Hindi Stories: शशि ने जब पायल से उस के विवाह की बात फिर छेड़ी तो उस ने कहा, ‘‘इस उम्र में विवाह? क्यों मजाक करती हो, लोग क्या कहेंगे?’’ शशि ने पहले भी कई बार पायल से विवाह की चर्चा की थी. आज फिर कहा, ‘‘अपने बारे में सोचो, आधा जीवन अकेले काट लिया. तुम्हारी परेशानी, अकेलेपन में कोई आया तुम्हारा हाल पूछने? और लोगों का क्या है, वे तो कुछ न कुछ कहते ही हैं. शादी नहीं हुई तब भी और हो जाएगी तब भी. कहने दो जिस को जो कहना है.’’

शशि अपने घर चली गई. दोनों अच्छी सहेलियां बन गई थीं. एक ही कालोनी में रहती थीं. शशि विवाहित और 2 बच्चों की मां थी, जबकि 45 वर्ष से ज्यादा की उम्र में भी पायल कुंआरी थी. शशि के जाने के बाद पायल ने खुद को आईने में देखा. ठीक उसी तरह जैसे वह 20 साल की उम्र में खुद को आईने में निहारा करती थी. बालों को कईकई बार संवारा करती थी.

इधर कुछ सालों से तो वह आईने को मात्र बालों में कंघी करने के लिए ?ाटपट देख लिया करती थी. पिछले कई वर्षों से उस ने खुद को आईने में इस तरह देखा ही नहीं. शशि शादी की बात कर के गई तो पायल ने खुद को आईने में एक बार निहारना चाहा. आधे पके हुए बाल, चेहरे का खोया हुआ जादू, आंखों के नीचे काले गड्ढे. खुद को संवारना भूल गई थी पायल. आज फिर संवरने का खयाल आया और आईने में ?ांकते हुए वह अपने अतीत में खो गई.

जब वह 20 साल की थी तब पिता की असमय मृत्यु हो गई थी. जवान होती लड़कियों की तरह वह भी खुद को आईने में निहारती रहती थी. मां को पैंशन मिलने लगी. लेकिन किराए के मकान में 2 बेटियों और एक बेटे के साथ मां को घर चलाने में समस्या होने लगी. 2 लड़कियों की शादी और बेटे को पढ़ालिखा कर रोजगार लायक बनाना मां के लिए कठिन प्रतीत हो रहा था. पायल कालेज में थी और 5 साल छोटा भाई अनुज अभी स्कूल में था.

पिता की मृत्यु के बाद पायल ने नौकरी के लिए तैयारी करनी शुरू कर दी. वह घर के हालात सम?ाती थी और मां का हाथ भी बंटाना चाहती थी. कुछ दिनों बाद नौकरी लग गई. वह एक सरकारी विभाग में क्लर्क बन गई. पायल को सम?ा ही नहीं आया कि नौकरी उस के लिए वरदान थी या अभिशाप. मां ने भाईबहन की जिम्मेदारी उसे ही सौंप दी. पायल ने सहर्ष स्वीकार भी कर ली. पायल के लिए रिश्ते आते तो मां किसी न किसी बहाने मना कर देती.

वह मन ही मन सोचती, पहले छोटी की शादी हो जाए और बेटा अपने पैरों पर खड़ा हो जाए. उस के बाद पायल की शादी के बारे में सोचूंगी. पायल की कमाई घर आने लगी तो भाईबहन के शौक बढ़ गए. मां भी दिल खोल कर खर्च करती. पायल ने भी भाईबहन और मां की इच्छाओं को हमेशा पूरा किया. 20 बरस की पायल की जवानी शुरू होते ही खत्म सी हो गई.

अब उसे एक ही सबक मां बारबार सिखाती, ‘अभी तुम्हें अपने लिए नहीं, अपने भाईबहन के लिए जीना है.’ सच, जरूरतें व्यक्ति को स्वार्थी बना देती हैं. पायल को औफिस में देर हो जाती या औफिस से कोई घर छोड़ने आता तो मां उस से पचासों सवाल करती. पायल क्या बात कर रही है, मां की नजरें और कान इसी पर लगे रहते.

