Democracy in India: लोकतंत्र जनता के लिए होता है और जनता भाषा, मजहब, विचार, संस्कृति, खानपान, पहनावे और जीवनशैली के हिसाब से डाइवर्स होती है. आज एक चुनाव, एक राष्ट्र, एक भाषा और एक सुप्रीम लीडर के नाम पर इस लोकतंत्र और इस की डाइवर्सिटी को खत्म कर लोकतंत्र की जगह एकतंत्र लाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है. आरएसएस की मानसिकता तो यही है कि जिस में विरोधी विचारों के लिए कोई जगह ही नहीं है. सरकार से असहमत लोगों को सुप्रीम अदालत में कौकरोच कहा गया. शिक्षा मंत्री के खिलाफ प्रोटैस्ट कर रहे लोगों को आतंकवादी बताया गया और हर उस आवाज को कुचलने की कोशिश की गई जो सरकार से सवाल पूछने की हिम्मत करती है. क्या वन नैशन, वन इलैक्शन और वन सुप्रीम लीडर वाली यह मानसिकता लोकतंत्र के नाम पर एकतंत्र लाने की साजिश नहीं है?

भारत की मिट्टी में ही डाइवर्सिटी समाई हुई है. यहां 20 कोस में संस्कृति बदल जाती है. भारत में सैकड़ों बोलियां बोली जाती हैं. 780 से ज्यादा भाषाएं हैं. भाषा, कल्चर और परंपराओं की इसी विविधता के कारण दुनिया में भारत की एक अलग पहचान है लेकिन पिछले 12 सालों में एक चुनाव, एक राष्ट्र, एक भाषा और एक सुप्रीम लीडर के नाम पर इस विविधता को कुचल कर एकतंत्र लाने की कोशिशें हो रही हैं. सीजेपी का प्रोटैस्ट असल में इसी मानसिकता के खिलाफ एक जनआक्रोश है.

आरएसएस के हिंदू राष्ट्र में अल्पसंख्यकों और विरोधियों के लिए जगह नहीं है. भारत में हिंदू 80 प्रतिशत हैं लेकिन सच्चाई यह है कि हिंदुओं की इस आबादी में हिंदू कोई नहीं है. हिंदुओं की यह बहुसंख्यक आबादी असल में आज भी वर्णव्यवस्था के हिसाब से बंटी हुई है. 10 फीसदी के आसपास ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हैं. इन वर्णो के अलावा लगभग 54 फीसदी आबादी शूद्रों की है जिन्हें संवैधानिक भाषा में ओबीसी कहा गया गया है. ओबीसी के बाद अछूतों यानी एससी की आबादी लगभग 16 प्रतिशत है और एसटी यानी आदिवासियों की आबादी 8 फीसदी के आसपास है. मुसलिम 14 और ईसाई 2 प्रतिशत हैं. बाकी के 4 प्रतिशत में बौद्ध, सिख, जैन, पारसी व लिंगायत हैं.

सच बात तो यह है कि भारत की इस विविधता में ढेरों समस्याएं हैं. जातियों के बीच की विभाजनरेखा बेहद मजबूत है. इसी विभाजन को खत्म करने के लिए संविधान में विविधता में एकता की बात की गई है. लेकिन बीजेपी को यह पसंद नहीं. आरएसएस के लिए यह हिंदुओं का देश है. ओबीसी, एससी, एसटी, बौद्ध, सिख, जैन, पारसी और लिंगायत को आरएसएस हिंदू समाज का हिस्सा समझता है. इस अवधारणा की सब से बड़ी समस्या यह है कि आरएसएस 10 फीसदी द्विजों के अलावा बाकी की तमाम जातियों को हिंदू पहचान से जोड़ कर उन्हें सिर्फ वोटबैंक बनाए रखना चाहती है. यह आरएसएस की सब से खतरनाक चाल है. वैसे देखा जाए तो इन 10 फीसदी द्विजों की औरतों की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों से ज्यादा बेहतर नहीं है.

