Hindi Story: पालमपुर की सुबहें किसी पुरानी कविता की तरह होती हैं, हर पेड़, हर पत्थर, हर पहाड़ जैसे कोई बिंब हो. सूरज यहां अचानक नहीं उगता, वह धीरेधीरे सफेद धुंध की चादर को खिसकाता है, जैसे किसी चित्रकार की उंगलियां रंगों को धीरेधीरे उजागर कर रही हों. उस चादर के पीछे से धौलाधार पर्वत की बर्फीली निस्तब्धता ?ांकती है. धौलाधार वह हिमाच्छादित पर्वतशृंखला है जो पालमपुर में मौन संरक्षक की तरह खड़ी रहती है, सालों से एक ही मुद्रा में- स्थिर, धवल और अल्पभाषी.
पास बहती न्यूगल नदी की कलकल के पास एक घर है. न बहुत बड़ा, न दिखावटी. छत पर सजी हैं हिमालयी बेलों की कतारें, ब्रह्मकमल, बर्फ गुलाब, सिंहपर्णी और एक पुराना बोनसाई रोडोडेंड्रोन, जिसे उस घर के लोग ‘कुमाऊं वाला’ कहते हैं. यह घर है अभिनव गुप्ताजी का. वे 60 वर्ष के रिटायर्ड जूलौजिस्ट यानी जीवविज्ञानी हैं, जिन्होंने पहाड़ की लुप्तप्राय जीव प्रजातियों और चीलों के पीछे भागतेभागते जीवन गुजारा. उन्होंने अपनी जवानी के दिनों में धौलाधार की ढलानों पर पाई जाने वाली दुर्लभ तितलियों और कस्तूरी मृगों पर शोध किया था.
जीवनभर उन्होंने इस बात को सम?ाने की कोशिश की कि कैसे ऊंचाई, तापमान और मौसमी बदलाव किसी प्रजाति की संरचना व व्यवहार को बदल देते हैं. उन के औसत कद, हलकी झुकी पीठ, सफेद बाल और अधपकी दाढ़ी व झर्रियों से भरे चेहरे पर अब भी एक खोजी चमक थी. पर अब वे थम गए थे. उन के जीवन की संगिनी, स्वरा, बरसों पहले एक लंबी चुप्पी ओढ़ कर चली गई थीं, वही स्वरा, जो सितारवादक थीं. कमरे के कोने में पड़ा वह पुराना सितार अब मौन था.
कभीकभी जब घर के भीतर बहुत गहरा सन्नाटा होता है तो अभिनवजी को लगता, एक धुन हवा में तैर रही है, जैसे स्वरा अभी भी कहीं यहीं हैं, एक राग बन कर. धौलाधार की स्थिरता में उन्हें स्वरा की आंखों की वही शांत आभा दिखती. कभीकभी उन्हें लगता, उस हिमरेखा के पार कोई छाया खड़ी है, जैसे स्वरा हो, जो रोज उन के इंतजार में वहीं ठिठकी रहती है, बिलकुल वैसी ही जैसे वह बरामदे में खड़ी, चाय का प्याला थामे उन का इंतजार किया करती थी.
रोज सुबह छत की सीढि़यां चढ़ते तो सब से पहले धौलाधार की ओर देखते. उन के लिए ये सिर्फ पहाड़ नहीं थे, ये समय की पीठ थे, जिस पर उन की स्वरा की स्मृतियां टिक कर सांस लेती थीं. वे हाथ में एक कप लिए पुराने बायोनौकुलर्स से दूर नीली चीलों का वास देखते.
उन की छत पर गमलों में लगे गुलैचा, फौक्सग्लव और नीलपुष्पी भी जैसे अपने पत्तों को थोड़ा और खोल लेते थे, जब धौलाधार खुल कर मुसकराती थी. अभिनव गुप्ता के लिए ये पौधे मात्र सजावटी नहीं थे, ये उन के एकांत के साथी थे, हर पत्ती, हर कली में वे जीवन की नई परिभाषा खोजते. छत पर मिट्टी की गंध, पत्तों की भाषा और पत्नी की स्मृति, सब एकसाथ घुल जाया करते.
‘ये पौधे बोलते नहीं, पर जब आंखें थकती हैं तो यहीं आ कर ठहर जाती हैं.’ उन्होंने कभी अपनी डायरी में यह लिखा था.
