Chhattisgarh Freedom of Religion Act 2026: सत्ता में रहते हुए असली मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने का सबसे आसान रास्ता धर्म की राजनीति है यह बात छत्तीसगढ़ में बीजेपी सरकार ने साबित कर दिया है. बजट सत्र में पारित छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक-2026 पर राज्यपाल रमेन डेका ने मुहर लगा दी है. अब यह कानून लागू हो गया है. इसमें धर्मांतरण पर 7 से 10 साल की कैद, 5 लाख से 25 लाख तक जुर्माना और सामूहिक मामलों में आजीवन कारावास तक का प्रावधान है. बीजेपी इसे अवैध धर्मांतरण रोकने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है लेकिन हकीकत यह है कि यह बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीति का नया अध्याय है जिसका मकसद विकास, बेरोजगारी, अशिक्षा, अपराध और महंगाई जैसे असली मुद्दों से जनता का ध्यान हटाना है.
छत्तीसगढ़ में धर्मान्तरण के खिलाफ 1968 का पुराना कानून पहले से मौजूद था. तब यह राज्य मध्य प्रदेश का हिस्सा था. बीजेपी ने 2023 के चुनाव में सत्ता में आने के बाद वादा किया था कि धर्मान्तरण के खिलाफ नया और सख्त कानून लाएंगे. 2026 में जब बीजेपी को सत्ता में आये दो-ढाई साल हो गए अचानक इस बिल को प्राथमिकता दी गई क्योंकि राज्य में किसान कर्ज में डूबे हैं, युवा बेरोजगारी से जूझ रहे हैं, नक्सली हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही और महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है. इन तमाम असफलताओं को छुपाने के लिए धर्मांतरण का डर दिखाना बीजेपी की पुरानी ट्रिक है.
नाम से तो यह कानून धर्म के स्वातंत्र्य का आभास देता है लेकिन असल में यह संविधान के आर्टिकल 25 के धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर हमला है. इसमें जबरदस्ती, धोखा, प्रलोभन या विवाह के नाम पर किसी भी तरह के रूपांतरण को गैरकानूनी करार दिया गया है लेकिन कौन तय करेगा कि प्रलोभन क्या है? असल में छत्तीसगढ़ की ईसाई मिशनरियों और चर्चों पर निशाना साधने के लिए यह कानून बनाया गया है. ईसाई समाज ने पहले ही इसका विरोध किया है. हजारों लोग रैली निकाल चुके हैं और इसे काला कानून बता रहे हैं लेकिन बीजेपी को माईनॉरिटीज के चिल्लाने से कभी फर्क नहीं पड़ता. बीजेपी का एकमात्र मकसद वोट बैंक के लिए ध्रुविकरण की राजनीती है.
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