Indian Politics: नरेंद्र मोदी के 12 साल के प्रधानमंत्रित्व काल का खूब प्रचार चल रहा है. टाइम्स औफ इंडिया जैसे बड़ेबड़े तमाम अखबारों में फ्रंट पेज पर 12 वर्षों की उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटा गया. राम मंदिर, धारा 370 जैसे कामों को गिनाया जा रहा है जबकि नोटबंदी, बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई, बढ़ती सांप्रदायिकता, शिक्षा का लगातार गिरता स्तर और रुपए की लगातार गिरती वैल्यू जैसी विफलताओं को छिपाया जा रहा है. जिन उपलब्धियों का ढोल पीटा जा रहा है, उन की जमीनी हकीकत क्या है, आइए जानते हैं.
सारे धर्मों ने हमेशा अपनी महानता का ढोल पीटा है. हमारे देश में आज की राजनीति भी ढोल पीटने पर टिकी है. जब आप के पास तथ्य न हों तो महानता का ढोल पीटना बहुत आसान काम है. गौरव का ढोल तो कभी संस्कृति और सभ्यता का ढोल धर्म से सीखें. बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ, यह किसी ने नहीं देखा, लोगों को बुद्ध ने बताया. मूसा को 10 कमांडैंट मिले, लोगों ने नहीं देखा, मूसा ने खुद ही ढोल पीटा. हजरत मुहम्मद को गुफा में जिब्रील मिले, किसी ने नहीं देखा, हजरत मुहम्मद ने ही कहा.
असल में ढोल पीटने का यह खेल बेहद पुराना है. राजा अपने चक्रवर्ती होने का ढोल पीटते रहे. पुरुष अपनी मर्दानगी का ढोल पीटते रहे. ऊंची जाति अपनी श्रेष्ठता का तो अमीर अपने रुतबे का ढोल पीटते रहे. असल में ढोल वही पीटता है जो अंदर से खोखला होता है. सच को ढोल की जरूरत नहीं होती लेकिन ?ाठ के लिए ढोल पीटना जरूरी होता है. थौमस अल्वा एडिसन के नाम पर कोई ढोल नहीं पीटा जा रहा जिन्होंने बिजली ईजाद की. आज नरेंद्र मोदी अपने
12 साल का ढोल पीट रहे हैं. ढोल पीटने की यह संस्कृति असल में खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझने की मानसिकता की उपज है. सभी धर्मों में ढोल पीटने की परंपरा सदियों पुरानी है. कोई चमत्कार चाहे हुआ भी न हो, बस, गुरु या पैगंबर ने खुद कहा, तो लोग मान गए. आम जनता को सुबूतों की जरूरत नहीं होती. विश्वास और प्रचार काम करता है. ढोल पीटने से ?ाठ भी सच हो जाता है. यही ढोल आज राजनीति में खूब बज रहा है. पुराने समय में राजा चक्रवर्ती होने का ढोल पीटते थे. आज के नेता अपने विकास का ढोल पीटते हैं. ढोल पीटना ?ाठों की परंपरा का हिस्सा है क्योंकि इस में सिर्फ ढोंग और दिखावा होता है.
धर्म अंधविश्वास पर टिका है. चमत्कार, स्वर्गनर्क, पुनर्जन्म का ढोल पीटे बिना कोई भी धर्म जिंदा नहीं रह सकता. आज राजनीति भी इसी रास्ते पर चल रही है. राम मंदिर, हिंदुत्व, राष्ट्रवाद का प्रचार आदि सब वोट बटोरने के हथियार बन गए हैं. क्या राम मंदिर से गरीबी, बेरोजगारी या शिक्षा की समस्या हल हुई? क्या मंदिरमसजिद के मुद्दे से जनता के संस्थान मजबूत हुए? फिर 12 साल लगातार राज करते रहने का ढोल पीटने का क्या अर्थ है?
