Bulldozer Politics: बुलडोजर अब केवल एक मशीन नहीं, बल्कि शासन की राजनीतिक पहचान बन चुका है. बुलडोजर यानी जो सरकार के खिलाफ विरोध का स्वर उठाए, जो अपने अधिकारों की मांग करे, जो न्याय चाहे, जो शिक्षा व रोजगार पर  सवाल पूछे, उसे कुचल दो. भारतीय जनता पार्टी की बुलडोजरी व्यवस्था ने संविधान के मूल सिद्धांतों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर नए प्रश्न खड़े कर दिए ह

84 वर्षीय जेसुइट पादरी और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता फादर स्टेन स्वामी को 2020 में भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार किया गया था. पार्किंसन रोग से पीडि़त होने के बावजूद उन्हें लंबे समय तक जेल में रखा गया. जमानत की उन की याचिकाएं लगातार खारिज होती रहीं. आखिरकार जुलाई 2021 में मुंबई के एक अस्पताल में उपचार के दौरान उन का निधन हो गया. उन के समर्थकों, संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों और मानवाधिकार संगठनों ने इसे ‘संस्थागत विफलता’ और पर्याप्त चिकित्सा सुविधा न मिलने का मामला बताया जबकि सरकार और जांच एजेंसियों ने इन आरोपों से साफ इनकार कर दिया. यह आम आदमी के हकों को छीनने का एक उदाहरण मात्र है.

लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि उन संस्थाओं से जीवित रहता है जो नागरिकों को न्याय, समानता और संवैधानिक सुरक्षा का भरोसा देती हैं. जब न्यायालयों की जगह प्रशासनिक आदेश लेने लगें, जब आरोप ही सजा में बदल जाएं, जब बुलडोजर अदालतों से पहले फैसला सुनाने लगे और जब महत्त्वपूर्ण सुबूत रहस्यमय परिस्थितियों में नष्ट होने लगें, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या देश कानून के शासन से चल रहा है या जनता पर सत्ता की मनमरजी हावी है?

पश्चिम बंगाल के चुनावों के ठीक पहले मतदाता सूचियों का गहन परीक्षण शुरू किया गया जिस में मतदान के अधिकार को ही छीन कर चुनाव आयोग ने अपनी फाइलों में दिल्ली के इशारे पर कर लिया. इस बुलडोजरी परीक्षण में किसी की सुनी नहीं गई. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता बेहद तानाशाही अंदाज में प्रैस कौन्फ्रैंसों और सुप्रीम कोर्ट में कहते नजर आए कि कानून उन के साथ है क्योंकि कानून को जैसे पढ़ेंगे, वही अंतिम सच है, जनता को वही मानना होगा.

कोलकाता में हजारों ईवीएम मशीनों के जलने की घटना से ले कर उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में आरोपियों के घरों पर चल रहे बुलडोजरों तक, बीते 12 वर्षों में ऐसी अनेक घटनाएं सामने आई हैं जिन्होंने संविधान, न्यायिक प्रक्रिया और नागरिक अधिकारों को ले कर गंभीर चिंता पैदा कर दी है. भारतीय जनता पार्टी सरकार की बुलडोजरी व्यवस्था ने त्वरित दंड की संस्कृति स्थापित कर के संविधान के मूल सिद्धांतों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं.

उत्तर प्रदेश से शुरू कर के पूरे देश में भाजपा सरकार द्वारा अपराधियों, माफियाओं और अवैध निर्माणों के विरुद्ध चलाए गए अभियानों ने बुलडोजर को प्रशासनिक कार्रवाई के प्रतीक के रूप में स्थापित कर दिया है. समर्थक इसे अपराध के खिलाफ कठोर शासन का प्रमाण बताने में लगे हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि यह संवैधानिक प्रक्रिया और विधि के शासन के पूरी तरह खिलाफ है.

भाजपा चुनावी सभाओं में बुलडोजर को ‘अपराधियों के खिलाफ सरकार की ताकत’ के रूप में प्रस्तुत करती है और विपक्ष को डराती है. अब बुलडोजर का अर्थ केवल एक निर्माण मशीन नहीं है, बल्कि वह भारतीय राजनीति का प्रतीक है.

