में बाधा बनने के बजाय कहानी को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएं. चाहे वह फिल्म ‘अमर प्रेम’ का गीत ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना…’ हो अथवा फिल्म ‘आराधना’ का ‘सफल होगी तेरी आराधना…’ ये महज गाने नहीं हैं, बल्कि समाज से प्रताड़ित पात्रों के लिए एक नैतिक और दार्शनिक संबल भी हैं. आर डी बर्मन और आनंद बक्षी के साथ मिल कर उन्होंने संगीत को एक सामाजिक विमर्श का हथियार बना दिया था.
सस्पैंस, थ्रिलर या नायर जौनर/शैली के नाम पर इन दिनों फिल्मकार जिस तरह की फिल्में बना रहे हैं उन में सामाजिक सरोकार कहीं नजर नहीं आता. यही वजह है कि ऐसी फिल्मों से दर्शक विमुख होता जा रहा है. जबकि शक्ति सामंत ने ‘नायर’ शैली की फिल्मों 1958 की ‘हावड़ा ब्रिज’ और 1962 की ‘चाइना टाउन’ के जरिए भारतीय सिनेमा को ‘नायर’ शैली से परिचित कराया था. लेकिन इन अपराधकथाओं के पीछे भी वे शहरीकरण के कारण पैदा होने वाले नैतिक पतन और मानवीय अलगाव को दिखाना नहीं भूलते थे.
शक्ति सामंत का सिनेमा इस बात का प्रमाण है कि लोकप्रिय और व्यावसायिक सिनेमा बनाते हुए भी अपनी वैचारिक रीढ़ को कैसे मजबूत रखा जा सकता है. शक्ति सामंत ने दर्शकों को उपदेश बांटने के बजाय अपनी कहानियों, दृश्यों और गानों के माध्यम से दर्शकों के विवेक को जगाने का ही काम करते रहे. जन्म शताब्दी वर्ष हमारे लिए एक अनुस्मारक है कि सिनेमा का काम केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि समाज के अंधेरे कोनों में अपनी टौर्च जला कर सच को सामने लाना भी है. सही मायनों में देखा जाए तो शक्ति सामंत की फिल्मों की रोशनी आज आधी सदी बाद भी उतनी ही प्रखर और प्रासंगिक है. उन का सिनेमा कल भी समय से आगे था और आज भी हमें राह दिखा रहा है.
गायक व हीरो बनतेबनते निर्माता व निर्देशक बन बैठे
13 जनवरी, 1926 को पश्चिम बंगाल के बर्दमान में जन्मे शक्ति सामंत की शिक्षादिक्षा देहरादून में उन के अंकल के घर पर हुई. उन्होंने स्नातक की पढ़ाई कोलकाता से की. बांग्ला मातृभाषी शक्ति सामंत ने देहरादून में शिक्षा लेते हुए हिंदी और उर्दू पर भी इतनी अच्छी पकड़ बना ली कि बाद में शक्ति सामंत ने दूसरों को उर्दू सिखाई भी. इतना ही नहीं, देहरादून में शिक्षा ग्रहण करते हुए हिंदी व उर्दू में महारत हासिल करने ने ही उन्हें मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में पैर जमाने में मदद की थी.
बहुत कम लोगों को पता होगा कि शक्ति सामंत अपने कालेज के दिनों में गाना गाया करते थे और उन दिनों उन की तमन्ना फिल्मों में बतौर अभिनेता और गायक स्थापित होने की थी. पढ़ाई पूरी करने की तकदीर ने उन्हें मुंबई से करीब 200 किलोमीटर दूर दपोली के उर्दू स्कूल में शिक्षक की नौकरी दिला दी. उस स्कूल में हर शुक्रवार छुट्टी होती थी, तो शक्ति दा मुंबई पहुंच कर फिल्मों में काम पाने के लिए संघर्ष किया करते थे. वे लगातार संघर्ष कर रहे थे लेकिन बात नहीं बन रही थी.
