Algorithm and Religion: आजकल कोई फेसबुक पर घंटों लगा रहता है तो कोई यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर लौंग या शौर्ट वीडियो में जिंदगी के बेशकीमती घंटे गंवा रहा है. सोशल मीडिया पर घंटों स्क्रौल करने वाले लोगों को लगता है कि वे मुफ्त इंटरनैट का मजा ले रहे हैं जबकि ऐसा बिलकुल भी नहीं है. सोशल मीडिया पर कोई भी व्यक्ति अपनी मरजी से अपना कीमती वक्त बरबाद नहीं कर रहा है बल्कि इस के पीछे एल्गोरिदम का एक ऐसा खतरनाक और छिपा षड्यंत्र काम करता है कि जिस के बारे में ज्यादातर लोगों को अंदाजा भी नहीं. सवाल यह है कि एल्गोरिदम के नाम पर यह ब्रेन हाईजैकिंग का गंदा खेल तो नहीं है?

सोशल मीडिया का एल्गोरिदम एक तरह की मानसिक गुलामी का हथियार है. आम आदमी उन विचारों का शिकार बनता है जिन की उसे जरूरत ही नहीं. यह बिलकुल धर्म के एल्गोरिदम जैसा है. धर्म ने भी विरोधी विचारों को कंट्रोल किया और आज एल्गोरिदम भी यही कर रहा है. वर्ष 2012 के फेसबुक एक्सपैरिमैंट में यूजर्स की फीड से पौजिटिव या नैगेटिव पोस्ट हटा कर उन का मूड बदला गया था.

यूजर्स को पता भी नहीं चला कि विकल्प हटाया गया है. आगे आप पढ़ेंगे कि कैसे इस एक्सपैरिमैंट से यह साबित हुआ कि एल्गोरिदम से लोगों की बुद्धि कंट्रोल की जा सकती है. धर्म ने भी विरोधी विचारों को कंट्रोल किया और आज एल्गोरिदम भी यही कर रहा है. एल्गोरिदम के नाम पर ब्रेन हाईजैकिंग का गंदा खेल खेला जा रहा है. न सोशल मीडिया आजाद है और न वह यूजर्स को आजादी दे रहा.

फेसबुक का यह एक बेहद महत्त्वपूर्ण एक्सपैरिमैंट था जिस का रिसर्च पेपर 2014 में पब्लिश हुआ. इस एक्सपैरिमैंट में फेसबुक की डेटा साइंस टीम ने एक हफ्ते तक 6,89,003 यूजर्स की न्यूजफीड बदल दी और 2 गु्रप बनाए. ग्रुप 1 की फीड से नैगेटिव शब्दों वाली पोस्ट कम कर दी गईं. इन लोगों को दुख, नफरत, रोना और उदासी वाली पोस्ट दिखनी 10 फीसदी कम हो गईं. वहीं ग्रुप 2 की फीड से पौजिटिव शब्दों वाली पोस्ट कम कर दी गईं.

यहां से खुशी, प्यार, उमंग और सैलिब्रेशन वाली पोस्ट 10 फीसदी तक घटा दी गईं. नतीजा यह हुआ कि जिन लोगों ने कम नैगेटिव पोस्ट देखीं उन्होंने खुद भी कम नैगेटिव पोस्ट लिखीं. वहीं, जिन्होंने कम पौजिटिव पोस्ट देखीं उन्होंने कम पौजिटिव पोस्ट लिखीं. इस एक्सपैरिमैंट का इफैक्ट तो छोटा था लेकिन स्केल काफी बड़ा था.

इस प्रयोग की खास बात यह थी कि किसी यूजर को इस एक्सपैरिमैंट का पता नहीं चला. लगभग 7 लाख लोगों में से किसी से पूछा नहीं गया, सहमति नहीं ली गई. इस प्रयोग से साबित यह हुआ कि इमोशनल कंटेजन औनलाइन भी हो सकता है, आमनेसामने बिना मिले भी मूड इफैक्ट हो सकता है, एल्गोरिदम मूड बदल सकता है और इमोशनल माहौल बदल कर वह व्यवहार पर असर डाल सकता है. यूजर्स बिना तथ्यों की जांच किए ज्यादा क्रिटिकल बन सकते हैं या ज्यादा उदार बन सकते हैं.

