Hindi Stories: “प्रियांशी, देख कर चढ़ना, एकदम स्ट्रेट ट्रैक है.”
“तुम लोगों को क्या लगता है मैं इतनी कमजोर हूं कि चढ़ नहीं पाऊंगी.”
“तू बोलने से ज़्यादा चढ़ने पर ध्यान लगा वरना अगर तू गिरी तो तेरे साथसाथ हमारी भी ट्रिप खराब हो जाएगी.”
“तुम लोग अपनी चिंता करो ब्रो, मैं अपनी देखभाल ख़ुद कर लूंगी,” खिलखिला कर अपने दोस्तों को चिढ़ाते हुए प्रियांशी ने साथ आए अपने दोस्तों से कहा और कुछ ही देर में स्टिक के सहारे वह सब से पहले चोटी पर पहुंच गई.
प्रियांशी हिंदुस्तान टाइम्स अखबार में चीफ एडिटर के पद पर काम करती है. वह अपनी एक महिला मित्र और 4 पुरुष मित्रों के साथ उत्तराखंड में ऋषिकेश के एक पर्यटक स्थल चोपता के ऊपर स्थित तुंगनाथ नामक ट्रेकिंग टूर पर 3 दिवसीय ट्रिप पर आई हुई है. जैसे ही वह ऊपर पहुंची, वहां अपने जैसे ही कई अन्य ग्रुप्स को देख कर हैरान रह गई क्योंकि वह तो अब तक इसी खयाल में थी कि वह ही सब से अनोखा काम कर रही है.
जब सारे मित्र आ गए तो प्रियांशी ने पूरी चोटी पर इधरउधर घूम कर जम कर तसवीरें क्लिक कीं. तभी उसे तुंगनाथ की चोटी पर 5 लड़कियों का एक गर्ल्स ग्रुप दिखा. वह दौड़ कर उन के पास जा पहुंची और सब को इकट्ठा करने लगी. उन में से एक आकांक्षा को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि बौयज़ ग्रुप की यह अनजान लड़की उन के गर्ल्स ग्रुप की सारी लड़कियों को क्यों इकट्ठा कर रही है.
आकांक्षा को यह सब बहुत अजीब सा लग रहा था, सो, वह प्रियांशी के पास जा पहुंची और बोली, “व्हाई आर यू कलैक्टिंग औल औफ़ अस, डियर?”
“इट्स वैरी इंपौर्टेंट फौर मी, प्लीज, कम एंड स्टे विथ मी.” प्रियांशी ने यह कहा तो आकांक्षा अपनी 5 मित्रों के साथ आ कर प्रियांशी के बगल में खड़ी हो गई. तब प्रियांशी ने अपने घर पर एक वीडियो कौल किया और सभी लड़कियों को दिखाते हुए कहा, “मौम-डैड, सी दीज़ आर माय ट्रिप मैंबर्स. वी आर एंजौइंग अ लौट हियर.” इस के बाद उस ने कुछ फोटोज क्लिक कीं, वीडियो बना कर अपनी मौम को भेजे, फिर कुछ और औपचारिक बातचीत कर के प्रियांशी ने फ़ोन काट दिया.
अब आकांक्षा बोली, “तुम ने ऐसा क्यों किया, हमारी तो कुछ समझ नहीं आ रहा?”
“अब मैं तुम लोगों को क्या बताऊं, मैं देश के जानेमाने न्यूज़पेपर हिंदुस्तान टाइम्स में दिल्ली में अकेली रह कर 5 साल से काम कर रही हूं और अभी चीफ एडिटर हूं पर मेरे पेरैंट्स मुझे अभी भी बच्ची ही समझते हैं. यही नहीं और भी बहुत सारी चीजें हैं जो मैं तुम्हें अभी नहीं बता सकती. हां, बस इतना जान लो कि मेरी अपने पेरैंट्स से ज़्यादा बात नहीं होती. बस, जो बहुत जरूरी होता है वही मैं उन के साथ शेयर करती हूं.