जब डैमोक्रेसी तर्क और सुबूत पर चलती है तभी वह जनता के हित में बनी रहती है. डैमोक्रेसी के लिए न तो भगवान मायने रखता है, न चमत्कार, नेता भी चमत्कारी नहीं होते लेकिन राजनीति में भगवान भी होता है और चमत्कार भी होते हैं और कई बार नेता ही अवतार बना दिए जाते हैं. डैमोक्रेसी में नेता के काम देखे जाते हैं. वह कितने साल सत्ता में रहा, यह नहीं गिना जाता. नेता के कामों से देश की जनता को क्या लाभ मिला, यह आंका जाता है, उस के दिन या फेरे नहीं गिने जाते.
बड़े दावों के लिए सुबूत भी बड़ा चाहिए
असाधारण दावों के लिए असाधारण सुबूतों की जरूरत होती है. लोकतंत्र और विज्ञान इसी सिद्धांत पर चलते हैं. मगर मानव इतिहास में समाज को हमेशा चमत्कारों, महानता के दावों और उन के जबरदस्त प्रचार के सहारे नियंत्रित किया गया है. चाहे वह हिंदुओं के ग्रंथों का पौराणिक काल हो, मध्यकाल हो या आज के अमेरिका का आधुनिक दौर, ढोल पीटने यानी खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने की यह संस्कृति हमेशा कायम रहती है.
विज्ञान और लोकतंत्र की खूबी यह है कि जब तक किसी घटना को प्रयोगशाला या स्वतंत्र गवाहों द्वारा परखा न जा सके, उसे अंधविश्वास या व्यक्तिगत दावा ही माना जाता है लेकिन विज्ञान और डैमोक्रेसी से उलट राजनीति में अंधविश्वास और दावे ही मायने रखते हैं. नेता खुद को चुनौती से परे दिखाने के लिए अवतार होने का ढोल पीटते हैं. अपने बारे में बड़ीबड़ी बातें करना और फिर उन्हें बारबार दोहरा कर लोगों के मन में स्थापित कर देना राजनीति का तरीका बन रहा है. धर्मों ने भी यह किया और राजाओं ने भी.
आज की राजनीति भी इस से अलग नहीं है. फर्क सिर्फ इतना है कि पहले ढोल पीटने का यह काम कथाओं, पुराणों और धार्मिक ग्रंथों से होता था, आज टीवी, सोशल मीडिया और सरकारी प्रचार के माध्यम से होता है. पहले हर राजा स्वयं को महान, विजेता और जनता का रक्षक बताता था और दरबारी कवि उस की प्रशंसा में ग्रंथ लिखते थे.
आज लोकतंत्र का युग है लेकिन प्रचार की संस्कृति खत्म नहीं हुई है. बस, तरीके हाईटैक हो गए हैं. अब दरबारी कवियों की जगह टीवी चैनल, आईटी सैल, विज्ञापन एजेंसियों और सोशल मीडिया अभियान ने ले ली है. भारत के आज तक, इंडिया टीवी, एबीपी न्यूज और अमेरिका का फौक्स न्यूज चैनल्स एक जैसे हैं. एक नरेंद्र मोदी में अवतार देखता है, दूसरा डोनाल्ड ट्रंप में.
जवाहरलाल नेहरू ने कितना ढोल पीटा
ढोल पीटना आसान है लेकिन सच का सामना करना बेहद मुश्किल. मोदी के काल में प्रचार और पार्टी संगठन खूब मजबूत हुआ क्योंकि धर्मकथाओं से धर्म के प्रचार एयर ढोल पीटने की आदत और मजबूत हुई और इसी मजबूती के साथ उन संस्थाओं की बरबादी हुई जिन से जनता को हक मिले थे. साथ ही, विभाजनकारी राजनीति का दौर भी शुरू हुआ है.
मोदी के 12 साल में यूपीआई, कुछ डिजिटल सुविधाएं आईं लेकिन देखा जाए तो ये सभी या तो नेहरू की वैज्ञानिक सोच पर आधारित हैं या फिर पश्चिमी देशों की कंपनियों की तकनीक का कमाल हैं. प्रचार मशीन ने इन्हें मोदी का चमत्कार बना दिया है. स्टीम इंजन, बिजली, टैलीफोन, ट्रांजिस्टर, माइक्रोचिप क्या वर्ष 2014 के बाद पैदा हुए थे और क्या ये भारत की ईजाद हैं?
