India Foreign Policy: पिछले हफ्ते भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सेशेल्स से मिले "गार्डियन ऑफ द ब्लू होरिज़न” सम्मान के बाद जो तमाशा हुआ, उसने एक बार फिर साबित कर दिया कि बीजेपी सरकार विदेश नीति को भी पीआर इवेंट समझती है. इस इवेंट के बाद देश की किरकिरी हुई और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी का सामना भी करना पड़ा. सेशेल्स जैसे छोटे से देश से मिले सम्मान का सर्टिफिकेट जब सोशल मीडिया पर आया तो उसमें इतनी स्पेलिंग मिस्टेक्स थीं की वो एआई जेनरेटेड लग रहा था. विदेश मंत्रालय बाद में सफाई दे रहा है कि वो सर्टिफिकेट तो महज वर्किंग ड्राफ्ट था.

सवाल यह है कि क्या जब चीन, अमेरिका के राष्ट्राध्यक्षों को ऐसा सम्मान मिलता है तो क्या उन्हें भी गलती से गलत पेपर थमा दिया जाता है? सच तो यह है कि ये घटना सिर्फ लापरवाही नहीं है बल्कि नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं को ट्रॉफी कलेक्शन टूर बनाने की मानसिकता का नतीजा है.

इसी मामले पर द गार्जियन ने स्टोरी छापी और लिखा "Give him any award, and he'll come running" यानि उन्हें कोई अवार्ड दो वे दौड़े चले आएंगे” आखिर ये तंज क्यों बना? असल में तो द गार्डियन ने जो लाइन हेडलाइन में छापी वो कांग्रेस की टिप्पणी थी और देश के विपक्ष को यह अधिकार है की वह प्रधानमंत्री के इवेंटबाजी पर सवाल उठाये लेकिन ऐसी टिप्पणी के साथ कोई अंतर्राष्ट्रीय मैगजीन स्टोरी छापे यह बेहद शर्मनाक है.

पिछले 10 साल में 100 से ज्यादा विदेश यात्राएं हुईं जिनमें नरेंद्र मोदी को 20 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले. हर यात्रा के बाद फोटो, हर सम्मान के बाद 2 घंटे का स्पेशल शो. विदेश में इतने अवार्ड मिल रहे हैं और देश में मीडिया इन इवेंट्स का शोर मचा रही है. जनता को असली मुद्दों से भटकाकर यह समझाया जाता है की प्रधानमंत्री को अवार्ड पर अवार्ड मिल रहे हैं इससे देश की अंतर्राष्ट्रीय छवि मजबूत हो रही है. जनता के अंदर की निराशा खत्म हो जाती है और राष्ट्रवाद कुलांचे मारने लगता है.

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