ब्रेन हाईजैकिंग का खेल

ब्रेन हाईजैक करने का मतलब है जबरदस्ती दिमाग पर कब्जा करना. लेकिन यहां कोई जबरदस्ती नहीं हुई, बस, चुनाव के आर्किटैक्चर को बदला गया. किसी को सोचने से नहीं रोका गया सिर्फ यह तय किया गया कि कोई क्या सोचेगा. मान लो आप किताबों की दुकान में गए. दुकानदार ने ‘ईश्वर नहीं है’ इस शीर्षक वाली किताब छिपा दी, सिर्फ ‘ईश्वर है’ साबित करने वाली किताबें आगे रख दीं. आप ‘ईश्वर है’ वाली किताब चुन सकेंगे क्योंकि इस शीर्षक की कई किताबें एकसाथ दिखेंगी. आप दुकानदार से पूछेंगे भी नहीं कि क्या कोई किताब ईश्वर नहीं है की है जबकि वह हिस्ट्री के सैक्शन में रखी है. क्या दुकानदार ने आप का दिमाग हाईजैक किया? नहीं. पर उस ने विकल्प हाईजैक किए. एल्गोरिदम ठीक यही करता है.

आप मिठाई की दुकान में गए. दुकानदार ने जलेबी छिपा दी और सिर्फ गुलाबजामुन आगे रख दिए. आप ने गुलाबजामुन चुन लिया. धर्म भी ठीक ऐसे ही काम करता है. फर्क बस इतना है कि धर्म कहता है जलेबी खाना पाप है. आप जलेबी से परहेज करने लगते हैं और गुलाबजामुन को पसंद करने लगते हैं. इस के उलट एल्गोरिदम के तहत गुलाबजामुन को हटा कर जलेबी रख दी जाएं तो आप जलेबी ही खाने लगेंगे.

धर्म और एल्गोरिदम दोनों ओर एकजैसा बिलीफ सिस्टम है. एक भगवान पर, दूसरा डेटा पर. दोनों का मकसद भी एक है. व्यवहार को प्रिडिक्टेबल बनाना. धर्म का पैरामीटर है धर्मग्रंथ, गुरु और ईश्वर वाणी, वहीं, एल्गोरिदम का पैरामीटर है वायरल पोस्ट, ट्रैंडिंग और इन्फ्लुएंसर्स. धर्म कहता है यह बात उस के पवित्र ग्रंथ में लिखी है, सो सही है. एल्गोरिदम कहता है यह बात ट्रैंड कर रही है, सो सही है. ईनाम का सिस्टम भी दोनों ओर एकजैसा ही है. धर्म स्वर्ग और पुण्य का लालच देता है तो एल्गोरिदम लाइक, शेयर, वायरल और मोनेटाइजेशन का लालच देता है. सजा का सिस्टम भी दोनों ओर है. धर्म नर्क, पाप, जाति से बाहर करने का डर दिखाता है तो एल्गोरिदम कैंसिल कल्चर, शैडो बैन और रीच खत्म करने की धमकी देता है.

धर्म और एल्गोरिदम एक ही थाली के चट्टेबट्टे

एल्गोरिदम अटैंशन इकोनौमी और एडवरटाइजिंग के पैसे से चलता है तो धर्म दानपेटी इकोनौमी पर टिका होता है. धर्म कहता है ध्यान ईश्वर पर लगाओ, टाइम दो, पैसा दो, मुक्ति मिलेगी. एल्गोरिदम कहता है ध्यान स्क्रीन पर लगाओ, टाइम दो, डेटा दो, मजा मिलेगा. दोनों में लोगों का फोकस इन्वैस्ट होता है.

मसजिद और मंदिर में दान डर और लालच की वजह से दिया जाता है और यहां नोटिफिकेशन आप को ऐसा करने पर मजबूर करता है. आप ने गुलाबजामुन चुना तो सैकड़ों तरह के गुलाबजामुनों के विज्ञापन दिखने लगेंगे. तब तक दिखते रहेंगे जब तक आप खरीद नहीं लेंगे. ये हर जगह दिखेंगे. व्हाट्सऐप पर, फेसबुक पर, इंस्टाग्राम पर, मैसेजिंग ऐप्स पर, एक्स पर, थ्रैड पर. आप सोचेंगे कि गुलाबजामुन इतने लोग खा रहे हैं तो कुछ खासीयत होगी ही. खा कर देख लो. आप एक नई कमीज की जगह गुलाबजामुन का और्डर कर देते हैं, वन प्लस वन का औफर हो तो 2 हो जाएंगी.