नेहरू ने आधुनिक भारत की नींव रखी. उन्होंने आईआईटी की शृंखला 1950 से ही शुरू कर दी. आईआईटी खड़गपुर 1951 में शुरू हुआ. आईआईएम और एम्स जैसे संस्थान 1956 में बने. 1969 में आईएसआरओ जैसी संस्थाएं बनीं. ये संस्थान आज भी भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति का आधार हैं. इन संस्थाओं के अलावा जवाहरलाल नेहरू ने लोकतंत्र, संसदीय व्यवस्था, वैज्ञानिक सोच और धर्मनिरपेक्षता को मजबूत किया.
नेहरू ने कोई ऐसा काम नहीं किया जो दुनिया में पहली बार हुआ हो लेकिन उन्होंने जो किया, उस का ढोल न उन्होंने खुद न ही उन की पार्टी कांग्रेस ने कभी पीटा. बात कांग्रेस और नेहरू के प्रशंसा की नहीं, सिर्फ प्रचार से अपने को महान कहने की है.
1947 में जब देश आजाद हुआ, तब भारत बेहद गरीबी, अशिक्षा और सांप्रदायिक हिंसा से जू?ा रहा था. उस दौर में नेहरू ने किसी चमत्कार का दावा करने के बजाय देश को मजबूत संस्थान दिए. चुनाव आयोग, स्वतंत्र न्यायपालिका और योजना आयोग को खड़ा किया ताकि सत्ता किसी एक व्यक्ति के हाथ में केंद्रित न रहे. नेहरू के दौर में भारत की साक्षरता दर जो 1947 में मात्र 12 प्रतिशत थी, वह उन के कार्यकाल के अंत तक बढ़ कर लगभग 30 प्रतिशत तक पहुंची.
यह बदलाव बिना ढोल पीटे हुआ. नेहरू को अपने काम गिनाने के लिए भारीभरकम पीआर और विज्ञापनों की जरूरत ही नहीं पड़ी. नेहरू ने संस्थान बनाए, लेकिन मोदी सरकार ने कई संस्थानों की आजादी और विश्वसनीयता खत्म कर दी. सीबीआई, ईडी, चुनाव आयोग, मीडिया और न्यायपालिका जैसे स्वतंत्र संस्थान राजनीति का शिकार हो कर पार्टी दफ्तर के हुक्म पर चलने लगे.
यह ध्यान रखना चाहिए कि निरक्षरता को चाहती तो ब्रिटिश सरकार भी खत्म कर सकती थी और उस समय की हिंदू रियासतों के राजा भी खत्म कर सकते थे. किताबों की सुविधा 18वीं सदी में आ चुकी थी. स्कूलकालेज खुलने लगे थे लेकिन हरेक के लिए दरवाजे तो बाद में 1947 में खुले. पहले उन को कौन रोक रहा था जो हिंदू धर्म की महानता के गुण गाए जा रहे थे.
विकास का ढोल ह्यकितना कारगर
मोदी सरकार का दावा है कि 12 सालों के दौरान राष्ट्रीय राजमार्ग 91,000 किलोमीटर से बढ़ कर 1.46 लाख किलोमीटर हो गए, एयरपोर्ट 74 से 160 हो गए और इस बीच रेलवे इलैक्ट्रिफिकेशन भी बढ़ा है लेकिन सच्चाई यही है कि नरेंद्र मोदी की ये उपलब्धियां पुरानी नींव पर ही बनी हैं. मोदी सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर का ढोल खूब पीटती है लेकिन बीजेपी का असली इंफ्रास्ट्रक्चर हर जिले में बीजेपी के पार्टी कार्यालय हैं. कांग्रेस के दफ्तर 70 साल के शासन के बावजूद मैली, खंडहरनुमा बिल्ंिडगों में हैं.
12 सालों में कोई नया हौस्पिटल, यूनिवर्सिटी या संस्थान बना हो या न, लेकिन बीजेपी ने पूरे देश में 500 से ज्यादा जिला स्तर के अपने भव्य कार्यालय बना कर खड़े जरूर कर दिए हैं. हर जिला कार्यालय पर 1.5 से 3 करोड़ रुपए खर्च हुआ है. हजारों करोड़ रुपए सिर्फ इन कार्यालयों पर खर्च हुए हैं, जबकि आम लोग आज भी स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के लिए तरस रहे हैं.
