Hindi Stories: खबर फैलते देर लगती है क्या. सरसर कर यह बात पूरे महल्ले में फैल गई कि सनी के साथ इतनी बड़ी घटना घट गई. सुन कर लोगों के मुंह खुले के खुले रह गए. सब के मुंह पर यही एक सवाल, ‘हाय, क्यों भला? कैसे? कब? ओह, बड़ा बुरा हुआ उस के साथ. सच में, ऐसा नहीं होना चाहिए था. बेचारे ग्रोवरजी अब क्या करेंगे. कुछ लोग मजे लेले कर कहने लगे, ‘यह लो, इसे कहते हैं, चौबेजी गए छब्बे बनने, दुबे बन के लौटे’. जितने मुंह उतनी बातें. लेकिन ग्रोवरजी के परिवार पर इन दिनों क्या गुजर रही है, यह कोई नहीं सम झ रहा है.
और बेचारा सनी, वह तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं बचा. अपने सारे दोस्तों से, रिश्तेदारों से, आसपड़ोस के लोगों से मुंह छिपाता फिर रहा है. किसी का फोन तक नहीं उठा रहा कि पता नहीं कौन क्या पूछ बैठे. पूरे दिन वह अपने कमरे में बैठा आंसू बहाता रहता है. ऊपर से ग्रोवरजी के ताने उसे मर जाने को मजबूर करते हैं. कई बार तो उस ने अपनी जान देने की भी कोशिश की लेकिन मां परविंदर है जो बेटे के आगेपीछे साए की तरह लगी रहती है कि वह कुछ कर न ले. आखिर बेटा है वह उस का. 9 महीने उस ने उसे अपनी कोख में रखा है तो दर्द तो होगा ही न. इसलिए सम झाती रहती है कि जो हुआ उसे भूल जाए और आगे की सोचे.
लेकिन यह कोई भूलने वाली बात है, भला. उम्रभर याद करने वाली बात है यह तो. और आगे की क्या ही सोचेगा अब वह. कोई रास्ता बचा है उस के पास? ऐसा दर्द मिला है उसे कि सहा भी नहीं जा रहा और किसी से कहा भी नहीं जा रहा. वह जानता है, किसी से कुछ कहा तो सब हंसेंगे उस पर. अरे, क्या सोचा था उस ने और क्या हो गया. कहते हैं न, ‘ताड़ से गिरे खजूर पर अटके,’ बेचारे की ऐसी स्थिति हो गई कि न तो वह इधर का रहा न उधर का. खुली आंखों से कितने सपने देखे थे पर सब धूलमिट्टी में मिल गए.
इधर ग्रोवरजी भी अपने सारे दोस्तों से कन्नी काटते फिर रहे हैं. कोई कुछ पूछ न बैठे, इस डर से दोस्तों की टोली में बैठना तक छोड़ दिया. अपनी दुकान भी बंद कर रखी थी कितने दिनों तक लेकिन कब तक बंद रखते. घरगृहस्थी भी तो चलानी है. परिवार का पेट तो पालना पड़ेगा. ऊपर से 2 जवान होती बेटियां हैं. एक लाड़ला बेटा है सनी, जिस ने ही उन की लुटिया डुबो दी और ऐसी डुबोई कि लुटिया तैर नहीं रही है, बल्कि बुरी तरह से डूब चुकी है. बेचारे ग्रोवरजी, दुकान खोल कर बैठ तो जाते हैं पर लोगों के सवालों से बच नहीं पाते. इसलिए बहुत जल्दी ही दुकान बंद कर घर वापस आ जाते हैं. शेर की तरह पूरे महल्ले में घूमने वाले ग्रोवरजी चूहे की तरह बिल में घुसे रहते हैं. सच में अजीब ही स्थिति हो गई है उन की.