“एक्चुअली, हमारी वाइव्स ही मैच नहीं करती, इसीलिए मैं अगर उन्हें बताती कि मैं लड़कों के साथ जा रही हूं तो पहले तो मुझे आने की परमिशन न देते, साथ ही, दुनियाभर का होहल्ला करते अलग. उन की तसल्ली के लिए मैं ने तुम सब के साथ फ़ोटो क्लिक कर लिया और वीडियो कौल भी कर लिया ताकि वे खुश और संतुष्ट रहें. अब वे बारबार कौल कर के मुझे परेशान नहीं करेंगे. वो भी खुश और मैं भी ख़ुश.”
अब वे दोनों अपनेअपने ग्रुप में शामिल हो गईं. प्रियांशी फिर से अपने दोस्तों के साथ एंजौय करने लगी. उन का ट्रेकिंग टूर तुंगनाथ की चोटी तक था. ऊपर का दृश्य देख कर तो वहां आए सभी ग्रुप मैंबर्स आश्चर्यचकित रह गए. चारों तरफ़ से बर्फ से नहाई हुई चोटी, ऊपर से बादलों की ओट में से झांकता सूरज, तुंगनाथ की चोटी को अपनी गोद में लेने को आतुर बादल- प्रकृति का ऐसा अनमोल दृश्य उस ने अपने जीवन में पहली बार देखा था.
पूरे दिन की मौजमस्ती और ढेरों फ़ोटो क्लिक के बाद अगले दिन जब वे वापस आ रहे थे तो अचानक से प्रियांशी का पैर स्लिप हुआ और वह बर्फ पर फिसलती हुई नीचे आ गिरी. वह तो भला हो वहां के कुछ लोकल निवासियों का जो वहां मौजूद थे, उन्होंने किसी तरह उसे संभाला. जल्दीजल्दी उस के सभी दोस्त नीचे आए और बेहोशी की हालत में उसे एक ग्रुप की एंबुलैंस से तुंगनाथ से लगभग 210 किलोमीटर दूर स्थित ऋषिकेश के एक हौस्पिटल में ले जाया गया.
डाक्टरों ने उसे एडमिट कर लिया और पैर में मल्टीपल फ्रैक्चर होने की बात कही. डाक्टरों के अनुसार तुरंत ही औपरेट करना जरूरी था. इंदौर स्थित प्रियांशी के मातापिता को जब प्रियांशी के दोस्त सौरभ ने सूचना दी तो वे एकदम घबरा गए, बोले, “यह सब कैसे हो गया, वह तो एक गर्ल्स ग्रुप के साथ गई थी. आप लोग कौन हो, उस के साथ की और गर्ल्स कहां गईं? ग्रुप लीडर कहां था और क्या कर रहा था जो मेरी लड़की फिसल गई? केस करूंगा मैं उन सब पर.” प्रियांशी के पापा आपे से बाहर हो गए थे.
“अंकल, अंकल, आप मेरी बात तो सुनिए, वह खतरे से बाहर है. उस का ट्रीटमैंट स्टार्ट हो गया है. हम सभी हैं यहां पर. आप अपनी सुविधा से आ जाइए. यहां आ कर आप को सब पता चल जाएगा,” सौरभ ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा. मल्टीपल फ्रैक्चर और औपरेशन होने की बात तो वह डर के कारण उन्हें बता ही नहीं पाया.
“कैसे भी करूं, मैं कल शाम से पहले नहीं पहुंच पाऊंगा. फ्लाइट से कल दिल्ली और फिर ऋषिकेश. तुम कौन हो और प्रियांशी तुम्हें कैसे जानती है, बाय द वे, तुम वहां क्या कर रहे हो और क्या ध्यान रखोगे तुम आजकल के लड़के? सिवा मौजमस्ती के तुम लड़कों को कुछ आता भी है?” प्रियांशी के पापा ने अपना सारा गुस्सा मानो सौरभ पर ही निकाल दिया हो पर बिना कोई उत्तर दिए सौरभ चुपचाप उन की बातें सुनता रहा.
अगले दिन जब तक प्रियांशी के मातापिता आए तब तक उस के पैर का औपरेशन हो कर प्लास्टर चढ़ चुका था. प्रियांशी के सभी पांचों दोस्तों ने मिल कर उस का पूरा ध्यान रखे हुए थे. कुछ देर तक शांत रहने के बाद प्रियांशी के पापा उस के दोस्तों को देख कर बोले, “ये क्या तुम्हारे औफ़िस में काम करते हैं?”