छत पर उन की बैठक भी है जिस में लकड़ी की पुरानी कुरसी है जिस में स्वरा बैठती थी. उस के बगल में रखी हैं सूखे फूलों की हर्बेरियम डायरी और पुरानी जूलौजी जर्नल्स की जिल्दों के बीच अब भी दबी हुई हैं हजारों जीवों की कहानियां. शाम को जब धौलाधार की चुप्पी घर के भीतर धीरेधीरे उतर
आती तो वे अकसर टैगोर की कविता पढ़ते और कभीकभी गजल सुनते हैं जगजीत सिंह की.
अनन्या, उन की बेटी, 32 वर्ष की थी. एक एनजीओ में काम करती है, जमीन से जुड़ी, भीतर कहीं बहुत नर्म.
एक शाम अनन्या अपने पापा के साथ चाय पी रही थी और चना मदरा खा रही थी. पापा रोज शाम को सिड्डू खाते थे, घी नहीं चटनी के साथ.
अनन्या ने पूछा, ‘‘पापा, आप को कभी लगता है कि कोई होना चाहिए बात करने के लिए?’’
अभिनवजी ने हंस कर कहा, ‘‘कौन कहता है बात नहीं होती? ये पौधे, पहाड़ बहुतकुछ कहते हैं.’’
अनन्या चुप हो गई. पापा अकसर ऐसे ही हंस कर बात टाल देते थे, बात को किसी पक्षी, किसी पहाड़ी फूल या बादलों की दिशा में मोड़ देते थे. जूलौजिस्ट होने के नाते पापा ने जानवरों और प्रकृति की भाषाएं सीखी थीं, लेकिन इंसानी अकेलेपन की भाषा से वे अकसर कतराते रहे. मां के जाने के बाद वे और भी चुप हो गए थे. अनन्या अब सम?ाने लगी थी कि पापा का अकेलापन कोई शिकायत नहीं, एक आदत बन चुका था, जिसे वे छत के पौधों, सूखे फूलों और धौलाधार की चुप्पियों में सहेजते थे पर उस रात, चुपचाप उस ने एक सोशल मीडिया ऐप पर पापा की एक प्रोफाइल बना दी और इंग्लिश में लिखा, ‘रिटायर्ड जूलौजिस्ट, थिंकर औफ द वाइल्ड. वन्स ए कीपर औफ वाइल्ड थिंग्स, नाउ ट्रेसिंग द क्वाइट फुटप्रिंट्स औफ ए चेंज्ड टाइम.’
उस ने ‘इंटरैस्ट’ में सादगी से लिखा था, ‘टैरेस गार्डनिंग, पोएट्री रीडिंग एंड कलैक्ंिटग ड्राइड फ्लावर्स प्रैस्ड बिटवीन द येलोइंग पेजेज औफ ओल्ड जूलौजी जर्नल्स.’
कुछ दिनों तक कई लोगों, खासतौर पर महिलाओं, के संदेश इनबौक्स में आते रहे. कोई चटक रंगों में लिपटी शायरा थी जो हर मैसेज में एक शेर लिख भेज रही थी. कोई अन्य, पहाड़ों की दीवानी एक ट्रैकर महिला, जो चाहती थी कि वह और ‘थिंकर औफ द वाइल्ड’ साथ चलें किसी बर्फीली चोटी तक. अनन्या सब देखती रहती. हर नोटिफिकेशन, हर मैसेज पर एक हलकी सी मुसकान, हर प्रोफाइल में पापा के लिए साथ तलाशने की उम्मीद. एक शाम अनन्या ने एक फ्रैंड रिक्वैस्ट देखी, ‘माया कौस्मिका.’ नाम जानापहचाना लगा, प्रोफाइल खोली तो पाया कि ये तो कहीं आसपास ही रहती हैं और एक सेंटर चलाती हैं और भी बहुत लोगों की फ्रैंड रिक्वैस्ट आ रही थीं पापा को.
लेकिन जब उस से न रहा गया तो एक शाम हिमालयन फर्न के पौधे में पानी देते वक्त उस ने कहा, ‘‘पापा, कुछ दिखाना है, पर नाराज मत होना.’’ और उस ने फोन अपने पापा की तरफ बढ़ा दिया. पापा ने चश्मा ठीक किया और मोबाइल हाथ में लिया. स्क्रीन पर उभरा उन का ही चेहरा, सिर्फ थोड़ा और अकेला, थोड़ा और ईमानदार और कुछकुछ बूढ़ा. पापा ने इनबौक्स स्क्रौल किया. पहले एक लंबा मौन साधा, फिर उन्होंने अनन्या की ओर देखा.
