Adopted Child Rights: भारत के इतिहास में सबसे ज्यादा दुर्गति विधवा औरतों की हुई है. हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 से पहले तक भारतीय पुरुष अपनी औकात के हिसाब से शादियां करते थे. एक से ज्यादा औरतें रखना रुतबे से जुड़ा मामला होता था. 55 साल की उम्र वाला शादीशुदा शख्श 15 साल की लड़की ब्याह लाता था. जब बूढ़े की मौत होती थी तब वह अपने पीछे कई विधवा औरतों को छोड़ जाता था और 1829 तक ऐसी विधवाओं को सती प्रथा के नाम पर जिंदा जला दिया जाता था. कई आंदोलनों और लम्बे संघर्षो के बाद विधवाओं को इज्जत से जीने का हक हासिल हुआ और 1955, 56 के क़ानून के बाद सब कुछ बदल गया लेकिन संपत्ति और गोद लेने के मामलों में आज भी समाज का रवैया विधवा औरत के खिलाफ ही नजर आता है. अभी हाल में इलाहबाद कोर्ट का फैसला इस दिशा में एक सार्थक कदम है.

एक औरत ने पति के देहांत के बाद एक बच्चे को गोद लिया लेकिन पति के परिवार वालों ने संपत्ति में बच्चे का हक मानने से इनकार कर दिया. उनका तर्क था कि गोद लेना पति के मरने के बाद हुआ है इसलिए मृतक से उसका कोई रिश्ता नहीं बनता. निचली अदालतों ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए फैसला औरत के पति के परिवार वालों के पक्ष में सुनाया. यहीं से विवाद शुरू हुआ. जिसके कारण विधवा औरत को हाईकोर्ट जाना पड़ा और हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पूरी तरह पलट दिया.

इस पूरे विवाद की जड़ में हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम 1956 और सुप्रीम कोर्ट के दो बड़े फैसले है. निचली अदालतों ने जब कहा कि पति के मरने के बाद गोद लिया गया बच्चा मृतक से कानूनी रूप से नहीं जुड़ सकता इसलिए उसे ससुराल की संपत्ति में कोई हक नहीं मिलेगा. निचली अदालत का तर्क तकनीकी तौर पर गलत नहीं था लेकिन अधूरा था. अदालत ने सिर्फ संपत्ति के उत्तराधिकार वाले कोण से मामले को देखा और गोद लेने के अधिकार वाले नजरिये को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया. विधवा औरत ने हाईकोर्ट में अपील की जहां हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया और कहा कि विधवा को मां बनने का अधिकार है. चाहे वह जैनैटिकली बच्चे की माँ बने या गोद लिए हुए बच्चे की माँ बने. यह उसका हक है और कानून उसे इस अधिकार से वंचित नहीं कर सकता.

हाईकोर्ट का सबसे पहला आधार हिंदू दत्तक अधिनियम 1956 की धारा 8 थी. इस धारा के अनुसार कोई भी हिंदू महिला जो 18 साल से ऊपर है और स्वस्थ दिमाग की है वो अकेले भी एक बच्चे को वैध रूप से गोद ले सकती है. इसके लिए पति का जीवित होना जरूरी नहीं है. कानून विधवा को भी मां बनने का पूरा अधिकार देता है. चाहे वो बच्चा जैविक रूप से उसका अपना हो या उसने गोद लिया हो. समाज चाहे जो बोले लेकिन कानून के सामने दोनों स्थितियों में मां का दर्जा बराबर है. इसी को हाईकोर्ट ने मां बनने का अधिकार कहा. कोर्ट ने साफ किया कि किसी औरत को सिर्फ इसलिए मां बनने से नहीं रोका जा सकता क्योंकि उसका पति अब इस दुनिया में नहीं है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कोई विधवा अपने पति की मृत्यु के बाद किसी बच्चे को गोद लेती है तो उस बच्चे को उसके मृत पति की संपत्ति में भी कानूनी अधिकार मिलेगा. गोद लेने के बाद बच्चा विधवा और उसके मृत पति दोनों का कानूनी वारिस माना जाएगा. हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 12 के तहत गोद लिया बच्चा गोद लेने वाले माता-पिता का ही बच्चा माना जाता है. साथ ही हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत बेटा और बेटी को पैतृक संपत्ति में बराबर का हक हासिल है. कोर्ट ने दोनों कानूनों को जोड़कर अपने फैसले की व्याख्या की. गोद लेने वाली मां का पति भी कानूनी रूप से उस बच्चे का पिता माना जाएगा, भले ही वह मर चुका हो.