“नहीं पापा, केवल स्नेहा मेरे औफ़िस में काम करती है. ये सभी अलगअलग कंपनियों में काम करते हैं और सभी मेरे दोस्त हैं.”
“जब तुम्हारी कंपनी में काम नहीं करते तो दोस्त कैसे बन गए, तुम यहां काम करने के लिए रहती हो या दोस्त बनाने के लिए? और ये सब लोग वहां तुम्हारे साथ ऋषिकेश में कैसे आ गए, तुम तो किसी गर्ल्स ग्रुप के साथ गई थीं? जो फ़ोटो तुम ने भेजी थीं उन में से तो कोई चेहरा नहीं दिख रहा यहां?” प्रियांशी के पापा बिना कुछ सोचेविचारे उस के दोस्तों के सामने ही फट पड़े थे.
“पापा, कल या परसों शायद छुट्टी मिल जाएगी. हम इस बारे में घर दिल्ली चल कर बात करेंगे, तो अच्छा रहेगा,” प्रियांशी ने निर्विकार भाव से अपने मम्मीपापा की तरफ़ देखते हुए कहा.
तीसरे दिन हौस्पिटल से छुट्टी मिली तो प्रियांशी के दोस्तों ने ही हौस्पिटल की सारी औपचारिकताएं पूरी कीं. चूंकि ऋषिकेश से दिल्ली लगभग 250 किलोमीटर ही दूर था, सो, ट्रैवल एजेंसी की एक ऐसी गाड़ी से जिस में प्रियांशी लेट कर आ सके कर के उस के दोस्त उसे और पापामम्मी को दिल्ली उस के फ्लैट पर ले कर आए. यों तो उस का फ्लैट सर्वसुविधायुक्त था परंतु पिछले 10 दिनों से बंद होने के कारण भोजन वगैरह की व्यवस्था नहीं थी. सो, उस के दोस्त खानेपीने से ले कर सोने तक की सारी व्यवस्था कर के ही घर गए ताकि प्रियांशी और उस के मम्मीपापा को किसी भी प्रकार की परेशानी न हो. जब सब कुछ सैटल हो गया तो वे सभी अपनेअपने घर चले गए.
जैसे ही वे गए, प्रियांशी के पापा एकदम से बरस पड़े, “तुम्हें दोस्त बनाने के लिए बस एक लड़की ही मिली, ये इतने सारे लड़के तुम्हारे दोस्त हैं. इतनी बार तुम से कहा है कि आजकल के लड़के केवल मौजमस्ती में भरोसा रखते हैं. इन से हमेशा थोड़ी दूरी ही बना कर रखनी चाहिए. आजकल जमाना कितना ख़राब है, जानते हुए भी तुम ने इतने लड़कों से दोस्ती कर रखी है. तुम ने तो किसी गर्ल्स ग्रुप के साथ जाने की बात कही थी, फिर ये 4 लड़के कहां से आ गए तुम्हारे पास ऋषिकेश में?”
“क्यों आसमान सिर पर उठा रखा है. बेचारी अभीअभी हौस्पिटल आई है. जाइए आप दूसरे कमरे में जा कर टीवी देखिए. जो भी बात करनी है, कल कीजिएगा.” प्रियांशी की मम्मी ने आकर किसी तरह पापा को वहां से हटाया और प्रियांशी को दवा दे कर सोने को कहा. प्रियांशी ने आंखें बंद कीं तो उसे पिछले 4-5 दिन याद आ गए कैसे उस के दोस्तों ने उस के लिए अपनी ट्रिप को अधूरा छोड़ कर उस का ध्यान रखा था और उस के मम्मीपापा उन्हीं दोस्तों को तब से ही न जाने कितना कोस चुके थे. वह मन ही मन सोचने लगी कि क्यों इतना बुरा कहते हैं लोग इस नई पीढ़ी को, जबकि आजकल की यह जेनजी मदद करने से ले कर दोस्ती तक में सारी हदें पार कर देती है. पापामम्मी को तो अभी काफ़ीकुछ पता नहीं है. जब पता चलेगा तब न जाने उस से रिश्ता ही न तोड़ लें. खैर, देखूंगी सुबह जो होगा, फ़िलहाल तो सो जाती हूं.