इन सब के अलावा अगर बीजेपी के पिछले एक दशक के शासन को तार्किक और आर्थिक आंकड़ों की कसौटी पर कसा जाए तो प्रचार और जमीनी हकीकत में अंतर साफ दिखता है. पिछले कुछ वर्षों में सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग, सीबीआई और ईडी जैसी संस्थाओं की निष्पक्षता पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सवाल उठे हैं. ‘वी डेम’ जैसी इंटरनैशनल संस्थाओं ने तो भारत को इलैक्टोरल औटोक्रेसी की श्रेणी में रखा है.
सरकार डिजिटल इंडिया और मजबूत अर्थव्यवस्था का भी खूब ढोल पीटती है लेकिन अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी और सैंशस के डाटा बताते हैं कि भारत में ग्रेजुएट युवाओं में बेरोजगारी दर ऐतिहासिक रूप से बढ़ी है. यह एक कड़वा सच है कि सरकारी स्कूलों, अस्पतालों और पब्लिक ट्रांसपोर्ट के बुनियादी ढांचे को बरबाद किया गया.
मोदी के विकास के दावे को आंख मूंद कर स्वीकार करवाने में मीडिया जुटी हुई है. सच यह है कि देश का निर्माण आत्मप्रशंसा से नहीं, बल्कि मजबूत, स्वतंत्र और पारदर्शी संस्थाओं से होता है. मीडिया को गोदी मीडिया कहना क्या यह साबित नहीं करता कि भारत में ढोल की ही पूजा होती है.
वैसे तो हर सरकार अपनी उपलब्धियों का प्रचार करती है, यह लोकतंत्र का हिस्सा भी है लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब प्रचार असलियत के बिलकुल उलट हो जाता है और सत्ता की आलोचना को देशद्रोह या विरोधी राजनीति बता कर खारिज किया जाने लगता है. लोकतंत्र की मजबूती के लिए संस्थाओं की स्वतंत्रता, प्रैस की आजादी, विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक सद्भाव भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं और इन्हीं बिंदुओं पर मोदी सरकार की आलोचना होती है क्योंकि इन 12 सालों में स्वतंत्र संस्थाओं की स्वायत्तता कमजोर हुई है और राजनीतिक धु्रवीकरण बढ़ा है.
लोकतंत्र से निर्माण सीधेसीधे जुड़ा है. सोवियत रूस में जम कर ढोल पीटा जाता था कि मजदूरो व किसानों की सरकार है, उत्तर कोरिया में खूब ढोल पीटा जाता है कि किम जोंग उन के वारिसों ने बहुत दूर मार कर सकने वाली मिसाइल बना ली हैं लेकिन जनता को क्या मिला है? दोनों देशों की जनता भारत की जनता की तरह भूखीनंगी है, लड़ाई में मरने को मजबूर है.
12 साल का विकास या सिर्फ ढोल
देश में मोदी सरकार के 12 साल पूरे हो चुके हैं. अखबारों के फ्रंट पेज पर राम मंदिर, अनुच्छेद 370 की समाप्ति जैसी उपलब्धियों का खूब प्रचार हो रहा है. इंफ्रास्ट्रक्चर, यूपीआई, आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं को भी हाईलाइट किया जा रहा है लेकिन नोटबंदी, सांप्रदायिक तनाव, रुपए की गिरती कीमत और बेरोजगारी जैसी समस्याओं पर चुप्पी साध ली गई है.
राम मंदिर बना. यह हिंदू भावनाओं के लिए बड़ा प्रतीक है. प्राण प्रतिष्ठा 2024 में हुई और निर्माण लागत करीब 19 सौ करोड़ रुपए आई. यह पूरी रकम दान से आई लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पूरे देश की प्रगति का मापदंड है? मंदिर से उत्तर प्रदेश के एक जिले अयोध्या में पर्यटन जरूर बढ़ा लेकिन उसी उत्तर प्रदेश के हजारों गांवों में आज भी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं. असल में एक धार्मिक प्रोजैक्ट को राष्ट्रीय उपलब्धि बता कर आर्थिक व सामाजिक मुद्दों से ध्यान भटकाया जा रहा है.
