Romantic Tragedy Films: ट्रेजेडी हमेशा हताशा का पर्याय नहीं होती, कई बार वह हालात से लड़ने हिम्मत देती है बशर्ते फिल्मों में उस का प्रस्तुतीकरण प्रभावी रहा हो. आइए ऐसी कुछ चुनिंदा फिल्मों पर नजर डालें-
“अनारकली जब तक यह दुनिया कायम रहेगी, तुम लफ्जे मोहब्बत की आबरू बन के जिंदा रहोगी और मुगलों की तारीख तुम्हारा यह एहसान याद रखेगी...”
“...बाखुदा, हम मोहब्बत के दुश्मन नहीं, उसूलों के गुलाम हैं...”
साल 1960 में प्रदर्शित ऐतिहासिक फिल्म `मुगलेआजम` के ये डायलौग्स फिल्म के आखिरी दृश्य के हैं जिन्हें अकबर अनारकली को एक सुरंग के जरिए मुगल सल्तनत की सरहद के पार भेजते वक्त कहता है. उस का मकसद यह था कि शहजादा सलीम यकीन कर ले कि उस की अनारकली मर चुकी है ताकि वह धीरेधीरे इस सदमे से उबर कर राजकाज संभाले.
ऐसा होता भी है और दर्शक इस अंत से असहमत होते हुए भी सहमत होने को मजबूर हो जाते हैं और इतना ही नहीं, वे बारबार, कई बार इस फिल्म को देखते हैं और हर बार यह विश्लेष्ण करने की कोशिश करते हैं कि इस फिल्म का अंत और क्या हो सकता था जिस से सलीम और अनारकली मिल भी जाते और मुगलिया सल्तनत की आबरू भी सलामत रहती.
लेकिन ऐसे किसी अंत का विकल्प निर्माता, निर्देशक और फिल्म के 5 लेखकों में शुमार के आसिफ ने छोड़ा ही नहीं था. प्यार का दुखद अंत दिखाना उन की मजबूरी नहीं बल्कि कहानी की मांग थी जो एक ज्यादा झूठी और थोड़ी सच्ची ऐतिहासिक दास्तान पर आधारित थी. `मुगलेआजम` की भव्यता और सफलता की मिसाल 66 साल बाद भी वेवजह नहीं दी जाती जिस का एक एक फ्रेम बेहद कसा हुआ था. एक नहिन्, अनेक खूबियां फिल्म में थीं जिन्होंने इसे कालजयी फिल्म का ख़िताब दिलाया, मसलन इस के भव्य महंगे सेट, कलाकारों की बेजोड़ ऐक्टिंग और सधी हुई एडिटिंग के अलावा गीत और संगीत.
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