सुबहसुबह उस का दोस्त सौरभ ढोकला, पोहा और जलेबी का रेडीमेड नाश्ता ले कर आ गया. जैसे ही घर में घुसा, प्रियांशी को देखते ही बोला, “तुम बताती थीं न कि इंदौर के लोगों को पोहा-जलेबी बहुत पसंद आता है और यहां दिल्ली में पोहा मिलना पहाड़ चढ़ने जैसा होता है पर फिर भी मैं खोज कर ले ही आया.”
“सौरभ, तुम करोगे नाश्ता?” प्रियांशी ने उस से पूछा.
“नहीं, मैं बस तुमसे मिलने और अंकलआंटी के लिए नाश्ता लाया था. अब औफ़िस के लिए निकलूंगा. कोई जरूरत हो तो बताना.”
“हांहां बिलकुल, तुम निकलो,” कह कर प्रियांशी ने उसे विदा किया क्योंकि मम्मीपापा के चेहरे के भावों से वह समझ चुकी थी कि अब कोई बहुत बड़ा तूफ़ान आने वाला है. सौरभ के सामने कोई तमाशा न हो, इसलिए उस ने जल्दी से सौरभ को विदा कर दिया.
जैसे ही सौरभ बाहर गया, प्रियांशी के पापा अपने वास्तविक रूप में आ चुके थे, “क्या है ये सब? यह लड़का तो तुम्हारे इतने नजदीक है कि हम भी नहीं हैं. तुम से कितनी बार कहा है कि जमाना खराब है, इन लड़कों से दूर रहा करो. पर तुम यहां ये सब कर रही हो, हमें नहीं पता था.” इस बार मम्मी भी पापा का साथ दे रही थीं.
“क्या जमाना खराब है, जमाना खराब है लगाए रहते हो आप लोग. यह जो इतना 2 दिनों से मेरे दोस्तों को कोस रहे हो, ये दोस्त ही हैं जिन्होंने मुझे कभी अपने से हीन महसूस नहीं कराया जितना आप लोगों ने इन 30 सालों में मुझे कराया है. कभी सोचा है आप लोगों ने कि मैं कभी घर आने के बजाय यहां अपने इन दोस्तों के साथ ही रहना क्यों पसंद करती हूं?” अब प्रियांशी के लिए भी चुप रहना मानो असंभव हो गया था.
“ऐसा क्या अत्याचार करते हैं हम तुम पर जो तुम हमें इतना दोष दे रही हो?” इस बार मम्मी ने आवाज उठाई थी.
“अत्याचार ही है, मां. मूक अत्याचार, जिसे आप लोग बचपन से मेरे साथ करते आए हैं. शायद आप लोगों ने तो कभी महसूस भी नहीं किया होगा कि जबजब आप लोग मुझ से छोटी राशि से मेरी तुलना करते थे तो मेरे ऊपर क्या बीतती थी. इसलिए जैसे ही मैं ने बीए करने के बाद आईआईएमसी का एग्जाम क्लीयर किया तो दिल्ली आने में जरा भी देर नहीं की क्योंकि मुझे उस घर में हमेशा घुटन होती थी.”
“कैसी बातें करती है तू, हमारे लिए तुम दोनों एकसमान हो. हम ने कभी भेदभाव नहीं किया.”
“एकसमान हैं पर सिर्फ़ कहने के लिए. आप को तो शायद याद भी नहीं होगा जब राशि हुई थी तो आप के सहित जितनी महिलाएं वहां थीं, सब ने एक ही बात कही थी, ‘चलो, इस का रंग तो साफ़ है, बड़ी वाली तो इन के घर में किसी पर ही नहीं गई, नैननक्श तो ठीक हैं पर शायद रंग में अपनी मौसी पर चली गई क्योंकि मेरा रंग गोरा नहीं तो क्या सांवला भी नहीं था. मुझे आज भी वह दर्द याद है. मैं ही नहीं, आप से 3 साल बड़ी बिल्लो मौसी भी हमेशा अपने काले रंग को ले कर लोगों के कटाक्ष सुनती रही हैं. कई बार तो आप ही बिल्लो मौसी को अपने गोरे रंग का गुमान दिखाती थीं.”