बीजेपी अपने 12 सालों के शासन की दूसरी सब से बड़ी उपलब्धि अनुच्छेद 370 की समाप्ति को बताती है. 2019 में अनुच्छेद 370 हटाया गया. सरकार का दावा था कि इस से कश्मीर में आतंकवाद कम होगा, विकास बढ़ेगा, घाटी में शांति आएगी लेकिन कश्मीर में स्थानीय लोगों में असंतोष आज भी बरकरार है. राज्य का दर्जा अभी तक बहाल नहीं हुआ. विकास के दावे ?ाठे साबित हुए. बेरोजगारी जस की तस है. 370 हटाए जाने के बाद भी आतंकवाद में कोई कमी नहीं आई. पुलवामा और पहलगाम जैसे आतंकी हमले 370 हटाए जाने के बाद ही हुए. 370 को हटाने का एकतरफा फैसला लोकतंत्र की भावना के खिलाफ था. भले ही सुप्रीम कोर्ट ने इसे वैध ठहराया हो.
नरेंद्र मोदी सरकार के 12 सालों का सब से बड़ा फैलियर नोटबंदी थी जिस पर सरकार बात तक नहीं करती. हालांकि नोटबंदी को राष्ट्रहित में बताने के लिए ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों का सहारा लिया गया लेकिन फिल्में कल्पनाओं के नाम पर भीड़ इकट्ठा कर सकती हैं इन्हें सही नहीं ठहरा सकतीं.
8 नवंबर, 2016 को कालाधन, फेक नोट और आतंकवादी फंडिंग खत्म करने के नाम पर देश की करंसी को ही रद्द कर दिया गया. आरबीआई के अनुसार, 99 प्रतिशत नोट बैंक में वापस आ गए. इस से बीजेपी के तमाम नैरेटिव गलत साबित हुए. अर्थव्यवस्था को ?ाटका लगा. छोटे कारोबार, किसान और मजदूर सब से ज्यादा प्रभावित हुए. लाखों नौकरियां चली गईं. जीडीपी ग्रोथ में गिरावट आई.
कालाधन कैश में कम ही होता है. असली कालाधन प्रौपर्टी, सोना, विदेशी खातों में ही रहे जिस पर कोई असर नहीं पड़ा. यह एपिक फैलियर था जिस ने आम आदमी को परेशान किया और इकोनौमी को भारी नुकसान पहुंचाया.
सरकार दावा करती है कि सांप्रदायिक दंगे कम हुए लेकिन रिपोर्ट्स उलट कहानी बताती हैं. एनसीआरबी के अनुसार 2014 से 2016 के बीच ही ऐसी हजारों घटनाएं हुई हैं. 2017 से 2022 के बीच सांप्रदायिक तनाव और दंगों की 2,900 से ज्यादा घटनाएं दर्ज की गई हैं. लिंचिंग, धर्मांतरण विवाद और मंदिर, मसजिद जैसे बेबुनियादी मुद्दे बढ़े हैं. इस दौरान अल्पसंख्यकों पर हमले की सब से ज्यादा घटनाएं रिपोर्ट हुई हैं. हालांकि दंगे तो पिछली सरकारों में भी हुए हैं लेकिन मोदी काल में ध्रुवीकरण की राजनीति को खूब बढ़ावा मिला, इसलिए सरकार के शांति के दावे बिलकुल सतही हैं.
अगर विकास का आकलन आम आदमी की जिंदगी से किया जाए तो तसवीर उतनी चमकदार नहीं दिखती जितनी विज्ञापनों में दिखाई जाती है. आज भी लाखों किलोमीटर ग्रामीण सड़कें पक्की नहीं हो पाईं. भारत का कुल सड़क नैटवर्क लगभग 66 लाख किलोमीटर है, जिस में सब से बड़ा हिस्सा ग्रामीण सड़कों का है. सरकार ने पीएमजीएसवाई के तहत लाखों किलोमीटर सड़कें बनाई हैं, लेकिन आज भी कई राज्यों में गांवों को जोड़ने वाली सड़कें कच्ची हैं या बरसात में खराब हो जाती हैं.