वह ओवरटाइम करने की बात बताती तो मां कहती, ‘यह ठीक है. लेकिन कोई प्यार की बीमारी मत पाल लेना. तुम कमाऊ लड़की हो. दसों लोग डोरे डालेंगे. लेकिन ध्यान रखना, तुम्हारे ऊपर परिवार की जिम्मेदारी है. फिर भी यदि ऐसा कुछ करना ही चाहो तो कोई क्या कर सकता है? तुम्हारी खुशी में हमारी खुशी. हम अपना देख लेंगे.’

वाह री जननी, चित भी मेरी पट भी मेरी वाला तेरा हिसाब. मां पूरी तरह पूजापाठी थी, लड़कियों को पराया धन मानती थी लेकिन अब जरूरत पड़ने लगी तो पराया धन वाला हिस्सा गायब हो गया. पायल की कमाई का एक बड़ा हिस्सा पूजापाठ में लग गया कि छोटी बहन की शादी अच्छे घर में हो जाए, भाई की पढ़ाई में कोई खर्च कम न रह जाए.

समयसमय पर मां की आंखों में घडि़याली आंसू भर आते और पायल को कई प्रकार से मां कोे सम?ाते हुए कसम खानी पड़ती कि जब तक भाईबहन की नैया किनारे नहीं लगा देती, तब तक ऐसा कुछ नहीं होगा. अपने बारे में सोचेगी भी नहीं.

भाईबहन कभी दोस्तों के साथ रैस्टोरैंट जाने की बात करते या ब्रैंडेड कपड़े लेने की बात करते तो पायल से ही पैसों की मांग करते. एक दिन मां भी सामने ही थी तो पायल कह बैठी, ‘मां, अनुज आज फिर दोस्तों के साथ जाने के लिए पैसे मांग रहा है. मैं ने अभी परसों ही रुचि को ड्रैस के लिए पैसे दिए थे. इस बार तुम पापा की पैंशन से इस को पैसे दे दो न.’

‘थोड़ी सी तो पैंशन मिलती है मुझे. उसे भी अगर निकाल लाऊंगी बैंक से तो तेरे छोटे भाईबहन की शादी और पढ़ाई का क्या होगा और मेरे बुढ़ापे का? वह अभी तेरी तरह कमाऊ तो नहीं हैं.’ सवाल तो यह बहुत बड़ा था, सो, पायल चुप हो गई.

पायल जब 30 वर्ष की हुई तब छोटी बहन रुचि की शादी हुई. रिश्ते बहुत आए लेकिन रुचि को पसंद ही नहीं आए. रुचि के अपने सपने थे. उस के सपनों का राजकुमार ढूंढ़ने में 5 साल लग गए. पायल जब उसे सम?ाती कि हम बहुत बड़े लोग नहीं हैं. इतने बड़े सपने मत पालो. अपने बराबर वालों में से किसी को पसंद कर लो. पायल की बात पर मां उलाहना देते हुए कहती, ‘समय लग रहा है तो लगे. रुचि को लड़का पसंद भी तो आना चाहिए. मन मार कर शादी करने का क्या अर्थ है. तुम्हें रुचि की शादी की इतनी जल्दी क्यों है?’

पायल को चुप होना पड़ता. खातेपीते घर के इंजीनियर से शादी तय हुई तो उस के मुताबिक खर्च भी करना पड़ा. पायल को अपने पीएफ से पैसे निकालने के अलावा विभागीय लोन भी लेना पड़ा. इस के सिवा कोई चारा ही नहीं था. विवाह में अच्छाखासा पैसा खर्च हुआ. इस वजह से उसे 5 साल तक अपने वेतन से लोन चुकाना पड़ा. शादी के समय रुचि और उस का पति दीदीदीदी करते उस के आगे चारों ओर घूमते लेकिन पायल को एहसास था कि आगे क्या होने वाला है. इतने सालों में वह दोगलेपन को ?ोलने की आदी हो गई थी पर कर कुछ नहीं पा रही थी.