हिन्दू क़ानून में बंटवारे की कानूनी शर्ते

हिंदू लॉ में 2 तरह की प्रॉपर्टी होती है. सेल्फ अक्वायर्ड प्रॉपर्टी यानी जो खुद कमाई हो और जॉइंट फैमिली प्रॉपर्टी जो दादा-परदादा से आई हो. हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम 1956, सेक्शन 12 कहता है, गोद लेते ही बच्चा अपने बायोलॉजिकल परिवार के सारे राइट्स खो देता है और अडॉप्टिव फैमिली का नेचुरल बोर्न चाइल्ड बन जाता है लेकिन जॉइंट फैमिली प्रॉपर्टी के मामले में थोड़ी अलग इंटरप्रिटीशन है.

जॉइंट हिन्दू फैमिली में कोपार्सनरी राइट जन्म से मिलता है. परिवार के मुखिया के मरते ही परिवार में संपत्ति का बंटवारा मान लिया जाता है. इसका मतलब यह है कि अगर पति ने अपनी पहली पत्नी के समय बच्चे को गोद लिया था तब वो बच्चा उस समय मौजूद जॉइंट फैमिली का हिस्सा बन गया. उसको पुश्तैनी प्रॉपर्टी में बराबर का हिस्सा मिलेगा क्योंकि उस टाइम फैमिली पार्टीशन नहीं हुआ था.

अगर पति ने दूसरी शादी के बाद बच्चे को गोद लिया तब दिक्कत है क्योंकि पहली पत्नी के मरते ही कानूनन जॉइंट फैमिली में उसका हिस्सा फिक्स हो जाता है. अब बाद में गोद लिया बच्चा उस पहले से फिक्स हुए हिस्से में क्लेम नहीं कर सकता. वो सिर्फ उस प्रॉपर्टी में हक मांगेगा जो पिता ने अपनी दूसरी पत्नी के साथ मिलकर अर्जित की है.

सीधे शब्दों में कहें तो पहली पत्नी के समय गोद लिया तो बराबर का हक मिलता है लेकिन पहली पत्नी के मरने के बाद गोद लिया तो वह हकदार नहीं, अगर वसीयत या गिफ्ट के जरिये उस बच्चे को हिस्सा दिया गया हो तो वह उसका हक है. कानून मानता है कि पत्नी के मरते ही उसका आधा हिस्सा उसके अपने वारिसों में चला गया. अब जो बच्चा बाद में आया वो उस पहले वाले हिस्से में कोई हक नहीं रख सकता. इस क़ानून को और बारीकी से समझने के लिए 1964 के इस फैसले को समझना जरुरी है. सुप्रीम कोर्ट का यह मामला गुरम्मा बनाम मल्लाप्पा के नाम से जाना जाता है जो इस क़ानून में मिल का पत्थर साबित हुआ है.

इस केस में एक आदमी ने अपनी पहली पत्नी के रहते एक लड़के को गोद ले लिया. बाद में वो आदमी मर गया. मरने के बाद रिश्तेदारों ने कहा कि ये गोद वाला बच्चा असली वारिस नहीं है इसे प्रॉपर्टी में हिस्सा मत दो. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. कोर्ट ने कहा कि हिंदू दत्तक अधिनियम 1956 की धारा 12 के हिसाब से जिस दिन गोद लिया उसी दिन से वो बच्चा अपने पुराने परिवार से कट गया और नए परिवार का असली बेटा बन गया. अब उसमें और खुद के बेटे में कोई फर्क नहीं है. इस फैसले का असर ये हुआ कि कानून ने साफ कर दिया कि गोद लिए बच्चे को बराबर का दर्जा हासिल है लेकिन यहां एक सवाल छूट गया था. अगर आदमी ने पत्नी के मरने के बाद बच्चा गोद लिया तो क्या होगा?

