July 20 Jantar Mantar Protest: 20 जुलाई का दिन मेरे लिए एक सामान्य दिन की तरह ही शुरू हुआ था। मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि उस दिन दिल्ली के बीचों-बीच जो कुछ होने वाला है, उसका मैं खुद एक प्रत्यक्षदर्शी बन जाऊँगी। उस सुबह मैं मेट्रो से अपने ऑफिस, सीपी के ए ब्लॉक, पहुँची। सुबह मेट्रो में किसी तरह की कोई परेशानी नहीं हुई। हम बिल्कुल सामान्य तरीके से ऑफिस पहुँचे। लेकिन ऑफिस पहुँचने के करीब 11 से 11:15 बजे के आसपास हमारे एक स्टाफ ने आकर बताया कि मेट्रो के गेट बंद कर दिए गए हैं और लोगों को बाहर आने की अनुमति नहीं दी जा रही है।
यह सुनकर मैं और मेरे कुछ सहकर्मी नीचे गए।
ऑफिस के नीचे पहुँचकर हमें माहौल कुछ असामान्य लगा। आमतौर पर जिस इलाके में रोज़ाना लोगों की आवाजाही रहती है, छोटी-छोटी दुकानें और स्टॉल दिखाई देते हैं, उस दिन वहाँ एक अजीब सी शांति थी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने पहले से ही पूरे इलाके को खाली करवा दिया हो। हमें नहीं पता था कि ऐसा किसके निर्देश पर हुआ था, लेकिन सामान्य दिनों के मुकाबले वहाँ बहुत कम गतिविधि थी।
हमारे ऑफिस से थोड़ी ही दूरी पर मेट्रो स्टेशन का गेट है। जब हमने वहाँ देखा, तो गेट बाहर से बंद था और बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी वहाँ मौजूद थे। कुछ पुलिसकर्मी पूरी यूनिफॉर्म में थे, जबकि कुछ लोग सिविल ड्रेस में दिखाई दे रहे थे। मेरी नजर कुछ ऐसे लोगों पर भी पड़ी जिनके हाथों में डंडे और छड़ियाँ थीं। कुछ के पास इलेक्ट्रिक बैटन जैसी चीजें भी थीं।
मैंने यह सब अपनी आँखों से देखा। यह दृश्य देखकर हम वापस ऑफिस आ गए।
ऊपर आकर मैंने अपने स्टाफ से बात की और उन्हें बताया कि नीचे क्या स्थिति है। कुछ लोगों ने कहा कि शायद कोई दूसरा गेट खोल दिया गया होगा और अब स्थिति सामान्य होगी। इसलिए हम वापस अपने काम में लग गए। लेकिन दोपहर 12 बजे के बाद स्थिति ने एक और मोड़ लिया।
कुछ पुलिसकर्मी हमारे ऑफिस में आए और उन्होंने हमें ऑफिस बंद करने के लिए कहा। उन्होंने बताया कि जंतर-मंतर से निकला मार्च आगे बढ़ गया है और स्थिति कुछ डिस्टर्बिंग हो गई है, इसलिए हमें ऑफिस बंद कर देना चाहिए।
हमने उनकी बात मानने का फैसला किया। हमें लगा कि हम सामान्य तरीके से ऑफिस बंद करेंगे और अपने-अपने घर चले जाएँगे। लेकिन जब हम नीचे पहुँचे, तब तक स्थिति पूरी तरह बदल चुकी थी। मुझे ठीक समय याद नहीं, लेकिन शायद 12:40 बजे के आसपास का समय रहा होगा। हमने देखा कि मेट्रो का वह गेट, जो पहले बंद था, अब खुला हुआ था। वहाँ से बड़ी संख्या में युवा बाहर निकल रहे थे। उसी समय पुलिसकर्मी उन युवाओं पर लाठियाँ चला रहे थे।
मैंने अपनी आँखों से देखा कि कई युवाओं को पुलिस द्वारा पीटा जा रहा था। कुछ युवा बचने के लिए सेंटर पार्क और पालिका बाजार की तरफ भाग रहे थे। कुछ हमारे ऑफिस की दिशा में भाग रहे थे। उनके पीछे पुलिसकर्मी भी दौड़ रहे थे।
भागती हुई भीड़ में लड़कियाँ भी थीं, लड़के भी थे और कुछ ऐसे लोग भी थे जो हमारी उम्र के लग रहे थे। मुझे नहीं पता कि उनमें से कौन प्रदर्शन में शामिल था और कौन अपने किसी काम से सीपी आया था।
लेकिन जो मैंने अपनी आँखों से देखा, वह यह था कि उस समय भाग रहे लोग नारे नहीं लगा रहे थे। मैंने किसी को किसी पुलिसकर्मी को धक्का देते हुए भी नहीं देखा। वे बस भाग रहे थे—शायद खुद को बचाने के लिए। और उनके पीछे वर्दी में और बिना वर्दी के दिखाई दे रहे कुछ लोग उन्हें डंडों से पीटते हुए आगे बढ़ रहे थे। मेरे लिए यह दृश्य बेहद परेशान करने वाला था।
