Fundamental Right: भारत में राजनीतिक विचारधारा दो मार्गीय है. एक तरफ धर्म का प्रचार करती पार्टियां हैं तो दूसरी तरफ धर्मनिरपेक्ष. केंद्र से ले कर प्रदेश स्तर तक धर्म के आधार पर यह वैचारिक विभाजन साफ है. आज यही विभाजन चुनावी मुद्दा बन गया है. शासन, सुशासन, विकास और मौलिक अधिकार अब चुनावी मुद्दे नहीं रहे.

जदयू के संस्थापक नीतीश कुमार राज्यसभा सदस्य बन गए तो बिहार की राजनीति से उन का रिश्ता टूट गया और नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, कर्पूरी ठाकुर युग का अंत हो गया जिस में गैरधार्मिक पार्टियां शासन कर रही थीं.

धार्मिक और गैरधार्मिक जिन को धर्मनिरपेक्ष माना जाता है के राजकाज में मुख्य अंतर नीति निर्माण के आधार और प्राथमिकताओं में होता है. धार्मिक पार्टियां पहचान और सांस्कृतिक पहचान को अपना आधार बना कर राजनीति करती हैं. इन से समस्या यह होती है कि एक तरफ ये अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए खतरा और बहुसंख्यवाद को बढ़ावा देती हैं और दूसरी तरफ धार्मिक कर्मकांडों को सरकारी नीतियों का हिस्सा बना लेती हैं.

गैरधार्मिक पार्टियां धर्मनिरपेक्षता, विकास और संवैधानिक नागरिक समानता व अधिकारों के आधार पर राजनीति करती हैं. इन की नीतियां तर्कसंगत, साक्ष्य आधारित और संवैधानिक नियमों व सिद्धांतों पर आधारित होती हैं. ये शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे, रोजगार और कानून का शासन जैसे कामों पर ध्यान देती हैं. इन के निर्णय धर्म आधारित भेदभाव के बिना सभी नागरिकों के लिए समान होते हैं.

धार्मिक पार्टियां इन पर विरोधी सांस्कृतिक पहचान की उपेक्षा करने का आरोप लगाती हैं. धार्मिक पार्टियां आस्था को शासन का केंद्र मानती हैं जबकि गैरधार्मिक पार्टियां ‘नागरिक अधिकार’ और ‘विकासात्मक समानता’ व संविधान की भावना को प्राथमिकता देती हैं

बिहार को कितना बदल पाए नीतीश कुमार

नीतीश कुमार लगभग 20 साल बिहार के मुख्यमंत्री रहे. इतना समय कम नहीं होता. वे समाजवादी विचारधारा के नेता हैं. जयप्रकाश नारायण, डाक्टर राममनोहर लोहिया, कपूर्री ठाकुर की विचारधारा को आगे ले कर वे चले. उन के साथ शरद यादव, जौर्ज फर्नांडिस, लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान जैसे नेता थे.

सत्ता की चाह में गैरकांग्रेसवाद के नारे पर समाजवादी विचारधारा के नेता 1977 से जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के करीब आए. इस के बाद समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता विचार पीछे छूटते गए. नीतीश कुमार भी खुद को धर्मनिरपेक्ष कहतेकहते हकीकत में धर्म की राजनीति करने वालों के साथ खड़े ही नहीं हो गए, उन कामों में सक्रिय हाथ बंटाने भी लगे.

नीतीश कुमार लगभग वैसे ही भाजपा के साथ बिहार सरकार चलाते रहे जैसे दूसरे भाजपा शासित प्रदेशों की सरकारें चलाई जा रही हैं. और, करदाताओं का पैसा धार्मिक पाखंडों पर खर्च ही नहीं किया गया, लोगों को उकसाया भी गया कि वे समाजवाद को छोड़ कर वर्णव्यवस्था, हिंदूमुसलिम भेद, निरंतर पूजापाठ को अपना लें. नीतीश कुमार ने समाजवादी सोच को छोड़ कर धर्म के पाखंड में बिहार की जनता को धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी. उन्होंने पुनौरा धाम के विकास के लिए बिहार की गरीब जनता के 882 करोड़ रुपए राममंदिर की तर्ज पर भव्य मंदिर निर्माण के लिए दिए.