‘‘तुम ने मेरी तनहाई को इतना हलका सम?ा कि उस का इलाज एक ऐप से करोगी?’’
अनन्या की आंखें भर आईं.
‘‘नहीं पापा, मैं आप की तनहाई को बहुत गहरा सम?ाती हूं. इसलिए ही…’’
उस के बाद अभिनवजी ने बिना कुछ कहे फोन उस को वापस कर दिया और अनन्या ने प्रोफाइल डिलीट कर दी.
दिन सरकते जा रहे थे, जैसे पुरानी घड़ी की सूइयां. अनन्या कुछ दिनों से किसी खास तैयारी में थी. उस शाम चाय के वक्त आखिर उस ने बोल ही दिया, ‘‘मैं ने आप का नाम एक लाइफ चेंजिंग सैंटर में लिखवा दिया है, पापा.’’
अभिनवजी ने चौंक कर देखा, फिर हलके से मुसकराए, ‘‘लाइफ चेंजिंग सैंटर? मुझे क्या जरूरत?’’
‘‘जरूरत मुझे है, पापा. कम से कम वहां कुछ लोग होंगे. हर बार कोई तितली या वौयलेट डेजी ही आप की बातचीत का साथी न हो.’’
वे हंस दिए, एक थकी हुई, पर मान जाने वाली हंसी, फिर बोले, ‘‘चलो, ठीक है अगर तुम कहती हो.’’
सैंटर नजदीक के बुंदला टी एस्टेट के पास ही थी. सैंटर में जीवनशैली सुधारने का अभ्यास करवाया जाता था और तकनीकें बतलाने वाली थीं वही माया कौस्मिकाजी, जिन की फ्रैंड रिक्वैस्ट पिछले हफ्ते पापा के लिए आई थी. सुबह होते ही अनन्या पिता को ले कर सैंटर पहुंच गई. अभिनवजी ने चुपचाप कोने की चटाई चुनी, जहां खिड़की से धौलाधार की धुंधली छाया और टी गार्डन दिख रहे थे. वे बाहर देखने लगे.
‘‘शरीर से पहले हम मन को शांत करना है,’’ उन्होंने यह स्वर सुना जो उन के भीतर तक उतर गया. वे पलटे. वहीं खड़ी थीं माया कौस्मिका. चेहरा किसी पुराने ब्रह्मांडीय स्वप्न से उतरा हुआ, नीली आंखों में चुप्पी नहीं, कोई कालातीत संवाद बहता हो जैसे. गरदन कुछ ज्यादा लंबी और मुसकान जैसे धूप की किरण को हथेली में पकड़ लिया गया हो. उन के पहनावे में कोई आडंबर नहीं था, सिर्फ मिट्टी और आकाश के रंग और कानों में छोटे रुद्राक्ष, जो हर शब्द के साथ जैसे हिलते नहीं, ध्यान में उतरते थे जैसे.
‘‘शरीर को नहीं, सांस को साधना है आप को यहां,’’ वे आगे बोलीं. आवाज में एक धीमी, लयबद्ध थिरकन थी. ऋषिकेश से यहां आईं, एंग्लोइंडियन, गहरी नीलिमा में डूबी हुई एक रहस्यमयी स्त्री थीं माया. उम्र में अभिनवजी के आसपास पर किसी और ही कालखंड से प्रतीत होतीं, जैसे किसी पुराने स्वप्न से उठ कर आई हों. उन के चेहरे पर एंग्लोइंडियन विरासत की महीन छाया थी, इंग्लिश परिष्कार और भारतीय जीवन का संगम.
वे एक अंगरेज महिला और एक भारतीय अध्यापक पिता की संतान थीं, जो शांति निकेतन के विद्यार्थी थे. जीवन के पहले 8 वर्ष माया कौस्मिका ने इंगलैंड में बिताए थे, फिर भारत आ गईं हमेशा के लिए. कभी दिल्ली के रंगमंच की मशहूर नृत्यांगना रही थीं पर अब वे जीवनशैली सुधारने की तकनीकें और ऐक्सरसाइजेज सिखाती थीं. बेहद शांत, सधे हुए स्वरों में बोलती थीं.