और परविंदर जो महल्ले की औरतों के सामने डींगे हांकते नहीं थकती थी, वह भी तो सब से नजरें चुराती फिर रही है. घर से निकलती नहीं है लेकिन कब तक बंद रहेगी. बाहर के हजारों काम होते हैं, निकलना तो पड़ेगा ही न. निकलेगी तो सवालों का ढेर, किसकिस को क्या जवाब देगी. परविंदर से अब इस महल्ले में रहना मुश्किल होने लगा है. लोगों की उपहासभरी नजरें अब उस से झेली नहीं जा रहीं, इसलिए घर का दरवाजा लगा कर ही रखती है लेकिन कब तक कोई दरवाजे पर कुंडी लगा कर रह सकता है, भला? दम नहीं घुट जाएगा. सनी की भी चिंता सताती रहती है कि कहीं वह कुछ ऐसावैसा न करे ले. इसलिए वह परिवार सहित गांव चली जाना चाहती है. अपने पति ग्रोवरजी से बात की उस ने इस बारे में, पर वे तो चिल्लाने ही लगे एकदम से.
‘‘हां, वहां गांव में तेरे बाप ने खजाना जो गाड़ रखा है. वही निकालनिकाल कर खाएंगे हम? ऐसे क्या देख रही है. सही तो कह रहा हूं मैं. अरे, गांव में अब बचा ही क्या है. घर, जमीन सब तो बिक गया तेरे इस बेटे नालायक बेटे के चलते. अपनी जिद में इस ने सब बरबाद कर दिया, सब बरबाद कर दिया,’’ बोलतेबोलते ग्रोवरजी की आंखों में आंसू आ गए.
अपने आंसू पोंछ फिर वे कहने लगे, ‘‘ये सब जो हो रहा है न, तेरे इस सपूत के चलते हो रहा है, परविंदर. हां, तेरे इस सपूत के चलते. कहीं का नहीं छोड़ा इस ने हमें. ‘न घर के रहे न घाट के’ धोबी के कुत्ते सी गत हो गई हमारी. सब हंस रहे हैं हम पर. तू कहती है कि कहीं तेरा बेटा कुछ कर न ले लेकिन वह निकम्मा यह भी नहीं कर सकता, बता रहा हूं मैं. यह तो मेरी छाती पर मूंग दलने के लिए पैदा हुआ है. अरे, ऐसी औलाद से तो बेऔलाद होना अच्छा.’’ ग्रोवरजी के मुंह से अपने बेटे के लिए केवल कड़वाहट ही निकल रही थी.
‘‘चुप रहो जी, अब. इस में किसी की कोई गलती नहीं है. वैसे भी, होनी को कौन रोक सकता है.’’
‘‘ना न, होनी का नाम न दे, परविंदर,’’ ग्रोवरजी बात काटते हुए बोले, ‘‘ये सब तेरे इस सपूत का कियाकराया है. उसी की जिद में आ कर मैं ने बापदादा की अर्जी अपने हिस्से की सारी जमीन यहां तक कि घर भी बेच डाला इस कपूत को अमेरिका भेजने के वास्ते. लेकिन क्या मिला?’’ ग्रोवरजी हवा में हाथ लहराते हुए बोले, ‘‘दोदो जवान बेटी सिर पर सवार बैठी हैं. कैसे ब्याह करूंगा इन का, बता न?’’
ग्रोवरजी ने फिर वही कहावत दोहराई कि ‘पूत सपूत तो क्यों धन संचय, पूत कपूत तो क्यों धन संचय. ‘‘अरे, मु झे तो पहले ही सम झ जाना चाहिए था यह बात कि यह लड़का हमारा समय बदलने नहीं, उलटने आया है. इस ने तो हमारी जिंदगी उलटपुलट कर रख दी. चल जा कर एक कप कड़क चाय बना ला. सिर दर्द से फटा जा रहा है.’’ ग्रोवरजी खटिया पर उधर मुंह कर के लेट गए और परविंदर अपने आंचल से आंसू पोंछती रसोई में चली गई.
ग्रोवरजी के मन में बस वही बातें चल रही थीं कि ‘ऐसा न होता तो कितना अच्छा होता. आखिर क्यों हुआ ऐसा. बेड़ा गर्क हो उस दलाल का जिस ने हमें इस नर्क में धकेला. क्या मिल गया उसे ऐसा कर के? चार पैसे कमाने के लिए आदमी इंसानियत भूल जाता है? सच कह रहा हूं, भला नहीं होगा उस दलाल का जिस ने हमें ऐसे दिन दिखलाए. ग्रोवरजी खटिया पर लेटेलेटे ही सोच रहे थे.
