Emotional Hindi Story: “ये पापा किस जमाने में जीते हैं दी, आज कौन ऐसी सोच रखता है कि लड़कियां शादी कर के सिर्फ घर संभालने के लिए होती हैं और अगर घर में लड़कियों ने जन्म लिया है तो जल्द से जल्द उन्हें दूसरे घर का कर दिया जाए,” सिम्मी बेहद उखड़े मूड में थी, “मम्मी से बात करो न दी, वे समझाएंगी पापा को.”
“अगर उन के समझाने से समझ जाते पापा तो फिर बात ही क्या थी,” अर्चना तो सदा की भांति ठंडे से स्वर में ही बोली.
“और ये बूआ के घर की क्या प्रौब्लम्स हैं. हमारे अपने घर के ही इतने मसले हैं, ऐसे में वे हमेशा रोती हुई, दुखी सी आ जाती हैं और पापा से कीमती तोहफे व अच्छीखासी रकम ले कर चलती बनती हैं. इतना होने पर भी जब कभी फूफाजी आते भी हैं तो उन का मुंह बना हुआ सा ही रहता है,” सिम्मी ने कहा.
“सिम्मी, अब मैं क्या बताऊं. मैं तो काफी समय से इस घर का माहौल ऐसा ही देख रही हूं. एक बात बताऊं दिल की, अब तो जी चाहता है कि सच में शादी कर के यहां से निकल ही जाऊं. दिनरात की चिकचिक से मैं तंग आ चुकी हूं.”
“और दी, अगर आप के सपनों का राजकुमार भी पापा जैसी सोच वाला हुआ तो? हो सकता है कि तुम्हारी भी ननद हो और वहां भी ऐसा ही वातावरण हो?”
“यही सब मैं ने भी सोचा था. पर अगर ऐसा हो भी तो मैं क्या कर लूंगी,” अर्चना बोली.
“अरे, एक तो आप की यह बड़ी मुसीबत है- मैं क्या करूं, मैं क्या कर लूंगी. जो थोड़ाबहुत मम्मी की वजह से पढ़ भी गए हम दोनों, उस पढ़ाई, उस मेहनत पर भी पानी फेरती रहती हो आप. अब आप को और मुझे तो जौब करने के बारे में सोचना चाहिए.” सिम्मी की यह बात अर्चना को तो बिलकुल नीम चढ़े करेले की तरह लगी.
“कैसी बातें कर रही है सिम्मी, पापा हमें कभी नौकरी नहीं करने देंगे, बल्कि तेरी सलाह मान कर जूते पड़ेंगे हमें,” अर्चना ने तनिक गुस्से से कहा.
“इस में जूते पड़ने जैसी क्या बात है, दी? आप समझो न, इस से तो पापा की मदद ही होगी न,” सिम्मी अभी भी अपनी बात पर अड़ी हुई थी.
“जैसे तू पापा की सोच जानती ही नहीं, जब तुझे पता ही है कि हमारी पढ़ाईलिखाई का क्रैडिट मम्मी को जाता है वह भी पापा से लड़झगड़ कर, तो आगे जौब की बात तो भूल ही जा. पापा तो हमें स्कूली शिक्षा पूरी होते ही ब्याहना चाह रहे थे. याद नहीं तूझे, कैसे कह रहे थे कि 18 साल की हो गई हो, बालिग हो, अब शादी करो. तुम्हारी बूआ, तुम्हारी मां भी इसी उम्र में ब्याह दी गई थीं. तुम्हारे बाद सिम्मी के भी हाथ पीले करने हैं.
“वह तो मम्मी पड़ गईं बीच में कि इस में कोई महान कार्य जैसी बात नहीं है. इन्दु आज भी ससुराल में महज उन लोगों की कठपुतली बन कर रह गई है. न तो वे लोग उस की किसी इच्छा का मान रखते हैं और न उस के वजूद को ही अच्छे से स्वीकारते हैं.”