पायल के लिए कभीकभी आने वाले रिश्तों को भी यह कह कर अस्वीकृत कर दिया जाता कि बस, भाई अपने पैर पर खड़ा हो जाए. फिर मांबेटे मिल कर पायल के हाथ पीले करेंगे. पायल ने आईना देखना छोड़ दिया. किस के लिए संवरना था उसे. कोई पसंद कर लेता या पसंद आ जाता तो यह भी तो एक बहुत बड़ी मुसीबत होती. इस मुसीबत से खुद को बचाने का तरीका था कि वह सरलसपाट सी रहती. बस, ?ाट से कंघी कर के पीछे चोटी कर लेती. खुद को जीभर कर देखना ही भूल गई पायल.

छोटा भाई अनुज बीटैक कर रहा था. पढ़ाई में होने वाला खर्च पायल को ही प्रतिमाह भेजना था. शुरू में तो अनुज फोन पर अकसर कहा करता था पायल से, ‘दीदी, एक बार मुझे नौकरी मिल गई तो फिर आप की शादी धूमधाम से करूंगा. पायल खुशी के मारे लजा जाती लेकिन नौकरी मिलते ही वह अपनेआप में रम गया.

मां की इच्छा थी कि एक बार बहू का मुंह देख लूं तो सम?ा गंगा नहा लिया. फिर कोई परवा नहीं. पायल के विषय में नहीं सोचा मां ने. पायल को दुख तो हुआ लेकिन मां की बातों के कई कड़वे घूंटों की तरह वह इसे भी पी गई. अनुज के लिए शादी के प्रस्ताव आने लगे थे. मां के अपने तौरतरीके थे लड़की पसंद करने के. दहेज, सुंदर लड़की और इतने ताम?ाम से निबटने के बाद मां किसी लड़की को शादी के लिए पसंद करती तो अनुज के नखरे शुरू हो जाते.

उम्र घोड़े की रेस की तरह बढ़ रही थी. पायल 40 साल की हो गई. अपनी शादी के बारे में उस ने न जाने कब से सोचना बंद कर दिया. अनुज की शादी हुई तो अपनी पत्नी को ले कर वह मुंबई चला गया. अब मां उम्रजनित बीमारियों के कारण सुस्त रहने लगी थी.

दोनों भाईबहन अपने जीवन में मस्त लेकिन पायल की जिम्मेदारियां अभी भी खत्म नहीं हुई थीं. मां के खानेपीने का इंतजाम कर, दिनभर औफिस में रहना और शाम को घर आ कर फिर वही गृहस्थी वाले काम. चाय बनाओ, खाना बनाओ और सारे इंतजाम करो. मां अकसर बीमार रहने लगी तो उस की दवा का प्रबंध करना और कई बार छुट्टी ले कर सारा दिन उस के पास रहना. बीचबीच में अस्पताल ले जाना जैसी जिम्मेदारियां तो थीं ही.

पायल औफिस से लौटी थी तो मां के पास उस की पुरानी सहेली आई थी.

‘‘अरे विमला, तू ने दोनों छोटे बच्चों की शादी कर दी लेकिन अपनी बड़ी बेटी को कुंआरी बैठाया है. देख, दोस्ती अपनी जगह लेकिन इस बात पर मैं बिलकुल भी तेरे साथ नहीं हूं.’’

‘‘क्या करती, उन के जाने के बाद 3 बच्चों को पालना मेरे बस का नहीं था. पायल सब से बड़ी थी. उस ने नौकरी कर के अपने भाईबहन को पाला और उन की शादी की. यह हमारी जरूरत थी.’’

