सिनेमाहॉल की अंधेरी खिड़की से जब हम पर्दे पर सत्तर के दशक की किसी फिल्म में भाई को बहन के लिए गुंडों से लड़ते देखते थे, तो थिएटर तालियों से गूंज उठता था. आज जब रक्षाबंधन का त्योहार हमारे दरवाज़े पर है, तो सिनेमा के शौकीनों के जहन में एक ही सवाल बार-बार कौंधता है...आखिर वह बौलीवुड जो कभी पारिवारिक रिश्तों की दुहाई देते नहीं थकता था, आज भाई-बहन के इस सबसे खूबसूरत और नैसर्गिक रिश्ते पर फिल्में बनाने से कतरा क्यों रहा है? हर इंसान की जिंदगी की स्क्रिप्ट में भाई या बहन का किरदार सबसे बड़ा, सबसे करीबी और सबसे पहला दोस्त होता है. एक ऐसा रिश्ता, जिसके बीच समस्याओं और लड़ाइयों का अंबार तो होता है, लेकिन जिसकी डोर इतनी मजबूत होती है कि तोड़ने से भी नहीं टूटती.
बाकी सारे रिश्ते हम दुनिया में आने के बाद अपनी सहूलियत, समझ या सामाजिक नियमों के हिसाब से चुनते या निभाते हैं.लेकिन भाई-बहन का रिश्ता ‘‘नैसर्गिक भागीदारी’’का रिश्ता है.हम सभी एक ही आंगन में बड़े होते हैं, एक ही जैसी डांट खाते हैं, रिमोट के लिए लड़ते हैं और एक-दूसरे के सबसे बड़े राजदार बनते हैं. यह पूरे विष्व का एक मात्र ऐसा रिश्ता है जो तोड़ने से भी नहीं टूटता.बचपन में न जाने कितनी बार हम गुस्से में कहते हैं, ‘आज से तू मेरा भाई नहीं’ या ‘मैं तुझसे कभी बात नहीं करूंगी’, लेकिन पांच मिनट बाद ही उसी भाई या बहन के पास जाकर कहते हैं, ‘सुन, मम्मी से मेरी सिफारिश कर दे ना!’ बड़े होने पर भले ही जिंदगी की मसरूफियत, शादियां या पारिवारिक विवाद कभी-कभी दूरियां ले आएं, लेकिन जब भी किसी एक पर आंच आती है, तो पैर अपने आप मदद के लिए दौड़ पड़ते हैं.
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