नीतीश कुमार ने जनता दल यूनाईटेड की नीतियों को छोड़ कर भारतीय जनता पार्टी की नीतियों का भगवा चोंगा पहन लिया था और गया में विष्णुपद मंदिर के आसपास के घाटों का सौंदर्यीकरण में करदाताओं का पैसा फूंक दिया. यही नहीं, रामायण सर्किट व शिव शक्ति सर्किट के तहत अहल्या स्थल, मुंडेश्वरी देवी धाम पर पैसा फूंका. नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रहते कोविड के दिनों में बिहारी मजदूरों को दूसरे राज्यों से रेलों से नहीं ला पाए. उन्हें सैकड़ों मील पैदल चल कर आना पड़ा. कोविड के संक्रमण का खतरा ले कर रेलों और बसों को आसानी से चलवाया जा सकता था.

नीतीश कुमार ने भारतीय जनता पार्टी को खुश करने के लिए उस के मंदिर एजेंडे को बढ़ाने के लिए सैकड़ों मंदिरों की चारदीवारियों पर जनता का कर से वसूला पैसा लगाया. मैथिली ब्राह्मणों को खुश करने के लिए कुर्मी जाति से आने वाले नीतीश कुमार ने जनता दल यूनाईटेड को समाजवादी सैक्यूलर पार्टी से धार्मिक पार्टी बना डाला. उन के विधायकों ने विरोध नहीं किया जबकि वे लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल व कांग्रेस के सहयोग से सैक्युलर वोटों से जीत कर आए थे. सत्ता और बंगले की चाहत इतनी जोरदार रही कि सब के सब गंगा आरती जैसे व्यर्थ के पूजापाठ और शहरों के गंगा किनारे मैरीन ड्राइवों को स्नान घाटों में बदलने को तैयार हो गए.

बिहार की बदहाली तो एक नमूना है. देशभर में सैक्युलर गैरधार्मिक पार्टियां भी भारतीय जनता पार्टी के कुछ वोट बटोरने के चक्कर में आमतौर पर धार्मिक मामलों में सरकारी खजाने का मुंह खोल ही देती हैं. नीतीश कुमार एक तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अनुसरण करने लगे हैं और जनता दल यूनाईटेड अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सैकड़ों घटकों में से एक बन कर रह गया है.

धर्म की राजनीति से पिछड़ गए यूपी और बिहार

यह नहीं भूलना चाहिए कि राम मंदिर को ले कर चलने वाली पार्टी भाजपा शासित महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बिहार की प्रतिव्यक्ति आय कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे दक्षिण भारत के कई प्रमुख राज्यों से काफी पीछे है. कर्नाटक की प्रतिव्यक्ति आय 2,04,605 रुपए, तमिलनाडु 1,96,309 रुपए और तेलंगाना की 1,87, 912 रुपए है. इन के मुकाबले उत्तर प्रदेश की प्रतिव्यक्ति आय 1,08,572 रुपए, बिहार की 69,321 रुपए मात्र है.

बिहार 20 सालों के नीतीश कुमार के सुशासन के बावजूद दक्षिणी राज्यों से कहीं पिछड़ा रहा क्योंकि इन 20 सालों में नीतीश कुमार का गठबंधन भारतीय जनता पार्टी के साथ ही ज्यादा रहा. उत्तर प्रदेश और बिहार विकास की दौड़ में सब से पीछे हैं तो इस की सब से बड़ी वजह यह है कि 1990 के बाद से इन राज्यों में उन राजनीतिक पार्टियों का कब्जा हो गया जो जाति और धर्म पर सरकार चला रही थीं. उन का प्रदेश के विकास से कोई लेनादेना नहीं है. बिहार और उत्तर प्रदेश में ऐसा कोई नया काम नहीं हुआ कि जिस से इन के आने वाले कल में कोई सुधार दिखता हो. नीतीश कुमार ने 20 सालों के सुशासन के बावजूद भाजपा के सहयोग के कारण उन के राज्य की स्थिति भाजपा शासित दूसरे राज्यों से और ज्यादा खराब रही.