यूट्यूब का औटोप्ले सिस्टम हो या फेसबुक और इंस्टाग्राम का एल्गोरिदम, ये सब पहले दाना डालते हैं, चिडि़या फंसी तो फिर कभी आजादी मुमकिन नहीं. आप ने सोचा एक वीडियो देखूंगा और 2 घंटे बाद होश आया. यह वही है जो प्रवचन में होता था, बस, 10 मिनट कथा सुनो, फिर 3 घंटे बरबाद. दोनों ओर कन्फर्मेशन बायस होना तय है. अपने लोग बनाम दूसरे लोग. हम श्रेष्ठ हैं, दूसरे खलनायक. हम सच पर चल रहे हैं, दूसरे ?ाठ से हमारे घर को लूटने की तैयारी कर रहे हैं.

धर्म ने तो सदियों से यही सिखाया. हमारा भगवान सच्चा, उन का ?ाठा. इस से दिमाग को तो आराम मिलता है लेकिन सोसाइटी बरबाद होती है. अगर आप लैफ्ट विंग पोस्ट लाइक करते हैं तो आप को राइट विंग की सब से जहरीली पोस्ट दिखाई जाएगी ताकि आप गुस्सा हों, कमैंट करें, एंगेजमैंट बढ़े. अगर आप राइट विंग को पसंद करते हैं तो आप को वे पोस्ट दिखाई जाएंगी जिन में लैफ्ट वाले आतंकी हैं.

इस खतरनाक खेल का नतीजा यह होता है कि आप धीरेधीरे मानने लगते हैं कि दूसरी साइड के सब लोग दुश्मन हैं या बेवकूफ हैं. यह वही काफिर और शूद्र वाली सोच है, बस, यह नए पैकेज में है. 2014 की स्टडी बताती है कि लोग खबर को सिर्फ हैडलाइन से याद रखते हैं, मूल सोर्स से नहीं. एल्गोरिदम तय करता है कौन सी हैडलाइन आप 20 बार देखेंगे. 20 बार देखने पर झूठ भी सच लगने लगता है. इसे ही इल्यूजरी ट्रुथ इफैक्ट कहते हैं. धर्म ने भी यही किया. एक काल्पनिक कहानी 1,000 साल तक दोहराई तो वह कहानी सच बन गई. एल्गोरिदम यही काम 1,000 दिन की जगह 7 दिन में कर देता है क्योंकि यह 100 बार झूठ दिखाता है.

धर्म और एल्गोरिदम में एक बड़ा फर्क है. धर्म से निकलना मुश्किल होता है. परिवार, समाज छोड़ना पड़ता है लेकिन एल्गोरिदम से निकलना आसान है, ऐप डिलीट कर दो. लेकिन लोग ऐसा करते नहीं क्योंकि धर्म डर से बांधता था और एल्गोरिदम एंटरटेनमैंट के नाम पर ब्रेन हाईजैक करता है. धर्म के पीछे ईश्वर की मरजी का दावा है तो एल्गोरिदम के पीछे मार्क जुकरबर्ग की तिमाही रिपोर्ट है.

धर्म और एल्गोरिदम दोनों का मकसद पवित्रता नहीं, बल्कि पैसा है. इसलिए इस के भक्त हो जाना और भी बेतुका है. धर्मग्रंथ हजारों साल में नहीं बदले लेकिन इंस्टाग्राम का एल्गोरिदम हर हफ्ते बदलता है, इसलिए यह ज्यादा खतरनाक है. आप को एडजस्ट होने का टाइम ही नहीं मिलता.

एल्गोरिदम के इस मकड़जाल से बाहर निकलना है तो हर वायरल बात पर खुद से पूछो, यह मु?ो किस ने दिखाया और क्यों? इस का उलटा कहां मिलेगा? धर्म में भी तो यही सवाल करना मना था. बोरियत बुरी चीज नहीं है. इस में शरीर काम नहीं करता लेकिन दिमाग काम कर रहा होता है. खाली बैठे लोगों ने बड़ेबड़े आविष्कार किए हैं.