बुलडोजर राज्य शक्ति के आक्रामक प्रयोग और नागरिक अधिकारों को खत्म करने का प्रतीक है. बुलडोजर यानी जो भी विरोध का स्वर उठाए उसे कुचल दो. उन अखबारों, टीवी चैनलों को बंद कर दो जो सरकार विरोधी चीजें लिखें या दिखाएं. उन पत्रकारों का दमन करो जो सच लिखें, बोलें और दिखाएं. उन युवाओं को जेल में ठूंस दो जो शिक्षा और रोजगार की मांग करें. उन सुबूतों में आग लगा दो जो कोर्ट में सरकार के खिलाफ जाएं.

अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों, मदरसों और मकबरों को अतिक्रमण के नाम पर ढहा कर वहां मंदिरों का निर्माण करो. इस नई बुलडोजरी व्यवस्था को स्थापित करने में भाजपा और संघ पूरी शिद्दत से लगे हैं.

लोकतंत्र के सुबूतों को निगल गई आग

10 जून, 2026 की रात पश्चिम बंगाल के कोलकाता में अलीपुर स्थित दक्षिण 24 परगना जिला परिषद की इमारत में भीषण आग लगने से लगभग 4,000 ईवीएम और वीवी पैट मशीनें जल कर राख हो गईं. ये वही ईवीएम थीं जिन का उपयोग राज्य के 10 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव के दौरान किया गया था. इस सरकारी इमारत में दक्षिण 24 परगना जिला परिषद सहित कई सरकारी विभाग हैं. हैरानी की बात यह है कि आग बीच की मंजिलों यानी चौथी, 5वीं और 6ठी मंजिल को प्रभावित किए बिना सीधे ऊपर की 7वीं और 9वीं मंजिल पर पहुंच गई, जहां चुनाव कार्यालय और स्ट्रौंग रूम था, जिस में ये ईवीएम मशीनें सुरक्षित रखी गई थीं.

यह हादसा नहीं है. यह तो लोकतंत्र के साथ छेड़छाड़ के बाद बेहद अहम सुबूतों को नष्ट करने का एक सुनियोजित सफल काम है. न्याय या सुबूत मिटाने की साजिश भारत के चुनावी नियमों के तहतचुनाव खत्म होने के बाद भी एक निश्चित समय तक ईवीएम को स्ट्रौंग रूम में पूरी तरह सुरक्षित सील कर के रखा जाता है, ताकि यदि कोई उम्मीदवार नतीजों को कोर्ट में चुनौती दे तो इन मशीनों की दोबारा जांच या रीकाउंटिंग की जा सके. अचानक इन मशीनों के जल जाने से कानूनी और न्यायिक हस्तक्षेप का रास्ता हमेशा के लिए बंद होने का खतरा पैदा हो गया है.

आगे अनेक राज्यों में चुनाव होने हैं. खासकर अगले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव और 2029 में लोकसभा चुनाव अहम है. यदि इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति होती है तो यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक साबित होगी.

देश को बताया जाता है कि लोकतंत्र सुरक्षित है. मगर सवाल यह है कि जब सुबूत ही नहीं बचेंगे तो न्याय किस आधार पर होगा? जब मशीनें जल जाएंगी तो पुन: जांच कौन करेगा? जब रिकौर्ड नष्ट हो जाएंगे तो अदालत किसे परखेगी? और जब सवाल पूछने वालों को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाएगा तो जवाबदेही की मांग कौन करेगा?

तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले से ही चुनावी नतीजों पर सवाल उठा रही थीं. उन का आरोप है कि कम से कम डेढ़ सौ सीटों पर गड़बड़ी की गई है. आग की घटना ने अब इस बात पर विराम लगा दिया है कि कोई व्यक्ति कोर्ट में ईवीएम और वीवीपैट मशीनों की पुन:जांच के लिए आवेदन कर सके. यह मोदी सरकार की नई बुलडोजर न्याय प्रणाली है जो मनमाफिक न हो उसे ध्वस्त कर दो. कोर्ट जाने की जरूरत नहीं. सरकार का फैसला ही सुप्रीम फैसला है. इसी छल से पश्चिमी बंगाल का चुनाव ही नहीं जीत लिया गया अब संविधान को कुचलते हुए तृणमूल कांग्रेस के विधायकों, सांसदों, पार्षदों के दलबदल कानून को तोड़मरोड़ कर वोटरों की इच्छा की चिंता किए बिना संविधान को रौंदा जा रहा है.