राजस्थान की प्रतिव्यक्ति आय 1,67,964 रुपए है, मध्य प्रदेश की 1,42,565 रुपए, असम की 1,35,787 रुपए, छत्तीसगढ़ की 1,47, 361 रुपए और झारखंड की 1,15,960 रुपए. सिर्फ गुजरात ही एक अपवाद है. 1960-61 से 2023-24 के बीच की तुलना करें औसत में अंतर में उत्तर प्रदेश में 31.6 फीसदी, बिहार में 37.5 फीसदी, राजस्थान में 5 फीसदी, मध्य प्रदेश में 5 फीसदी आय घटी है जबकि तेलंगाना की 103.7 फीसदी, कर्नाटक की 84 फीसदी, केरल की 67.9 फीसदी तमिलनाडु की 61.9 फीसदी और आंध्र प्रदेश की 41.7 फीसदी आय बढ़ी है.

1947 में जब देश आजाद हुआ, उस के बाद लोकसभा और विधानसभा के चुनाव शुरू हुए तो कांग्रेस ने चुनाव जीतने के लिए चुनावी घोषणाएं नहीं कीं बल्कि चुनाव जीतने के बाद विकास के काम किए. इन में आईआईटी, एम्स, पावर प्लांट प्रमुख थे. जब देश और प्रदेश पर धार्मिक सरकारों का राज स्थापित हुआ तो वहां पर मंदिरों का विकास ज्यादा होने लगा. अयोध्या, काशी और मथुरा, गया, सीतामढ़ी के मंदिरों से जितनी आय प्रदेश को हो रही है उतनी आय किसी उद्योग से नहीं हो रही.

धर्म की राजनीति करने वाले दलों के सामने धर्म की जरूरतों को पूरा करने की चुनौती होती है. इन दलों को यह लगता है कि अगर धर्म के एजेंडे को पूरा नहीं करेंगे तो उन को वोट नहीं मिलेगा. भारतीय जनता पार्टी ने शुरू से ही अपने वोटर से 3 मुद्दों पर वोट मांगा था. इन में पहला अयोध्या में राम मंदिर, दूसरा कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म करना और तीसरा समान नागरिक संहिता कानून बनाना था.

भाजपा सत्ता में आई तो उस ने अपने ये काम पूरे किए. भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में अच्छे दिन, विकास, बुलेट ट्रेन, स्मार्ट सिटी जैसे और भी तमाम बातें थीं लेकिन इन को पूरा नहीं किया गया और भाजपा व उस के सहयोगी दल इन की बातें नहीं करते.

क्या हुआ बुलेट ट्रेन का

मोदी सरकार की बुलेट ट्रेन योजना अभी भी पूरी नहीं हुई है. इस की योजना 2014 में बनी थी. मोदी सरकार की महत्त्वाकांक्षी मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना का काम अभी तक पूरा नहीं हुई है. इस पर अभी भी काम चल रहा है. 508 किलोमीटर लंबे कौरिडोर में से 320 किलोमीटर से अधिक का वायाडक्ट यानी पुल का काम पूरा बताया जा रहा है.

सूरत, वापी, बिलिमोरा, भरूच और वडोदरा सहित गुजरात के कई स्टेशनों पर काम तेज गति से चल रहा है. पहली बुलेट ट्रेन 350 किलोमीटर प्रति घंटा की गति से दौड़ने के लिए तैयार की जा रही है. इस में पूरा संदेह है कि यह छोटी दूरी की बुलेट ट्रेन हवाई यात्रियों को आकर्षित करेगी. बुलेट ट्रेन की बात दब जाए, इस के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद ही नईनई वंदे भारत रेल गाडि़यों को चलाने के लिए झंडी दिखाते रहते हैं. जो काम रेलमंत्री को करना चाहिए वह काम खुद नरेंद्र मोदी करते हैं ताकि जनता यह सवाल पूछ न सके कि बुलेट ट्रेन का क्या हुआ.

मोदी सरकार के लिए बुलेट ट्रेन से अधिक महत्त्वपूर्ण काम मंदिर बनाने का लगा. इस की वजह यह थी कि मोदी को धर्म के नाम पर वोट मिलते हैं. इसलिए न केवल राममंदिर बल्कि बिहार में सीता मंदिर, वाराणसी में काशी विश्वनाथ का मंदिर और मथुरा में मंदिरों का दर्शन करने के लिए विकसित किया गया. नीतीश कुमार ने पहले तो आनाकानी की पर बाद में वे नरेंद्र मोदी के रंग में नहा गए.