एल्गोरिदम का सब से बड़ा दुश्मन बोरियत है. जब बोर होंगे तभी ओरिजिनल विचार आएगा. धर्म ने भी बोरियत को ‘खाली दिमाग शैतान का घर’ कह कर बदनाम किया था. हर धर्म कहता है, दिन में 100 बार आका को याद करो. ‘कैसे हो’ की जगह ‘गौड ब्लैस यू’, ‘जयश्री राम’, ‘इंशाअल्लाह’ बोलो. दिन में 10 बार बोलो, 100 बार बोलो. जब कंप्यूटर, मोबाइल खोलोगे, उसी एल्गोरिदम को इंतजार करते पाओगे.

फेसबुक के एक्सपैरिमैंट ने साबित किया कि मूड बदला जा सकता है लेकिन बुद्धि कंट्रोल तभी होगी जब आप अपना कंट्रोल सौंपना बंद करें. धर्म ने कहा था बुद्धि समर्पण कर दो और एल्गोरिदम कहता है स्क्रौल करते रहो. दोनों जानते हैं कि आप का ध्यान आप की इकलौती असली संपत्ति है, इसे मंदिरमसजिद में दान न करें, न किसी ऐप पर बरबाद करें.

सोशल मीडिया एल्गोरिदम तय करता है आप कौन हैं

एल्गोरिदम असल में नियमों और गणनाओं का एक सैट होता है जो यह तय करता है कि आप को आप की फीड में क्या दिखे. फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और एक्स इन्हीं सिग्नल्स पर काम करते हैं. आप क्या देखते हैं, कितनी देर देखते हैं, किन पोस्ट्स पर लाइक, शेयर, कमैंट करते हैं, किन लोगों को फौलो करते हैं, किस तरह के कंटैंट पर रुकते हैं. एल्गोरिदम आप के इस व्यवहार को नोट करता है और आप को आप के पसंदीदा प्लेटफौर्म पर अधिक समय तक बनाए रखने के लिए माहौल तैयार करता है क्योंकि जितना अधिक समय आप बिताते हैं उतना अधिक विज्ञापन दिखाया जा सकता है और वहीं से इन कंपनियों की कमाई होती है.

एल्गोरिदम आप की पसंद पहचान कर बहुत सी फीड उसी के अनुसार दिखाता है. वह अपनी पसंद भी थोप रहा हो तो आप को पता नहीं चलेगा. बीच में कहीं आप किसी विज्ञापन पर रुक गए तो उस के पौबारह और फिर वह उसी तरह के विज्ञापन बारबार दिखाएगा. आप जिस कंपनी के प्लेटफौर्म को देख रहे हैं, वह अपने मालिकों की पसंद भी बीच में डाल देगा. अगर आप रुक गए तो वह फिर वही और दिखाने लगेगा. जैसे पादरी, पंडित, पंडित, मुल्ला की पैनी नजर हर जने पर रहती है वैसे ही एल्गोरिदम की रहती है. ग्राहक को फांसो, पकड़ो, लूटो. यह नया डिजिटल धर्म पहले वाले से है ज्यादा खतरनाक

यहां सवाल उठता है क्या यूजर स्वतंत्र है? तकनीकी रूप से तो आप क्या देखना चाहते हैं, यह आप तय करते हैं. आप ऐप छोड़ भी सकते हैं लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं है. प्लेटफौर्म का डिजाइन आप को बारबार वापस खींचता है. नोटिफिकेशन, औटोप्ले, इनफिनिट स्क्रौल जैसी चीजें आप को बांधे रखती हैं.

यह वैसा ही है जैसे जंकफूड खाना आप के लिए अच्छा नहीं है लेकिन उसे इस तरह बनाया जाता है कि आप बारबार खाएं. यह सुंदर दिखता है. औनलाइन मंगाएंगे तो बहुत बढि़या पैकिंग में आएगा. वहां डाइनिंग कर रहे तो प्लेट सुंदर होगी, सर्वर स्मार्ट होगी, रैस्तरां चमचम कर रहा होगा. 10 रुपए के खाने के आप से 100 रुपए या 1,000 रुपए ले लिए जाते हैं.