‘‘तेरे ये तर्क किसी काम के नहीं. क्या मां ऐसी होती है?’’ अपने कमरे में घुसतेघुसते पायल ने यह वार्त्तालाप सुन लिया था. पायल के घर पहुंचने की खबर पा कर दोनों सहेलियों के वार्त्तालाप का विषय बदल गया था. मां नहीं जानती थी कि पायल ने उन का वार्त्तालाप सुना था.

अगले दिन शाम को मां पायल से बोली, ‘‘पायल, दोनों भाईबहन की जिम्मेदारी तू ने पूरी कर दी है. मेरी बीमारीपरेशानी तो लगी ही रहेगी. अब तू अपने बारे में सोच. कुंआरा मिल जाए तो अच्छा है नहीं तो दूसरी शादी में कोई लड़का जरूर मिल जाएगा तेरे लिए. तनख्वाह से पैसे बचा कर थोड़े से गहने अपने लिए बना ले.’’

मां की यह बात सुन कर अवाक थी पायल. अभी तो भाई की पढ़ाई का लोन भी अच्छी तरह से नहीं उतरा था. फिर उस की शादी का खर्चा. वह अच्छीखासी नौकरी में था, पत्नी भी नौकरी करती थी लेकिन उस ने एक बार भी दीदी से नहीं कहा कि आप ने मेरे ऊपर इतना खर्च किया है, अब मैं समर्थ हूं तो आप का ऋण लौटाना चाहता हूं. वह तो मां की खबर भी लेना भूल गया था.

मन ही मन ?ां?ालाई तो थी लेकिन शांत स्वभाव से बोली, ‘‘मां, सोना डेढ़ लाख रुपए प्रति 10 ग्राम के करीब पहुंच गया है. कहां से बनाऊं गहने? अनुज की पढ़ाई का लोन अभी चुका ही रही हूं. तुम्हारी दवाओं का भी काफी खर्च आता है. प्रमोशन मैं ले न सकी क्योंकि शहर बदल कर तुम लोगों से दूर जाना पड़ता. अब मेरी शादी की बात न करो, बेहतर यही है.’’

उसे समझ में नहीं आ रहा था कि मां बेवजह दिल पर चोट क्यों करती रहती है. जब शादी की उम्र थी तो साफ कह दिया था कि अभी अपने बारे में नहीं सोचना है और अब जब एस्ट्रोजन, टेस्टोस्टेरौन और प्रोजेस्टेरौन जैसे तत्त्व शरीर में बनने बंद हो गए हैं तो इन्हें मेरी शादी का ध्यान आया है. अभी कुछ दिनों पहले ही घबराहट और अनियमितता के चलते वह गायनीकोलौजिस्ट के पास गई थी तो पता चला कि ये मेनोपौज के लक्षण हैं.

थोड़ा परेशान हो कर बोली, ‘‘मां, तुम अनुज के साथ चली जातीं तो मैं प्रमोशन ले लेती. थोड़ा इनकम बढ़ती तो लोन चुकाने में सुविधा होती और माहौल भी चेंज होता. पूरी उम्र इसी शहर में रह कर काट दी.’’

आज पहली बार उस ने इस तरह के लहजे में अपनी बात रखी. इस दौरान मां को इस बात का एहसास हो गया था कि महानगर में रहने वाला अनुज और उस की पत्नी अपने छोटे से फ्लैट में उस के लिए कमरा निकालने में असमर्थ हैं. कोई मुंह से न भी बोले लेकिन व्यवहार से स्पष्ट हो ही जाता है. शायद अपनी सहेली की बात मां के दिल में असर कर गई थी, इसलिए पायल की बात का कोई तीर छोड़ता हुआ जवाब नहीं दिया इस बार.

पायल अपना फर्ज मान कर मां की सेवा करती रही. उस ने मां से कहा था, ‘‘इस बार प्रमोशन लिस्ट में नाम आया तो मैं जरूर जाऊंगी और तुम चलोगी मेरे साथ.’’

मां ने कोई जवाब नहीं दिया था. इसे स्वीकारोक्ति ही माना जाए क्योंकि दूसरा कोई चारा भी तो नहीं था उस के पास. मगर ऐसी नौबत ही नहीं आई. पायल का संकल्प भी बना रहा और मां की अकड़ भी.