सबसे ज्यादा हैरानी मुझे इस बात से हुई कि युवाओं को एक खास दिशा में धकेला जा रहा था। उन्हें दूसरी तरफ जाने की अनुमति नहीं दी जा रही थी। पुलिस उन्हें लगातार उस सड़क की ओर भेज रही थी जो हनुमान मंदिर की तरफ जाती है।
हर तरफ पुलिस ही पुलिस दिखाई दे रही थी।इतनी बड़ी संख्या में पुलिस बल मैंने शायद पहली बार देखा था। कई लोगों के हाथों में डंडे और छड़ियाँ थीं।कुछ लोगों के पास इलेक्ट्रिक स्टिक जैसी चीजें भी थीं( मेरी एक दोस्त ने मुझे बताया कि ऐसे इलेक्ट्रिक स्टिक चार्ज किए जाते हैं और इनके इस्तेमाल से चोट के साथ करंट का झटका भी लग सकता है) । उस समय हम खुद भी असमंजस में थे कि आखिर हम किस रास्ते से बाहर निकलें। हम पहले चौराहे की तरफ जाने की कोशिश करने लगे। वहाँ भी हमें सामान्य स्थिति नहीं दिखाई दी। चारों तरफ पुलिस और युवाओं के बीच भागमभाग का माहौल था।
हमने वहाँ रुकना उचित नहीं समझा और अपने ऑफिस के साथ वाली सड़क से पैदल ही निकलना शुरू कर दिया। हम चलते रहे।
काफी दूर तक हमें कोई ऑटो नहीं मिला। हमें यह भी पता नहीं था कि मेट्रो चल रही है या नहीं और कौन सा रास्ता सुरक्षित है। किसी तरह पैदल चलते हुए हम आर.के. आश्रम मेट्रो स्टेशन के पास पहुँचे।
वहाँ जाकर बहुत मुश्किल से हमें एक ऑटो मिला। जिस दूरी के लिए सामान्य दिनों में ऑटो वाला लगभग 150 से 180 रुपये लेता है, उस दिन उसने हमसे 500 रुपये लिए। उस समय हमारे पास ज्यादा विकल्प भी नहीं थे। हमें बस किसी तरह वहाँ से निकलना था। और आखिरकार मैं किसी तरह अपने घर पहुँचे।
लेकिन उस दिन जो मैंने अपनी आँखों से देखा, वह मेरे मन में रह गया।मैंने युवाओं को भागते हुए देखा।
मैंने पुलिस को उनके पीछे दौड़ते हुए देखा।
मैंने लाठियाँ चलते हुए देखीं।
मैंने लोगों को डरते हुए देखा।
मैंने देखा कि एक सामान्य दिन अचानक किस तरह अफरातफरी में बदल गया।
बाद में जब मैं घर पहुँची और टीवी पर खबरें देखीं, तब मुझे पता चला कि वहाँ आँसू गैस के गोले भी छोड़े गए थे और स्थिति और भी गंभीर हो गई थी।
मैं यह नहीं कह रही कि किसी भी प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना आसान होता है। पुलिस की अपनी जिम्मेदारियाँ होती हैं और भीड़ को नियंत्रित करना भी एक चुनौतीपूर्ण काम है।
लेकिन एक नागरिक और एक प्रत्यक्षदर्शी के तौर पर मेरे मन में कुछ सवाल जरूर हैं—
क्या हर प्रदर्शन का जवाब लाठी होना चाहिए?
क्या बातचीत की कोई गुंजाइश नहीं हो सकती?
क्या युवाओं की बात सुनने का कोई रास्ता नहीं निकाला जा सकता?
मैंने उस दिन जो देखा, उसने मुझे भीतर तक परेशान किया।
क्योंकि ये सिर्फ कुछ युवा नहीं थे।
ये हमारे देश के युवा थे।
और जब मैंने अपनी आँखों के सामने उन्हें भागते और पिटते देखा, तो मेरे मन में सिर्फ एक सवाल था—
अगर लोकतंत्र में अपनी बात रखने के लिए निकले युवाओं को भी डर और लाठी का सामना करना पड़े, तो फिर हम उनसे किस तरह के लोकतंत्र की उम्मीद कर रहे हैं?
20 जुलाई मेरे लिए सिर्फ एक तारीख नहीं है।
यह एक ऐसा दिन है जिसे मैंने सिर्फ खबरों में नहीं पढ़ा।
मैं वहाँ थी।
मैंने अपनी आँखों से देखा।
और जो देखा, उसे भूल पाना मेरे लिए आसान नहीं है। July 20 Jantar Mantar Protest
लेखिका – शालू दुग्गल