संविधान क्या कहता है, यह फैसला करने का अधिकार सिर्फ सुप्रीम कोर्ट का है पर वह खुद क्या बन गया है, यह कहना भी भय पैदा करता है. वकीलों की दलीलें बेकार गईं, अखबार (थोड़े से ही हैं जो कुछ कह सकते हैं) की बात नकार दी गई. सुप्रीम कोर्ट के लिए जनता कौकरोच और परजीवी है कि वह सरकार के फैसलों को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाती है.

सुप्रीम कोर्ट एक तरफ बुलडोजर व्यवस्था को अंसवैधानिक कहती है पर असल में उस पर मोहर लगाती रहती है. 2024 में सुप्रीम कोर्ट की एक बैंच ने बुलडोजर कार्रवाई पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का अधिकार अदालत का है, प्रशासन का नहीं. अदालत ने बिना उचित प्रक्रिया अपनाए किसी आरोपी का मकान गिराने पर चिंता व्यक्त की थी और कई मामलों में राज्यों से जवाब मांगा था. मगर सुप्रीम कोर्ट की सुनता और मानता कौन है?

राज्यों की भाजपा सरकारें अब सीधे न्याय करती हैं. सरकार कहती है कि भूमाफिया, अतिक्रमणवादियों, अवैध निर्माण और जघन्य अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई हुई है, जो कानून के दायरे में है. वे देश की अदालतों में भी यही कह कर बच रहे हैं कि घरदुकान अवैध तरीके से बनाई थी इसलिए ढहा दी गई, पर सवाल यह कि जब इतने साल से घरदुकान बने खड़े थे, तो पहले नजर क्यों नहीं आए?

नगर निगम बाकायदा हाउस टैक्स, वाटर टैक्स और सीवर टैक्स ले रहा है, फिर वे अवैध कैसे हो गए? फिर जब इलाके का एक मकान सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर के बना है तो उस के आसपास के मकान भी तो अतिक्रमण की गई जमीन पर ही बने हैं, तो सिर्फ आरोपी का मकान ही क्यों ढहाया गया?

मगर यह सवाल कौन उठाए? कोई सच्चाई बयां करने अदालतों में नहीं आ रहा है क्योंकि जो गरीब परिवार मकान ढह जाने के बाद सड़क पर आ गया हो, जिस के सामने पेट भरने और जिंदा बचने की चुनौती हो वह वकील करने और कोर्ट जाने की बात भी कैसे कर सकता है? फिर पुलिस का खौफ अलग है. एनकाउंटर में मार दिए जाने की दहशत है.

जैसे लोगों के घरों को गिराया जा रहा है, वैसे ही हर संस्था को तोड़ा जा रहा है. जो भी सरकार के धार्मिक और तानाशाही राज के रास्ते में आ रहा है उस पर उसी तरह बुलडोजर चल रहा है जैसा लोगों के पुराने घरों पर चलता है.

संविधान बनाम बुलडोजर

भारत का कानून कहता है कि कोई व्यक्ति तब तक दोषी नहीं माना जा सकता जब तक अदालत में उस का दोष सिद्ध न हो जाए. यदि केवल आरोप लगते ही किसी का घर गिरा दिया जाए, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि दंड देने का अधिकार अदालत के पास है या प्रशासन के पास?

भारत का संविधान इस सिद्धांत पर आधारित है कि किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने और दंडित करने का अधिकार केवल कानून और न्यायालयों को है. संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा की गारंटी देता है परंतु 2014 के बाद से देश के कई राज्यों में जिस प्रकार की ‘बुलडोजर न्याय व्यवस्था’ स्थापित हो गई है, उस ने संवैधानिक मूल्यों, विधि के शासन और न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं. सिर्फ मकान, दुकान, प्याऊ, मसजिद ही नहीं, हर कानून, हर संवैधानिक प्रावधान, हर परंपरा जो सरकार के आड़े आ रही है, सरकारी शासन की बुलडोजरी व्यवस्था की चपेट में.