एल्गोरिदम का उद्देश्य विचारधारा नहीं बल्कि एंगेजमैंट और मुनाफा है. इसलिए इसे अटैंशन मैनीपुलेशन का बिजनैस कहा जाता है. इन्फौर्मेशन ओवरलोड, आलस्यपूर्ण जीवनशैली, मनोरंजक कंटैंट के प्रति आकर्षण और क्रिटिकल थिंकिंग की कमी के कारण आदमी फंसता है.

सोशल मीडिया एल्गोरिदम कोई ब्रेनवाश मशीन तो नहीं है लेकिन यह पूरी तरह निष्पक्ष भी नहीं है. यह एक ऐसा बिजनैस मौड्यूल है जो ह्यूमन साइकोलौजी का इस्तेमाल कर के फोकस को पकड़ता है और बनाए रखता है. एल्गोरिदम आप को पूरी तरह कंट्रोल नहीं करता लेकिन अगर आप सचेत नहीं हैं तो यह आप की सोच की दिशा जरूर बदल सकता है.

अब भगवान सर्वज्ञ नहीं, एल्गोरिदम सर्वज्ञ है. उसे पता है कि आप क्या सोचते हैं, क्या महसूस करते हैं और शायद यह भी कि आप आगे क्या सोचेंगे. भगवानों के दुकानदार हथियार और भीड़ का इस्तेमाल करते हैं, एल्गोरिदम मोबाइल और कंप्यूटर का. किताबें दोनों की दुश्मन हैं.

2014 के मूड प्रयोग ने दिखाया कि आप की फीड में थोड़ा सा बदलाव कर के आप के भाव बदले जा सकते हैं. यानी, आप की खुशी और उदासी अब आप के हालात से कम जबकि आप की टाइमलाइन से ज्यादा तय हो सकती है. धर्म के इतिहास में असहमति पाप मानी गई. ‘सरिता’ जैसी पत्रिका से धर्म के लोग चिढ़ते हैं क्योंकि यह धर्म के एल्गोरिदम की पोल खोलती है. बहुत लोग दूर से ही इसे बिना पढ़े इस की आलोचना शुरू कर देते हैं क्योंकि यह सत्य कहती है, खरी कहती है.

एल्गोरिदम ने इस सिद्धांत को और एडवांस कर दिया

अब विरोधी विचारों को जलाया नहीं जाता, उन्हें बस दिखाया नहीं जाता. आप को वही दिखेगा जो आप को पसंद है. वही दिखेगा जो आप को रोके रखे, जो आप को क्लिक करने पर मजबूर करे और धीरेधीरे आप भूल जाएंगे कि दुनिया में आप के अलावा भी सोचने के दूसरे तरीके मौजूद हैं.

सब से खतरनाक चीज गुलामी नहीं, बल्कि गुलामी का एहसास न होना है. हम सोचते हैं हम जो देख रहे हैं वह हम ने चुना है. हम जो सोच रहे हैं वह हमारी अपनी सोच है लेकिन हकीकत यह है कि हमारी पसंद भी धीरेधीरे उसी प्रोडक्ट से बन रही है जो हमें दिखाया जा रहा है. यानी, हम सिर्फ उपभोक्ता नहीं हैं, हम खुद एक प्रोडक्ट हैं जिसे एल्गोरिदम आकार दे रहा है.

धर्म और एल्गोरिदम दोनों अलग युगों के उत्पाद जरूर हैं लेकिन दोनों का खेल एक ही है- मानव मन को दिशा देना. फर्क बस, इतना है कि धर्म ने डर और आस्था का सहारा लिया जबकि एल्गोरिदम ने सुविधा और मनोरंजन का. शायद इसी वजह से यह नया डिजिटल धर्म पहले वाले से ज्यादा खतरनाक है.

धर्म और एल्गोरिदम दोनों ही किताबों के दुश्मन हैं. मोबाइल महंगा है, डेटा महंगा है पर व्हाट्सऐप, फेसबुक, एक्स, थ्रैड, जेमिनी, ग्रोक, चैट जीपीटी, क्लाउड मुफ्त हैं, काफी हद तक. क्यों? इसलिए कि ये भी धर्म की तरह परेशान को, बेघरबार को आश्रय देते हैं. अमेरिका में चर्च होमलैस, बेघरों को सुबह गरम खाना खिलाता है, हमारे यहां लंगर लगते हैं. मुफ्त का खाना कोई क्यों खिलाता है? ताकि, आप ही की दूसरी जेब से पैसे निकाल सके. न एल्गोरिदम कुछ निर्माण करता है, न खाना उगाता है, न पानी घर तक लाता है, न मकान बनाता है पर आप पर हावी है धर्म की तरह जो न खेती करता, न भवन निर्माण करता पर जिस का आका सब को सुखी करता है, सब को निरोगी बनाता है, सब को छत देता है. आखिर कैसे?