अरे, सोचा था औरों की तरह मेरा बेटा भी विदेश जाएगा. खूब पैसा कमाएगा. बड़ा आदमी बनेगा लेकिन सारे सपने मुंगेरी लाला के हसीन सपने की तरह धरे के धरे रह गए. और तो और, सनी मुजरिम की तरह जंजीरों में जकड़ कर वापस आया. ओहो, लोग कैसे देख रहे थे हमें. जैसे हम कितने बड़े मुजरिम हों.
और वह बलविंदर, जो मेरे सामने खड़े होने की हिम्मत तक न करता था, आज वह कैसे सरेआम मेरी खिल्ली उड़ा रहा है. मु झ से ऐसे तन कर बात करता है जैसे मैं उस का नौकर हूं. अरे, बात तो यह है कि मैं ने उस की बेटी गुरलीन से अपने सनी का रिश्ता करने से जो इनकार कर दिया था, आज वह उसी का बदला ले रहा है. खुश हो रहा है मेरी खिल्ली उड़ा कर. जिस बलविंदर का मुंह मेरे सामने इत्ता सा हो जाता था, आज उसी बलविंदर के सामने हमारी इत्ती सी भी इज्जत नहीं रह गई. सब पता है मु झे, इसी इसी बलविंदर ने आग की तरह यह बात पूरे महल्ले में फैलाई कि सनी मुजरिम की तरह जंजीरों में जकड़ कर अपने वतन वापस आ गया. मेरा पड़ोसी जो है, हर बात की खबर होती है उसे. मु झे तो बस एक बार वह दलाल मिल जाए तो मैं उस का कचूमर न बना दूं तो कहना. ग्रोवरजी ने गुस्से में खटिया के पौवे पर जोर का हाथ मारा तो उलटा उन के ही हाथ का कचूमर बन गया और वे जोर से चिल्ला पड़े.
‘‘अरे, क्या हुआ?’’ परविंदर दौड़ी आई.
‘‘कुछ नहीं, चाय ला,’’ ग्रोवरजी ने मुंह घुमा कर कहा, तो परविंदर बोली कि घर में चायपत्ती खत्म हो गई. ‘‘खत्म हो गई तो बता नहीं सकती थी पहले? बोल सनी को, जा कर ले आए. चाय पीनी है मु झे.’’
सनी दुकान से चाय लाने गया तो वहां उसे सिमरन दिख गई. वह भी दुकान से कुछ खरीदने आई थी. सिमरन को देख कर सनी कुछ देर के लिए अपना सारा दुख भूल गया और उस के होंठ मुसकरा उठे. वह आगे बढ़ कर उसे हाय बोलता या हालचाल पूछता, उस से पहले ही अपनी स्कूटी से वह फुर्र हो गई. पलट कर भी नहीं देखा उसे फिर. बेचारा, पहले से क्या कम दुखी था जो अब सिमरन भी… कद्दू सा मुंह लटकाए घर पहुंचा और बिछावन पर जा कर पट पड़ गया. अब तो भूखप्यास भी गई उस की. किस से क्या कहे. कौन सुनेगा उस की क्योंकि उस ने सुनी थी किसी की जो उस की कोई सुनेगा.
सनी का एक दोस्त अमेरिका क्या गया, उसे भी भूत सवार हो गया अमेरिका जाने का. घर में उस ने हंगामा खड़ा कर दिया कि जैसे भी हो, उसे अमेरिका जाना ही है. यहां तक कि उस ने खानापीना तक छोड़ दिया था ताकि उस की बात मान ली जाए. अब एक ही बेटा है यह सोच कर ग्रोवरजी ने अपने बापदादा की संपत्ति बेच कर उसे अमेरिका भेज दिया लेकिन मुश्किल से 2 साल भी वह अमेरिका में नहीं रहा और वापस आ गया.