धर्म पर राजनीति करने वाले दल धर्म के आसपास ही अपना विकास देखते हैं. यह बात केवल भारत की ही नहीं है, दुनिया के तमाम देश अब धर्म की राजनीति पर आगे बढ़ रहे हैं. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की जीत के पीछे चर्च की राजनीति का प्रभाव रहा है.

नेपाल, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका और भारत एक ही तरह के राजकाज से धर्म की राजनीति चलाते रहे हैं. दक्षिण एशिया के इन सभी देशों पर धार्मिक कट्टरता और संकीर्णता का खतरा मंडरा रहा है. इन देशों में धार्मिक कट्टरता लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए एक गंभीर खतरा है. चिंताजनक बात यह है कि यह तेजी से बढ़ रही है. राजशाही का खात्मा कर के जनता ने अपने लिए एक लोकतांत्रिक व्यवस्था चुनी थी. अब नेपाल को एक हिंदू राज्य में बदलने की कोशिश हो रही थी जो फिलहाल नए चुनावों के बाद शायद रुकी है. यही हाल बंगलादेश का हुआ है. श्रीलंका में लोकतंत्र खत्म हो गया है.

भारत के आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद जैसे हिंदू समर्थक दलों के लोग नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते थे पर फिलहाल यह टल गया है क्योंकि बालेन शाह की सरकार धर्म को कोई महत्त्व नहीं दे रही. श्रीलंका में अहिंसा में विश्वास रखने वाले बौद्ध धर्म के कई भिक्षुओं ने मुसलमानों और तमिल हिंदुओं के खिलाफ आंदोलन चला रखा है. मुसलमानों के धार्मिक स्थलों और उन की बस्तियों पर अकसर हमले किए जाते हैं. देश में मुसलमानों के खिलाफ नफरत में तेजी से वृद्धि हुई है. पहले तमिलईलम को ले कर लंबा गृहयुद्ध चला था.

बर्मा यानी म्यांमार में तो बौद्ध भिक्षु ही नहीं, वहां की सरकार भी रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ है. सैकड़ों रोहिंग्या मुसलमान मारे जा चुके हैं और उन की कई बस्तियां जला कर खाक कर दी गईं. हजारों रोहिंग्या भाग कर दूसरे देशों में शरण ले रहे हैं. बंगलादेश में मुसलिम कट्टरपंथी संगठन जोर पकड़ रहे हैं. धर्म के नाम पर कई प्रमुख आतंकवादी संगठन अस्तित्व में आए हैं. वहां के हिंदू अल्पसंख्यक खतरे में हैं. उन के साथ हिंसा की घटनाएं सामने आती रहती हैं. धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव और शोषण के मामले धीरेधीरे बढ़ते जा रहे हैं. हर साल हजारों हिंदू बंगलादेश छोड़ कर भारत में शरण ले रहे हैं. बर्मा का आर्थिक विकास पड़ोसी थाईलैंड, इंडोनेशिया, सिंगापुर, चीन से कहीं कम है.

पाकिस्तान में लोकतंत्र को सब से बड़ा खतरा ही वहां के धार्मिक कट्टरपंथियों से है. धार्मिक कट्टरपंथ का मुकाबला करने में वहां का लोकतंत्र फेल हो गया है. ईशनिंदा जैसे विषयों से जुड़े कानूनों ने धार्मिक चरमपंथ को बढ़ावा दिया है और अल्पसंख्यक पहले से अधिक असहाय व असुरक्षित हो गए हैं. धार्मिक कट्टरपंथ देश के लोकतांत्रिक संस्थानों पर भी असर डालने लगे हैं. दूसरे राजनीतिक दलों में धार्मिक कट्टरता का मुकाबला करने का संकल्प खत्म हो गया है.

