The India Story Review: फिल्म का विषय बड़ा है मगर जिस ढंग से पेश किया गया है वह बहुत कमजोर है. मामला खेतों में पड़ने वाले जहरीले पेस्टीसाइड्स और उस से होने वाली समस्याओं से जुड़ा है. मगर यह कोर्टरूम ड्रामा फिल्म बहुत खराब डायरैक्शन और क्लियर विजन की कमी व कमजोर लेखन के चलते ढेर हो जाती है.
फिल्म की कहानी पुणे के रहने वाले पूर्व फौजी योगेश पाटिल (श्रेयस तलपड़े) के इर्दगिर्द घूमती है. योगेश की 7 साल की मासूम बेटी परी (त्रिषा शारदा) की कैंसर से मौत हो जाती है. योगेश का दावा है कि उस की बेटी किसी बीमारी से नहीं मरी, बल्कि उस की हत्या कि गई है. वह पुलिस स्टेशन जा कर रिपोर्ट लिखाना चाहता है कि सब्जियों, फलों और दूध में मिलाए जाने वाले हानिकारक पेस्टीसाइड्स की वजह से उस की बच्ची को कैंसर हुआ. पुलिस उसे भगा देती है और शहर का कोई भी वकील उस का केस लड़ने को तैयार नहीं होता.
आखिरकार, अर्चना (काजल अग्रवाल) नाम की एक नईनवेली वकील उस का केस हाथ में लेती है. बौम्बे हाईकोर्ट में यह बहस शुरू होती है. अर्चना अदालत में सीधे तौर पर किसानों, कीटनाशक बनाने वाली बड़ी कंपनियों और सरकार को इस मौत का जिम्मेदार ठहरा देती है. इस के बाद पूरे देश में बवाल मच जाता है. किसान खुद को हत्यारा कहे जाने पर भड़क जाते हैं. मामला कोर्ट में चलता है और अंत में कोर्ट फैसला सुनाता है कि घातक पेस्टीसाइड्स वाली कंपनियों पर नकेल कसी जाए.
निर्देशक चेतन डी के और लेखक सागर शिंदे ने यह पूरी फिल्म किसी वैबसाइट में छपे लेख जैसी बना दी है. फिल्म में न तो कोई कसाव है और न ही कोर्टरूम का वह माहौल जो दर्शक को बांध कर रखे. थ्रिल तो बिलकुल भी नहीं. इतनी सतही पटकथा है जैसे लगता है याचिका डालने वाला कोई नई जानकारी लाया हो और कोर्ट, नेता, प्रशासन की आंखें खोल दी हों.
फिल्म में विपक्षी वकील वर्धन अग्निहोत्री (मनीष वाधवा) सिर्फ बातें बनाता नजर आता है. वह अपनी तरफ से कोई गवाह या ठोस सुबूत तक पेश नहीं करता. इतनी बड़ीबड़ी कौर्पोरेट कंपनियां, जो अरबों का कारोबार करती हैं, अदालत में अपना बचाव करने के बजाय मीटिंगरूम में बैठ कर, बस, अपना रोना रोती दिखाई गई हैं.
फिल्म का स्क्रीनप्ले इतना बिखरा हुआ है कि समझ ही नहीं आता कि डायरैक्टर क्या बनाना चाहता था. फर्स्ट हाफ पूरी तरह से कोर्ट की बेतुकी बहसों में निकल जाता है. वहीं सैकंड हाफ में मुद्दा गायब हो जाता है और पूरी फिल्म अस्पताल के रुलाने वाले सीन्स और फ्लैशबैक में चली जाती है. बच्ची के कैंसर से पीड़ित होने वाले दृश्य इतने लंबे और भारी हैं कि दर्शक इमोशनली जुड़ने के बजाय फंसे हुए महसूस करते हैं.
हैरानी यह कि सीन्स के बीच में लगे कट्स इतने खराब हैं कि लगता है सैंसर बोर्ड की कैंची चलने के बाद मेकर्स ने इसे ठीक से जोड़ा भी नहीं. संगीत के नाम पर मंगेश धाकड़े का काम बेहद साधारण है. एक भी गाना याद रखने लायक नहीं.
इस पूरी फिल्म में श्रेयस तलपड़े ही इकलौते ऐसे ऐक्टर लगते हैं जिस ने ईमानदारी से काम किया है. पहले हाफ में उस का रोल कम है, लेकिन सैकंड हाफ में एक बेबस और रोते हुए पिता के रूप में वह छाप छोड़ता है. उस का क्लाइमैक्स वाला एकांकी भाषण थोड़ा असरदार है. दूसरी तरफ, वकील बनी काजल अग्रवाल अपनी भूमिका में फिट नहीं बैठी. न तो उस के चेहरे पर किसी वकील वाली गंभीरता दिखती है और न ही उस की डायलौग डिलीवरी में धार है.
हां, छोटी बच्ची त्रिषा शारदा ने अपनी मासूमियत से ध्यान खींचा है. सीधा कहें तो इस भारीभरकम फिल्म को निर्देशक अपने हाथ में लेता तो है मगर कमजोर रिसर्च, बचकाने कोर्टरूम सीन्स और ढीले निर्देशन की वजह से यह फ्लौप साबित होती है. फिल्म कोई समाधान देने या सही तरीके से सवाल उठाने में नाकाम रहती है.