वर्ष 2014 में सत्ता में आते ही बीजेपी ने सब से बड़ा हमला भारत की विविधता में एकता पर ही किया. सांप्रदायिकता की राजनीति शुरू हुई. आम जनता से जुड़े तमाम जरूरी मुद्दे हाशिए पर धकेल दिए गए. बहुसंख्यक वोटों के ध्रुवीकरण के लिए अल्पसंख्यकों को निशाने पर लिया गया. इन के खिलाफ नैरेटिव गढ़ने के लिए तमाम तरह के हथकंडे अपनाए गए. मीडिया को कंट्रोल किया गया और तमाम लोकतांत्रिक संस्थाओं में अपने लोगों को फिट कर उन्हें विरोधियों के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया. मेनस्ट्रीम मीडिया, सोशल मीडिया और नेताओं के बयानों के जरिए दिनरात झूठे नैरेटिव फैलाए गए. इस तरह जनता की बड़ी आबादी के दिमाग़ को हाईजैक कर लिया गया और जिस ने आवाज उठाई उस का मुंह बंद कर दिया गया. मेनस्ट्रीम मीडिया के मालिक द्विज ही हैं जो आरएसएस की मानसिकता का पूरा समर्थन करते हैं.

जनता सड़कों पर आने को क्यों मजबूर हुई

इन 12 सालों में बेरोजगारी चरम पर पहुंच गई. नौकरी ही नहीं है. सीएमआईई के आंकड़े कहते हैं, युवा बेरोजगारी 45 प्रतिशत तक पहुंच गई है. हर साल 2 करोड़ नौकरी का वादा था लेकिन 10 साल में सिर्फ 7 से 8 लाख सरकारी नौकरियां ही दी गईं. बिहार का नौजवान तमिलनाडु और केरल तक मजदूरी करने जाता है. गरीब और मिडिल क्लास के बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा आसान नहीं रह गई है. मिड डे मिल खाने वाले बच्चे असल में अनस्किल्ड लेबर ही बनते हैं. इन में से कुछ ही नीट, एसएससी, रेलवे, पुलिस, शिक्षक भरती जैसी परीक्षाओं तक पहुंच पाते हैं.

देश के युवाओं के लिए ये परीक्षाएं सड़ चुके सिस्टम में आखिरी उम्मीद की तरह हैं लेकिन पिछले 5 वर्षों में 70 से ज्यादा बड़े पेपर लीक हुए हैं. 4 करोड़ स्टूडैंट्स का एकएक साल बरबाद हुआ और फौर्म के हजारों करोड़ रुपए सरकार की जेब में गए. पेपर लीक का पैटर्न बन गया और सिलसिला लगातार चलता रहा. कोई जवाबदेही नहीं, कोई सुधार नहीं. इस पर भी न्याय की सब से ऊंची कुरसी पर बैठे शख्स ने नौजवानों की तुलना कौकरोच से कर सिस्टम में सुधार का आखिरी दरवाजा भी बंद कर दिया. इस से नौजवानों की हताशा बढ़ी. सीजेपी प्रोटैस्ट इसी हताशा की पैदावार है.

2026 का नीट पेपर लीक हुआ. सीबीएसई के मूल्यांकन में भी भारी गड़बड़ियां हुईं. शिकायत करने वाले स्टूडैंट्स को पाकिस्तानी घोषित कर दिया गया. इस से स्टूडैंट्स की हताशा बढ़ी और सोशल मीडिया के जरिए एक ऐसा मूवमैंट शुरू हुआ जिस ने सरकार की नींद उड़ा कर रख दी. सीजेपी की शुरुआत मई 2026 में सोशल मीडिया पर हुई और 6 जून, 2026 से जंतरमंतर पर इस का धरना शुरू हुआ. डिजिटल रणनीतिकार अभिजीत दिपके ने एक औनलाइन अभियान शुरू किया जो देखते ही देखते जनआंदोलन बन गया.

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग से शुरू हुआ यह आंदोलन सोनम वांगचुक के समर्थन के बाद जोर पकड़ने लगा. सोनम वांगचुक ने 28 जून, 2026 को अनिश्चितकालीन अनशन शुरू किया था. 18 जुलाई को पुलिस द्वारा अस्पताल ले जाए जाने तक उन का अनशन लगभग 21वें दिन में पहुंच चुका था. 18 जुलाई, 2026 को दिल्ली पुलिस जबरन सोनम वांगचुक को जंतरमंतर से उठा कर सफदरजंग अस्पताल ले गई.