भारत में 80 बनाम 20 की बात कर के 1980 के बाद सभी चुनाव लड़े और जीते जा रहे हैं. ‘बंटोगे तो कटोगे’ जैसे नारे भारत की हालत को बताने में सक्षम है. पहले दक्षिण एशिया में भारत, सब से गरीब होने के बावजूद, मजबूत लोकतंत्र माना जाता था. हिंदू समर्थक दक्षिणपंथी दल के अपने बल पर सत्ता में आने से यहां भी सवाल खड़े हो गए हैं. भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग चल रही है. एक तरह से 20 फीसदी अल्पसंख्यकों को राजनीति की मुख्यधारा से बाहर कर दिया गया है. चुनाव आयोग को अब इस का ठेका दे दिया गया है कि वह भाजपा के धार्मिक एजेंडे को अमलीजामा पहनाए.

धार्मिक कट्टरपंथी लोकतंत्र में विश्वास नहीं रखते और जनता के मौलिक अधिकारों के हनन से पीछे नहीं हटते. दक्षिण एशिया देशों में जो गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और पिछड़ापन है, इस की सब से बड़ी वजह धार्मिक कट्टरवाद ही है. इस का समाधान धार्मिक कट्टरवाद में नहीं, बल्कि केवल उदार, सभी को अधिकार देने वाले लोकतंत्र में निहित है.

लोकतंत्र में सरकार का काम देश चलाने का होता है. मंदिर चलाना सरकार का काम नहीं होता. जबकि, मौजूदा सरकार मंदिर चलाने में जुटी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस की मिसाल हैं. नीतीश कुमार ने कुछ दिनों इस का विरोध किया, फिर वे भी इसी राह पर चल पड़े. उन्होंने बिहार के साथ पूरे उत्तर भारत का नाश कर दिया है.

सरकार का काम मंदिर चलाने का नहीं

2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने यह साबित करने का काम किया कि सरकार का काम मंदिर चलाने का भी है. इस का बड़ा उदाहरण अयोध्या का राम मंदिर, काशी विश्वनाथ और मथुरा का मंदिर है. जहां प्रधानमंत्री लगातार आतेजाते रहे हैं. नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने कार्यकाल के दौरान प्रमुख मंदिरों, तीर्थस्थलों और धार्मिक आयोजनों में हिस्सा लिया.

नरेंद्र मोदी ने जब लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया तो चुनाव क्षेत्र के रूप में वाराणसी को चुना, जहां काशी विश्वनाथ मंदिर मुद्दा था. अयोध्या, काशी और मथुरा भाजपा के एजेंडे में थे. वाराणसी से सांसद बनने के बाद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री ने काशी के विकास पर ध्यान दिया. वहां काशी विश्वनाथ मंदिर और काशी तमिल संगम जैसे आयोजन किए. इस के बाद गुजरात में सोमनाथ मंदिर दर्शन और शौर्ययात्रा में हिस्सा लिया. इस के बाद महाराष्ट्र के नासिक में कालाराम मंदिर में पूजा की.

नरेंद्र मोदी ने दक्षिण भारत के लगभग सभी बड़े मंदिरों की यात्राएं की हैं. केरल में गुरुवयूर और श्री रामास्वामी मंदिर में फोटो खिंचाए. इस के अलावा आंध्र प्रदेश लेपाक्षी के वीरभद्र मंदिर और तमिलनाडु के रामेश्वरम, श्रीरंगम के प्रमुख मंदिरों के दर्शन किए. नरेंद्र मोदी ने छत्तीसगढ़ डोंगरगढ़ में बम्लेश्वरी मंदिर का दौरा किया था. इस के अलावा वे उत्तराखंड में केदारनाथ, बद्रीनाथ, असम में कामाख्या मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों का भी नियमित रूप से दौरा करते रहे हैं. चुनावों के बीच उन्हें टूटे पुल देखने का मौका नहीं मिलता पर कोई मंदिर नहीं छोड़ते.

मथुरा के कृष्ण मंदिर में प्रधानमंत्री के रूप में गए. अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास और उद्घाटन के मौके पर वे मुख्य जजमान की भूमिका में रहे. 2024 के राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह से पहले उन्होंने 11 दिनों तक देशभर के कई प्रसिद्ध मंदिरों का दौरा किया. देशभर के मंदिरों में उन के दौरे तो हुए ही, मंदिर वाले शहरों को चमकाने में सरकारी पैसे को बेतहाशा विकास के नाम पर खर्च किया गया. यह साबित करने की कोशिश की गई कि मंदिरों के जरिए पैसा कमाया जा सकता है. उत्तर प्रदेश के महाकुंभ को भव्य से भव्य तरह से आयोजित किया गया और गंगा के पानी से ज्यादा करदाता का पैसा बहा.