“क्या बकवास कर रही है तू. अपने उलटेसीधे कामों को ढकने के लिए तू बहकीबहकी बातें कर रही है. जो हम पूछ रहे हैं उस का जबाब देने की जगह हम पर ही आरोप लगा रही है.”
“आरोप आप पर ही नहीं, पूरी सोसाइटी पर है, मांपापा. न जाने क्यों कालेगोरे में उलझे रहते हैं इस संसार के लोग. क्या कालागोरा होना हमारे अपने हाथ में होता है? मुझे अभी याद है आप रोज़ मुझे कच्चा दूध लगाती थी ताकि मेरा रंग भी राशि जैसा गोरा हो जाए. जो घर में आता था वह आप को एक नुस्खा बता कर चला जाता था और आप ने क्याक्या नहीं ट्राय किया मेरे ऊपर पपीता, दही, मलाई, बेसन, एलोवेरा और भी न जाने क्या क्या?
“आप को कौन समझाए कि कालागोरा रंग सिर्फ़ एक भ्रम है. पर आज मैं आप को बताती हूं कि जबजब आप ने मेरे ऊपर अपने प्रयोग किए हैं, हर दिन मैं ने ख़ुद को कोसा है कि मैं इस संसार में आई ही क्यों? शायद आप लोगों को पता ही नहीं है कि इंसान का काला और गोरा रंग उस की स्किन में मौजूद मेलानिन नाम के एक तत्त्व के कारण होता है. जिस इंसान की स्किन में मेलानिन की मात्रा ज़्यादा होती है उस का रंग उतना ही अधिक काला होता है.
“जब भी कोई घर में आता था, हमेशा कहता था, “ये आप की बड़ी बेटी आप के घर की ही नहीं लगती और दादी जब मुझे अपने खानदान का काला टीका बताती थीं तब भी आप दोनों मुंह सिल कर बैठे रहते थे. आप दोनों ने कभी उन का विरोध नहीं किया बल्कि एक बार तो मम्मी ने मुझे अपने साथ अपनी किटी पार्टी में ले जाने तक को मना कर दिया था. मैं रोती रह गई थी और आप राशि को ले कर चली गई थीं.”
“ये सब बकवास है. फालतू की बातें कर के हमारा दिमाग़ ख़राब मत करो, तुम,” पापा ने गरजते हुए कहा.
“क्यों आ गए आप लोग, मैं ने तो नहीं कहा था आप लोगों को यहां आने के लिए. आज से 5 साल पहले तक तो आप ने कभी यहां आने की ज़रूरत नहीं समझी. 5 साल तो मुझे जौब करते ही हो गए, उस से पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी से कालेज करने के बाद मैं ने आईआईएमसी में डिप्लोमा किया तब भी आप लोग नहीं आए. मैं क्या कर रही हूं, कैसे रह रही हूं. कभी आप ने जानने की कोशिश की? चले जाइए आप लोग. मैं जैसी भी हूं, ख़ुश हूं. मैं अपना ध्यान ख़ुद रख सकती हूं.”
“हमें भी यहां रहने का कोई शौक नहीं है. तुम तो गर्ल्स ग्रुप के साथ गई थीं, हम से झूठ क्यों बोला?”
“हां, मैं ने आप लोगों से झूठ बोला था क्योंकि यह सच आप पचा न पाते कि मैं 4 लड़कों के साथ गई हूं. आप लोगों का फालतू का दंगा कौन झेलेगा. कभी आप लोगों ने ख़ुद भी सोचने की कोशिश की है कि मैं ने आप लोगों से झूठ क्यों बोला? क्यों आप को सच नहीं बता पाई मैं? आप ही क्या, मैं इस संसार के हर युवा के मातापिता से पूछना चाहती हूं कि क्यों वे अपनी ही संतान पर भरोसा नहीं करते? क्यों नहीं अपने और उन के बीच दोस्ताना रिलेशन रखते ताकि वे अपने मन की हर बात उन्हें बता पाएं और आप लोग तो मेरी जिंदगी में कहीं हो ही नहीं जो मैं आप को सच बताऊं.”
“तुम्हें शर्म नहीं आई हम से झूठ बोलते हुए, आख़िर, तुम्हारे मातापिता हैं हम?”