एक दिन उन की मुलाकात अशोक कुमार यानी कि दादा मुनि से हो गई. दादा मुनि ने उन्हें सलाह दी कि वे फिल्मों में गायक या हीरो बनने का मोह छोड़ कर प्रोडक्शन डिपार्टमैंट में काम करें. फिर शक्ति सामंत ने अपना इरादा बदला. उन्हें बौम्बे टाकीज में नौकरी मिल गई. हिंदी व उर्दू के ज्ञान की काबिलीयत को देखते हुए ज्ञान मुखर्जी, सतीश निगम और फणी मजूमदार जैसे निर्देशकों ने उन्हें अपना सहायक बनाया. कुछ समय बाद वे बौम्बे टाकीज छोड़ कर वृजेंद्र गौड़ के साथ बतौर सहायक इस शर्त पर जुड़े कि अगर उन्हें फिल्म बनाने का कहीं से मौका मिला, तो वे उन्हें छोड़ देंगे. उन दिनों वृजेंद्र गौड़ फिल्म ‘कस्तूरी’ निर्देशित कर रहे थे. इसी वजह से शक्ति सामंत को पाहवा की फिल्म ‘बहू’ निर्देशित करने का अवसर इस शर्त पर मिला कि फिल्म की कहानी और संवाद वृजेंद्र गौड़ लिखेंगे.
यह फिल्म 1955 में रिलीज हुई थी. लेकिन शक्ति सामंत को पहचान मिली 1956 में रिलीज फिल्म ‘इंस्पैक्टर’ से, जिस का निर्माण वर्तमान समय के मशहूर फिल्मकार साजिद नादियावाला के दादा जी ने किया था. यही वजह है कि साजिद नादियावाला दावा करते हैं कि उन का प्रोडक्शन हाउस ‘नादियावाला एंड ग्रैंड संस पिछले 75 वर्षों से फिल्में बना रहा है. उस के बाद ‘शेरु’, ‘डिटैक्टिव’ और ‘हिल स्टेशन’ जैसी कुछ फिल्मों की कामयाबी के बाद उन्होंने अपनी प्रोडक्शन कंपनी ‘शक्ति फिल्म्स’ की शुरुआत की. जिस की पहली फिल्म थी ‘एक मर्डर मिस्ट्री’ जिस की कहानी बनी अस्पताल के बेड पर. शक्ति सामंत का एक ऐक्सिडैंट हुआ था और जब वे अस्पताल में ठीक हो रहे थे तब उन्होंने ‘हावड़ा ब्रिज’ की कहानी सोची थी.
और अशोक कुमार को सुनाई जो फिल्म के हीरो थे. अशोक कुमार ने ही मधुबाला को राजी किया और कहते हैं कि मधुबाला को सिर्फ 1 रुपए में साइन किया गया था. ‘हावड़ा ब्रिज’ में ओ पी नैयर ने संगीत दिया था और उन की धुनें शक्ति सामंत को इतनी पसंद आईं कि उन्होंने तय सीमा से 2 गाने ज्यादा बनवाए. फिल्म सुपर हिट रही और यहीं से बतौर निर्मातानिर्देशक शक्ति सामंत का कैरियर ऊंचाइयों की तरफ बढ़ने लगा. उस के बाद शक्ति सामंत ने तमाम सफलतम फिल्में बनाते हुए सामाजिक संदेश भी दिए.
1950 के दशक के मध्य से ले कर 2000 के दशक तक शक्ति सामंत ने कई यादगार फिल्में दीं, जैसे बहारें फिर भी आएंगी (1966), एन इवनिंग इन पेरिस (1967), आराधना (1969), कटी पतंग (1970), अमर प्रेम (1972), अनुराग (1972), अजनबी (1974), अमानुष (1975, हिंदी और बंगाली द्विभाषी), आनंद आश्रम (1977, हिंदी और बंगाली द्विभाषी), द ग्रेट गैम्बलर (1979), बरसात की एक रात (1981), आवाज (1984), दुश्मन (1990), देवदास (2002, बंगाली) आदि. Shakti Samanta Birth Centenary