28 जून को सोनम वांगचुक के साथ 6 स्टूडैंट्स भी अनशन पर बैठे थे और कई छात्र तो अब भी अनशन पर बने हुए हैं. 20 जुलाई, 2026 तक प्रोटैस्ट बिलकुल शांतिपूर्वक चलता रहा. 20 जुलाई, 2026 को दिल्ली पुलिस ने खानेपीने, पानी और पब्लिक वाशरूम तक बंद करवा दिए. शाम 6 बजे के बाद जब समय खत्म हुआ तो पुलिस ने खदेड़ना शुरू किया. उस दौरान की धक्कामुक्की में कई लोग घायल भी हुए. इस दौरान कुछ ‘सिविल ड्रैस” में लोग भीड़ में घुसे और माहौल बिगाड़ने की कोशिश की. हालात पूरी तरह बेकाबू हो चुके थे. शाम 6 बजे के बाद सीजेपी कार्यकर्ता और पुलिस के बीच जबरदस्त धक्कामुक्की हुई. कइयों के सिर फूटे, हाथ टूटे और इस अफरातफरी में कुछ पुलिसवालों को भी चोटे आईं. इस के बाद पुलिस ने एफआईआर भी दर्ज की और स्टूडैंट्स को डिटेन कर मंदिरमार्ग थाने ले गई.

पुलिस वालों ने अपनी वरदी और उस वरदी के साथ मिले डंडे का भरपूर दुरुपयोग किया. यह पुलिस के लिए हाथ साफ करने का मौका था. इन पुलिसवालों की गुंडागर्दी पर सवाल खड़ा करने से लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है लेकिन सब से बड़ा सवाल यह है कि प्रोटैस्ट में हाथ में डंडा लिए बिना वरदी वाले गुंडे कहां से आए थे? इन्हें किस ने इजाजत दी? क्या यह आरएसएस की कार्यशाला में ट्रेन हुए लोग थे या अमित शाह की स्पैशल फ़ोर्स के लोग थे?

सीजेपी प्रोटैस्ट पेपर लीक से शुरू हुआ पर अब यह हर उस शख्स की आवाज है जिसे पिछले 12 वर्षों के दौरान ठगा गया. इस प्रोटैस्ट में पेपर लीक से हताश स्टूडैंट्स ही नहीं बल्कि नोटबंदी की लाइन में मारे गए लोगों के बच्चे, जीएसटी में बरबाद हुए व्यापारियों के परिजन, कोरोना में औक्सीजन की कमी से जूझे लोग, पुलिस के डंडे से पीटे गए पहलवान, मणिपुर की आग में जलाए गए घरों की औरतें सब शामिल हैं. किसान, छात्र, दलित, पिछड़ा, महिला और मजदूर सब का दर्द एक है. जब दरवाजे बंद कर दिए जाएं तो खिड़की तोड़नी पड़ती है और जब खिड़की भी बंद हो तो सड़क ही बचती है. सीजेपी का आंदोलन अब सिर्फ एक मुद्दे तक सीमित नहीं रह गया है. यह लोकतंत्र बनाम एकतंत्र की लड़ाई बन चुका है.

एकतंत्र के लिए लोकतंत्र की बली

बीजेपी और आरएस का प्लान एक राष्ट्र, एक चुनाव, एक भाषा, एक नेता का एकतंत्र बनाना है. यानी, लोकतंत्र की जगह एकतंत्र की पूरी प्लानिंग चल रही है. इस एकतंत्र में अलग राय की कोई जगह नहीं है. जो सवाल पूछेगा वो देशद्रोही साबित कर दिया जाएगा. 10 साल में रेल, बीएसएनएल, एयरपोर्ट, बंदरगाह, एलआईसी सब बेच दिए गए. आगे भी 6 लाख करोड़ की सरकारी संपत्ति बेचने का टारगेट है. दूसरी तरफ 80 करोड़ लोगों को 5 किलोग्राम राशन दे कर मंदिर की ओर भेजा जा रहा है. महंगाई 200 प्रतिशत बढ़ी है जिस से भुखमरी बढ़ी है. विश्व भुखमरी सूचकांक में 105वे नंबर पर पहुंच चुके देश की ‘ऊंची जाति’ की मीडिया देश की जनता को दिनरात बता रही है की दुनियाभर में देश का डंका बज रहा है.

लोकतंत्र जनता की आवाज सुनता है लेकिन आरएसएस विरोधी विचारों को नेस्तनाबूद करने की मानसिकता रखता है. ईडी और सीबीआई जैसी संस्थाओं का इस्तेमाल विरोधियों को कुचलने के लिए ही किया जा रहा है. यही कारण है कि 95 प्रतिशत केस सिर्फ विपक्षी नेताओं पर हैं. चुनाव से पहले अकाउंट फ्रीज कर दिए जाते हैं, विपक्षी मुख्यमंत्री तक को जेल हो जाती है, पार्टी तोड़ने के लिए साम, दाम, दंड, और भेद नीति का जम कर प्रयोग हो रहा है. इलैक्टोरल बौंड के जरिए कालाधन लीगल कर भाजपा ने अपने लिए खूब चंदा बटोरा.