गरीबों पर बुलडोजर

बुलडोजर कार्रवाई का सब से चिंताजनक पहलू यह है कि इस का प्रभाव केवल आरोपी तक सीमित नहीं रहता. एक घर में मातापिता, पत्नी, बच्चे, बुजुर्ग और अन्य सदस्य भी रहते हैं. यदि किसी एक व्यक्ति पर आरोप है तो पूरे परिवार को बेघर कर देना किस न्याय सिद्धांत के अंतर्गत उचित ठहराया जा सकता है? जब किसी आरोपी का घर मुकदमे से पहले ही गिरा दिया जाता है तो व्यवहारिक रूप से उसे दोषी मान लिया जाता है. यह स्थिति न्यायिक प्रक्रिया की आत्मा के विपरीत है.

यदि बाद में अदालत आरोपी को निर्दोष घोषित कर दे तो क्या उस का ध्वस्त घर, बिखरा परिवार और समाप्त हो चुकी आजीविका वापस लौटाई जा सकती है? क्या किसी आरोपी का घर गिराना वास्तव में कानून का शासन है या फिर कानून की प्रक्रिया को दरकिनार कर के त्वरित दंड देने की एक राजनीतिक संस्कृति?

अपनों पर खामोशी

दूसरी तरफ योगी का बुलडोजरी न्याय अमीरों, नेताओं के करीबियों या सियासत में बैठे लोगों के लिए नहीं है. भारतीय जनता पार्टी के किसी नेता के खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज होता है तो वर्षों तक उस का निबटारा नहीं हो पाता है. गवाहों पर दबाव, धमकी, हमले, हत्याओं की खबरें आने लगती हैं. तब आरोपी पर बुलडोजर नहीं गरजता, उलटे, आरोपी को पुलिस संरक्षण दिया जाता है.

पीडि़त को पैसे का लालच दे कर उस का मामला रफादफा करने की कोशिश की जाती है. आरोप सही हों या गलत, यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि सत्ता के करीब रहने वालों के लिए कानून का व्यवहार अलग है तो यह लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक संकेत है.

उन्नाव कांड : जहां पीडि़ता ने की आत्मदाह की कोशिश

उत्तर प्रदेश के भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर ने देश की न्याय व्यवस्था का खूब मखौल उड़ाया. सेंगर ने अपने आवास पर एक नाबालिग बच्ची का बलात्कार किया. जब नाबालिग और उस का परिवार न्याय की आस में पुलिस के पास गया तो पुलिस ने उन की एक न सुनी क्योंकि मामला विधायक से जुड़ा था. 8 अप्रैल, 2018 को पीडि़ता ने लखनऊ में मुख्यमंत्री आवास के सामने आत्मदाह की कोशिश की.

मीडिया में बात उछली तो पुलिस को केस रजिस्टर करना पड़ा. मगर अगले ही दिन 9 अप्रैल को पुलिस हिरासत में नाबालिग बच्ची के पिता की हत्या हो गई क्योंकि पहले सेंगर के समर्थकों ने उस के साथ मारपीट की थी बाद में हवालात में पुलिस ने उस की पिटाई की.

विपक्ष ने मोरचा खोला और जन दबाव बढ़ा तो मामला सीबीआई को सौंपा गया. मगर सेंगर की हिम्मत देखिए. 28 जुलाई, 2019 को पीडि़ता, उस की मौसी, चाची तथा वकील जब एक कार में जा रहे थे, एक ट्रक ने उस में जबरदस्त टक्कर मारी. इरादा था पीडि़ता को खत्म करने का.

इस दुर्घटना में पीडि़ता की चाची और मौसी की मौत हो गई, जबकि पीडि़ता और उस के वकील गंभीर रूप से घायल हुए. सुप्रीम कोर्ट ने मामले का संज्ञान लिया, तब जा कर कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ कार्रवाई हुई. केस आगे बढ़ा  और 16 दिसंबर, 2019 को दिल्ली की एक अदालत ने उसे बलात्कार और हत्या का दोषी मान कर आजीवन कारावास की सजा सुनाई.

जो काम कुलदीप सिंह सेंगर ने किया वह प्रधानमंत्री व गृहमंत्री के कार्यालय का हर अफसर कर सकता है. संविधान का बलात्कार अब आम हो चला है. संविधान की रक्षा के लिए जनता के पास उतना न साहस है, न पैसा है, न इच्छा है कि इस का विरोध करे, बहुतों को तो हिंदूहिंदू और हिंदूमुसलिम चश्मे के कारण ये काम दिखते ही नहीं हैं.

