Jayant Bhandari Rationalist: सरिता पत्रिका जो बात दशकों से कहती आई है अब वह बातें सोशल मीडिया पर भी होनी शुरू हो गई हैं. देखा जाये तो सरिता हमेशा से भारत की आवाज रही है. आज जयंत भंडारी भारत की इस आवाज को वॉइस ऑफ भारत के जरिये शोशल मीडिया के अलग अलग प्लेटफार्म से बुलंद कर रहे हैं. कौन हैं जयंत भंडारी और वह वॉइस ऑफ भारत की पहचान कैसे बन गये हैं? आइये जानते हैं.
जयंत भंडारी एक सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर और पब्लिक स्पीकर हैं. वो खुद को रैशनलिस्ट और संविधानवादी कहते हैं. उनका मंच यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक और ट्विटर है. वह सीधी बात रखते हैं. उनका अंदाज सीधा, बिना लाग-लपेट वाला और सवालों से भरा हुआ रहता है. जयंत भंडारी न कोई नेता हैं और न ही किसी पार्टी के प्रवक्ता. वह सिर्फ आम आदमी की भाषा में उन बड़ी-बड़ी बातों की काट करते हैं जो धार्मिक गिरोहों द्वारा साइंस और कल्चर के नाम पर फैलाई जाती हैं इसलिए रैशनल लोग उन्हें सुनते भी हैं.
अपने शोशल मीडिया प्लेटफार्म के लिए उन्होंने “वॉइस ऑफ भारत” नाम चुना क्योंकि वो उस भारत की आवाज हैं जो सवाल पूछता है. ये वो भारत है जो मंदिर के बाहर भी खड़ा है, जो GST भी देता है और स्कूल की फीस भी. जिस दौर में मेनस्ट्रीम मीडिया के पास धर्म और संस्कृति के नाम पर सिर्फ गर्व और आस्था के महिमामंडन का काम बचा हो तब उन्होंने तर्क की बात शुरू की. उन्होंने हर उस प्रोपगेंडा के पीछे छिपे सच को उजागर किया जिससे धर्म और राजनीती की दुकाने चलती हैं.
जयंत भंडारी भीड़ वाले टॉपिक नहीं चुनते. वे आम आदमी की बात करते हैं, वो तर्क की बात करते हैं, आज की बात करते हैं और भविष्य को बेहतर बनाने की बात करते हैं. वो संस्कृत श्लोक या भारी अंग्रेजी नहीं बोलते. आम आदमी की बात उसी की जुबान में करते हैं. इसी वजह से युवा और टियर-2, टियर-3 शहर के लोग उनसे कनेक्ट हो रहे हैं.
जयंत भंडारी ने लगातार धर्म, राजनीति, कल्चर, पितृसत्ता, इतिहास और राष्ट्रवाद पर सवाल उठाए. ट्रोलिंग, रिपोर्ट, गाली सब झेलने के बाद भी रुके नहीं इसलिए आज उनके फॉलोवर्स की तादात अच्छी खासी है. इंटरनेट पर लगातार बोलने वाले की ही पहचान बनती है. जयंत भंडारी का पूरा मोटो तर्क, संविधान, इंसानियत के आसपास ही रहता है. वे कहते हैं कि धर्म निजी मामला है, कानून सबके लिए एक होना चाहिए. इतिहास को गर्व से नहीं, सबूत से पढ़ो. इसी वजह से उन्हें नास्तिक, लिबरल और रैशनल ऑडियंस एक साथ फॉलो करती है.
शोशल मीडिया पर जयंत भंडारी की यह जर्नी आसान नहीं थी. जैसे ही वॉइस ऑफ भारत की रीच बढ़ी उन पर धर्म विरोधी, देश विरोधी के टैग भी लगे. कमेंट में ग़ालियों की भरमार होने लगी, वीडियो रिपोर्ट किये गये जिससे उनके चैनल को कई बार स्ट्राइक का सामना करना पड़ा लेकिन इसी विरोध ने उन्हें और ज्यादा पहचान दी क्योंकि इंटरनेट का नियम है जिस पर सबसे ज्यादा बहस हो वही ट्रेंड करता है.
जयंत भंडारी कोई सेलिब्रिटी या नेता नहीं हैं. वो उस खाली जगह के प्रोडक्ट हैं जहां लोगों के पास सवाल थे पर जवाब देने वाला कोई नहीं था. “वॉइस ऑफ भारत” के जरिये उन्होंने भारत की उस आवाज को माइक थमा दिया जो भेड़चाल से अलग सोचती थी. जयंत भंडारी असल में स्थापित मान्यताओं की खाल उधेड़ते हैं और परंपराओं पर तर्क वाली चीर-फाड़ करते है. वे भारत के इतिहास, कल्चर और धर्म के उस आवरण को हटाते है जिसे सदियों से आस्था और गर्व के नाम पर पवित्र बना दिया गया है. जयंत का सवाल बहुत सीधा है, अगर कोई चीज सच में महान है तो उसे सवालों से डरना क्यों चाहिए? और अगर कोई सच से डर रहा है या डरा रहा है तो दाल में कुछ काला जरूर है. जयंत भंडारी के लिए एकमात्र कसौटी है सबूत, तर्क और इंसानी भलाई.