“पर दी, अनिल फूफाजी का घर तो बहुत बड़ा है. जब भी बूआ आती है, कितना कुछ लाती है.”
“सिर्फ पैसे वाले होने से कुछ नहीं होता, फूफाजी की अपनी इज्जत यहां अच्छे से बनी रहे, इसलिए बूआ को यहां इतने सामान के साथ भेजते हैं और कितनी अजीब बात है कि जितना भेजते हैं उस से दोगुना यहां से बूआ से मंगवा लेते हैं. बूआ, बस, यही कहती रहती हैं पापा से कि आज मांबाबूजी होते तो मेरी एक इच्छा न टालते. इस पर हमारे पापा क्लीनबोल्ड, फिर चाहे मम्मी की बचत हो या घर का बजट बिगड़े, बूआ लदीफंदी ही अपनी ससुराल जाती हैं.” अर्चना किशोरावस्था से ही यह सब समझती थी लेकिन कुछ कहती न थी.
कभी वह सुनीता से बात करती इस बारे में तो उस के मायके में भी उस के मातापिता उस के भाई पर आश्रित थे तो यहां अगर सुनील की हर बात का विरोध करती तो जाती कहां? हर बार अर्चना एक ही बात कह देती कि पापा हैं, सब से बड़े हैं और बूआ उन की इकलौती बहन है, दादादादी हैं नहीं. सो, बूआ पापा से न कहेंगी तो किस से कहेंगी. बूआ की ससुराल में पापा उन का मान न रखेंगे तो कितना बुरा लगेगा इंदु को. यह सब सुनसुन कर अर्चना ने इस बारे में सुनीता से बात करनी ही बंद कर दी थी.
हां, एक दफा इंदु की हालत देख कर सुनीता ने जिद पकड़ ली थी कि चाहे मेरा जो हो, दोनों बच्चियों को तो पढ़ाना ही है, सुनील माने या न माने.
कितना रोनाधोना कर दिया था सुनीता ने. सुनीता ने कभी ज्यादा बातें नहीं मनवाई थीं सुनील से, अपने मातापिता की पसंद को दिल से अपनाया था और अपने सासससुर की सेवा, इंदु का ध्यान रखने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी. सुनील का हमेशा साथ दिया था. सो, लड़कियों की पढ़ाई के मामले में सुनील ने हथियार डाल दिए थे.
असल में सुनील, पापा और इंदु का समाज की सभा में उठनाबैठना कुछ ज्यादा था जहां का मुखिया एक मंदिर पुजारी ही था. वह ही सब के कान भरता था, तरहतरह की कहानियां सुनाता कि राम-भरत की शादी कितनी जल्दी हो गई थी, दहेज में क्याक्या दिया गया था. असल में वह यह कहना नहीं भूलता था कि उस जमाने में पंडितों, ऋषियों, मुनियों की इज्जत थी. उन्हें पैसा दिया जाता था, गाएं दी जाती थीं, सोना दिया जाता था. शादी का मतलब था कि पंडितों को मुफ्त का भरपूर मिले. भाईबहन हां में हां मिलाते और घर में लागू करने की कोशिश करते.
जब अर्चना ने 12वीं पास की तो उस के लिए लड़का ढूंढ़ने लग गया सुनील. तब हैरानी से सुनीता उस का मुंह देखने लगी थी.
“बालिका वधू बनाना है क्या अर्चना को और 12वीं कौन सी शिक्षा है आज के जमाने में, कुछ भी नहीं.”
“इस में बालिका वधू की क्या बात है? मैं अपनी नाबालिग बेटी की शादी कर रहा हूं क्या? और फिर तुम कहोगी कि लड़कियों को नौकरी भी करने दो तो वह भी मान जाऊं क्या?”
“इस में बुराई क्या है?”
“कभी घर के बाहर का माहौल देखा है, लड़की जात कहीं सुरक्षित नहीं है. मर्दों के शानाबशाना काम करने वाली बातें सिर्फ किताबों में अच्छी लगती हैं. अरे, लड़कियों के लिए जमाना कभी बदला है क्या?”