लखीमपुर खीरी : किसानों पर चढ़ी सत्ता की गाड़ी

केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी और उन के बेटे आशीष मिश्रा की करतूत भी कोई भूल नहीं सकता है. 3 अक्तूबर, 2021 को किसान रैली से लौटते किसानों पर टेनी और उस के बेटे ने कार चढ़ा कर उन्हें रौंद कर मारा था. लखीमपुर खीरी में हुए इस कांड में 4 किसानों और एक पत्रकार की मौत हुई थी.

इस मामले में अभी भी अदालत में ट्रायल चल रहा है. मगर इस मामले में योगी सरकार ने अपना बुलडोजरी न्याय नहीं दिया. 5 लोगों के हत्यारे के न तो आवास पर बुलडोजर चला और न ही संपत्ति जब्त हुई. यह गाड़ी सिर्फ किसानों पर नहीं चढ़ी थी. यह गाड़ी जनता के अधिकारों पर चढ़ी थी.

स्वामी चिन्मयानंद मामला

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में गृह राज्यमंत्री और भाजपा सांसद रहे स्वामी चिन्मयानंद का मामला भी काफी चर्चित रहा. शाहजहांपुर में चिन्मयानंद का शिक्षा संस्थान और आश्रमों का बड़ा नैटवर्क है. चिन्मयानंद पर उस के ही कानून कालेज की एक छात्रा ने 2019 ने यौन शोषण का आरोप लगाया था.

इस छात्रा के साथ लंबे समय तक बलात्कार हुआ, उस के वीडियो बना कर उसे मानसिक दबाव में रखा गया, राजनीतिक और सामाजिक ताकत का इस्तेमाल कर के उसे डरायाधमकाया गया. छात्रा डर के मारे कुछ समय के लिए अंडरग्राउंड भी हो गई. बाद में उस ने पुलिस को अपने साथ हुई ज्यादतियों के कुछ वीडियो दिए.

उधर चिन्मयानंद ने छात्रा पर आरोप लगाया कि वह उस से 5 करोड़ रुपए की उगाही करना चाहती थी. केस चलता रहा और अंतत: मार्च 2021 में शाहजहांपुर की एमपी-एमएलए अदालत ने सम?ाते और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर चिन्मयानंद को इस मामले में बरी कर दिया.

गौरतलब है कि चुनाव आयोग में प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार भाजपा के 54 निर्वाचित प्रतिनिधियों ने महिलाओं के विरुद्ध अपराध से संबंधित मामलों का उल्लेख किया है, जिन में से 5 मामले बलात्कार के आरोपों से संबंधित हैं, मगर बुलडोजर की कार्रवाई किसी पर नहीं हुई. किसी की संपत्ति जब्त नहीं की गई क्योंकि ये लोग सत्ता में बैठे हैं. ये धर्म की रक्षा कर रहे है इसलिए सब गुनाह माफ हैं.

हर युवा का संवैधानिक अधिकार है कि वह अपना भविष्य अपनी क्षमता व इच्छा के अनुसार संवार सके. इस अधिकार पर बुलडोजर बैठ गए हैं. नैशनल टैस्ंिटग एजेंसी और सीबीआई की शक्ल में. इन संस्थाओं को एग्जाम लेने की ठेकेदारी दे दी गई है पर कहीं कोई सुनवाई नहीं है.

युवाओं के सपनों पर पेपर लीक का बुलडोजर

मोदी सरकार दावा करती है कि वह देश की 80 करोड़ जनता को मुफ्त राशन दे रही है. देना ही पड़ेगा क्योंकि सरकार रोजगार जो दे नहीं पा रही है. युवाओं को नौकरी न देनी पड़े, लिहाजा, आएदिन परीक्षाओं के पेपर लीक करवा दिए जाते हैं और फिर इम्तिहान रद्द हो जाता है. करोड़ों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियां करते हैं. मांबाप अपना पेट काट कर, जमीन बेच कर, गहने गिरवी रख कर उसे कोचिंग करवाते हैं, इस आशा में कि बेटा प्रतियोगी परीक्षा में निकल जाएगा, सरकारी नौकर हो जाएगा तो गरीबी के दिन दूर हो जाएंगे. मगर वह सरकारी मुलाजिम बने तो बने कैसे? पेपर ही लीक हो जा रहे हैं. परीक्षाएं ही रद्द हुई जा रही हैं.

