Raja Shivaji Movie Review: फिल्म ‘राजा शिवाजी’ शिवाजी महाराज के जीवन पर आधारित है. शिवाजी महाराज पर बौलीवुड से ले कर मराठी सिनेमा में कई फिल्मों से ले कर सीरियल्स भी बने हैं. हालफिलहाल ‘तान्हाजी छावा’ में उन के कुछ ग्लिम्प्सेस दिखाए गए हैं. मराठी सिनेमा में तो ‘छत्रपति शिवाजी’ और ‘सिंहगढ़’ जैसी फिल्में पहले ही रिलीज हो चुकी हैं. कई फिल्में तो मराठा साम्राज्य के सेनापतियों पर भी बन चुकी हैं. फिर सवाल यह कि इस फिल्म की क्या जरूरत थी? और क्या यह फिल्म कुछ अलग दिखा पाती है?

आजकल पीरियोडिक फिल्में खूब बनने लगी हैं, खासकर डायरैक्टर उन कहानियों में ज्यादा रुचि ले रहे हैं जिन में धर्मों के टकराव के एंगल को भुनाया जा सके. यह फिल्म भी इसी कड़ी में है.

‘राजा शिवाजी’ की कहानी एक स्ट्रौंग हिस्टोरिकल बैकग्राउंड से शुरू होती है. फिल्म 1629 के उस दौर से शुरुआत करती है जब दक्कन में सत्ता की लड़ाई अपने चरम पर थी. शिवाजी महाराज के जन्म से पहले ही उन के नाना लखुजी जाधव (महेश मांजरेकर) की हत्या कर दी जाती है, जो कहानी को एक इमोशनल और पौलिटिकल एंगल देती है. इस घटना के बाद शाहजी राजे को मुहली संधि के लिए जबरन राजी होना पड़ता है. और उन के पत्नी व बच्चों के साथ विस्थापन का दौर शुरू होता है. यहीं से फिल्म यह स्थापित करने की कोशिश करती है कि शिवाजी का जन्म ही अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए हुआ है, लेकिन यही शुरुआत आगे चल कर बहुत ‘डायरैक्ट’ और ओवरसिंप्लिफाइड हो जाती है.

फिल्म के शुरुआती हिस्से में सल्तनतों की आपसी सियासत दिखाई गई है, जिस में शाहजहां (फरदीन खान), बाजीपुर के शासक आदिल शाही (अमोल गुप्ते), सूबेदार शाहजी (सचिन खेड़ेकर) को ले कर खींचतान चलती है. यह वाला पार्ट ध्यान खींचने लायक है. कहानी तेजी से शिवाजी के बचपन और मां जिजाऊ के प्रभाव की ओर बढ़ती है. जिजाऊ (भाग्यश्री) को ऐसी मां के रूप में दिखाया गया है जो शिवाजी के मन में ‘स्वराज’ का बीज बोती हैं.

समस्या यह है कि बचपन से ही शिवाजी को एक ‘चुने हुए नायक’ या कहें ‘मसीहा’ की तरह दिखाया गया है, उन का अपना मानवीय संघर्ष कम दिखाया गया है, बस चीजें होती दिखा दी गई हैं. ‘स्वराज’ का विचार फिल्म के केंद्र में तो होता है, मगर स्वराज क्या है, बस, डायलौग कहलवा कर निबटा दिया गया है. शिवाजी महाराज के बारे में जितना पढ़नेलिखने में मौजूद हो पाया है, उस में समझ आता है कि वे छापामार रणनीति से युद्ध जीता करते थे. इसे मराठी में ‘गनिमी कावा’ कहा जाता है. इस का मतलब, सीधी लड़ाई से बचना, दुश्मन को थकाना और सही मौके पर अचानक हमला करना. इस के अलावा किलों के नैटवर्क और खुफिया तंत्र में भी वे मजबूत थे.

फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे शिवाजी का बड़ा भाई संभाजी भोसले (अभिषेक बच्चन) को अफजल तोप से मार देता है. हालांकि, इस का उल्लेख सीधासीधा कहीं मिलता नहीं है. वहीं शिवाजी की मां अफजल को मार गिराने का वचन लेती है. फिल्म के पहले भाग तक चीजें बहुत तेजी से चलती है. लेकिन दूसरे भाग में कहानी का पूरा फोकस शिवाजी महाराज के अफजल खान (संजय दत्त) के साथ संघर्ष तक सीमित हो जाता है. अफजल खान को एक खतरनाक और क्रूर जनरल के रूप में पेश किया गया है, जो शिवाजी को खत्म करने के लिए निकलता है. फिल्म के अंत में दोनों के बीच राजनीतिक मुलाकात होती है जहां वाघनख से शिवाजी अफजल खान को मार देते हैं. यह हिस्सा थिएटर में तालियां जरूर बटोरता है लेकिन अगर आप इतिहास की बारीकियों की उम्मीद रखते हैं, तो यह काफी सतही लगता है.

शिवाजी महाराज के जीवन के कई अहम पड़ाव, जैसे किलों का निर्माण, प्रशासनिक सोच, मुगलों के साथ जटिल संबंध आदि सब को या तो बहुत जल्दीजल्दी निबटा दिया गया है या पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है. यहां तक कि फिल्म में मुगलों या विदेशी शासकों के खिलाफ हिंदू सैंटिमैंट को दिखाया गया है मगर यह नहीं बताया गया है कि शिवाजी के कार्यकाल में लगभग एकतिहाई सैनिक मुसलिम थे, कुछ तो सेनापति तक थे. दूसरे हाफ में यही कमजोरी और साफ दिखती है. फिल्म बारबार एक ही पैटर्न फौलो करती है, खतरा आता है, शिवाजी भाषण देते हैं, युद्ध होता है, जीत मिलती है. इस दोहराव की वजह से कहानी में नया कुछ महसूस नहीं होता और दर्शक धीरेधीरे थकने लगता है.

फिल्म में अधिकतर किरदार मराठी सिनेमा या कहें कि महाराष्ट्रियन ही हैं. रितेश देशमुख का परफौर्मेंस कहानी को पूरी तरह संभाल नहीं पाता. वे कई जगह ठीक लगते हैं, लेकिन जब कहानी को उन के कंधों पर आगे बढ़ना होता है, तो वे उतना असर नहीं छोड़ पाते. इस के उलट, बाजीपुर की बड़ी बेगम की भूमिका में विद्या बालन कमाल की दिखती हैं. फिल्म में सलमान खान का कैमियो भी दिया गया है, जिस में वह अफजल खान के अंगरक्षक को तब मार डालता है जब वह शिवाजी को लगभग मारने ही वाला होता है. यह एंट्री ताली बजाने वाली बन पड़ी है. सलमान खान ने इस में शिवाजी के अंगरक्षक जीवा महाले की भूमिका निभाई है. महाले पौराणिक संदर्भों में निचले तबके के माने जाते रहे.

फिल्म का अंत अफजल के खात्मे पर होता है, यानी संभावना है कि आगे इस का दूसरा पार्ट आएगा, जिस में मुगल सल्तनत से संघर्ष का जिक्र हो. बात करें फिल्म के ऐक्शन सीन की, तो बहुत ही औसत दर्जे के हैं. अभिषेक बच्चन जमता भी है पर रितेश बहुत फीका लगता है. रितेश ने भरसक ऐक्टिंग करने की कोशिश की है. संजय दत्त सिलसिलेवार तरह से अपनी पिछली फिल्मों वाले जोन में ही हैं, लगता नहीं उन्हें डायरैक्टर कुछ अलग रोल देना चाह रहे हों. पूरी फिल्म कई फिल्मों की कतरनें जोड़ कर बनाई गई लगती है.

फिल्म के वीएफएक्स तो निहायत ही खराब हैं. हाथी और भैंसों वाला सीन तो बिलकुल नकली दिखाई देता है. फिल्म का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर, खासकर अजयअतुल का काम कहानी को ऊंचा उठाने की कोशिश करता है. कई सीन सिर्फ म्यूजिक की वजह से प्रभावी लगते हैं, वरना उन में उतनी ताकत नहीं होती. वहीं विजुअल्स और सिनेमेटोग्राफी, जिन से बहुत उम्मीद थी, औसत लगते हैं. फिल्म का बजट 100 करोड़ रुपए बताया जा रहा है, मगर उस हिसाब से काम दिखता नहीं है. Raja Shivaji Movie Review

 

 

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