Ranchi Student Protest: झारखंड के रांची में 7 अगस्त 2026 को JPSC-JSSC परीक्षा में गड़बड़ियों के खिलाफ चल रहे छात्र आंदोलन के दौरान AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा स्टूडेंट्स के समर्थन में पहुंची थी. इस दौरान उन पर 26 साल के अमरनाथ पांडेय ने स्याही फ़ेंकी और स्याही फेंकने के बाद जय श्री राम का नारा लगाया. नेहा बोरा का आरोप है कि अमरनाथ पांडे RSS से जुड़ा है.

एक बोतल उछली उसमें से काला रंग निकला और नेहा के चेहरे पर बिखर गया इसके साथ बिखर गई वो पूरी मानसिकता जिसे संस्कृति कहकर पीढ़ियों से ढोया जा रहा है. यह कोई अकेली घटना नहीं है और न ही यह किसी एक सिरफिरे की हरकत भर है. यह उसी सोच की ताजा किस्त है जो सदियों से संस्कृति की खोल में छिपी रही है. अगर कोई कमजोर, कोई दलित या कोई औरत अपनी आवाज ऊंची करे तो उसे भरी सभा में अपमानित कर दो. उसका मुंह काला कर दो ताकि बाकी लोग देखकर डर जाएं. नेहा ने आवाज उठाई, सिस्टम को चुनौती दी और आजादी की बात की इसलिए सजा जरुरी थी. चेहरे पर कालिख पोत दिया गया. ये सजा शरीर के लिए नहीं थी, ये सजा समाज को सन्देश देने के लिए थी. संदेश साफ था. औरत हो, औरत बन कर रहो.

इस देश में चेहरे पर कालिख पोतने की परंपरा नई नहीं है और यह सिर्फ लड़कियों तक सीमित भी नहीं है. यह वही मानसिकता है जिसने सदियों तक दलितों को सार्वजनिक तौर पर अपमानित किया. गांव में किसी दलित ने मंदिर में प्रवेश की कोशिश की, किसी ने ऊंची जाति के खिलाफ पंचायत में आवाज उठाई या किसी ने मजदूरी के पैसे मांगे तो सजा एक ही थी. मुंह काला करके पूरे गांव में घुमा दो. आज भी महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा से लेकर बिहार तक ये खबरें आती रहती हैं.

झारखण्ड के इसी रांची के भाभानगर में 29 मार्च 2026 को 28 साल की एक दलित औरत और उसकी बेटी के चेहरे पर कालिख पोतकर उन्हें सार्वजनिक रूप से घुमाया गया. संयोग से इस औरत का नाम भी नेहा था. महिला के पति ने 4-5 दिन पहले बिना बताए पंकज सिंह की मोटरसाइकिल ले ली थी लेकिन वह लौटा नहीं पाया. कानून का सहारा लेने की बजाय पंकज सिंह ने अपनी महिला मित्र गुंजा श्रीवास्तव और 2 अन्य लोगों के साथ मिलकर औरत और उसकी बेटी को पकड़ा, चेहरे पर कालिख पोत दिया और दोनों माँ बेटी को पूरी कॉलोनी में पैदल घुमाया.

राजस्थान के भीलवाड़ा में एक दलित युवक को इसलिए पीटा गया और मुंह काला किया गया क्योंकि उसने घोड़ी पर बैठकर शादी करने की हिम्मत की थी. मध्य प्रदेश में एक दलित युवक को पेशाब पिलाने का मामला सामने आया. वीडियो वाइरल होने के बाद आरोपी पर कार्यवाही हुई. इन तमाम मामलों में फर्क सिर्फ हथियार का है. पहले चूल्हे की कालिख या जूते-चप्पल का हार हुआ करता था, अब स्याही की बोतल है. मकसद वही है. इज्जत को सार्वजनिक तौर पर नीलाम कर दो. औरत का चेहरा और दलित का शरीर हमेशा से निशाने पर रहे हैं. उन पर हमला मतलब पूरे समाज को ये बताना कि तुम्हारी कोई हैसियत नहीं है. अपनी औकात में रहो.

और ये औकात तय कौन करता है? वो संस्कृति जिसकी दुहाई देकर हर अत्याचार को जायज ठहरा दिया जाता है. कहा जाता है हमारी संस्कृति में लड़कियां ऐसे नहीं बोलतीं. हमारी संस्कृति में दलित सर ऊंचा करके नहीं चलते. जरा इस संस्कृति के ग्रंथों को पलट कर देखिए. पैट्रिआर्की और जातिवाद दोनों की जड़े वहीं मिलेंगी.

भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि वहाँ स्त्री कभी स्वतंत्र नहीं हो सकती. यानी औरत की आजादी को ही पाप मान लिया गया. जब धर्मग्रंथ ही औरत आजादी के खिलाफ खड़े हों तो स्याही फेंकने वाले को नैतिक बल क्यों नहीं मिलेगा? वो इसी पाठ को पढ़कर बड़े हुए हैं. उन्हें बचपन से सिखाया गया है कि औरत और दलित की जगह पैरों में है यही इनकी मर्यादा है और मर्यादा तोड़ने वाले का चेहरा काला करना ही तो धर्म है.

यह पूरा खेल वर्चस्व का है. पितृसत्ता औरतों पर मर्दों का वर्चस्व बनाये रखता है और जातिवाद निचली जाती पर द्विजों का वर्चस्व बना कर रखता है. पैट्रिआर्की और जातिवाद दोनों का आधार एक ही है, डर. उस डर का कि अगर दलित पढ़ लिख गया तो मेहनत कौन करेगा? अगर लड़की सवाल करने लगी तो घर कौन चलाएगा? इसलिए इन दोनों को कंट्रोल करने के लिए सबसे आसान तरीका चुना गया. शर्मिंदगी का एहसास करा दो. औरत का चेहरा काला करो और दलित को नंगा करके मारो, पेशाब पिलाओ. ये हिंसा नहीं है, आतंक है. ये एक सुनियोजित संदेश है बाकी सबके लिए कि लाइन क्रॉस की तो यही हश्र होगा और सबसे खतरनाक बात ये है कि इस आतंक को भीड़ का समर्थन हासिल होता है. ठीक किया, ज्यादा बोल रही थी यानी अपराधी अकेला नहीं है. उसके पीछे एक पूरी सोच खड़ी है जिसे हमने अब तक संस्कृति के नाम पर बचा रखा है इसलिए नेहा के चेहरे की स्याही सिर्फ साबुन से नहीं धुलेगी बल्कि इस कालिख को मिटाने के लिए उन तमाम किताबों, उन परंपराओं और उन पंचायतों को मटियामेट करना होगा. Ranchi Student Protest

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