सोचिए उस युवक की मानसिक हालत क्या होगी जिस ने 5 वर्ष तैयारी में लगा दिए हों और परीक्षा से कुछ घंटे पहले प्रश्नपत्र बाजार में बिकने लगे, फिर परीक्षा रद्द हो जाए. उस का सारा परिश्रम एक झटके में अर्थहीन हो जाता है.

हाल ही में नीट का पेपर रद्द होने के बाद अब तक नीट में सफल होने का सपना पालने वाले कोई 14 छात्र आत्महत्या कर चुके हैं. सोचिए उन जवान और होनहार बच्चों के मांबाप के दिल पर क्या बीत रही होगी? वे कहीं जा कर दुहाई नहीं दे सकते. सुप्रीम कोर्ट संविधान के नौकरी, व्यवसाय व जीने के हक की रक्षा करने में हिचक रही है क्योंकि सरकार को नाराज नहीं कर सकती.

जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है आमजन के लिए न्याय की परिभाषा बदल गई है. न्याय अब उसी को माना जाता है जो सत्ता शीर्ष पर बैठे व्यक्ति ने सुना दिया. अब न्याय के लिए कोर्टकचहरी का दरवाजा खटखटाने की जरूरत कतई नहीं है. बुलडोजरी न्याय प्रणाली में सबकुछ खटाखट हो रहा है. उत्तर प्रदेश में बुलडोजर बाबा लोगों को तुरंत न्याय दे रहे हैं. किसी मुसलमान पर आरोप लगा नहीं कि बुलडोजर बाबा उस के सीने पर चढ़ गए. जब तक उस का घरदुकान नेस्तनाबूद न कर दें, उस के परिवार को सड़क पर खड़ा न कर दें, उसे जेल में न ठूंस दें या उस का एनकाउंटर न कर दें, तब तक बुलडोजर का गरजना नहीं रुकता.

संविधान से टकराती व्यवस्था

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने कानून गढ़ लिए हैं. इन से प्रेरित हो कर कई अन्य राज्यों में भी आरोपियों के मकानों और दुकानों पर बुलडोजर चल रहे हैं. जब तक आरोपी का पूरा घर गिरा नहीं देते, उस के बूढ़े मांबाप को, छोटे भाईबहनों को, बीवीबच्चों को सड़क पर नहीं बैठा देते, तब तक बुलडोजर की कार्रवाई चलती रहती है. बुलडोजर बाबा अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों को भी खूब रौंद रहे हैं. तर्क यह कि इस से अपराधियों में भय पैदा होता है और कानून व्यवस्था मजबूत होती है.

हालफिलहाल की बात करें तो जून 2025 में रामपुर और संभल में 2 मसजिदें, एक दरगाह व मजार तथा कई दुकानें सरकारी भूमि पर अतिक्रमण बता कर ढहा दी गईं. 2025 में ही फतेहपुर की 180 साल पुरानी नूरी जामा मसजिद के हिस्से को सड़क चौड़ीकरण परियोजना में ढहा दिया गया. आगे भी गिराना जारी रहता मगर समय रहते हाईकोर्ट ने रोक लगा दी. फरवरी 2026 में संभल में ग्राम समाज की भूमि पर बरसों से बने एक मदरसे को ध्वस्त किया गया. इस के अलावा, नेपाल सीमा से लगे जिलों में 429 धार्मिक ढांचे अवैध बता कर ढहा दिए गए. इन में मदरसे, मसजिदें, ईदगाह और अन्य धार्मिक संरचनाएं शामिल थीं.

राम मंदिर में बुलडोजरी लूट

भारतीय जनता पार्टी राममंदिर का मुद्दा उछाल कर सत्ता में आई. जिस तरह कुरुक्षेत्र के मैदान में हर तरह का छलकपट किया गया था वैसा ही राममंदिर के निर्माण में किया गया. अदालतों के निर्णयों को अपने मतलब का लिखाया गया. देशभर में दंगे कराए गए. धार्मिक भेदभाव बढ़ाया गया. भक्तों को बताया गया कि इस से हिंदू इतिहास गौरवशाली हो जाएगा. घरों में सोना बरसने लगेगा. सोना घरों में तो नहीं बरसा पर राममंदिर से जुड़े लोगों के घरों में जरूर बरस रहा है. बुलडोजर जब चलता है तो घरों और दफ्तरों की संपत्ति की लूट भी खूब होती है. वैसी ही राम मंदिर में दिख रही है.

महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर लूटा था. वह तो बाहर से आया था और दूसरे धर्म का होने के नाते उस की कोई आस्था उस मंदिर में नहीं थी. उस ने संपत्ति लूटी और ले कर चला गया. मगर यहां तो आस्थावानों ने अपने ही मंदिर में डकैती डाल दी. अपने ही भगवान को लूट लिया. मंदिर के रक्षक ही भक्षक बन गए. लंबे समय से अयोध्या के राम मंदिर में लूट मची हुई है.

गौरतलब है कि जब से मंदिर बना है वहां प्रतिदिन श्रद्धालुओं द्वारा बड़ी मात्रा में नकद दान, सोनाचांदी और अन्य चढ़ावे चढ़ाए जाते रहे हैं. अब खबर आई है कि उस चढ़ावे पर मंदिर के रखवालों ने ही डाका डाल दिया है. 200 करोड़ रुपए से अधिक के दान की लूट हो गई है. दान में चढ़ाई गई 60 किलो चांदी का कोई अतापता नहीं है. भगवान राम के नाम की सोने और हीरे जडि़त शिलाएं गायब हैं और लूट का यह खेल लंबे समय से जारी है.

योगी सरकार के कानों में भनक भी नहीं पड़ी और अब जो मामला उछला है तो एसआईटी जांच का खेल खेला जा रहा है, जबकि सीधे एफआईआर होनी चाहिए थी और ट्रस्ट के संचालकों सहित जितने लोग कैश गिनने और दान सहेजने के काम में लगे थे, सब को अरैस्ट कर के जेल में डाल दिया जाना चाहिए था.

एक अनुमान के मुताबिक, मंदिर में प्रतिमाह कोई 7 करोड़ रुपए से ज्यादा का कैश आता था. इस के अलावा आभूषण और रत्नजडि़त शिलाएं अलग थीं. मजे की बात है कि 1,500 रुपए माह पर काम करने वाले मंदिर के कर्मचारियों ने अपनी करोड़ों की कोठियां खड़ी कर लीं. बड़ीबड़ी जमीने खरीद लीं और सरकार को आज तक कुछ नजर नहीं आया. उन को सिर्फ मुसलमान, उन की मसजिदें और मजारें ही दिखती रहीं. जिन पर उन के बुलडोजर गरजते रहे. अब मंदिर में डकैती मामले में आवाज रुंध गई है.

चंदे के पैसे से चलने वाले मदरसों में आय का ब्योरा ढूंढ़ने वालों ने कभी राममंदिर के संचालकों से आय का ब्योरा क्यों नहीं तलब किया? जनता को तो यह जानने का अधिकार ही नहीं है कि मंदिरों में प्रतिदिन कितना चढ़ावा चढ़ता है और वह कहां जाता है? किस काम में खपाया जाता है? आखिर भगवान तो उस चढ़ावे का इस्तेमाल अपने निजी काम के लिए करते नहीं हैं, फिर जनता के उन अरबोंखरबों रुपयों का होता क्या है?

धार्मिक आयोजनों में अलगअलग पैमाने

गौरतलब है कि सड़के, फुटपाथ, पार्क, चौराहे और अन्य सार्वजनिक स्थल किसी एक धर्म, समुदाय या संगठन की संपत्ति नहीं होते हैं. वे सभी नागरिकों के सा?ा उपयोग के लिए बनाए जाते हैं. यदि किसी धार्मिक, सामाजिक या राजनीतिक आयोजन के कारण आम जनता को असुविधा होती है तो उस पर समान नियम लागू होने चाहिए पर क्या सभी मामलों में एकजैसी कठोरता दिखाई जाती है? बिलकुल नहीं, क्योंकि बुलडोजर न्याय व्यवस्था सिर्फ अल्पसंख्यकों और गरीबों के लिए है.

कांवड़ यात्रा, नमाज और समानता का प्रश्न

ध्यान दीजिए, हर वर्ष सावन के महीने में लाखों श्रद्धालु कांवड़ यात्रा में भाग लेते हैं. यह भारत की सब से बड़ी धार्मिक यात्राओं में से एक है. कई राज्यों में कांवड़ यात्रियों के लिए विशेष मार्ग बनाए जाते हैं, बैरिकेटिंग की जाती है, यातायात डाइवर्ट किया जाता है और प्रशासन अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था करता है.