कुछ महीनों बाद ही मां चल बसी. पायल अकेली रह गई. भाईबहन फोन करते या कभीकभार मिलने भी आते तो अकेली कमाऊ बहन को कुछ देने के बजाय उस से ही आर्थिक मदद मांगते. वह देती भी थी. उसे हमेशा यही सिखाया गया था कि वह बड़ी है और बड़े की जिम्मेदारी भी बड़ी होती है.

कई बार जानबूझ कर प्रमोशन न लने के बाद अब प्रमोशन लेना पायल के लिए अनिवार्य हो गया था. प्रमोशन मतलब नए शहर में ठिकाना ढूंढना. जिम्मेदारियों से मुक्ति मिल गई थी और नए शहर में रहने की पायल की चाहत भी पूरी हो गई थी. इस नए शहर में उसे शशि जैसी सहेली मिली थी. आपसी घनिष्ठता अब तक खूब बढ़ गई थी. शशि को जब से पायल के बारे में पता चला था तो उस ने बारबार सम?ाया था, ‘‘ठीक है तुम ने अपनी जिम्मेदारी निभाई लेकिन अब तो सोचो अपने बारे में.’’

कल ही पायल ने उस से कहा था, ‘मेरी उम्र 45 साल से ऊपर है. इस उम्र में शादी? लोग क्या सोचेंगे? मेरे भाईबहन, रिश्तेदार क्या कहेंगे?’

शशि दृढ़ता से बोली थी, ‘अब निकलो इस जंजाल से. तुम्हारे बारे में किस ने सोचा? तुम ने अपनी जिम्मेदारी निभाई. अब क्या तुम्हारे भाईबहन की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती या अब उन के बच्चों के नैपी धोने की जिम्मेदारी भी उठाने वाली हो? इस से पहले कि भाईबहन अपना बच्चा यह कह कर तुम्हारे पास छोड़ जाएं कि बहन, तुम अकेली हो, मेरे बच्चे को रख लो. आप का मन लगा रहेगा और आप की देखभाल भी हो जाएगी, अच्छा होगा कि तुम अपना नया जीवन शुरू करो.’

पायल ने खुद को काफी देर तक गौर से आईने में निहारा. उसे लगा जैसे जिम्मेदारी के नाम पर छल किया गया हो उस के साथ. लेकिन शिकायत करे तो किस से करे? वह बड़ी थी और कमाती थी, इसलिए जिम्मेदारी भी उसी की बनती थी.

शशि ने एक अधेड़ युवक से उस का परिचय करवाया था. युवक के चेहरे पर जिंदगी के पूरे निशान मौजूद थे. करीने से कटे और रंगे हुए बाल. उम्र को मात देने की भरपूर कोशिश करता हुआ उस का क्लीन शेव चेहरा और जींस व टीशर्ट पहने हुए पूरी जिंदादिली के साथ जीते हुए उस युवक का नाम अपने आचरण के अनुरूप ही आमोद था.

पहला विवाह असफल हो चुका था. चोट के निशान तो थे जीवन में लेकिन भरपूर जीने के लिए मरहमपट्टी के साथ मुसकराता चेहरा था. अच्छी नौकरी में था. पायल से विवाह के लिए तैयार था. दोतीन बार मिल भी चुका था. लेकिन पायल के मन के मोती बिखर चुके थे. वह हर बार कुछ न कुछ बहाना बना कर टाल जाती. लेकिन आज जब उस ने खुद को आईने में निहारा तो उस के हृदय से निकली अमृत की चंद बूंदें उस के चेहरे पर स्पष्ट ?ालक रही थीं. उसे एहसास हुआ कि जीवन हर अवस्था में खूबसूरत है.