“मैं तो अब पछता रही हूं क्यों उस दिन मैं ने आप लोगों को बता दिया कि मैं अपने दोस्तों के साथ घूमने जा रही हूं. कम से कम मेरे दोस्तों को आप लोगों के इस रूखे व्यवहार का सामना न करना पड़ता. आप ही बताओ यहां दिल्ली में क्या मैं केवल लड़कियों के साथ ही दोस्ती करूंगी. ये पांचों मेरे दोस्त हैं और हमेशा रहेंगे. मेरी हर मुसीबत में ये मेरे साथ होते हैं. मेरे लिए आसमान के तारे तक तोड़ लाने का साहस रखते हैं ये लोग. और आप लोग कान खोल कर सुन लीजिए कि मैं इन के ख़िलाफ़ अब एक शब्द भी नहीं सुनना चाहती.”
“ठीक है तो हम लोग चले जाते हैं, तुम्हारी देखभाल के लिए यहां तुम्हारे आवारा दोस्तों की मंडली है ही,” पापा ने कड़कती आवाज में कहा.
“जैसी आप की मरजी. मैं ने तो आप को बुलाया नहीं था. वह तो मेरे दोस्तों ने आप को फोन कर दिया. मैं ने तो पिछले 6 सालों में कभी आप को अपनी तकलीफ़ों के बारे में नहीं बताया, आज क्या बताऊंगी,” कह कर प्रियांशी ने अपने ऊपर चादर तान ली और सोने की कोशिश करने लगी.
“ठीक है जब इसे ही हमारी ज़रूरत नहीं है तो यहां रुक कर क्या करेंगे,” कह कर गुस्से से प्रियांशी के पिता अपना बैग उठा कर जाने लगे. उन के पीछेपीछे मम्मी भी भागीं, “अरे, रुकिए तो हमारी बेटी है वह, ऐसी हालत में उसे छोड़ कर नहीं जा सकते हम.”
जब तक पापा उन की आवाज़ सुन पाते तब तक प्रियांशी की मम्मी लिफ्ट के पास अचानक से बेहोश हो कर गिर पड़ीं. बदहवास से पापा ने भाग कर उन्हें उठाया और प्रियांशी को आवाज लगाई. उसी फ्लोर पर रहने वाले कुछ लोगों ने जल्दी से मम्मी को प्रियांशी के फ्लैट में ले जा कर लिटाया. प्रियांशी ने फटाफट उसी सोसाइटी में रहने वाले अपने दोस्त निरंजन को फ़ोन लगाया. जब तक निरंजन एंबुलैंस से मम्मी को हौस्पिटल ले कर पहुंचा तब तक प्रियांशी के सभी चारों दोस्त हौस्पिटल पहुंच चुके थे.
मम्मी को अटैक आया था. पापा को दिल्ली में कुछ भी पता नहीं था. प्रियांशी तो औलरेडी बेड पर ही थी. इस बीच, प्रियांशी के पांचों दोस्तों ने ही हौस्पिटल और घर दोनों जगह की बागडोर संभाल रखी थी. 10 दिनों के इलाज के बाद उस की मम्मी को घर लाया गया. जब मम्मी को घर में छोड़ कर उस के दोस्त जाने लगे तो प्रियांशी बोली, “मैं तुम लोगों का एहसान कभी नहीं भूलूंगी और सच कहूं तो भूलना भी नहीं चाहती और चूंकि दोस्ती के रिश्ते में थैंक यू की कोई जगह नहीं होती इसलिए थैंक यू भी नहीं बोलूंगी.”
“पिटना है क्या हमारे हाथों, दोस्ती का मतलब केवल मौजमस्ती करना नहीं ब्रो. किसी भी स्थिति में अपने दोस्त का साथ देना ही सच्ची दोस्ती होती है और तू तो हमारे ग्रुप की जान है. कोई भी जरूरत हो तो बताना. अब हम लोग चलते हैं,” कह कर वे चले गए.
उन के जाते ही प्रियांशी ने अपने पापा की तरफ़ देखा और बोली, “देखा आप ने, ये लोग किसी तरह का रंगभेद नहीं रखते बल्कि इन में से निरंजन और सौरभ तो मेरी ही तरह काले रंग के हैं. हमें कभी इन के बीच में रह कर अपने रंग के बारे में आभास तक नहीं होता. और आप के तथाकथित नातेरिश्तेदार मुझे हमेशा मेरे काले होने का एहसास कराते रहते हैं.