कई बार स्थानीय लोगों से कांवडि़यों की भिड़ंत हो जाती है. युवा कांवडिए उग्र हो कर दुकानों में तोड़फोड़ करते हैं. गाडि़यों के शीशे तोड़ डालते हैं. ऐसे में कानून व्यवस्था को संभालना पुलिस के लिए भी मुश्किल हो जाता है क्योंकि कांवडि़यों को सत्ता का संरक्षण मिला हुआ है. जिन पर सत्ता पुष्प वर्षा करती हो उन पर पुलिस डंडा कैसे चलाए, ये बड़ा धर्मसंकट खड़ा हो जाता है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तो मुसलमानों को शुक्रवार को आधा घंटे के लिए सड़क पर नमाज पढ़ने तक की इजाजत नहीं देते. कहते हैं, ‘मसजिद के अंदर जगह नहीं है तो शिफ्टों में नमाज पढ़ो. जनसंख्या ज्यादा हो गई है तो उस को नियंत्रित करो. सड़कें धार्मिक गतिविधियों के लिए नहीं हैं और इस से यातायात तथा आम नागरिकों को परेशानी होती है.’

ऐसे में प्रश्न केवल कांवड़ यात्रा का नहीं, बल्कि समानता के सिद्धांत का है. एक तरफ किसी एक दिन आधा घंटा कोई सड़क पर नमाज पढ़ ले तो कयामत आ जाती है, किसी सार्वजानिक स्थल, पार्क के किसी कोने में कोई नमाज पढ़ता दिख जाए तो जिहादी घोषित हो जाता है और महीनों सड़कों का बड़ा हिस्सा कांवडि़यों के लिए घेर दिया जाए तो वह श्रद्धा का मामला होता है. उन पर फूलों की वर्षा की जाती है.

रामनवमी, गणेशोत्सव, दुर्गा पूजा, मोहर्रम, ईद मिलादुन्नबी और अन्य धार्मिक अवसरों पर देशभर में जुलूस निकलते हैं. इन के कारण कई बार यातायात प्रभावित होता है, बाजार बंद होते हैं और आम नागरिकों को असुविधा का सामना करना पड़ता है. बड़े शहरों में गणेश विसर्जन के दौरान कई घंटे तक ट्रैफिक प्रभावित रहता है. दुर्गापूजा पंडालों के लिए पार्कों, मैदानों और कभीकभी सड़कों के हिस्सों का उपयोग किया जाता है. रामनवमी और अन्य जुलूसों के दौरान कई मार्गों पर यातायात रोकना पड़ता है.

इन आयोजनों को प्रशासनिक अनुमति हाथोंहाथ मिल जाती है. कुछ मिनटों के लिए सड़क पर नमाज गलत है तो फिर घंटों या दिनों तक चलने वाले अन्य धार्मिक आयोजनों के लिए अलग दृष्टिकोण क्यों है? यदि सड़क घेरना गलत है तो वह सभी के लिए गलत होना चाहिए. संविधान सब के लिए बराबर है.

संविधान सिर्फ एक दस्तावेज बन कर न रह जाए

संविधान का मूल विचार यह था कि राज्य नागरिकों का सेवक होगा, स्वामी नहीं. अदालतें अंतिम निर्णायक होंगी, प्रशासन नहीं. लेकिन यदि आरोप ही सजा बन जाए और बुलडोजर ही फैसला करे तो फिर संविधान की किताबें केवल पुस्तकालयों की शोभा बन कर रह जाएंगी. लोकतंत्र की असली परीक्षा यह नहीं है कि सरकार अपने समर्थकों के साथ कैसा व्यवहार करती है. असली परीक्षा यह है कि वह अपने आलोचकों, विरोधियों और सब से कमजोर नागरिकों के अधिकारों की कितनी रक्षा करती है.

जिस दिन बुलडोजर अदालत से बड़ा हो जाएगा, उस दिन संविधान केवल एक दस्तावेज बन कर रह जाएगा, जीवित व्यवस्था नहीं. इस से पहले कि पूरे देश में बुलडोजर व्यवस्था स्थापित हो जाए, इस का पुरजोर विरोध और जल्द से जल्द इस का दमन लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है.                       .

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