सनी अमेरिका के एयरफोर्स विमान में जंजीरों में बांध कर नरेंद्र मोदी के दोस्त डोनाल्ड ट्रंप द्वारा निकाले गए भारतीयों में से एक था. अमेरिका में ट्रंप सरकार बनते ही वहां अवैध रूप से रह रहे लोगों की मुसीबत हो गई. ट्रंप सरकार ने भारतीय नागरिकों को अपमानित कर उन्हें मुजरिमों की तरह जंजीरों में जकड़ कर वापस भारत भेज दिया. सनी ने जब रोरो कर अपनी मां को यह बात बताई कि वह 15 दिनों तक नहाया नहीं, ब्रश भी नहीं किया, कई दिनों से ठीक से खाया नहीं तो परविंदर फूटफूट कर रो पड़ी थी. बेचारा, वहां से लौटने के बाद कितना कमजोर हो गया था और ऊपर से ग्रोवरजी के ताने सुनसुन कर तो वह डिप्रैशन में भी चला गया.
उस के जख्मों पर सब नमक ही छिड़क रहे थे लेकिन उस का दिल टूट कर तब चूरचूर हो गया जब सिमरन से उस की मंगनी भी टूट गई. सोचा था एक बार उस से मिल कर बात करेगा. वह जरूर सम झेगी उसे क्योंकि उन का प्यार एकदो दिन का नहीं, महीनों का था. रोज दोनों देरदेर रात तक फोन पर गप्पें मारा करते थे, अपने उज्ज्वल भविष्य के सपने देखा करते थे. सिमरन कहती थी कि वह इस दुनिया में उस के लिए ही आई है. वह तो यह तक कहती थी कि उसे उस दिन का बड़ी बेसब्री से इंतजार है जब वह सनी की दुलहन बन कर उस के घर आएगी और फिर दोनों हवाई जहाज से उड़ कर अमेरिका चले जाएंगे लेकिन सब गुड़गोबर हो गया.
अब बेरोजगार लड़के से कौन लड़की शादी करेगी भला? आज की लड़कियां अब इसी शर्त पर प्यार और शादी करती हैं जहां लड़के के पास अच्छी जौब और ढेर सारा बैंकबैलेंस हो. सनी के पास ये दोनों ही चीजें नहीं थीं तो फिर क्यों वह उसे घास डालती? वह कोई और नहीं ढूंढ़ लेगी अपने लिए? शायद ढूंढ़ भी लिया हो, तभी तो उस ने सनी को देख कर भी इग्नोर कर दिया.
गुरुदासपुर में रहने वाले सनी के परिवार वालों की पहले बहुत इज्जत हुआ करती थी. आतेजाते लोग ग्रोवरजी को सलामी ठोकते थे लेकिन आज वही लोग उन पर हंस रहे हैं. लोगों के बीच वे मजाक के पात्र बन कर रह गए. लोग मजे लेले कर कह रहे हैं कि बड़ा बेटे को विदेश भेजने चला था, लो, लौट कर बुद्धू घर को आ गया न.
लेकिन ग्रोवरजी को जिस बात का डर था वही हुआ. इन सब बातों के कारण सनी का रिश्ता टूट गया. जोगिंदरजी ने फोन पर ही सनी से अपनी बेटी सिमरन का रिश्ता यह कहते हुए तोड़ दिया कि उन्हें उन के घर अपनी बेटी नहीं देनी.
‘‘अरे, पर मेरी बात तो सुनिए जोगिंदरजी,’’ ग्रोवरजी ने अपनी बात रखनी चाही थी, ‘‘आप जैसा सोच रहे हैं वैसी कोई भी बात नहीं है. लोग तो कुछ भी बोल रहे हैं, आप लोगों की बातों पर मत जाइए. वे जलते हैं हम से, नहीं चाहते कि मेरे बेटे की शादी आप की बेटी से हो लेकिन मैं सच कह रहा हूं, आप जैसा सोच रहे हैं वैसी कोई बात नहीं. मेरा बेटा तो कुछ दिनों की छुट्टियों पर यहां आया है, चला जाएगा फिर वापस अमेरिका. और यह तो सोचिए हमारे बच्चों की सगाई हो चुकी है. फिर आप शादी तोड़ने की बात कैसे कर सकते हैं?’’
‘‘क्यों नहीं कर सकते, जी? क्या हम जानबू झ कर मक्खी निगल जाएं, यही कहना चाहते हैं आप? नहीं, जी नहीं, अब यह रिश्ता नहीं हो सकता. माफ करो मु झे.’’ कह कर जोगिंदरजी ने फोन काट दिया दिया था. और तो और, उन्होंने ग्रोवरजी का नंबर भी ब्लौक कर दिया ताकि वे दोबारा उन्हें कौल न कर सकें.