वन नैशन वन इलैक्शन, वन नैशन वन टैक्स और वन नैशन वन लीडर के जरिए फैडरल ढांचा खत्म करने की पूरी तैयारी चल रही है. राज्य के अधिकार छीने जा रहे हैं. जो बोलेगा उसे टुकड़ेटुकड़े गैंग कहा जाएगा. 10 साल में हर मुद्दे को हिंदूमुसलिम बना दिया गया. महंगाई, बेरोजगारी, पेपर लीक के सवाल का जवाब लव जिहाद, मसजिद के नीचे मंदिर और धर्मांतरण से दिया जाने लगा. शिक्षा का भगवाकरण, इतिहास बदलने की सनक, विज्ञान की जगह पौराणिकता लाने की जिद. ये सब आरएसएस के 100 साल पुराने एजेंडे का हिस्सा हैं. आरएसएस को लोकतंत्र और संविधान की जरूरत ही नहीं, उसे वही पुराना रामराज्य चाहिए जहां जनता सिर्फ भक्त की भूमिका अदा करे और सत्ता को श्रद्धा की नजर से देखे और जहां वशिष्ठ, विश्वामित्र, दुर्वासा, मनु और चाणक्य की चले.

लोकतंत्र के हत्यारे ही एकतंत्र चाहते हैं

आरएसएस को लोकतंत्र से मतलब कभी नहीं रहा. वह राम राज्य चाहती है. जहां जनता सिर्फ भीड़ के रूप में हाथ जोड़े ख़डी हो, सत्ता के केंद्र में सिर्फ एक सुप्रीम लीडर हो और यह सुप्रीम लीडर वशिष्ठ और दुर्वासा जैसे द्विजों के इशारों पर काम करे. पूरा देश राम के नाम पर चले लेकिन असली ताकत सिर्फ ब्राह्मणों के हाथों में हो. 2014 के बाद से रामराज्य पर आधारित इसी एकतंत्रीय मौडल को मूर्त रूप देने के लिए आरएसएस की सरकार काम कर रही है.

लोकतंत्र की असली ताकत जनता है, कोई एक व्यक्ति नहीं. लोकतंत्र का सब से बड़ा आधार यह है कि सत्ता किसी एक व्यक्ति, एक संस्था या एक विचारधारा की नहीं होती बल्कि जनता की होती है. संविधान ने भारत को इसी सिद्धांत पर खड़ा किया, इसलिए संसद, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, सीएजी, सूचना आयोग, यूनिवर्सिटीज, स्वतंत्र मीडिया और नौकरशाही जैसी संस्थाओं को अलगअलग जिम्मेदारियां दी गईं ताकि ये सभी संस्थाएं मिल कर सत्ता की निरंकुशता पर लगाम लगाए रखें.

भारत के लोकतंत्र की खूबसूरती यह रही है कि मंत्री अपनेअपने मंत्रालय के लिए जवाबदेह रहें. रेल मंत्री रेल के लिए, शिक्षा मंत्री शिक्षा के लिए, स्वास्थ्य मंत्री स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए और गृह मंत्री कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाले. 2014 के बाद इस व्यवस्था में बदलाव शुरू हुआ. अलगअलग मंत्रालयों की जवाबदेही कमजोर पड़ने लगी और हर मंत्री सिर्फ प्रधानमंत्री कार्यालय में हाजिरी लगाने तक सीमित हो कर रह गया. जिम्मेदारी खत्म हो गई, सिर्फ मंत्रालय बाकी बचे. इन अलगअलग मंत्रालयों की कमान ऐसे लोगों के हाथों में दी गई जिन्हें संबंधित मंत्रालय का न तो कोई तजरबा था और न ही वे इस के लायक थे.

