Men’s Problems: मैं 38 वर्षीय विवाहित पुरुष हूं. पिछले कुछ समय से मुझे शारीरिक कमजोरी महसूस होती है जिस के कारण वैवाहिक जीवन प्रभावित हो रहा है. मैं इस बारे में किसी से खुल कर बात नहीं कर पाता. आत्मविश्वास कम होता जा रहा है. क्या करूं?

सब से पहले यह समझना जरूरी है कि शारीरिक कमजोरी का मतलब हमेशा कोई गंभीर बीमारी या पुरुषत्व की कमी नहीं होता. कई बार लगातार तनाव, नींद की कमी, काम का दबाव, चिंता, बढ़ती उम्र, अनियमित दिनचर्या, धूम्रपान, शराब, डायबिटीज, हाई ब्लडप्रैशर या हार्मोन संबंधी बदलाव भी इस की वजह बन सकते हैं.

जब इंसान इस विषय को मन में दबा कर रखता है तब यही तनाव समस्या को और बढ़ा सकता है. इसलिए खुद को दोष देने या चुपचाप चिंता करते रहने के बजाय आप के लिए सब से अच्छा कदम यह होगा कि किसी अच्छे फिजीशियन, यूरोलौजिस्ट या सैक्स हैल्थ विशेषज्ञ से शांत मन से मिलें. डाक्टर जरूरत पड़ने पर कुछ सामान्य जांच कर सकते हैं, ताकि कमजोरी की असली वजह समझ जा सके. इंटरनैट पर मिलने वाली बिना सलाह की दवाओं, तेलों या तुरंत ताकत के दावों से बचना जरूरी है, क्योंकि कई चीजें नुकसान भी पहुंचा सकती हैं.

साथ ही, अपनी दिनचर्या पर भी ध्यान दीजिए. पर्याप्त नींद, नियमित हलका व्यायाम, संतुलित भोजन, तनाव कम करना और पत्नी के साथ खुला व सहज संवाद कई बार बहुत फर्क लाता है. अकसर पुरुष यह मान लेते हैं कि उन्हें हर समय पूरी तरह परफैक्ट होना चाहिए, लेकिन वास्तविक रिश्ते केवल शारीरिक प्रदर्शन पर नहीं टिके होते. भरोसा, अपनापन और मानसिक सहजता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण होती है.

मेरी सब से अच्छी दोस्त मुझ से दूरदूर रहने लगी है.

मैं 22 वर्ष की छात्रा हूं. मेरी एक बहुत अच्छी दोस्त है. हम पिछले 5 वर्षों से साथ हैं. पहले हम हर बात एकदूसरे से सा?ा करते थे. कुछ महीनों से वह मुझ से दूरी बनाने लगी है. अब वह कालेज में दूसरे दोस्तों के साथ ज्यादा समय बिताती है. जब मैं उस से पूछती हूं तो वह कहती है कि सब ठीक है लेकिन मुझे लगता है कि कुछ बदल गया है. मैं उसे खोना नहीं चाहती. मुझे क्या करना चाहिए?

कालेज के दिनों में नए दोस्त बनना, अलगअलग समूहों में समय बिताना और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं का बदलना एक सामान्य प्रक्रिया है. इस का अर्थ हमेशा यह नहीं होता कि सामने वाला व्यक्ति आप को छोड़ना चाहता है या आप की दोस्ती की कद्र नहीं करता.

फिलहाल आप को अपनी दोस्त से नाराजगी या शिकायत के बजाय खुल कर और सहजता से बात करने की कोशिश करनी चाहिए. उसे यह बताइए कि आप उस की दोस्ती को कितना महत्त्व देती हैं और पिछले कुछ समय से उस की कमी महसूस कर रही हैं. साथ ही, उसे थोड़ा समय और स्पेस भी दें. कई बार रिश्ते तब ज्यादा सहज रहते हैं जब उन पर लगातार सवालों और अपेक्षाओं का दबाव न हो. यह भी जरूरी है कि आप अपनी पूरी खुशी और आत्मविश्वास को केवल एक दोस्ती पर निर्भर न करें. नए लोगों से मिलिए, अपनी पढ़ाई, रुचियों और अन्य संबंधों पर भी ध्यान दीजिए. इस से न केवल आप का आत्मबल बढ़ेगा, बल्कि आप की दोस्ती में भी संतुलन बना रहेगा.

रिश्तेदार केवल काम पड़ने पर ही मुझे याद करते हैं.

मैं 45 वर्ष का व्यक्ति हूं, सरकारी अधिकारी हूं. मेरे पद के कारण अकसर रिश्तेदार किसी न किसी काम के लिए मेरे पास आते रहते हैं. जब भी किसी को पैसे, मदद या सिफारिश की जरूरत होती है, तब सब मुझे याद करते हैं लेकिन जब मुझे किसी की आवश्यकता होती है तो कोई आगे नहीं आता. अब मुझे लगने लगा है कि लोग केवल स्वार्थ के लिए रिश्ते निभाते हैं. अकसर मन में निराशा और गुस्सा आता है. क्या करूं?

यह स्थिति अकसर उन लोगों के साथ होती है जो समाज में प्रभावशाली पदों पर होते हैं. ऐसे में यह सम?ाना जरूरी है कि कौन व्यक्ति वास्तव में आप से जुड़ा है और कौन केवल आप के पद या संसाधनों से लाभ लेना चाहता है. जीवन के कठिन समय की एक अच्छी बात यह होती है कि वह हमें रिश्तों की असली तसवीर दिखा देता है.

अब समय आ गया है कि आप अपनी सीमाएं तय करें. हर व्यक्ति की हर मांग को पूरा करना आप की जिम्मेदारी नहीं है. यदि कोई मदद मांगता है तो पहले यह सोचिए कि क्या वह व्यक्ति भी आप के सुखदुख में कभी साथ खड़ा हुआ है. इस का मतलब यह नहीं कि आप कठोर या स्वार्थी बन जाएं, बल्कि इतना जरूर है कि अपनी उदारता का इस्तेमाल सम?ादारी के साथ करें.

उन कुछ लोगों पर ध्यान दीजिए जो बिना किसी स्वार्थ के आप का हालचाल पूछते हैं, आप की चिंता करते हैं और आप की उपलब्धियों से अधिक आप के व्यक्तित्व को महत्त्व देते हैं. ऐसे रिश्ते भले ही कम हों, लेकिन वही जीवन की असली पूंजी होते हैं. रिश्तों का मूल्य उन की संख्या से नहीं, बल्कि उन की सच्चाई से तय होता है. इसलिए लोगों के व्यवहार से कड़वाहट पालने के बजाय इसे एक सीख की तरह स्वीकार कीजिए. अब दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार नहीं, बल्कि अपनी शांति, सम्मान और संतुलन को ध्यान में रख कर रिश्ते निभाइए. इस से न केवल मन का बोझ कम होगा, बल्कि आप उन लोगों को भी बेहतर ढंग से पहचान पाएंगे जो वास्तव में आप के अपने हैं.

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