कभीकभी, गोधूलि की बेला में, उन के कमरे से सितार की मीठी तानें फूट पड़तीं, राग यमन पालमपुर की हवाओं में घुलता जाता. वे अकसर नीली ऊनी शौल में लिपटी रहतीं, जिस पर एक बड़ा मोरपंख काढ़ा होता, जो हवा से बातें करता सा लगता. उन की आवाज में संगीत की छाया थी.
क्लास के बाद अनन्या ने माया कौस्मिका को अपने पिता से मिलवाया. ‘‘ये मेरे पापा हैं,’’ उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘आप के नए विद्यार्थी.’’
माया कौस्मिकाजी ने क्षणभर उन्हें गौर से देखा, फिर धीरे से बोलीं, ‘‘मैं आप को पहचान गई थी, आप वही हैं न जिन के प्रोफाइल में लिखा हुआ है ‘सीकर औफ साइलैंस.’
अभिनवजी की नजर अनन्या की ओर गई जिस में एक अनकहा संकोच था. अनन्या ने उन की वह नजर महसूस की और बेहद नर्म ढंग से चेहरे का रुख दूसरी ओर मोड़ लिया और मोबाइल की स्क्रीन पर उस की उंगलियां चलने लगीं, जैसे कोई व्यस्तता ओढ़ ली हो.
माया मुसकराईं, बहुत हलकी, बहुत धीमी मुसकान और तब उस क्षण की नमी बाहर खड़े ऊंचेऊंचे देवदार की पत्तियों पर एक मौन की तरह ठहर गई. अभिनवजी ने नजरें उठाईं, उस मुसकान में कुछ पहचाना सा था, कुछ ऐसा जो कहा नहीं गया पर सम?ा गया. एक ऐसा मौन का ऐसा संवाद जो केवल अनुभवी दिलों के बीच घटता है.
अब अभिनवजी हर सुबह जैसे किसी अदृश्य पुल की ओर बढ़ते, एक छोटा आसमान था जो लाइफ चेंजिंग सैंटर के नाम पर उन्हें फिर से घर से बाहर बुलाने लगा था. नया स्वेटर जो अनन्या के कहने पर भी नहीं पहनते थे, उसे पहन कर, सिर पर हिमाचली टोपी जमाए, वे सैंटर की ओर निकल जाते. अनन्या उन्हें देखती, चुपचाप, कुछ विस्मित-सी, कुछ खुश सी. उस के पिता, जिन्होंने घर की बालकनी से आगे जाना छोड़ दिया था, अब घर से बाहर निकलने लगे थे और एक नए प्रकार की ताजगी ले कर लौटते. पुरानी दिनचर्या की जमीजमी सी झील में जैसे कोई हलका सा पत्थर गिरा हो और उस की लहरें अब हर कोने को छूने लगी थीं. कुछ था जो बदल रहा था, धीरे, शांत और फिर भी स्पष्ट जैसे पुरानी दीवारों पर धूप उतरना शुरू हुई हो.
उस दिन शाम कुछ विशेष थी, जैसे बादलों की पतली चादर के पीछे से कोई पुरानी मुसकान झुक रही हो. अनन्या ने बहुत दिनों से सोच रखा था और उस दिन, शाम को एनजीओ के काम से लौटते समय वह माया कौस्मिकाजी को अपने साथ घर ले आई. मायाजी के पास कोई औपचारिकता नहीं थी, कोई आग्रह नहीं, बस एक सहज स्वीकृति थी. दरवाजा खुलते ही अभिनवजी ने जब उन्हें देखा तो क्षणभर को समय जैसे रुक गया था. वे कुछ कह नहीं पाए पर उन की आंखों में जो रोशनी थी, वह किसी किशोर मन की पहली उत्सुकता सी थी.
‘‘आप हमारे घर?’’ कहतेकहते वे रुक गए.
फिर बिना कुछ कहे, हाथ के इशारे से उन्हें ऊपर, छत की ओर अपनी बैठक में ले गए, जहां उन की दुनिया बसती थी. छत पर शाम थोड़ी झुकी हुई थी और गमलों में लगे छोटेछोटे पहाड़ी पौधे सफेद बादलों की धीमी लौ में नहा रहे थे. पहाड़ी बेकनिया, रक्तबेल, पैशन फ्लावर, क्लामैटिस सब खिल उठे थे जैसे.