सुनीता तब कुछ न बोली. बस, चुपचाप इसी में शांत रह गई कि किसी तरह लड़कियों को पढ़ने की इजाजत मिल जाए, वही काफी है. कुछ हफ्तों की मानमनौअल, रूठने और रोनेधोने के बाद अर्चना और सिमरन की शादी की बात दब गई थी और दोनों अब अच्छी पढ़ाई कर रही थीं.
अकसर वे उन दोनों को समझाती भी रहती थीं कि सोने के पिंजरे से ज्यादा आत्मस्वाभिमान की टूटीफूटी झोंपड़ी कहीं ज्यादा अच्छी होती है, इसीलिए उस की बेटियां पढ़ेंगी और अपने पैरों पर खड़ी भी होंगी.
“तो बताओ न दी, क्या हम मम्मी की सोच का मान न रखें, आज पापा को घर की किस्तें चुकाने में तकलीफ हो रही है तो हमारी पढ़ाईलिखाई का क्या फायदा? देखो दीदी, मुझे ट्रैवल एजेंसी में नौकरी मिल रही है और आप भी कोचिंग सैंटर से औफर हुई अपनी नौकरी को हां कर ही दो, महीने के अंत में पापा की बहुत मदद होगी. उन्हें मानसिक तनाव से मुक्ति मिलेगी. अब सोच क्या रही हो, हां कह दो न.”
“वह तेरी तरह जल्दबाज नहीं है, इसीलिए सोच रही है, समझी,” यह सुनीता की आवाज थी.
इंदु और सिमरन ने पीछे मुड़ कर देखा तो सुनील और सुनीता खड़े थे. दोनों की आंखों में चमक और होंठों पर निश्च्छल मुसकान थी.
“देखा आप ने, मैं कहती थी न आप से कि हमारी 2 बेटियां नहीं बल्कि हमारे दिल और धड़कन हैं जिन के बिना हम हैं हीं नहीं और अब बताइए आप कि किस ने जूते पड़वाने जैसा काम किया है हम तीनों में से?”
“तुम तीनों में से किसी ने नहीं, मैं ने किया है जूते खाने जैसा काम ऐसी छोटी सोच रख कर, मेरे लिए तो ये दोनों मेरी दो आंखें भी बन चुकीं आज से जो मुझे सही राह दिखा रही हैं,” सुनील गर्वभरे स्वर में बोला.
“तो अब जूते नहीं, खाना खाया जाए. सच्ची, बहुत भूख लगी है,” सिमरन चहक कर बोली तो सभी उस की इस बात पर खुल कर हंस दिए.
“पापा, आई एम सौरी. लेकिन मैं यह जाने बिना रह नहीं पा रही हूं कि आप में एकदम से ऐसा चेंज कैसे, मतलब आप कैसे?” सिमरन अचंभे में थी और अपने स्वाभावनुसार डाइनिंग टेबल पर खाना खातेखाते ही सुनील से पूछ बैठी.
तब सुनील और सुनीता की नजरें मिलीं तो सुनीता बोली, “इस का जवाब मैं देती हूं. आज तेरे पापा इंदु बूआ के घर गए थे तेरे फूफाजी की नई फरमाइश को पूरी करते हुए. पता है, 3 हफ्ते पहले इंदु आई थी कि महेश के लिए सोने का ब्रेसलेट चाहिए क्योंकि उस की शादी की सालगिरह पर उस की सास ने इंदु को एक छल्ला पहनाया था, अब एक सोने के छल्ले के बदले महेश ने एक बार फिर इंदु को जीभर कर सुना दिया कि मजाल है तुम्हारे भैया ने जो शादी के बाद कोई सोने की चेन या अंगूठी दी हो. उन से कहो, मुझे ब्रेसलेट गिफ्ट करें,” कहते हुए सुनीता ने सुनील की ओर देखा.