शशि की सलाह पर अमल करने में लगभग दोचार महीने लग गए पायल को. उस ने तय किया कि वह आज ही ब्यूटीपार्लर जाएगी. लौट कर उस ने शशि को फोन किया, ‘‘मैं शादी के लिए राजी हूं.’’ शशि की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. रुचि और अनुज को जब पायल ने अपने विवाह की बात बताई तो दोनों ने मिलीजुली बात ही कही.

‘‘दीदी, इस उम्र में शादी? लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे? आप को सहारा ही चाहिए तो मेरे बेटे को अपने पास

रख लो.’’

‘‘मुझे सहारा नहीं, जीवन चाहिए. सुखदुख में सहारा देने वाला एक जीवनसाथी चाहिए. अब मुझे जीना है अपनी खुशी के लिए, अपने लिए.’’

रुचि और अनुज कुछ पल खामोश रहे. शायद उन्हें अपने स्वार्थ का और आगे आने वाली जिम्मेदारी का एहसास हुआ. दोनों ने कहा, ‘‘हम आप के विवाह में शामिल होने के लिए कब आएं. होने वाले जीजा से तो मिलाओ.’’

‘‘कोई बड़ा जलसा होने नहीं जा रहा है. बस, सूचित कर रही हूं.’’

बहन के रूखे जवाब ने रुचि और अनुज को बहुतकुछ सोचने पर मजबूर कर दिया. अनुज की पत्नी और रुचि के पति दोनों बड़ी बहन के त्याग के बारे में पूरी तरह जानते थे और उन्होंने कई बार परिवार में मिठास लाने की कोशिश की भी थी लेकिन दकियानूसी मां के रहते वे कुछ कह नहीं पाए.

पायल ने काफी देर कर दी अपने बारे में सोचने में पर देर आए, दुरुस्त आए. कोई आप के विषय में सोचे, यह अच्छी बात है. न सोचे तो खुद सोचना चाहिए. अपनी खुशियां तलाशने का हक हर किसी को है.

उधर भाईबहन ने जब अपनेअपने परिवार में बात की तो सभी लोग पायल के फैसले से खुश थे. खासकर रुचि और अनुज के पति और पत्नी. अब रुचि और अनुज को भी दीदी के एहसान महसूस हुए. रुचि के बारबार फोन आने लगे थे. वे सब लोग उत्साह से भरे हुए थे और मिल कर दीदी की शादी की प्लानिंग कर रहे थे. दीदी की बदौलत आज सब लोग समृद्ध थे. भाईबहन, उन के पत्नीपति और बच्चों में गजब का उत्साह था. एक लंबे अरसे के बाद अपनी उस दीदी से मुलाकात होने जा रही थी जिस ने भाईबहन की पढ़ाई के लिए अपना सर्वस्व निछावर कर दिया था.

शादी के हफ्तेभर पहले 8-9 लोगों की फौज पायल के छोटे घर में जमा हो गई. इन में भाईबहन, उन के परिवार और उन के ही कुछ करीबी रिश्तेदार शामिल थे. भाई ने पायल को एक कार की चाबी सौंपी, बहन ने 3 कमरे के एक फ्लैट के कागज. बहन की शादीशुदा बेटी ने फ्लाइट और होटल के टिकट का लिफाफा पकड़ाते हुए जब कहा, ‘‘मौसी, आप के और आप के उन के लिए हनीमून का इंतजाम मेरी तरफ से.’’ तो पायल का चेहरा शर्म से लाल हो गया.

हंसी का एक ठहाका गूंजा और घर की दीवारों में देर तक ठहरा रहा. मां का दकियानूसीपन उस की टीस थी जिस की अब उस के भाईबहन ने अच्छी सर्जरी कर डाली थी. पायल अब बाहर से ही नहीं बल्कि अंदर से भी जवान महसूस करने लगी थी. लड़की या महिला को त्याग की मूर्ति कहकह कर खूब लूटा गया है. भाईबहन ने आखिर इस बात को अस्वीकार कर दिया कि लड़कियां सिर्फ त्याग के लिए ही होती हैं. Hindi Stories

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...