‘‘ये देखिए,’’ अभिनवजी ने किसी बच्चे की तरह उल्लास से कहा, ‘‘ये हिमालयी ब्लू पौपी है, बड़ी मुश्किल से उगाई है.’’
माया ने एकएक पत्ती को देखा, जैसे वे शास्त्रीय रागों की तानें हों और फिर धीरे से सिर झुकाया मानो उस प्रयास को नम्र प्रणाम दे रही हों.
अभिनवजी ने खुद हाथ से चाय बनाई थी उस दिन, ब्रिटिश लोगों द्वारा पसंद की जाने वाली अर्ल ग्रे ब्लैक टी, जिस में बर्गमौट औरेंज का स्वाद था. मिट्टी के कप में जब चाय परोसी गई तो हवा में एक गहराई आ गई, कुछ पीने से ज्यादा महसूस करने जैसी.
अनन्या चुपचाप एक कोने में बैठी सब देख रही थी. कांगड़ा की ओलोंग चाय पीने वाले पापा, ब्रिटिश चाय कब और क्यों लाए, वह सोचसोच कर मुसकरा रही थी. उस ने अपने पिता को इतने वर्षों में इतना प्रसन्न, इतना सजीव नहीं देखा था. उन की आंखों में जीवन की कोई पुरानी चिनगारी लौट आई थी, जो शायद कभी किताबों, पौधों, तितलियों और खोए हुए स्वप्नों के बीच रह गई थी.
उस की आंखें धीरेधीरे भीगने लगीं. वह कुछ नहीं बोली पर उस के भीतर कुछ पिघलता रहा जैसे वर्षों से जमी बर्फ, अचानक किसी अप्रत्याशित धूप में पिघलने लगी हो.
माया उठीं और चुपचाप कोने में पड़े सितार के सामने खड़ी हो गईं, जो अनन्या की मां का था. पुराना सितार, वर्षों से मौन, उन्हें देखता रहा. उन्होंने उसे स्नेह से उठाया.
धीरेधीरे तारों को ठीक किया, सुरों को सहलाया और राग पुरिया धनाश्री बुनने लगीं, प्रेम का, विरह का और अनकहे संवादों का राग. घर में अतीत की कोई धुन उतर आई थी, जो स्वरा अपने साथ ले गई थी. उस दिन, छत पर, चाय के हलके धुएं और धौलाधार के सामने 2 लोगों के बीच एक चुपचाप संबंध जन्म ले रहा था, बिना वादा, बिना भाषा, सिर्फ मौन, संगीत और अनुभूति में रचाबसा.
अभिनवजी ने उस रात डायरी में लिखा, ‘आज माया ने स्वरा का सितार बजाया. बरसों बाद किसी राग ने मुझे भीतर तक छुआ.
‘मैं ने आंखें मूंद लीं थीं. कोई तसवीर नहीं बनी, कोई स्मृति नहीं जागी, सितार बजाते वक्त वह मुझ से दूर थी, फिर भी अजीब बात है, उस की हर धुन मुझे छू रही थी, इस उम्र में जब लोग रिश्ते गिनना छोड़ देते हैं, मैं हर पौधे, हर फूल में माया का चेहरा बुनने लगा हूं.’
अब यह एक नई, धीमी लय में बहता जीवन था, जिस में सुबह लाइफ चोंजिंग क्लास से शुरू होती और शाम कभीकभी 2 कप चाय के साथ छत पर किसी खामोश बातचीत में ढल जाती. मायाजी अब अकसर उन के घर आ जातीं और सधे कदमों से अभिनवजी के साथ ऊपर छत पर चली जातीं. वहां हवा हमेशा हलकी चलती थी और गमलों में खिले पौधों के बीच जैसे कोई और ही समय पनपता था. अभिनवजी हर बार किसी नए पौधे की कहानी सुनाते.
‘‘ये मेक्नोपोसिस एक्युलिएटा है,’’ वे बड़े प्रेम से बताते, ‘‘नीला फूल आता है मगर तभी जब इसे छुआ न जाए.’’