उन के चेहरे पर निराशा और उदासी की छाया छा चुकी थी. तब सुनीता ने सुनील के हाथ पर हाथ रखते हुए कहा, ”जबकि सब अच्छी तरह जानते हैं कि इन्होंने इन 5 सालों में अपनी हैसियत से बढ़चढ़ कर ही किया है इंदु के ससुरालियों के लिए.”
“पर मुझे आज तक समझ नहीं आया कि बूआ के इतने संपन्न ससुराल वालों को यहां से आखिर चाहिए क्या? वे ऐसा क्यों करते, सुनाते हैं बूआ को?” सिमरन कुछ रोष स्वर में बोली.
“यह फितरत होती है कुछ लोगों की, कहते हैं न चोर चोरी से जाय हेराफेरी से न जाए, उस परिवार को शुरू से ही यह लगता था कि उन्होंने हम से रिश्ता जोड़ कर जैसे हम पर एहसान किया है क्योंकि हमारी आर्थिक स्थिति उन से कुछ कमतर थी. इसलिए वे लोग अपनी आत्मसंतुष्टि के लिए इंदु की मुट्ठीभर कर यहां भेजते रहे और बदले में चाहते थे कि इंदु दोनों हाथों में भरभर कर यहां से खजाना ले जाए. पर आज जब तुम्हारे पापा इस अनुचित मांग के लिए इंदु से कुछ बात करने गए तो वे नहीं जानते थे कि महेश आज घर पर होगा. अभी गेट खोल कर घर के अहाते में ही पहुंचे थे कि भीतर हो रहे वार्त्तालाप के तेज स्वर ने इन के कदम वहीं पर ही जड़ कर दिए.
“मैं भैया से अब और कुछ नहीं लूंगी. क्या उन्हें अपना परिवार नहीं देखना, मेरी वजह से उन की आर्थिक स्थिति डांवाडोल हो गई है, बारहतेरह हज़ार की अंगूठी के बदले लाख सवा लाख का तोहफ लेना कहां की अक्लमंदी है. उन की भी बेटियां हैं, उन्हें अब उन के लिए रुपया जेवर जोड़ना चाहिए न कि मेरी नित नई मांगों को पूरा करना चाहिए?”
“अरे, रहने दो ये बातें, तुम्हारी दोनों भतीजियां तो वैसे भी दहेजप्रथा के विरोध में हैं और शादी अगर दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली तो तुम्हारे भैया की एक माह की तनख्वाह में दोनों निबट जाएंगी,” महेश बेशर्मी से बोला.
“उफ्फ, किस कदर घटिया सोच रखते हो तुम, इस का मतलब तो यह हुआ कि अगर बेटियों ने पिता की खूनपसीने की गाढ़ी कमाई को फुजूल खर्च होने से बचाने की सोचा है तो भैया और भाभी को अपना जीवनयापन करना ही नहीं है, वो लोग तो संन्यासी बन कर जंगलों की राह पकड़ लेंगे,” इंदु व्यंग्य से बोली.
“यह इस बार ही क्यों तुम्हें इतनी चिंता सता रही है, पहले तो सब ले आती थीं तुम?”
“यही सोच कर शर्म से गढ़ी जा रही हूं कि आप की स्वार्थी सोच को समझने में देर कैसे हो गई मुझ से, सोचा सच में बड़े भैया पिता समान ही हैं तो बच्ची की तरह मनचाही जिदें करती रही पर भूल गई कुछ समय के लिए कि क्या उन का अपना परिवार नहीं है और एक बार फिर उन से बेतुकी जिद कर आई कि आसमान छूते सोने के दामों में मुझे आप लोगों की तरफ से अपने पति के लिए सोने का ब्रेसलेट चाहिए.