बेचारे ग्रोवरजी की सांपछछूंदर की गति हो गई थी. यही ग्रोवर ही कैसे अपना सीना चौड़ा कर लोगों के सामने अकड़ कर चलते और अपनी मूंछों पर ताव दे कर कहते फिरते थे कि उन का बेटा सनी विदेश गया है, विदेश. अरे, देखना कैसे सेठ बन कर लौटेगा वह एक दिन. सनी के विदेश जाने की बात सुन कर कैसे बेटियों वालों की लाइन लग गई थी उन के दरवाजे पर. हर बेटी का बाप इसी फिराक में था कि कैसे भी कर के ग्रोवरजी के बेटे सनी से उन की बेटी का रिश्ता तय हो जाए.
बलविंदर भी अपनी बेटी गुरलीन का रिश्ता ले कर ग्रोवरजी के घर आया था लेकिन ग्रोवरजी कोई कच्चे खिलाड़ी तो थे नहीं जो शादी के लिए तुरंत हां कर देते. वे तो तोल रहे थे अभी कि कौन सब से बड़ा ग्राहक आता है उन के एनआरआई बेटे को खरीदने.
एक दिन शहर के बड़े बिजनैसमैन जोगिंदरजी अपनी एकलौती बेटी सिमरन का रिश्ता ले कर उन के घर पहुंच गए. अब पैसों की तो कोई कमी थी नहीं उन के पास. जितना चाहे दे सकते थे अपनी बेटी को. और ग्रोवरजी तो थे ही पैसों के भूखे इंसान. वे तो जोगिंदरजी जैसे मोटे बकरे को ही ढूंढ़ रहे थे जो उन की तिजोरी पैसों से लबालब भर दे. इसलिए तुरंत उन्होंने इस रिश्ते के लिए हां कह दी और आननफानन दोनों बच्चों की सगाई भी हो गई और कुछ ही महीनों बाद शादी की डेट पड़ गई. सगाई होने जाने के बाद सिमरन और सनी रोज फोन पर बातें करने लगे. सनी उसे वीडियोकौल कर वहां की चीजें दिखलाता और कहता कि जब वह ब्याह कर यहां आएगी, तब दोनों खूब घूमेंगेफिरेंगे और सिमरन सपनों की दुनिया में खो जाती फिर.
इस शादी के लिए जोगिंदरजी ने ग्रोवरजी की हर वह डिमांड मानी जो वे करते गए. बस, वे चाहते थे कि कैसे भी कर के सिमरन की शादी सनी से हो जाए तो वे गंगा नहा लें. आखिर वे भी तो अपने समाज में लोगों को यह दिखलाना चाहते थे कि उन्होंने अपनी बेटी की शादी एक एनआरआई लड़के से की, जो एक शान की बात होती है. समय की नजाकत को देखते हुए ग्रोवरजी ने भी बहती गंगा में खूब हाथ धोया लेकिन ऐन वक्त पर सब गड़बड़ हो गया. ग्रोवर के हसीन सपने, सपने ही रह गए.
सनी के वापस आने की बात सुन कर ग्रोवरजी को अटैक आतेआते बचा था और परविंदर तो खड़ेखड़े धड़ाम से नीचे गिर पड़ी थी बेटे को जंजीरों में जकड़े देख कर. घर में रोनाबिलखना शुरू हो गया था. अब रोएबिलखे भी क्यों न, क्योंकि उन के हाथ के तोते जो उड़ गए, सोचा था, जोगिंदरजी के रूप में दुधारू गाय मिल गई उन्हें, जिसे वे जब चाहें तब दुहते रहेंगे पर उन्होंने तो लताड़ ही मार दी.
ऊपर से अपने बेटे को विदेश भेजने के वास्ते जो लाखों रुपए खर्चे, वह भी सब पानी में चला गया. साथ में इज्जत, शान, रुतबा सब चला गया. इसे ही कहते हैं समय की मार. न तो वे इधर के रहे न उधर के. Hindi Stories