चुनाव आयोग ने एकतंत्र की बुनियाद ख़डी कर दीचुनाव आयोग को संविधान का चौथा स्तंभ माना जाता है लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने सत्ताधारी बीजेपी के एजेंट की तरह काम किया. 12 मार्च, 2026 को टीएमसी की अगुआई में लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसदों ने मिल कर ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए महाभियोग नोटिस दिया. यह भारत के इतिहास में चुनाव आयोग के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ पहला महाभियोग नोटिस था. नोटिस में 7 आरोप लगाए गए. ज्ञानेश कुमार ने पद पर रहते हुए पक्षपातपूर्ण बरताव किया और चुनावी धोखाधड़ी की जांच में जानबूझ कर बाधा डाली.

एसआईआर की आड़ में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम गलत तरीके से काटे गए और नागरिकों से उन के वोटिंग राइट छीन लिए गए. एसआईआर का असल मकसद सत्ताधारी पार्टी को फायदा पहुंचाना था. अप्रैल 2026 में फिर 73 सांसदों ने 9 नए आरोपों के साथ राज्यसभा में नोटिस दिया. ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आरोप कितने गंभीर हैं, यह आंकड़ों से समझिए. पहले नोटिस पर 193 सांसदों के साइन थे. लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63. नियम कहता है- चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए 100 लोकसभा और 50 राज्यसभा सांसद चाहिए लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा सभापति सी पी राधाकृष्णन दोनों ने नोटिस खारिज कर दिया. उन का कहना था- प्रस्ताव में कोई दम नहीं है. इस तरह 200 से ज्यादा सांसदों की आवाज को दबा दिया गया.

जब चुनाव आयोग खुद कठघरे में खड़ा हो जाए तो चुनाव की विश्वसनीयता खत्म हो जाती है. ज्ञानेश कुमार ने गैरसंवैधानिक आचरण किए. आयोग ने बीजेपी के पक्ष में फैसले लिए और विपक्ष की शिकायतों पर आंख बंद कर ली. जब 193 सांसद भी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्ताव पास नहीं करा पाए तो आम जनता को क्या न्याय मिलेगा? चुनाव आयोग अब स्वतंत्र संस्था नहीं बल्कि सरकार के इशारे पर चलने वाला विभाग बन गया है.

शिक्षा व्यवस्था को दीमक की तरह चट कर गए धर्मेंद्र

धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री का पद सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी की चापलूसी के लिए मिला है. वे हर मौके पर मोदी का गुणगान करते नहीं थकते. देश की शिक्षा व्यवस्था को उन्होंने पूरी तरह चौपट कर दिया है. उन के अपने बच्चे विदेश में पढ़ते हैं. बेटी नैमिशा प्रधान ने अमेरिका के टफ्ट्स यूनिवर्सिटी में एलएलएम की पढ़ाई की. जब खुद मंत्री का परिवार भारतीय शिक्षा पर भरोसा नहीं करता तो लाखों गरीब छात्रों का भविष्य कैसे सुरक्षित रहेगा? यह दोहरा मापदंड बीजेपी सरकार की असलियत है.

शिक्षा मंत्रालय को बजट तो मिला लेकिन उसे बरबाद करने में धर्मेंद्र प्रधान ने कोई कसर नहीं छोड़ी. 2026-27 में शिक्षा मंत्रालय को 1.39 लाख करोड़ रुपए का बजट दिया गया जो पिछले सालों से बढ़ा है. स्कूल शिक्षा के लिए 83,562 करोड़ और उच्च शिक्षा के लिए 55,727 करोड़ रुपए आवंटित किए गए. इस भारीभरकम बजट के बावजूद नीट और सीबीएसई जैसे बड़े एग्जाम में पेपर लीक का सिलसिला जारी रहा. 90 से ज्यादा पेपर लीक हुए, लाखों छात्रों का भविष्य बरबाद हुआ. बजट बढ़ने के बावजूद परीक्षा प्रणाली फेल हो गई क्योंकि मंत्रालय में न तो जवाबदेही है और न ही कोई सुधार.

सड़कों पर उतरे छात्रों की आवाज को धर्मेंद्र प्रधान ने आतंकवादियों से जोड़ दिया. उन्होंने छात्रों के प्रदर्शन को आतंकवाद फैलाने वाला बताया और सीजेपी को टैररिस्ट की बी टीम करार दिया. नीट पेपर लीक के बाद 20 से ज्यादा छात्रों ने आत्महत्या कर ली लेकिन मंत्री जी छात्रों को ही गलत बताने लगे. मोदी सरकार के 12 सालों में शिक्षा का हश्र यही रहा है. धर्मेंद्र प्रधान की इस लापरवाही ने पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था को लील लिया है. चापलूसी पर टिकी कुरसी के कारण उन्हें छात्रों की चिंता नहीं, सिर्फ कुरसी की चिंता है. देश की प्रगति का असली पैमाना मंदिर या इवैंटबाजी नहीं हैं. असली पैमाना एजुकेशन सिस्टम होता है जिसे धर्मेंद्र प्रधान ने पूरी तरह चौपट कर दिया.

