Fundamental Right: भारत में राजनीतिक विचारधारा दो मार्गीय है. एक तरफ धर्म का प्रचार करती पार्टियां हैं तो दूसरी तरफ धर्मनिरपेक्ष. केंद्र से ले कर प्रदेश स्तर तक धर्म के आधार पर यह वैचारिक विभाजन साफ है. आज यही विभाजन चुनावी मुद्दा बन गया है. शासन, सुशासन, विकास और मौलिक अधिकार अब चुनावी मुद्दे नहीं रहे.
जदयू के संस्थापक नीतीश कुमार राज्यसभा सदस्य बन गए तो बिहार की राजनीति से उन का रिश्ता टूट गया और नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, कर्पूरी ठाकुर युग का अंत हो गया जिस में गैरधार्मिक पार्टियां शासन कर रही थीं.
धार्मिक और गैरधार्मिक जिन को धर्मनिरपेक्ष माना जाता है के राजकाज में मुख्य अंतर नीति निर्माण के आधार और प्राथमिकताओं में होता है. धार्मिक पार्टियां पहचान और सांस्कृतिक पहचान को अपना आधार बना कर राजनीति करती हैं. इन से समस्या यह होती है कि एक तरफ ये अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए खतरा और बहुसंख्यवाद को बढ़ावा देती हैं और दूसरी तरफ धार्मिक कर्मकांडों को सरकारी नीतियों का हिस्सा बना लेती हैं.
गैरधार्मिक पार्टियां धर्मनिरपेक्षता, विकास और संवैधानिक नागरिक समानता व अधिकारों के आधार पर राजनीति करती हैं. इन की नीतियां तर्कसंगत, साक्ष्य आधारित और संवैधानिक नियमों व सिद्धांतों पर आधारित होती हैं. ये शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे, रोजगार और कानून का शासन जैसे कामों पर ध्यान देती हैं. इन के निर्णय धर्म आधारित भेदभाव के बिना सभी नागरिकों के लिए समान होते हैं.
धार्मिक पार्टियां इन पर विरोधी सांस्कृतिक पहचान की उपेक्षा करने का आरोप लगाती हैं. धार्मिक पार्टियां आस्था को शासन का केंद्र मानती हैं जबकि गैरधार्मिक पार्टियां ‘नागरिक अधिकार’ और ‘विकासात्मक समानता’ व संविधान की भावना को प्राथमिकता देती हैं
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