माया मुसकरातीं, उन की बात पूरी होने से पहले ही कह देतीं, ‘‘कुछ रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं, अभिनव, जो बस एकांत में खिलते हैं.’’
एक दिन अचानक अभिनवजी ने पूछ ही लिया, ‘‘आप का नृत्य कैसे छूटा?’’
माया कुछ देर चुप रहीं, फिर बोलीं, ‘‘मेरा नृत्यजीवन एक शाम में ठहर गया था, जब दिल्ली से ऋषिकेश जाते समय एक सड़क दुर्घटना में मेरे पैर की हड्डियों में गहरी चोट आई. घुटने और टखने की नसें ऐसी जख्मी हुईं कि डाक्टरों ने कहा कि अब पूर्ण नृत्य संभव नहीं.’’
कुछ देर बाद अभिनवजी की ओर देख कर फिर बोलीं, ‘‘मंच से उतर आई, लेकिन नृत्य भीतर से कभी नहीं गया. शरीर थम गया पर जो भीतर थिरकता था, उसे कोई ऐक्सिडैंट नहीं छीन सका. फिर ऐक्सरसाइजेज सीखीं, संगीत सीखा, फिजियोथेरैपी सीखी, जिम के गुर सीखे और अब मैं आसनों में, सांसों में, रागों में और मौन में अपना अधूरा नृत्य जीती हूं.’’
यह सुन कर अभिनवजी भीतर तक थम गए. आंखों में विस्मय था और मन किसी अनजाने दुख से भारी हो उठा. वे अच्छे से सम?ाते थे कि किसी नृत्यांगना का नृत्य छूटना वैसा ही होता है जैसे नदी से उस का प्रवाह छिन जाए या किसी पक्षी से उस का आकाश.
कुछ देर बाद अभिनवजी थोड़ा हिचकिचाते हुए बोले, ‘‘माया, अगर बुरा न मानो तो एक बात पूछूं?’’
माया बोलीं, ‘‘बिलकुल, पूछो.’’
‘‘तुम जैसी सजीव और आत्मनिर्भर स्त्री, क्या कभी किसी के साथ, मेरा मतलब है शादी के बारे में नहीं सोचा?’’
मायाजी कुछ क्षण मौन रहीं. आंखें दूर की पहाडि़यों पर टिकी हुईं, जैसे कोई स्मृति वहीं अटकी हो, फिर बोलीं, ‘‘हां, सोचा था कभी. पर कुछ रिश्ते होते हैं जो समय से पहले थम जाते हैं और कुछ ऐसे जो कभी आकार ही नहीं लेते.’’
कुछ देर रुक कर वे फिर बोलीं, ‘‘मेरे जीवन में कुछ पल ऐसे भी आए जहां साथ के बजाय अकेले चलना ज्यादा सच्चा लगा.’’
यह सब सुन कर अनुभवजी की आंखों में एक मिश्रित भाव उभरता है- आश्चर्य, सम्मान और कहीं गहरे तक छू जाने वाली करुणा. उन की नजर माया के चेहरे पर टिक जाती है, जैसे वे उस आत्मविश्वास और टूटन की मिलीजुली परतों को पढ़ने की कोशिश कर रहे हों.
अनन्या सब देखसमझ रही थी और कमरे से बाहर चली गई उन दोनों को एकांत देने के लिए. सारी कोशिशें भी तो उसी की थीं. उस को अपनी मां याद आती माया आंटी की बातों में, उन के हंसने के ढंग में, सितार की धुनों में और पापा की आंखों में लौटती चमक में.
कभीकभी पापा रवींद्रनाथ टैगोर की किताब हाथ में लिए अनन्या के साथ माया के घर चले जाते, मायाजी सितार उठातीं, राग पूरिया या यमन की कोई तरंग उठती और पापा चुपचाप उसे घंटों बैठ कर सुनते और किताब में से कविताएं सुनाते.
चाय, पौधे, संगीत, कविता और मौन, इन सब के बीच कुछ ऐसा बुन रहा था जिसे शब्दों में बांधा नहीं जा सकता था. यह प्रेम था या सहानुभूति, या फिर यह किसी टूटे हुए समय का धीरेधीरे जुड़ जाना था.
उस दिन अभिनवजी ने डायरी में वापस आ कर लिखा, ‘जीवन का दूसरा सूरज तेज नहीं होता, वह बस इतना करता है कि सूखी डाल फिर से हरियाने लगती है. माया आई हैं और मैं फिर से एक छोटी सी बगिया बन गया हूं.’