पापा अब तक चुप थे, फिर धीरे से अपनी आवाज में कुछ मिश्री सी घोलते हुए बोले, “एक सप्ताह बाद मम्मी को ले कर मैं वापस इंदौर जाऊंगा, तू भी चलना हमारे साथ.”
“नहीं पापा, मेरे जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता. औलरेडी मेरी छुट्टियां ख़त्म हो चुकी हैं. कुछ दिनों घर से ही काम कर के वापस जौइन करूंगी. मुझे वैसे भी उस घर में घुटन होती है. अब तो इन दोस्तों के साथ ही रहने की आदत हो गई है.”
“बेटा, हम चाहते हैं कि अब तू शादी कर के सैटल हो जा. फिर आराम से जैसे चाहे रह. कुछ लड़के हम ने देख रखे हैं, तू देख ले तो फाइनल कर देते हैं,” इस बार मम्मी धीरे से बोलीं.
“मेरे लिए कोई लड़कावडका देखने की जरूरत नहीं है. और यह क्या सोच है आप लोगों की कि शादी करने पर ही लड़की सैटल होती है. 5 सालों से इतनी अच्छी कंपनी में जौब कर रही हूं, वह सैटल होना नहीं है क्या?” कुछ तैश से वह बोली.
“हमारे समाज में विवाह होने को सैटल होना कहते हैं. तेरी शादी हो जाए, फिर राशि की भी कर देंगे,” पापा बोले.
“राशि की आप को जहां करनी है, कर दो लेकिन मैं अपनी पसंद से करूंगी. मैं सौरभ के साथ लिवइन रिलेशनशिप में हूं और उसी से शादी करूंगी.” इस बार उस ने साहस दिखा ही दिया.
“क्या तमाशा लगा रखा है तुम ने यहां. क्या है यह लिवइन रिलेशनशिप. आवरगर्दी की भी हद होती है. मुझे तो पहले दिन ही दाल में कुछ काला लगा था पर मुझे क्या पता था कि यहां तो पूरी दाल ही काली है. कितने दिनों से चल रहा है यह सब?”
“मैं और सौरभ एकदूसरे से प्यार करते हैं और 2 साल से एकसाथ रह भी रहे हैं. एकदूसरे को बहुत अच्छी तरह समझते भी हैं. उस के मम्मीपापा कानपुर में रहते हैं और जाति से वह सोनी है. मैं उस के घर 3 बार जा भी चुकी हूं. मैं उन लोगों को पसंद हूं और उन्हें मेरे काले रंग से भी कोई आपत्ति नहीं है,” प्रियांशी ने कहा.
“ओह, यह सब देखने से पहले मुझे मौत क्यों नहीं आ गई. जाति भी ओबीसी, रंग भी कोयले जैसा स्याह और ऊपर से लिवइन रिलेशनशिप. एक शाकाहारी ब्राह्मण के घर में पिछड़े वर्ग का दामाद. यह तो नहीं हो सकता. हम इस रिश्ते को मंज़ूरी नहीं दे सकते. हमारी तो आज तक की कमाई इज्जत में ही बट्टा लग जाएगा. राशि की शादी होना मुश्किल होगी सो अलग. तो हमें आज तक कभी क्यों नहीं बताया अपनी इस काली करतूत के बारे में.” पापा और मम्मी दोनों ही अपने असली स्वरूप में आ चुके थे.
“आप लोगों की इसी काली सोच, जिस में काला, गोरा और समाज के अलावा कुछ और है ही नहीं, के कारण नहीं बताया. अगर मैं बताती तो क्या आप लोग ख़ुशीख़ुशी हमारी शादी कर देते. जिस समाज की आप बात कर रहे हैं वह तब कहां गया था जब 8 साल पहले दादी बीमार पड़ी थीं और उन के इलाज के लिए आप को मम्मी के गहने बेचने पड़े थे जो शायद आज तक भी आप उन्हें बनवा कर नहीं दे पाए. तब यह समाज क्यों नहीं आया था आप की मदद करने. खैर, मेरा निर्णय अडिग है. मैं अगले महीने सौरभ से शादी करूंगी. आप लोग शामिल होंगे तो शायद मुझे अच्छा लगेगा,” कह कर प्रियांशी अपने कमरे में चली गई और पापामम्मी एकदूसरे को देखते रह गए.