तो सवाल आप दोनों से नहीं पूछते क्योंकि सवाल पूछने वाले की जीभ काट ली जाती है, अकाउंट सस्पैंड कर दिया जाता है. सिस्टम हाईजैक कर लिया जाता है.

एल्गोरिदम के नाम पर दुनिया की सारी संपत्ति हड़पने की साजिश

आज दुनिया में एक नई दौड़ चल रही है. पहले तेल और सोना सब से कीमती माने जाते थे लेकिन अब डेटा और एल्गोरिदम सब से बड़ी ताकत बन चुके हैं. आज कुछ गिनीचुनी कंपनियां लोगों के मोबाइल, इंटरनैट, सोशल मीडिया, खरीदारी, बैंकिंग और यहां तक कि सोचने के तरीके तक को एल्गोरिदम के जरिए कंट्रोल कर रही हैं. दुनिया की सब से बड़ी टैक कंपनियां एआई और एल्गोरिदम पर अरबों रुपए खर्च कर रही हैं, बदले में वे खरबों रुपए कमा रही हैं. इस से सवाल उठ रहा है कि क्या भविष्य की पूरी इकोनौमी कुछ ही कंपनियों के हाथों में सिमट कर रह जाएगी?

एनवीडिया की 2025 में इनकम 215 अरब डौलर रही, जो पिछले साल से 65 फीसदी ज्यादा है. इस का कारण है कि आज लगभग हर बड़ा एआई मौडल एनवीडिया के जीपीओ पर ही ट्रेन होता है. एएसएमएल ऐसी मशीनें बनाती है जिन से एआई चिप्स तैयार होते हैं. एआई की बढ़ती मांग ने इस का कारोबार भी तेजी से बढ़ाया है. माइक्रोसौफ्ट अजूरे की सालाना आमदनी की बढ़ोतरी में एआई का बहुत बड़ा योगदान रहा. यह कंपनी 2026 तक एआई के जरिए लगभग 25 अरब डौलर की आय हासिल करने का लक्ष्य ले कर चल रही है.

गूगल क्लाउड ने 2025 की चौथी तिमाही में ही 17.7 अरब डौलर का कारोबार किया. जेमिनी जैसे एआई मौडल इस की बड़ी वजहें हैं. अमेजन एडब्लूएस की सालाना कमाई 108 अरब डौलर तक पहुंच गई, इसलिए एआई पर अब यह कंपनी लगातार भारी निवेश कर रही है. ओरेकल भी एआई डेटा सैंटर और क्लाउड सेवाओं के जरिए तेजी से आगे बढ़ रही है और बड़े एआई ग्राहकों को कंप्यूटिंग सेवाएं मुहैया करा रही है.

आज फेसबुक, इंस्टाग्राम और टिकटौक पर कोई क्या देख रहा है, यह व्यक्ति नहीं, एल्गोरिदम तय करता है. मेटा विज्ञापन दिखाने के लिए भी एआई एल्गोरिदम का इस्तेमाल करती है. इस चलते कंपनी की आमदनी पिछले साल के मुकाबले 2025 में सीधे 52 फीसदी बढ़ी है. इसी वजह से कंपनी एआई इन्फ्रास्ट्रक्चर पर 72 अरब डौलर तक खर्च करने की योजना बना चुकी है.

टिकटौक की डौयिन सेवा के लगभग 77 करोड़ मंथली कस्टमर हैं. उस का एआई असिस्टैंट डौबाओ भी 15.5 करोड़ से ज्यादा साप्ताहिक कस्टमर्स तक पहुंच चुका है. इसी कारण कंपनी की वैल्यू 550 अरब डौलर से ज्यादा पहुंच गई है. ओपन-एआई की सालाना कमाई लगभग 12 अरब डौलर तक पहुंच चुकी है. चैट जीपीटी के 70 करोड़ से ज्यादा साप्ताहिक कस्टमर्स हो चुके हैं. एंथ्रोपिक की वैल्यू लगभग 183 अरब डौलर तक पहुंच गई है.