कुछ दिनों बाद शाम जरा अलग थी, आसमान हलका नीला था. देवदारों की लंबी परछाइयां धीरेधीरे छत तक उतर आई थीं और हवा में बेकनिया के फूलों की एक अनकही खुशबू भरी थी. मायाजी उस दिन आईं तो जैसे शाम अपने पूरे सौंदर्य के साथ उतर आई हो. उन्होंने रेशमी पहाड़ी पोशाक पहनी थी, जिस पर नीली कढ़ाई और छोटीछोटी चांदी की बूंदें टंकी थीं.
अभिनवजी उस क्षण उन्हें देख कर कुछ कह नहीं पाए. उन की आंखों में ठहराव था पर उस ठहराव के भीतर हलचल थी, जैसे वर्षों से सूखे ताल में एकाएक कोई पुरानी धारा लौट आई हो. वे दोनों छत पर बैठे रहे, मायाजी ने चुपचाप चाय की प्याली थामी, कुछ क्षण बिना बोले बीत गए. फिर अभिनवजी ने बहुत धीमे, जैसे किसी कविता की पंक्ति गुनगुनाते हों, कहा, ‘‘माया, क्या आप जानती हैं, इन फूलों को मैं आप से कम नहीं सम?ाता. आप के आने से कुछ ऐसा लौट आया है, जिसे मैं ने खो दिया था.’’
मायाजी ने कोई उत्तर नहीं दिया और अपनी उंगली से प्याली के किनारे पर एक वृत्त सा बनाया. उस वृत्त में कोई उत्तर छिपा था, जो शब्दों में नहीं था पर पूरा कहा गया था.
आकाश पर उस क्षण एक हिमालयी मोनाल पंख पसारे गुजरा, नीली, हरी और ताम्बई आभा से चमकता हुआ जैसे स्वयं प्रकृति ने उस पल को रंग देने को भेजा हो और नीचे, छत पर एक अनकहा संबंध जन्म ले चुका था, शब्दों के पार, विलंबित लय में, बस मौन की धीमी धड़कन पर टिके हुए. मोनाल की वह आवाज, मानो आकाश ने उन दोनों के लिए कोई मौन आशीर्वाद भेजा हो.
कोने में रखे पुराने वुडन केस वाले म्यूजिक सिस्टम से धीमीधीमी गजल बह रही थी, ‘कभी यूं भी आ मेरी आंख में, कि मेरी नजर को खबर न हो…’
गजल के सुर हवा में घुलते जा रहे थे. मायाजी ने थोड़े विस्मय और मुसकान के साथ पूछा, ‘‘यह सिस्टम बहुत पुराना लग रहा है, अभी भी काम करता है?’’
अभिनवजी ने उन की ओर देखते हुए कहा, ‘‘हां, इस में कुछ पुरानी यादें बसती हैं और कुछ नई शामें भी.’’
पास ही रखे गमले में खिला था एक हिमालयन गुलबहार का फूल. मायाजी उसे देर तक देखती रहीं, फिर धीमे से पूछा, ‘‘यह हर बार बस बसंत में ही खिलता है?’’
अभिनव मुसकराए, ‘‘जैसे कोई सुंदर शय हर मौसम में नहीं, किसी खास घड़ी में ही खिलती है.’’
गजल अब अगले शेर पर थी, ‘कभी दिन की धूप में ?ाम के कभी शब के फूल को चूम के, यूं ही साथसाथ चलें सदा, कभी खत्म अपना सफर न हो…’
और उस पल ने जैसे कोई पुरानी कविता पूरी कर दी. जब मायाजी जाने लगीं तो सीढि़यों से पलट कर देखा. अभिनवजी ने कोई शब्द नहीं कहा, बस, अपनी हथेली में एक ब्लू पौपी फूल लिए खड़े थे और म्यूजिक सिस्टम अब भी धीमे सुरों में उन्हें बांध रहा था. कुछ कहा नहीं गया, फिर भी सब कह दिया गया था.