प्रियांशी की आंखें तो नम थीं परंतु आंसू मानो इतने बरसों में जमाने के ताने सुनसुन कर सूख गए थे. वह अपलक खिड़की से अस्त होते सूरज को देख रही थी कि तभी सौरभ का फ़ोन आ गया-
“हैलो मेरी ब्रेवो डार्लिंग, क्या हाल है, एवरीथिंग इज फाइन?”
“यस, औल इज वैल.”
“अरे, इतने सड़े से स्वर में क्यों साउंड कर रही हो. क्या हुआ?”
सौरभ से इमोशनल सपोर्ट मिलते ही प्रियांशी की रुलाई निकल गई और बिलखते हुए उस ने सारी दास्तान सौरभ को कह सुनाई.
“नो प्रौब्लम, परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है. आज रात को मेरे पेरैंट्स भी आ रहे हैं. कल मैं उन्हें ले कर तुम्हारे पेरैंट्स के पास आता हूं. मेरे पेरैंट्स के बारे में तो तुम्हें पता ही है, वे बहुत सुलझे हुए और मेरे बहुत अच्छे फ्रैंड्स भी हैं. दे विल सौल्व इट. अभी तू चैन की नींद ले. सुबह मिलते हैं.”
अगले दिन सुबह नाश्ते के बाद जब प्रियांशी के पेरैंट्स इंदौर जाने की तैयारी कर रहे थे तभी डोरबेल बजी. प्रियांशी की मम्मी ने जैसे ही दरवाज़ा खोला, सामने सौरभ अपने पेरैंट्स के साथ था. प्रियांशी के मातापिता तो मुंह फुला कर बैठे थे, सो, औपचारिक बातचीत के बाद सौरभ की मम्मी ने बातचीत का सिरा संभाला और बोलीं, “आप लोग अगर रज़ामंदी दें तो मैं प्रियांशी को अपने घर की बहू बनाना चाहूंगी.”
“हमारी रजामंदी की क्या जरूरत है. वह अपने फ़ैसले ख़ुद ले सकती है. हम लोग आज शाम को वैसे भी इंदौर के लिए निकल रहे हैं,” प्रियांशी के पापा ने कुछ नाराजगी से कहा.
“अंकल, मैं जानता हूं कि प्रियांशी के इस फैसले से आप खुश नहीं हैं, कारण भी मुझे पता है पर मुझे उस से भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. मैं प्रियांशी की काबिलीयत का कायल हूं. आप को पता है वह अपने डिपार्टमैंट की जान है. कितनी ही बार उसे दूसरी कंपनियों के औफर आए पर इस की कंपनी ने इसे जाने नहीं दिया. आप के लिए जाति और रंग दोनों बहुत मायने रखते हैं पर मेरे कहने से आप थोड़ा सा लिबरल हो जाइए तो हम दोनों को अच्छा लगेगा,” विनम्रता से अपनी बात को रखते हुए सौरभ ने कहा.
“भाईसाहब, शादी तो होगी ही, दोनों मैच्योर हैं, कमाते हैं. तो फिर क्यों न आप भी अपना आशीर्वाद इन्हें दे दीजिए क्योंकि हर युवा अपने जीवन के इस मोड़ पर अपने मातापिता का साथ चाहता है. अरे शर्मा जी, जब ख़ून का रंग काला, गोरा और जाति नहीं देखता तो हम होते कौन हैं इन में भेद करने वाले. ये आज के युवा बच्चे हम से कहीं ज़्यादा समझदार और तार्किक हैं. सो, आइए जी, जमाना बदल गया है, हमआप भी बच्चों की ख़ुशी में शामिल होते हैं ताकि ये लोग अपने इस नए जीवन की शुरुआत हंसीख़ुशी कर सकें,” कहते हुए सौरभ के पिता ने प्रियांशी के पिता को गले लगा लिया.
बेमन से ही सही पर इस बार प्रियांशी के मातापिता ने इस रिश्ते को मूक सहमति दे दी थी. सौरभ ने धीरे से प्रियांशी को आंख मार कर मानो कहा कि नाउ औल इज वैल. Hindi Stories