एनटीए की जरूरत ही क्यों? करोड़ों बच्चों के भविष्य से खिलवाड़

एनटीए आज खुद घोटालों का अड्डा बन गई है. नीट पेपर लीक, जेईई में गड़बड़ी, यूजीसी-नेट रद्द होना ये सब घटनाएं हर साल का रूटीन बन गई हैं. सीबीएसई भी आंसर शीट स्कैनिंग घोटाले में फंसा है. लाखों छात्रों का भविष्य बरबाद हो रहा है. जेईई मेन, नीट यूजी, सीयूईटी, यूजीसी नेट जैसी करीब 15 बड़ी परीक्षाएं एनटीए करवाती है. हर साल एक करोड़ से ज्यादा छात्र इन में बैठते हैं. नीट यूजी में ही तकरीबन 22 लाख स्टूडैंट्स शामिल होते हैं. इतने बड़े पैमाने पर एक एजेंसी को जिम्मेदारी सौंपने की तुक क्या है? 2024-26 में नीट पेपर लीक का मामला सीबीआई तक पहुंचा, फिर भी मंत्रालय चुप रहा. ये सारे भ्रष्टाचार और लीकेज शिक्षा मंत्रालय की लापरवाही के कारण हुए हैं और शिक्षा मंत्रालय की कमान धर्मेंद्र प्रधान के हाथों में है, इसलिए सारे लीकेज का ठीकरा धर्मेंद्र प्रधान के सिर ही क्यों नहीं फूटना चाहिए.

एनटीए यानी नैशनल टैस्टिंग एजेंसी 2018 में बनी. सरकार ने कहा था एक एजेंसी सारी बड़ी परीक्षाएं लेगी तो पेपर लीक नहीं होंगे, नकल रुकेगी. मकसद था एक राष्ट्र, एक परीक्षा लेकिन 8 साल में एनटीए खुद सब से बड़ा सवाल बन गई. एनटीए हर साल 12 से ज्यादा बड़ी परीक्षाएं कराती है, एमबीबीएस/बीडीएस के लिए नीट-यूजी, इंजीनियरिंग के लिए जेईई मेंस, जेईई एडवांस यूनिवर्सिटी एडमिशन के लिए सीयूईटी-यूजी/पीजी, प्रोफैसरशिप के लिए यूजीसी-नेट. इस के अलावा सीएमएटी, जीएमएटी, आईसीएआर जैसे एग्जाम भी यह कंडक्ट करवाती है. मतलब स्कूल से कालेज, कालेज से नौकरी तक का हर स्टैप एनटीए के हाथ में सौंप दिया गया है.

सिर्फ नीट एग्जाम में ही 20 लाख से ज्यादा बच्चे बैठते हैं. जेईई मेन का एग्जाम हर साल 14 लाख बच्चे देते हैं. सीयूईटी-यूजी/पीजी में 13 लाख और नीट-यूजी में 9 लाख बच्चे हर साल बैठते हैं. कुल मिला कर हर साल एक करोड़ से ज्यादा स्टूडैंट्स एनटीए के भरोसे अपनी जिंदगी दांव पर लगाते हैं. पहले सीबीएसई 12वीं के नंबर से एमबीबीएस, जेईई के लिए खुद अपने पेपर कराता था. यूजीसी-नेट और यूजीसी भी खुद कराता था. तब सरकार का तर्क यह था कि अलगअलग एग्जाम के लिए अलगअलग एजेंसी होंगी तो पेपर लीक का खतरा बना रहेगा, इसलिए सरकार ने सब को एक जगह कर दिया. लेकिन इस से समस्या खत्म होने के बजाय और ज्यादा बढ़ गई. अब पेपर लीक का ग्राफ बड़ा हो गया. नीट का एक पेपर लीक होने से एकसाथ 20 लाख बच्चों का भविष्य दांव पर लग गया. यही हाल दूसरे एग्जामों का भी हुआ.