इस सवाल का जवाब सुप्रीम कोर्ट के इस दूसरे फैसले में है. भगवान सिंह बनाम राम राज 2002 के इस मामले में एक जॉइंट हिन्दू फैमिली का एक सदस्य मर गया. उसके 2 साल बाद उसके भाई ने एक बच्चे को गोद लिया. गोद लिया हुआ बच्चा जब बड़ा हुआ तो उसने दादा की पुरानी पैतृक प्रॉपर्टी में हिस्सा मांगा लेकिन बाकी लोग मना कर दिए. ये केस 5 जजों की बड़ी बेंच के पास गया. कोर्ट ने कहा कि जॉइंट फैमिली का एक नियम है. जब परिवार का कोई मुखिया मरता है तो कानून उसी दिन नोशनल पार्टीशन मान लेता है. मतलब ये मान लिया जाता है कि उस समय बंटवारा हो चुका और उसी समय से मरने वाले का हिस्सा उसके वारिसों में चला गया इसलिए कोर्ट ने फैसला दिया कि जो बच्चा उस मौत के बाद गोद लिया गया है उसको उस पुरानी पैतृक संपत्ति में कोई हक नहीं बनेगा क्योंकि वो हिस्सा तो पहले ही बंट चुका है. इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने ये भी जोड़ दिया कि पिता की खुद की कमाई वाली संपत्ति में इस गोद लिए बच्चे का पूरा हक होगा.

कानून के लेवल पर अब पोजीशन बिल्कुल साफ हो गई. अगर पति ने पहली पत्नी के जीवन में बच्चे को गोद लिया तो उसे पैतृक और खुद की दोनों प्रॉपर्टी में बराबर का हिस्सा मिलेगा लेकिन अगर पहली पत्नी के मरने के बाद गोद लिया तो उसे सिर्फ पिता की खुद की कमाई में हिस्सा मिलेगा, दादा-परदादा की पैतृक संपत्ति में नहीं. समाज पर इसका असर ये पड़ा कि अब लोग गोद लेने से पहले टाइमिंग देखने लगे. बहुत से लोग दूसरी शादी के बाद गोद लेते थे ताकि पहली पत्नी के बच्चों का हिस्सा कम कर दें. इस फैसले के बाद वो रास्ता बंद हो गया. औरतों के लिए भी यह फैसला बेहद अच्छा साबित हुआ क्योंकि पहले आदमी दूसरी शादी करके नया बच्चा गोद ले लेता था और पहले वाले बच्चों को बेदखल कर देता था. अब कानून ने उस पर रोक लगा दी. सीधे शब्दों में कहें तो 1964 वाले फैसले ने गोद लिए बच्चे को इज्जत दी और 2002 वाले फैसले ने जॉइंट फैमिली की पैतृक प्रॉपर्टी को सुरक्षित किया. अब बैलेंस है. ना गोद वाला बच्चा बेसहारा है, ना पुराना परिवार लुट रहा है.

गोद लेने के बाद बच्चे का दर्जा क्या होगा?

अब आते हैं सबसे पेचीदा सवाल पर कि गोद लेने के बाद बच्चे का दर्जा क्या होगा और उसे संपत्ति में हक मिलेगा या नहीं? इसका जवाब हिंदू दत्तक अधिनियम की धारा 12 में ही है. धारा 12 कहती है कि जिस दिन गोद लिया जाता है उसी दिन से बच्चा अपने पुराने परिवार से पूरी तरह कट जाता है और नए परिवार का सदस्य बन जाता है. कानून की नजर में अब वो बच्चा गोद लेने वाली महिला के पति का भी बेटा है, भले ही पति जीवित न हो इसलिए ससुराल वाले ये नहीं कह सकते कि इस बच्चे का मृतक से कोई संबंध नहीं है, संबंध कानून खुद बना देता है लेकिन यहीं पर संपत्ति का मामला उलझता है और यहीं 2002 वाला सुप्रीम कोर्ट का फैसला सबसे जरूरी हो जाता है.