“अरे हो गईं गलतियां, नासमझियां मुझ से अतीत में. तो क्या अब अपनी गलतियों को सुधार नहीं सकती. मुझे तो भैया की हरसंभव मदद करनी चाहिए. आज आप की और सासुमां की बातों से कलेजा छलनी हो गया मेरा. संपन्न परिवार में क्या कमी है जो अभी भी सोनेचांदी के अलावा आप लोग अभी एक और नए एयरकंडीशनर और एलईडी स्क्रीन लेना चाह रहे हैं?
“बस महेश, अब और कुछ नहीं, देर से ही सही अब मैं भी अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं. दोबारा शिक्षा के क्षेत्र में कदम बढ़ाऊंगी मैं. भैया से कहूंगी कि अपनी दोनों बेटियों को भी उन की क्षमताओं से कम न आंकें, उन्हें आत्मनिर्भर बनाएं ताकि वे लोग जीवन में आने वाली किसी भी समस्या का मुकाबला कर सकें. उन्हें हालात को समझने की बुद्धि मिले, अपने जीवन में वे अनुभवी बनें और सब से बढ़ कर अपने आत्मसमान को कभी कमज़ोर न पड़ने दें. आते रक्षाबंधन में अब मुझे भैया से तोहफे के रूप में यही वचन चाहिए कि उन की बेटियां सीप में बंद उन मोतियों की तरह हैं जो मोती जानते नहीं हैं कि वो कितने कीमती हैं. सीप से निकल कर ही वे अपना वजूद जान सकेंगे. सीप में बंद तो वो अंधेरे में ही रहेंगे. उन मोतियों को बाहर निकालना है, उन्हें उन के सही स्थान पर स्थापित करना है.”
“लैक्चर अच्छा दे लेती हो, मुंह में गजभर लंबी जबान है, यह आज ही पता लगा पर आज के बाद यह न खुले मेरे आगे.”
“हर गलत बात पर अब खामोश नहीं रहूंगी और आगे पढ़ने का जो विचार अब बनाया है मैं ने, वह भी अब आप पत्थर पर लकीर समान ही समझिए.”
इंदु का स्वर ठंडा पर बेहद मजबूत भावों वालों था. महेश समझ गया कि अब इंदु अपने इरादे से पीछे नहीं हटेगी.
“भाड़ में जाओ, अब बढ़ती उम्र में विद्यार्थियों में शामिल हो कर अपना मजाक उड़वाओ” यह कहने के साथ ही वह वहां से चला गया.
“क्या बात है, आज तो बूआ का नया ही रूप देखनेसुनने को मिल रहा है,” सिमरन तो जैसे अभी भी मंत्रमुग्ध ही थी.
“अगले हफ्ते जब रक्षाबंधन पर आएगी तो उस के बोलने से पहले उस का तोहफा अपने इन अनमोल मोतियों की शक्ल में उस के आगे कर दूंगा और न सिर्फ यह तोहफा दूंगा बल्कि रिवाज के उलट अपनी बहन से एक उपहार मांगूंगा भी.” सुनील ने जब यह कहा तो तीनों ने प्रश्नसूचक निगाहों से उस की ओर देखा.
“उस से कहूंगा कि वह भी यह वचन दे कि वह भी अब अपना फैसला बदलेगी नहीं, किसी हालत में नहीं, किसी मजबूरी में नहीं, किसी दबावब में नहीं. अब उस का भाई उस के अपने लिए हर निर्णय में उस के साथ है.” यह कहते हुए सुनील के चेहरे पर दृढ़ता और संतुष्टि के भाव थे, “हमारा समाज जाए भाड़ में, हम अपनी चिंता करेंगे न कि घिसीपिटी बातों की,” सुनील ने आगे जोड़ा.
“वाहवाह, क्या बात है. ‘फूलों का तारों का सब का कहना है, एक हजारों में मेरी बहना है…’ सिमरन ने आंखें बंद कर गायक की तरह एक हाथ कान पर और एक हाथ हवा में लहराते हुए यह गाना जो गाया तो सब की हंसी थमने का नाम न ले सकी. Emotional Hindi Story
लेखिका – साहिबा टंडन