एक बच्चा 12 साल सीबीएसई या स्टेट बोर्ड से पढ़ता है. उस के प्रिंसिपल, टीचर रोज टैस्ट लेते हैं. 12वीं के बाद अचानक एनटीए आ कर कहती है वो सब बेकार है. अब एडमिशन सीयूईटी से होगा. यानी, 12 साल की मेहनत को एक 3 घंटे के पेपर पर तोल दिया. मानो, सारे स्कूल प्रिंसिपल बेईमान और निकम्मे हों. शिक्षा मंत्रालय ने खुद स्कूल सिस्टम को नकारा साबित कर दिया.

सरकार कहती है, एक चुनाव से देश का खर्च बचेगा, इस का जिम्मा ज्ञानेश कुमार को दे दिया. इसी तर्ज पर एक एग्जाम की नौटंकी शुरू की गई, जिम्मेदारी धर्मेंद्र प्रधान को दी गई जिन्होंने एनटीए को एग्जाम करवाने का ठेकेदार बना दिया और दोनों ने मिल कर सब चौपट कर दिया. एनटीए की लापरवाही के कारण लाखों बच्चों का भविष्य बरबाद हुआ, बच्चे तनाव में गए और हर साल सैकड़ों बच्चे आत्महत्या करने को मजबूर हुए. एनटीए का सब से बड़ा फायदा कोचिंग माफिया को मिला. जहां तक एक एग्जाम की बात है, वह भी धोखा ही साबित हुआ क्योंकि सीयूईटी के बाद भी हर यूनिवर्सिटी की कटऔफ अलग जाती है. नीट के बाद भी स्टेट कोटा अलग होता है तो एक एग्जाम का फायदा क्या हुआ? यह सिर्फ सैंट्रलाइजेशन है, सुधार नहीं.

2024 में नीट का पेपर लीक हुआ. 67 बच्चों को 720 में 720 मिले. ग्रेस मार्क का खेल हुआ. तब भी छात्र सड़क पर उतरे थे. सीबीआई जांच भी हुई लेकिन हैरानी की बात यह कि किसी को सजा नहीं हुई. उसी साल यूजीसी नेट का पेपर लीक होने से परीक्षा रद्द करनी पड़ी. 9 लाख बच्चों का साल बरबाद हुआ. शिक्षा मंत्रालय एनटीए का मालिक है. मंत्रालय ने बजट बढ़ाने की जगह एजेंसी को ठेका दे दिया. सीबीएसई ने 12वीं का सिस्टम कमजोर किया और सारा बोझ एनटीए पर डाल दिया.

एक एग्जाम का फौर्म 1,700 से 2,000 रुपए का पड़ता है. गरीब बच्चा 3 से 4 एग्जाम नहीं दे पाता. इतने खर्च के बावजूद कई बार तकनीकी गड़बड़ी के कारण एग्जाम की डेट बढ़ जाती है या सैंटर बहुत दूर रखा जाता है. एक पेपर लीक होने पर पूरा साल बरबाद हो जाता है. इसी वजह से कोचिंग माफिया 2 लाख रुपए फीस ले रहा है. एनटीए ने बराबरी की जगह कंपीटिशन को बढ़ावा दे कर एग्जाम को खतरनाक खेल बना दिया है.

एनटीए ने साबित कर दिया कि सैंट्रलाइजेशन होने से जवाबदेही खत्म हो जाती है. एक करोड़ छात्रों का भविष्य एक संस्थान, एक वैबबसाइट और एक सर्वर के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. पुराने सिस्टम में दिक्कत थी तो उसे सुधारा जाना चाहिए था. सीबीएसई , राज्य बोर्ड, यूनिवर्सिटी अपने स्तर पर परीक्षा क्यों नहीं ले सकते? जब तक एनटीए रहेगी, छात्रों का भविष्य लीक होता रहेगा. पुराने सिस्टम में सीबीएसई और यूनिवर्सिटीज अपनी परीक्षाएं खुद करवाती थीं. उस में भी कुछ कमियां थीं लेकिन एक ही जगह पर सारा सिस्टम केंद्रित नहीं था. अब एनटीए के आने से एक गड़बड़ी पूरे देश के बच्चों का भविष्य खराब कर देती है.