सुप्रीम कोर्ट ने 2002 वाले फैसले में कहा कि जॉइंट हिन्दू फैमिली में जब परिवार का कोई सदस्य मरता है तो कानून उसी पल एक काल्पनिक बंटवारा मान लेता है. मरने वाले का हिस्सा उसके वारिसों में चला जाता है. अब अगर उस मौत के बाद कोई बच्चा गोद आता है तो उसका उस पहले से बंट चुकी पैतृक संपत्ति में कोई हक नहीं बनता क्योंकि वो उस समय वह परिवार का हिस्सा था ही नहीं हालांकि कोर्ट ने साथ में ये भी कहा कि पिता की खुद की कमाई हुई संपत्ति में गोद लिए बच्चे का पूरा हक होगा. उसे कोई नहीं रोक सकता चाहे गोद कब भी लिया गया हो.

इलाहबाद हाईकोर्ट के ताज़ा फैसले का महत्व

इलाहबाद हाईकोर्ट के ताज़ा फैसले का निचोड़ यह है कि विधवा का गोद लेना पूरी तरह वैध है और बच्चा कानूनन मृतक पति का ही बेटा है इसलिए पति की खुद की संपत्ति में बच्चे को पूरा हिस्सा मिलेगा लेकिन अगर विवाद वाली संपत्ति दादा-परदादा की पैतृक संपत्ति है तो 2002 के फैसले के हिसाब से उसमें बच्चे को हक नहीं बनेगा. इस मामले में हाईकोर्ट ने शायद सिर्फ गोद की वैधता वाले हिस्से पर जोर दिया होगा और निचली अदालत को इसी बात पर गलत ठहराया होगा. अगर मामला सुप्रीम कोर्ट गया तो पैतृक संपत्ति वाले मुद्दे पर परिवार वालों का पलड़ा भारी रहेगा. सीधे शब्दों में कहें तो इस मामले में हाईकोर्ट ने औरत के मां बनने के मानवीय और कानूनी अधिकार को बचाया है लेकिन संपत्ति का बंटवारा तो अभी भी उसी पुराने जॉइंट फैमिली के नियम से होगा जो 2002 में तय हो चुका है.

भारतीय समाज में आज भी विधवा को अशुभ और बेसहारा मानकर उसकी जिंदगी के फैसले परिवार और समाज को सौंप दिए जाते हैं. उसे दोबारा मां बनने या घर बसाने का हक नहीं दिया जाता. हाईकोर्ट का यह फैसला विधवा को भी एक स्वतंत्र नागरिक के रूप में स्थापित करता है. वह किसी बच्चे को गोद लेने का फैसला अकेले भी कर सकती है और अपने परिवार की परिभाषा भी खुद तय कर सकती है.

समाज एक औरत को कोख से जन्म देने वाली मां तक ही सीमित कर देता है. इस सोच की वजह से गोद लिए गये बच्चों को मान्यता नहीं मिल पाती. कोर्ट ने इस भेद को तोड़ दिया है. मां होना या मां बनना भावनात्मक रिश्ता होता है, खून का नहीं. एक औरत बिना कोख में बच्चे को पाले भी मां बनने का चुनाव कर सकती है और वह किसी अनाथ बच्चे को गोद लेकर भी मां बन सकती है. यह औरत का हक है कि वह कौन सा रास्ता चुने. राज्य और परिवार को उसे रोकने का अधिकार नहीं.

पितृसत्ता की सबसे पुरानी शर्त है कि वंश आगे बढ़ाने के लिए बेटा चाहिए और यह बेटा पिता के शुक्राणु और माँ के गर्भ से ही जन्मा हो लेकिन 1956 के क़ानून में इस मानसिकता को खत्म कर दिया गया. गोद लिए हुए बच्चों को भी वही सारे अधिकार दिए गये जो जैनैटिक बच्चों को हासिल है. सबसे बड़ी बात यह है कि कानून जीवित लोगों के अधिकार बचाने के लिए है, मरे हुए लोगों के अहंकार बचाने के लिए नहीं. Adopted Child Rights

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