2025 के साल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की धार्मिक यात्राओं को देखें तो

5 फरवरी, 2025 को प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ में त्रिवेणी तट पर संगम में डुबकी लगाई और पूजा की.

2 मार्च को गुजरात के सोमनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंग के दर्शन और विशेष पूजा की. 6 मार्च को मुखवा मंदिर जहां गंगा शीतकालीन विश्राम करती है वहां पूजा और गंगा आरती की.

11 अप्रैल, 2025 को गुरुजी महाराज मंदिर ईसागढ़, मध्य प्रदेश के आनंदपुर धाम कार्यक्रम में हिस्सा लिया. 6 अप्रैल, 2025 को रामानाथ स्वामी मंदिर में रामनवमी के अवसर पर पूजन तथा नए पंबन ब्रिज कार्यक्रम में हिस्सा लिया. 11 अप्रैल, 2025 को गुरुजी महाराज मंदिर, आनंदपुर धाम परिसर में पूजा के कार्यक्रम में भागीदारी की. 27 जुलाई, 2025 को बृहदस्वरा मंदिर दर्शन के लिए पहुंचे. वहां मंदिर में चोल इतिहास से जुड़े उत्सव में हिस्सा लिया.

22 सितंबर, 2025 का माता त्रिपुरा सुंदरी मंदिर उदयपुर, त्रिपुरा में मंदिर परिसर के उद्घाटन कार्यक्रम में हिस्सा लिया. 30 सितंबर, 2025 को चितरंजन पार्क के दुर्गा मंदिर, दिल्ली में नवरात्र के दौरान पूजाअर्चना कार्यक्रम में हिस्सा लिया. 16 अक्तूबर, 2025 को श्रीशैलम मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग मंदिर में पूजा की.

15 नवंबर, 2025 को देवमोगरा मंदिर नर्मदा, गुजरात में जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर दर्शन किए. इस के बाद 25 नवंबर, 2025 राम जन्मभूमि मंदिर शिखर पर ध्वज आरोहण तथा पूजा की. 25 नवंबर, 2025 को ब्रह्म सरोवर मंदिर कुरुक्षेत्र, हरियाणा में दर्शन और पूजा की. 28 नवंबर, 2025 श्री पुतिगे श्री कृष्ण मठ उडुपी, कर्नाटक मंदिर दर्शन और पूजा कार्यक्रम में हिस्सा लिया. 28 नवंबर, 2025 को ही श्री संस्थान गोकर्ण पर्तगाली जीवोत्तम मठ कानाकोना, गोवा में आध्यात्मिक यात्रा और दर्शन किए.

यही नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब भी विदेश यात्राएं कीं, वहां भी वे हिंदुओं के नए व पुराने मंदिरों के दर्शन अवश्य करने गए. 2024 में यूएई के आबूधाबी के हिंदू मंदिर की स्थापना में नरेंद्र मोदी गए. इस को खाड़ी देशों में बना पहला भव्य मंदिर माना जाता है. 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी नेपाल गए. वहां पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा की. तब वहां धर्मनिष्ठ कम्युनिस्टों की सरकार थी. बाली यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडोनेशिया के मंदिर में दर्शन किया. 2016 में केन्या के इस्कौन मंदिर में वे दर्शन करने गए. इसी तरह से आस्ट्रेलिया के सिडनी मंदिर में पूजा की.

किसी भी देश की उन्नति उस के लोगों की पूजापाठ से नहीं बल्कि निर्माण से, उत्पादन से, सही प्रबंध से होती है. इस के लिए चर्च, मसजिद, गुरुद्वारे या मंदिरों में आस्था की बाढ़ नहीं चाहिए बल्कि अर्थव्यवस्था और कानूनी संस्थाओं में जनता के विश्वास की जरूरत होती है. हर धार्मिक पार्टी नागरिक के बहुत से मानव अधिकार उस से छीन कर पूजापाठ कराने वाली संस्थाओं के हाथों गिरवी रख देती है. Fundamental Right

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