इतिहास को लेकर जयंत भंडारी का रुख गौरव-गाथा वाला नहीं है. भारत में पिछले कुछ सालों में इतिहास को दो डिब्बों में बंद कर दिया गया है. एक डिब्बे पर लिखा है स्वर्णिम वैदिक युग और दूसरे पर जातिवाद, विदेशी आक्रमण और पतन. बीच में वो भारत गायब है जिसने बहस की, सवाल पूछे और गलतियां भी कीं. जयंत भंडारी पूछते हैं कि अगर हमारे पास सच में प्लास्टिक सर्जरी, विमान और इंटरनेट था तो हमें आज आईआईटी और एम्स बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? अगर नालंदा और तक्षशिला ज्ञान के केंद्र थे तो उन्हें जलते समय समाज मूक दर्शक क्यों बना रहा?
रैशनल सोच इतिहास को पूजा घर में नहीं रखती. वो उसे लैब में रखती है. हर दावे को परखती है. जिस समाज ने बुद्ध, चार्वाक, कबीर और पेरियार को पैदा किया था वही समाज आज नरेंद्र दाभोलकर, गोविन्द पंसारे, एम. एम कलबुर्गे और गौरी लंकेश की हत्याओं का जश्न क्यों मना रहा है? महान संस्कृति वाले समाज को अपनी गलतियों को मानने की हिम्मत भी दिखानी होगी. तभी हम जाति, अंधविश्वास और पाखंड की जड़ों तक पहुंच पाएंगे. वरना इतिहास की महानता का ढिंढोरा पीटते रहेंगे और वर्तमान में पिछलग्गू और नाकारा ही साबित होंगे.
कल्चर के मामले में जयंत भंडारी की सबसे गहरी चोट संस्कार शब्द पर है. भारतीय कल्चर को आज एक ऐसे पैकेज की तरह बेचा जाता है जिसमें औरत का शरीर, खाने की थाली और जन्म से तय पेशा सब पहले से फिक्स है. पीरियड में रसोई से बाहर, विधवा का सफेद साड़ी और श्रृंगार पर रोक, बेटी के लिए लक्ष्मण रेखा और बेटे के लिए कुल का नाम ये कल्चर नहीं है, ये नियंत्रण है. इसी तरह जाति को कर्म आधारित व्यवस्था कहकर हजारों साल की असमानता को धर्म की मोहर लगा दी गई. कोई भी कल्चर जो आधी आबादी को कमजोर करे, एक बड़े हिस्से को अछूत माने और इंसान के खाने-पीने तक में दखल दे वो कल्चर टिकाऊ नहीं हो सकता. कल्चर का काम इंसान को आगे ले जाना है उसे जंजीरों में जकड़ना नहीं. अगर कल्चर विज्ञान, सवाल और बराबरी को जगह नहीं देता तो वो म्यूजियम की चीज है, जिंदा समाज की नहीं.
धर्म की पड़ताल पर आते ही जयंत भंडारी की रैशनल विचारधारा सबसे नुकीली हो जाती है. वो धर्म को कई हिस्सों में तोड़ते हैं. डर, पाप, ग्रह दोष, कर्मफल और नर्क का डर. यह सब इसलिए बनाये गये ताकि इंसान सवाल न पूछे और सिस्टम को चुनौती न दे. धर्म के नाम पर हूंडी, दान, पूजा की रसीद, रत्न, वास्तु और चमत्कार का पूरा इकोसिस्टम खड़ा किया गया है. हर डर की एक कीमत तय है. जब धर्म को राष्ट्रवाद के साथ जोड़ दिया जाता है तो आलोचना देशद्रोह बन जाती है. फिर संविधान से ऊपर आस्था को रखा जाने लगता है.
जयंत भंडारी नास्तिकता को विकल्प मानते हैं. जयंत का भारत मंदिर की घंटी से नहीं, स्कूल की घंटी से चलेगा. हवन के धुएं से नहीं, अस्पताल की ऑक्सीजन से बचेगा. व्रत के भूखे पेट से नहीं, रोजगार की तनख्वाह से पलेगा. वॉइस ऑफ भारत का मतलब सिर्फ एक धर्म या एक इतिहास नहीं है. इसका मतलब है एक ऐसा भारत जहां संविधान की पहुंच हाशिये पर खड़े आखिरी आदमी तक हो, विज्ञान सबसे बड़ी ताकत हो और इंसानियत सबसे ऊपर हो. जयंत भंडारी की लड़ाई किसी भगवान से नहीं है बल्कि लड़ाई उस सोच से है जो कहती है जैसा चल रहा है चलने दो. इतिहास को गर्व से नहीं गलतियों से सीखकर आगे बढ़ा जा सकता है. कल्चर को हम तभी बचा पाएंगे जब उसे बदलने की इजाजत देंगे और धर्म को तभी इज्जत मिलेगी जब वो इंसान को ऊपर रखते हुए सवालों की इज्जत करना सीख जाएगा. Jayant Bhandari Rationalist