एक राष्ट्र एक चुनाव की तरह एक राष्ट्र एक एग्जाम की बात भी खोखली साबित हुई. जब एक ही एजेंसी पर सबकुछ लाद दिया जाता है तो छोटीछोटी गलती भी बड़ी आफत बन जाती है. एनटीए को भंग करने की मांग इसलिए जायज है क्योंकि इस में बारबार पेपर लीक, आंसर की गड़बडड़ी और रिजल्ट में धांधली चल रही हैं. नीट 2024 में बिहार और झारखंड में पेपर 30-50 लाख रुपए में बिका. सीबीआई ने गिरफ्तारियां कीं लेकिन तब शिक्षा मंत्रालय ने एग्जाम को रद्द नहीं किया. लाखों ईमानदार छात्रों का नुकसान हुआ.

धर्मेंद्र प्रधान ने एनटीए को आउटसोर्सिंग और प्राइवेट कंपनियों के भरोसे छोड़ रखा है. लाखों छात्र सालभर मेहनत करते हैं. नीट लीक के बाद कई छात्रों ने तनाव में आत्महत्या कर ली. फिर भी शिक्षा मंत्री जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं. सीबीएसई और एनटीए दोनों ही धर्मेंद्र प्रधान के अधीन हैं, इसलिए धर्मेंद्र प्रधान ही सारे भ्रष्टाचार के जिम्मेदार हैं.

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से आगे की बात

आरएसएस का सपना रामराज्य का है. रामराज्य में जनता नागरिक नहीं, सिर्फ भीड़ होती है. ऐसी भीड़ जो राजा के आगे हाथ जोड़ कर खड़ी हो, सवाल न पूछे. सत्ता के केंद्र में एक राजा और उस के चारों तरफ वशिष्ठ-दुर्वासा जैसे सलाहकार हों. 2014 के बाद बीजेपी सरकार ने इसी परिकल्पना को लागू करना शुरू किया. नाम लोकतंत्र का, काम एकतंत्र का. नारा सब का साथ लेकिन सिस्टम एक का राज.

2014 के बाद लोकतंत्र की तमाम संस्थाओं को एकएक कर तोड़ा गया. पहले संस्थाओं को कमजोर किया गया, फिर उन में अपने लोग बिठाए गए जिन का काम नीति बनाना नहीं, गुणगान करना रह गया. एक चुनाव, एक भाषा, एक शिक्षा का नारा इसी एकतंत्र की सीढ़ी है. डाइवर्सिटी को खत्म कर के एक ऐसा देश बनाया जा रहा है जिस में दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक के अधिकारों को कुचल कर उन्हें बेचारा बना दिया जाए. यही ‘राम राज्य’ वाला मौडल है. राजा गलती न करे. राजा से सवाल न हो. अगर कोई सवाल करे तो उसे शंबूक समझ कर मार दो. सीजेपी का प्रोटैस्ट असल में इसी एकतंत्र की मानसिकता के खिलाफ है.

अब सवाल सिर्फ पेपर का नहीं है. मामला सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का नहीं है. असल मुद्दा जवाबदेही का है. तमाम लोकतांत्रिक संस्थाएं अपनी क्रैडिबिलिटी खो चुकी हैं. जमीर, इंसानियत और भरोसा रुपए से भी तेजी से गिर रहा है और सरकार के मंत्रियों की हठधर्मिता पैट्रोल के दामों से भी तेज बढ़ रही है. पैट्रोल में मिलावट का सरकारी खेल बेशर्मी से चल रहा है, रेलवे का तेजी से व्यापारीकरण किया जा रहा है, जलजंगलजमीन को उद्योगपतियों के हाथों पर गिरवी रखा जा रहा है, चुनाव आयोग सरकार के लिए वोटरों को चुन रहा है.

अब केवल एक मंत्री के पद छोड़ने का सवाल नहीं है. असली सवाल यह है कि क्या इस देश में सत्ता में बैठे लोगों की कोई जवाबदेही बची है? लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं होता, बल्कि गलतियों की जिम्मेदारी लेने का भी नाम होता है. जब परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठें, युवाओं का भविष्य संकट में पड़ जाए या किसी विभाग की गंभीर लापरवाही सामने आए तब लोकतांत्रिक परंपरा तो यही कहती है कि जिम्मेदारी तय हो लेकिन आज स्थिति ऐसी बन गई है कि इस्तीफा देना तो दूर, गलती स्वीकार करना भी सत्ता की कमजोरी समझा जाने लगा है.

लोकतंत्र की सब से बड़ी ताकत जनता का भरोसा होता है. अगर यही भरोसा कमजोर होने लगे तो संविधान की किताब चाहे जितनी मजबूत हो, लोकतंत्र भीतर से खोखला होने लगता है. Democracy in India

 

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