तीनचार दिनों बाद अनन्या उस शाम पापा की किताबें ठीक करने के बहाने से उन के कमरे में आई, लेकिन मन कहीं और था. फिर उस ने धीरे से पापा की टेबल पर माया कौस्मिकाजी का भेजा हुआ एक छोटा सा नीला लिफाफा रखा, उस के साथ एक सफेद बटरकप का फूल था. लिफाफा रखते हुए अनन्या की आंखों में वह खुशी, जो किसी गुप्त उदासी को थोड़ा हलका होता देख पाने से आती है.
कुछ दिनों से पापा ने माया कौस्मिकाजी की बातों पर मुसकराना शुरू किया था, खुद को वक्त देना बढ़ा दिया था और पुराना म्यूजिक सिस्टम एक बार फिर से सांस ले रहा था. कुछ देर बाद अभिनवजी का ध्यान टेबल पर गया और उन्होंने चश्मा पहन कर उसे खोला. अंदर 2 टिकट थे. ‘हिमालयन म्यूजिक फैस्टिवल’ के, जो त्सुगलक्खांग मंदिर परिसर, मैक्लोडगंज में होने वाला था, जहां माया कौस्मिका सितारवादन की प्रस्तुति देने वाली थीं और ये दोनों टिकट उन्होंने ही अनन्या के हाथों घर भिजवाए थे. पढ़ते ही अभिनवजी का चेहरा जैसे खिल गया. उन की आंखों में वही पुराना उत्साह लौट आया जो कभी वे किसी व्याख्यान या तितली अनुसंधान के दौरान महसूस करते थे.
‘माया का कार्यक्रम? और वह भी मैक्लोडगंज में?’ उन के स्वर में उत्साह था, जैसे किसी भूली हुई ऋतु का आमंत्रण आ गया हो.
उस लिफाफे में एक पत्र भी था, जिस में लिखा था-
‘प्रिय अभिनव (सीकर औफ साइलैंस)
‘2 दिनों बाद त्सुगलाखांग परिसर में, शांत पहाडि़यों की गोद में सितार ले कर बैठूंगी, अगर तुम्हारा मन कहे तो चले आना.
‘और हां, तुम्हें पता है कि मैं ने आज रवींद्रनाथ टैगोर की एक कविता पढ़ी, उसी किताब से जो तुम एक दिन घर लाए थे और वापस ले जाना भूल गए थे. इस कविता में वे कहते हैं-
‘तुम, मुझे जीवन में अपने प्रेम को उसी प्रकार धारण करने दो, जैसे एक वीणा अपने संगीत को धारण करती है और अंतत: अपने जीवन के साथ मैं इसे तुम को लौटा दूं.’
‘माया’
अनन्या ने मुसकरा कर कहा, ‘‘आप को चलना होगा, पापा. मैं जानती हूं, आप को वहां होना चाहिए, माया आंटी के लिए.’’
पलभर चुप रह कर उन्होंने अपने गले का रूमाल ठीक किया, फिर बोले, ‘‘चलूंगा, क्यों नहीं चलूंगा, माया ने बुलाया है तो मु?ो जाना ही होगा.’’
उन की आवाज में वही कंपन था जो दिल के भीतर बहुत देर से किसी रुकी हुई धुन के फिर से बजने जैसा होता है.
फिर कुछ देर सोचने के बाद उन्होंने धीरे से कहा, ‘‘धन्यवाद अनन्या, मुझे फिर से किसी की नजरों में जिंदा कर देने के लिए. प्रोफाइल बनाने के लिए नहीं, माया से मिलवाने के लिए भी नहीं, बल्कि उस हिस्से से मिलवाने के लिए जिसे मैं ने खुद कब का छोड़ दिया था.’’
‘‘पापा, कभीकभी बच्चों को भी मांबाप को जीना सिखाना पड़ता है,’’ वह पापा का हाथ पकड़ कर बैठ गई. दोनों रो रहे थे.
खिड़की के पास वही पुरानी कुरसी रखी थी, जहां मां अकसर बैठती थीं, सूती साड़ी में लिपटी, शाम की चाय हाथ में लिए और उनींदी आंखों के साथ. अनन्या ठिठकी. ठंडी हवा ने माथा छुआ, मानो मां ने सिर पर हाथ रखा हो.
त्सुगलाखांग की ओर अब एक यात्रा शुरू होने वाली थी, जहां सितार और मौन की भाषा में कुछ अधूरी बातों को फिर से कहने का अवसर मिलने वाला था. Hindi Story
लेखक – अनुजीत इकबाल