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रोजगार रिपोर्ट के अनुसार, भारत के कुल बेरोजगारों में युवाओं की हिस्सेदारी लगभग 83 प्रतिशत है. 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 25 से 29 साल के युवाओं में बेरोजगारी दर लगभग 20 प्रतिशत है. 20 से 29 वर्ष के कुल 6.3 करोड़ स्नातकों में से लगभग 1.1 करोड़ बेरोजगार हैं.
12 साल में डिजिटल इंडिया, इंफ्रास्ट्रक्चर, कुछ वैलफेयर स्कीम्स जैसे कुछ अच्छे काम जरूर हुए हैं लेकिन हर साल 2 करोड़ नौकरियां, अच्छे दिन और विकसित भारत जैसे बड़ेबड़े दावों की तुलना में हकीकत बिलकुल उलट है. बीजेपी की प्रचार मशीनरी इन कुछ उपलब्धियों का बखान तो खूब करती है जबकि महंगाई, बेरोजगारी, किसान संकट, स्वास्थ्य और शिक्षा के गिरते स्तर जैसी खामियों को छिपाती है.
लगातार धाराशायी होता विकास
इंफ्रास्ट्रक्चर की बात करें तो पिछले 4-5 सालों में ही सैकड़ों पुल गिरे. 2021-2025 के बीच 170 ब्रिज ढहे, जिन में 200 से ज्यादा मौतें हुईं. बिहार, गुजरात, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र में लगातार पुल टूटने की घटनाएं हुईं.
2022 में मोरबी ब्रिज हादसा हुआ जिस में 141 मौतें हुईं. गुजरात में हाल ही में गंभीरा ब्रिज गिरा, जिस में 9 मौतें हुईं. उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में हाल ही में अंडरकंस्ट्रक्शन ब्रिज गिरा, कई मजदूर मरे. बिहार में 2023 से 24 के बीच 13 नए ब्रिज गिरे. भ्रष्टाचार और घटिया कंस्ट्रक्शन की वजह से पुलों का गिरना नए रिकौर्ड बना रहा है लेकिन किसी की कोई जवाबदेही नहीं. नई सड़कें बनते ही गड्ढे और दरारें नजर आने लगती हैं. मानसून में सड़कें बह जाती हैं. पौटहोल्स से 2020 से 24 के बीच 9,000 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं.
जिस अयोध्या को बीजेपी अपनी सब से बड़ी उपलब्धियों में गिनती है उसी आयोध्या की नई सड़कें, राम मंदिर के रास्ते पहली बारिश में ही खराब हो गए. मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक में दरारें आईं. राष्ट्रीय राजमार्गों पर भी 21 ब्रिज पिछले 3 सालों में गिरे हैं. ग्रामीण सड़कें 40 प्रतिशत तक अभी भी कच्ची हैं. इन का रखरखाव जीरो है और क्वालिटी तो बिलकुल घटिया स्तर की है.
दरभंगा में एम्स बनाने की 2015 में घोषणा हुई. 2020 में मंजूरी मिली.
10 साल से ज्यादा बीत गए, 1,200 करोड़ खर्च हो गए लेकिन अस्पताल के नाम पर सिर्फ मुख्य गेट और बाउंड्री वाल बनी है. पूरा अस्पताल, डाक्टर्स, बैड्स आदि सब कागजों पर चल रहे हैं. बिहार जैसे पिछड़े इलाके में स्वास्थ्य सुविधा का ऐसा मजाक सिर्फ बीजेपी ही कर सकती है. यह प्रतीक है कि बीजेपी के 12 सालों में प्रचार तो भारी रहा लेकिन असली काम शून्य ही साबित हुए.
विकास की बत्ती गुल
झूठ का कितना ही ढिंढोरा पीटा जाए, कई बार वक्त भी आईना दिखा देता है. जयपुर में बीजेपी प्रदेश कार्यालय में मोदी सरकार के 12 साल पूरे होने का जश्न मनाया जा रहा था. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव मंच पर मोदी सरकार की उपलब्धियां गिना रहे थे. उन के सामने राजस्थान के ऊर्जा मंत्री हीरालाल नागर भी बैठे थे लेकिन 15 मिनट में 3 बार बिजली गुल हो गई. आखिरकार मोबाइल फोन की टौर्च और कैमरों की लाइट जला कर विकास का बखान किया गया.