एक्स-एआई की वैल्यू 200 अरब डौलर से ज्यादा है. टेस्ला अपनी फुल सैल्फड्राइविंग तकनीक को लाखों कारों से मिलने वाले डेटा के आधार पर लगातार बेहतर कर रही है. कंपनी ने 2025 में भी अरबों डौलर का कारोबार दर्ज

किया. अडोब ने एआई बेस्ड फायरफ्लाई टूल्स की मदद से 2025 में 24 अरब डौलर की रिकौर्ड कमाई दर्ज की. माइक्रोसौफ्ट कोपायलट और अजूरे ओपन-एआई सेवाओं का उपयोग फौर्चून 500 की 65 फीसदी से ज्यादा कंपनियां कर रही हैं.

पैलिंटिर जैसी कंपनी सरकारों और दूसरी कंपनियों को एआई डेटा एनालिसिस सर्विस दे कर अरबों डौलर का कारोबार कर रही है. आईबीएम वाट्सनक्स बड़े बिजनैस मौडल के लिए एआई डेटा सर्विस प्लेटफौर्म बन चुका है. वीजा और मास्टरकार्ड हर दिन करोड़ों लेनदेन को एल्गोरिदम से जांचते हैं. फ्रौड पकड़ने और जोखिम का आकलन करने के लिए बड़े पैमाने पर एआई का इस्तेमाल होता है. अलीबाबा अपने क्लाउड, विज्ञापन और खरीदारी की रिक्वैस्ट में एआई एल्गोरिदम का उपयोग करती है.

कोरवेव जैसी कंपनी ने कुछ ही वर्षों में जीरो से बढ़ कर 5 अरब डौलर का कारोबार हासिल कर लिया और आगे इस से भी ज्यादा ग्रोथ का अनुमान है. डाटाब्रिक्स की वैल्यू 134 अरब डौलर तक पहुंच चुकी है और यह कंपनी बेहद कम समय में ही एआई डेटा प्लेटफौर्म का बड़ा नाम बन गई है. माइक्रोसौफ्ट, गूगल, अमेजन और मेटा सिर्फ ये 4 कंपनियां मिल कर 2026 में एआई इन्फ्रास्ट्रक्चर पर 650 अरब डौलर से ज्यादा खर्च करने की तैयारी में हैं. इतनी बड़ी राशि कई देशों के पूरे साल के बजट से भी ज्यादा है.

इंटरनैट पर कोई व्यक्ति क्या देखेगा, यह एल्गोरिदम तय कर रहा है. कौन सा विज्ञापन दिखेगा, कौन सी खबर वायरल होगी, कौन सा वीडियो सामने आएगा आदि सब एआई तय कर रहा है. कंपनियां यूजर के व्यवहार, पसंद और खरीदारी का डेटा इकट्ठा कर के उस से मुनाफा कमा रही हैं. एआई के कारण लाखों नौकरियां खत्म हो रही हैं जबकि नई तकनीक का फायदा सिर्फ बड़ी कंपनियों को मिल रहा है. यह भी सच है कि डेटा, कंप्यूटिंग कैपेसिटी और एआई मौडल को डैवलप करने की लागत इतनी ज्यादा है कि छोटी कंपनियों के लिए कम्पीट करना मुश्किल है.

डेटा और कंप्यूटिंग कुछ कंपनियों के हाथों में होने से इकोनौमिकल डिसबैलेंस तेजी से बढ़ रहा है. यह दुनिया की सारी संपत्ति हड़पने की साजिश ही नजर आ रही है क्योंकि तमाम रिपोर्ट्स यह साफ तौर पर दिखा रही हैं कि एआई और एल्गोरिदम के कारण दुनिया की संपत्ति तेजी से कुछ बड़ी कंपनियों के हाथों में इकट्ठा हो रही है. अगर एआई पर निगरानी, डेटा सुरक्षा और ट्रांसपेरैंसी के नियम मजबूत नहीं किए गए तो भविष्य की इकोनौमी कुछ ही कंपनियों के हाथों में सिमट कर रह जाएगी. यही चिंता आज दुनियाभर के इकोनौमिस्ट्स के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है. Algorithm and Religion

 

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