Freedom of Democracy: डेमोक्रेसी जब बोलना चाहती है
उसकी जुबान पर
ताला जड़ दिया जाता है
डेमोक्रेसी जब चलना चाहती है
उसके पैरों में बेड़ियां डाल दी जाती है
डेमोक्रेसी
जब देखना चाहती है
उसकी आँखों पर पट्टियां बांध दी जाती हैं
डेमोक्रेसी जब उड़ना चाहती
उसके पंखों को उखाड़ फेंका जाता है
डेमोक्रेसी
जिस दिन
अपनी गुलामी को
पूरी तरह स्वीकार कर लेती है
उसी दिन वह मर जाती है
अपनी मौत से पहले
डेमोक्रेसी
बन्धनों से
मुक्त होने का जो संघर्ष करती है
इसी संघर्ष को
आंदोलन कहते है

जिंदा शरीर में
रक्त का संचार रुक जाये
तो शरीर मुर्दा हो जाता है
ठीक ऐसे ही
लोकतंत्र में
आंदोलन का प्रवाह रुक जाए
तो यह मुर्दा हो जाता है
डेमोक्रेसी जिंदा रहे
इसके लिए
आंदोलन जरूरी होते है

कर्तव्य हो अधिकार न हो
व्यवस्था में सुधार न हो
सत्ता में हों भ्रस्टाचारी
कुर्सी पर हों अत्याचारी
जनतंत्र जब खतरे में हो
और क्रांति लहू के कतरे में हो
तब
आंदोलन जरूरी हो जाते हैं

पूंजीपति सरकार में हों
तो जनता बेचारी हो जाती है
जब सड़कें वीरान हो जाएं
तो संसद आवारा हो जाती है
संसद आवारा हो जाये
तो सत्ता में
मठाधीशों की घुसपैठ हो जाती है
धर्म संसद में होता है
और लोकतंत्र
मठाधीशों के चरणों तले
अपनी मुक्ति की भीख मांग रहा होता हैलूट खसोट सरेआम हो जाये
जब सत्ता बेलगाम हो जाये
विकास का परचम झुक जाए
परिवर्तन का पहिया रुक जाए
सत्ता का नशा सर चढ़ जाए
और बात हद से आगे बढ़ जाये
तब
आंदोलन जरूरी हो जाते हैं

संविधान

नेताओं अभिनेताओं
और सेठों की जेबों में होता है
और न्याय के लिए
लड़ रहा आखिरी आदमी
जेलों में होता है
दंगाईयों के सात खून माफ होते हैं और
प्रस्तावना के पन्नों से वो खून साफ होते हैं
परलोक के सपनों में लोक सो जाता है
धर्म की भीड़ में तंत्र खो जाता है

धर्म की अफीम पीकर
लोक सो जाता है
सत्ता के षड्यंत्रों में तंत्र खो जाता है
तब लोक तन्त्र जिंदा रहे
इसके लिए
आंदोलन जरूरी हो जाते हैं

मानसिक तौर पर गुलाम लोगों के पास
विचार नहीं होते
बस शरीर होता है
शरीरों को
निरंकुशता की आदत होती है
लेकिन
जिनके पास विवेक की पूंजी होती है
उनके पास समाधान की कुंजी होती है
इसलिए
विवेक हमेशा आबाद रहता है
शरीर गुलाम हो भी जाएं लेकिन
दिमाग हमेशा आजाद रहता है
आजाद दिमाग मे
विचारों का द्वंद चलता है
यह द्वंद बदलाव को मचलता है
विचारों के इसी द्वंद से
आंदोलनकारी जन्म लेते हैं
और आंदोलनकारियों के आस्तित्व से
शोषणकारी डरते हैं
इसलिए
आंदोलन जरूरी होते हैं

असहमति जब
सहनशीलता की सीमा पार कर जाए
तो वह आक्रोश में बदल जाती है
आक्रोश जब हद से आगे बढ़ जाये
तो वह आंदोलन बन जाता है
आंदोलन के गर्भ से ही
क्रांति जन्म लेती है
और क्रांति से ही
व्यवस्था बदलती है
क्योंकि
एक आंदोलनकारी
निरंकुशता को कभी
स्वीकार नही करता
परिवर्तन की आग में
खुद को झोंक देता है
किसी महात्मा का
इंतज़ार नही करता
इसलिए
आंदोलन जरूरी होते हैं

दुनिया का हर आंदोलन
विचारों पर
सवार होकर ही
आगे बढ़ता है
और
क्रांति के बीज बोता है
विचारों के द्वंद से
बाहर निकले बिना
कोई भी आंदोलन
क्रांति नही बन सकता

आंदोलन में
विचारों का समावेश न हो तो
तो वह दिशाहीन हो कर
रक्तरंजित हो जाता है

ऐसे में
वास्तविक मुद्दों को
राजनीति की आंच में
जला दिया जाता हैं और
आंदोलनकारी
दंगाई साबित कर दिए जाते हैं

आंदोलन विचारहीन
भीड़ के कंधों पर सवार हो
तो इसका अंत
हिंसा और आगजनी
ही होता है
और इस भीड़ में शामिल
हर आदमी
अपने नागरिक होने की
पहचान खो देता है

नागरिक होने की पहचान
मिट न जाये
प्रस्तावना में लिखे शब्द
धूमिल न हों जाएं
कोई लुटेरा फिर से
सिकन्दर न बन जाये
गुलामी ही हमारी
मुकद्दर न बन जाये
बेबस कोई बेचारा न हो जाये
और संसद आवारा न हो जाये
इसलिए आंदोलन
जरूरी हो जाते हैं
इसलिए आंदोलन
जरूरी हो जाते हैं

Freedom of Democracy

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