यह घटना कोई मजाक नहीं बल्कि बीजेपी के विकास मौडल की असली तसवीर है. जितना ढोल पीटा जाता है, हकीकत उतनी ही कड़वी होती है. जयपुर वाली घटना बीजेपी की पूरी राजनीति को उजागर करती है. ऊर्जा मंत्री के सामने बिजली गुल होना संयोग नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी है. 12 साल में विकसित भारत का सपना दिखाया गया लेकिन बिजली, पानी, नौकरी और बुनियादी समस्याएं जस की तस हैं.
बिजली की ही बात करें तो केंद्र सरकार दावा करती है कि 2012 वाले बड़े ब्लैकआउट से अब सुधार हुआ है. पीक डिमांड 270 जीडब्लू तक पहुंची है लेकिन राज्यों में, खासकर गरमी में, पावर कट आम हैं. दिल्लीएनसीआर, चेन्नई, राजस्थान जैसे कई राज्यों में लोडशेडिंग होती रहती है. इस से छोटे उद्योग और किसान सब से ज्यादा प्रभावित होते हैं. आज जगहजगह जेनरेटर लगे हैं क्योंकि बिजली उत्पादन और वितरण भरोसेमंद नहीं हैं.
सीएमआईई और पीएलएफएस डेटा के अनुसार बेरोजगारी 5-8 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है. शिक्षित युवाओं में तो यह और भी ऊंची है. लाखों युवा नौकरी की तलाश में बेरोजगार घूम रहे हैं. छोटे उद्योगों पर संकट के बादल गहरा रहे हैं. लाखों यूनिट बंद हो चुकी हैं. इस से करोड़ों नौकरियां गईं. डीमौनिटाइजेशन और जीएसटी के बाद रिकवरी धीमी रही.
महंगाई लगातार बढ़ी है. टमाटर, प्याज, दाल जैसी चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं. आम आदमी की थाली महंगी हो गई. किसानों की आय दोगुनी करने का वादा 2022 तक था लेकिन आज तक पूरा नहीं हुआ. किसान आंदोलन में 700 लोग मारे गए, किसानों का कर्ज और आत्महत्याएं जारी रहीं. कई राज्यों में फसलें सड़ गईं, मुआवजा नहीं मिला.
इन 12 सालों में अमीरों और कौर्पोरेट्स को फायदा हुआ. शेयर मार्केट, इंफ्रा प्रोजैक्ट्स बढ़े लेकिन गरीब और मध्य वर्ग पर बो?ा भी बढ़ा जिस से असमानता बढ़ी. जीडीपी ग्रोथ के दावे किए गए लेकिन जौब क्रिएशन और रियल वेज ग्रोथ कम हुई.
इंफ्रास्ट्रक्चर में कुछ कम हुआ लेकिन गुणवत्ता और रखरखाव पर सवाल भी खड़े हुए. कई प्रोजैक्ट्स में देरी हुई और भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे. कोविड लौकडाउन के दौरान मजदूरों का संकट गहराया. बिना तैयारी के नीतियां बनीं जिस से हजारों लोग मारे गए लेकिन कोई जवाबदेही तय नहीं हुई.
नेहरू का सब से बड़ा योगदान संस्थानों का निर्माण था. किसी भी सरकार का मूल्यांकन इस आधार पर भी होना चाहिए कि उस ने संस्थाओं को मजबूत किया या कमजोर. हर जिले में शानदार पार्टी कार्यालय बन जाना पार्टी के विकास का प्रमाण तो है, देश का नहीं. विकास का अर्थ है बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, रोजगार, वैज्ञानिक सोच, सामाजिक समानता और नागरिक स्वतंत्रता. अगर किसी देश में विशाल इमारतें खड़ी हो जाएं लेकिन बेरोजगारी, असमानता और सामाजिक तनाव बने रहें तो ऐसा विकास अधूरा ही माना जाएगा. नेहरू के 12 साल की तुलना मोदी के
12 साल से करना तो सूरज को दीया दिखाने जैसा है. 12 साल के विकास का ढोल बजाने की जरूरत ही न पड़ती अगर सच में बीजेपी की नीति और नीयत साफ होती.





